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प्रसंग : फासीवादी उभार का भाषाई पहलू PDF Print E-mail
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Sunday, 27 April 2014 10:21

लाल्टू

जनसत्ता 27 अप्रैल, 2014 : फासीवाद एक सामूहिक मनोरोग है जो अनुकूल ऐतिहासिक परिस्थितियों में सिर उठाता है। पिछले दो दशक में भारत में लगातार इसकी ताकत बढ़ते रहने के कई कारण हैं। इन कारणों पर बहुत सारे चिंतक विमर्श करते रहते हैं। पर एक कारण ऐसा भी है, जिस पर बातचीत कम हुई है और सुनियोजित ढंग से नहीं हुई है। अगर हम यह देखें कि बीस सालों में कौन-सी बातें एक जैसी रफ्तार से बढ़ती रही हैं, तो उनमें एक मुद््दा भाषा का होगा।

यह हाल के दशकों में ही हुआ है कि भारत के संपन्न वर्गों ने जबरन अंगरेजी को भारतीय भाषा बना दिया है। आजादी के तुरंत बाद अंगरेजी एक कामकाजी भाषा तो थी, पर शायद ही कोई इसे तब भारतीय भाषा कहता हो। अब स्थिति बिल्कुल उलट गई है। संपन्न वर्गों की एक ऐसी श्रेणी है जो यह सुनते ही कि आप अंगरेजी को भारतीय भाषा नहीं मानते, आप पर तरह-तरह के आक्षेप लगाएगी कि आप संकीर्ण सोच में फंसे हैं। हालांकि सचमुच अंगरेजी भारतीय भाषा आज भी नहीं है, क्योंकि इसका इस्तेमाल संपन्न वर्गों के लोग ही कर पाते हैं। अगर इस आधार पर किसी देश की भाषा तय हो तो उन्नीसवीं सदी में फ्रांसीसी भाषा को आधे से अधिक यूरोपीय देशों की भाषा माना जाता। तुर्गनेव तक ने अपना शुरुआती लेखन फ्रांसीसी भाषा में किया था। ऐसा कोई नहीं कहेगा कि फ्रांसीसी रूस की भाषा थी, पर हमारा देश है कि यहां अंगरेजी भारतीय भाषा नहीं है कहते ही चिल्ल-पों मच जाती है। आर्थिक दृष्टि से जैसा भी हो, मूल्यों की दृष्टि से भारतीय समाज आज भी मुख्यत: सामंती है। और फासीवाद के उभार में एक जरूरी कारण सामंती मूल्यों का वर्चस्व है। 

हममें से कई लोग मजबूरी में अंगरेजी का इस्तेमाल करते हैं, पर अधिकतर मान चुके हैं कि अंगरेजी के बिना अब कोई राह नहीं। यह बड़ी विडंबना है। एक समय था जब तमाम मुसीबतों के बावजूद फारसी और संस्कृत तक में समकालीन यूरोपीय कृतियों के अनुवाद उपलब्ध होते थे। होना यह तय था कि समय के साथ इन शास्त्रीय भाषाओं के अलावा बोलचाल की भाषाओं में सामग्री उपलब्ध हो। और तकनीकी तरक्की से यह काम आसान भी होता गया है। पर जापान, चीन के बरक्स हमारे यहां बहुत कम ही लोग इस तरह के शोध या तकनीकी-विकास में लगे हैं, जिससे एक से दूसरी भाषाओं में अनुवाद का काम आसानी से हो सके।

भाषा के महत्त्व पर सापिर, ह्वोर्फ, वायगोत्स्की से लेकर स्टीवेन पिंकर तक अनगिनत विद्वानों ने लिखा है। हमारे देशी विद्वान इनको पढ़ते-पढ़ाते हैं और अंगरेजी में हमें बताते हैं कि थोपी गई भाषा मनुष्य के सामान्य विकास में बाधा पहुंचाती है और कई तरह की विकृतियां पैदा करती है। समझना मुश्किल है कि ऐसे ज्ञान-पापी रातों को सोते कैसे होंगे। हम जो कह रहे हैं निरंतर उसके विपरीत आचरण कर रहे हैं।

