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यह हिंसा कैसे थमेगी PDF Print E-mail
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Saturday, 26 April 2014 10:43

गिरिराज किशोर

जनसत्ता 26 अप्रैल, 2014 : मान्यवर, मुख्य चुनाव आयुक्त, मैं आपका और चुनाव आयोग का ध्यान उपरोक्त विषय की ओर आकर्षित करना चाहता हूं। मैं जानता हूं आपका समय बहुत कीमती है। लेकिन यह पहला चुनाव है जो भाषाई हिंसा, विकृतियों से भरा हुआ है। बड़े नेता तक इससे बचे नहीं हैं। अपने भाषणों को प्रभावी बनाने के लिए अपने विरोधियों का नामकरण एके 49, पाकिस्तानी एजेंट जैसे हिंसक शब्दों से करते हैं। आयोग सहमत होगा कि ये ऐसे शब्द हैं जो उनके समर्थकों को हिंसा के लिए प्रेरित करते हैं। दो पार्टियों के नेताओं में, चुनाव से असंबद्ध सांड जैसे शब्द को लेकर घमासान युद्ध चालू हो गया। मैं समझता हूं कि आयोग में जरूर ऐसा सेल (प्रकोष्ठ) होगा जो इन नेताओं की आक्रामक और असंसदीय शब्दावली का बारीकी से विश्लेषण करता होगा। 

आम आदमी की हैसियत से, मेरा मानना है कि आयोग की सबसे बड़ी जिम्मेदारी संसार के सबसे बड़े जनतंत्र के चुनाव सुचारुरूप से कराने की है। मैंने 16 अप्रैल के जनसत्ता में यह लिखा था। मुझे यह मालूम नहीं कि प्रत्याशियों और पार्टियों के नेताओं (जिन्हें सुरक्षा में वाई, जेड सुरक्षा प्राप्त नहीं है) की सुरक्षा आयोग की जिम्मेदारी है या नहीं। अगर है, तो आम आदमी पार्टी के संयोजक पर ही बार-बार हमले क्यों हो रहे हैं; इसके लिए कौन जिम्मेदार है? यह हिंसा है। अपरिभाषित हिंसा नेताओं द्वारा, खासतौर से प्रस्तावित प्रधानमंत्री के मुंह से प्रयुक्त ऐसे शब्द हैं जिनका मैंने ऊपर उल्लेख किया है। एक पूर्व मुख्यमंत्री के साथ हुए इस हिंसात्मक दुर्व्यवहार का आयोग को स्वत: संज्ञान लेना चाहिए या नहीं, यह तो मान्य आयोग ही तय करेगा।

आप के संयोजक और उनके साथियों के साथ आक्रामकता संभवत: उनकी गुजरात यात्रा के बाद से शुरू हुई थी। पहली कार दुर्घटना भी संभवत: तभी हुई थी। हो सकता है वह दुर्घटना ही हो। दूसरी घटना चकित करने वाली है। आचार-व्यवहार के हिसाब से अगर एक पूर्व मुख्यमंत्री किसी पदासीन मुख्यमंत्री से भेंट करने का समय मांगे तो क्या उसे समय न देकर पुलिस से दूर ही रुकवा देना चाहिए? यह ऐसा ही हुआ अगर कोई पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त वर्तमान मुख्य चुनाव आयुक्त से मिलने आए तो उसे द्वार पर ही अपने सुरक्षाकर्मियों से रुकवा देना। उससे पहले आप के राष्ट्रीय संयोजक को हवालात ले जाया गया। उसके बाद जब मोदीजी का सामना करने का मन बना कर वे वाराणसी गए तो रोड शो के समय उन लोगों पर स्याही फेंकी गई। बाद में अंडे फेंके गए। 