एक तर्क यह है कि भारत की इतनी सारी विविध भाषाओं में काम कर पाना संभव नहीं है। हम गरीब हैं और हमारे पास पर्याप्त संसाधन नहीं हैं। यह झूठ चलता रहता है, जबकि भारत दुनिया में मारक अस्त्रों का सबसे अधिक आयात करने वाला देश है। राष्ट्रीय बजट का एक चौथाई सुरक्षा खाते में जाता है। अगर इस बात को छोड़ भी दें तो भी सवाल यह है कि अंगरेजी के अलावा हम किसी भारतीय भाषा में पढ़ते-लिखते हैं या नहीं। राज्य स्तर पर स्थानीय भाषा में विमर्श हो और राष्ट्रीय स्तर का विमर्श अंगरेजी में हो, इसमें आज कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए। हो यह रहा है कि मुद््दों की गहराई तक जाने के लिए पठनीय या शोध सामग्री ढूंढ़ने वाले अधिकतर लोग अंगरेजी के अलावा कुछ पढ़-लिख नहीं रहे। ऐसा करते हुए उन्होंने खुद को जमीनी सच्चाइयों से भी काट लिया है और जब स्थितियां अपनी समझ से अलग बिगड़ती हुई दिखती हैं तो उन्हें अचंभा होता है। आखिर इसमें आश्चर्य क्या कि जब बहुसंख्यक लोगों के साथ बातचीत के लिए पोंगापंथियों की भरमार है और समझदार लोगों का अभाव है तो देश में फासीवाद का उभार दिखने लगा है।

देश के अधिकतर लोग टीवी देख कर अंग्रेजी की गुटर-गूं सुन तो लेते हैं, पर उन्हें यह भाषा समझ नहीं आती। अंगरेजी में वंचितों के पक्ष में प्रखर भाषण दे रहा विद्वान उनके लिए कुछ तो मनोरंजन का पात्र है, और कुछ अवचेतन में पलते आक्रोश का कारण। यही आक्रोश आखिर फासीवादी विकृतियों में बदलने में मदद करता है। मजेदार बात यह है कि अंगरेजी वाले यह सोचते हैं कि उनकी बहसों को देश गंभीरता से ले रहा है।


अरे, जो अंगरेजी समझता ही नहीं, वह इस गुटर-गूं को क्या समझेगा!

भाषा सिर्फ भाषा नहीं होती, हम जो भाषा बोलते हैं वही हमें परिभाषित करती है। सापिर-ह्वोर्फ ने भाषाई निश्चितता का सिद्धांत दिया था, कि भाषा के अलावा हमारे अस्तित्व में और कुछ अर्थ ही नहीं रखता, जिसे हम दुनिया मानते हैं, उसे भाषा ही हमारे लिए बनाती है- यह शायद कुछ अतिरेक ही था; पर उसके बाद भी तमाम भाषाविदों ने बार-बार चेताया है कि भाषा ही जैविक विकास का सबसे महत्त्वपूर्ण पहलू है। हमारी विश्व-दृष्टि, जीवन के प्रति हमारा नजरिया, इनके साथ भाषा का गहरा संबंध है। हम अपनी बात को औरों तक पहुंचाने, सही-गलत के बारे में अपनी समझ साझा करने के लिए भाषा का इस्तेमाल करते हैं। यह अकारण नहीं है कि मोदी की भाषा हमारी सांप्रदायिक अस्मिता को जगाने में सफल हो जाती है और गांधी से लेकर वाम के तमाम समूहों का विमर्श, जिसमें लगातार अंगरेजी बढ़ती जा रही है, बड़ी संख्या में लोगों को मुश्किल से छू पा रहा है।

जो लोग देश के सामान्य जन पर बात करते हैं और किसी भी भारतीय भाषा को पढ़ते-लिखते नहीं हैं, उन्हें खारिज करना जरूरी है, क्योंकि देश में फासीवाद के उभार का एक कारण वे खुद हैं। कई तो ऐसे हैं कि सिर्फ अंगरेजी में हल्का-फुल्का लिख कर स्व-घोषित पंडित बने घूमते हैं। वह कुछ भी कहते हैं तो अंगरेजी मीडिया उसे उछालता है। देशी भाषाओं में मीडिया का प्रबंधन ऐसे ही लोगों के हाथ में होने के कारण अक्सर इन भाषाओं की पत्र-पत्रिकाओं में अंगरेजी का पिछलग्गूपन दिखता है। 

जैसे-जैसे विमर्श की धुरी अंगरेजी की तरफ होती गई है, भारतीय भाषाओं में तकनीकी शब्दों का संकट भी बढ़ता गया है। आम आदमी ही नहीं, बुद्धिजीवियों के लिए भी ये भाषाएं कठिन होती जा रही हैं और उनके विमर्श में भागीदारी करने वालों का दायरा भी सिमटता जा रहा है। कुल मिलाकर एक अजीब स्थिति है, जिसे कई लोग भारत और इंडिया की दो समांतर दुनिया का नाम देते हैं। देशी भाषा में बात करते हुए अगर हम महज अंगरेजी का अनुवाद कर रहे हैं, तो वह भारत की नहीं, इंडिया की ही भाषा है। धीरे-धीरे भारत कमजोर पड़ता जा रहा है, चुनांचे वह फासीवादियों के चंगुल में फंसता जा रहा है। कई लोग कहेंगे कि यह रैखिक युग्मक (बाइनरी) में फंसा हुआ सोच है, पर सचमुच मनोवैज्ञानिक दृष्टि से यह जटिल और साथ ही सामाजिक घटना के रूप में बड़ी सरल सी बात है। 

अंगरेजी सीखना या बोलना अपने आप में कोई दोष नहीं है, पर भारतीय सामाजिक-राजनीतिक परिदृश्य में कई अंगरेजी वाले एक अलग सत्ता अपना लेते हैं। यह इंग्लिशवाला होना अपने साथ देशी भाषा के प्रति उदासीनता ही नहीं, उपेक्षा का स्वभाव लिए होता है। इंग्लिशवाला होना शासक वर्गों के साथ होना है, आम लोगों से अलग होना है। तो आम लोगों तक पहुंचने के लिए कौन बचा रहेगा? जब तक सामाजिक विसंगतियों के खिलाफ प्रतिबद्ध सोच रखने वाला कोई है तो ठीक है, जब शासन की मार या अन्य कारणों से ऐसे लोग नहीं हैं तो मैदान संकीर्ण राष्ट्रवाद के लिए खुला है। भाषाओं का कमजोर होना सिर्फ मुहावरों का विलुप्त होना नहीं है, यह सामूहिक और निजी अस्मिता का घोर संकट पैदा करता है। 

इस संकट से निपटने के कई तरीके हो सकते हैं- एक तो यह कि हर स्तर पर स्थानीय भाषाओं में काम हो, कम से कम माध्यमिक स्तर तक शिक्षा मातृभाषा में हो। इसके विपरीत फासीवाद वह मरीचिका है जो सामयिक रूप से उत्पीड़ित को इस ताकत का आभास देती है कि मेरी बोली में ताकत न हो न सही, पर अपनी भी कोई हस्ती है। जब भाषा में बिखराव होता है, जैसा कि आम लोगों पर बोलते हुए अंग्रेजीदां विशेषज्ञों में दिखता है, तो वह सतही रह जाती है और सवालों का हल नहीं दे पाती। फासीवादी संगठनों में समकालीन विमर्श एकतरफा होता है और उनके अधिकतर कार्यकर्ता देशी भाषाओं में पारंगत होते हैं। इस तरह फासीवाद अपनी जड़ें जमाने में सफल होता है।


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