आक्रमण का क्रम निरंतर जारी है। हरियाणा में आप के प्रत्याशी के चेहरे पर स्याही पोती गई। राष्ट्रीय संयोजक को चपत मारी गई। सिर पर घूंसे मारे गए। आठ मार्च को लाली नाम के किसी आॅटो ड्राइवर ने आप के राष्ट्रीय संयोजक को दिल्ली में रोड शो के समय इतनी जोर से चपत लगाई कि उनका चश्मा टूट गया और चेहरे पर सूजन आ गई। वे मन की शांति के लिए गांधी-समाधि पर घंटे भर बैठे रहे। 

देश के बहुत-से लोगों का इस हिंसात्मक कार्रवाई से दिल दहल गया। जबकि भाजपा के प्रवक्ता मल्होत्रा ने इस घटना की निंदा करने के बजाय टीवी चैनल पर इसका समर्थन किया। कांग्रेस के मंत्री सिब्बल ने निंदा करते हुए इस घटना को मल्होत्राजी की तरह उनकी गलतियों का नतीजा बताया। प्रकारांतर से वह भी समर्थन ही था। नौ अप्रैल को मनीष पांडे ने फेसबुक पर पोस्ट किया कि लाली भाजपा का कार्यकर्ता है।

वाराणसी में केजरीवाल पर प्रतिदिन आक्रमण हो रहे हैं। नारे लग रहे हैं केजरीवाल वापस जाओ। क्या यह जनतंत्रात्मक अधिकार का हनन नहीं? पान वाले की दुकान पर, समाचारपत्र के अनुसार, उन्हें और उनके साथियों को घेर कर गाली-गलौज की गई, लकड़ी के टुकड़े फेंके गए। पुलिस ने बड़ी मुश्किल से केजरीवाल को निकाला। अगले दिन भी ऐसा ही हुआ। उनके अस्थायी निवास स्थान को घेरा गया। उनको वह स्थान बदलना पड़ा। वे मानते हैं कि उनकी हत्या भी हो सकती है। उसके बावजूद अपने समर्थकों को शांत रहने के लिए कह रहे हैं। आप के नेता प्रशांत भूषण की एक चुनाव सभा में टोपी उतार कर उछाली गई। आयोग के संज्ञान में आया होगा। आयोग से मेरे कुछ सवाल और निवेदन हैं।

चुनाव के दौरान पूरा देश आयोग की निगरानी में है। अत: सामान्य रूप से भी यदि कहीं अव्यवस्था हो तो चुनाव आयोग हस्तक्षेप कर सकता है। विशेष रूप से चुनाव से संबंधित किसी भी तरह की अव्यवस्था के निराकरण की जिम्मेदारी आयोग पर ही होनी चाहिए। 

किसी भी प्रत्याशी के साथ प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष हिंसा हो, उसके प्रचार को बाधित किया जाए तो स्थानीय चुनाव अधिकारी को उसकी रिपोर्ट आयोग को भेजनी चाहिए। अगर नहीं भेजता तो स्वत: आयोग को रिपोर्ट मंगा कर कार्रवाई करके सूचना प्रसारित करनी चाहिए, जो कुछ मामलों में की भी जाती है। उपरोक्त प्रत्याशी के संग किए गए व्यवहार में अभी तक ऐसा नहीं हुआ। जबकि प्रत्याशी पूर्व मुख्यमंत्री और अपनी पार्टी का सर्वोच्च पदाधिकारी है। यही हरियाणा से चुनाव लड़ रहे योगेंद्र यादव और चांदनी चौक से प्रत्याशी आशुतोष के साथ भी हुआ था।

पुलिस यदि ऐसी उद्दंडता के आरोप में किसी को गिरफ्तार करती है, उसे जमानत पर छोड़ कर


बाद में फाइल बंद कर दी जाती है। जनता को लगता है कि आयोग और प्रशासन इस बारे में गंभीर नहीं हैं। उद््दंड लोग प्रोत्साहित होकर अपनी हिंसक गतिविधि बढ़ा देते हैं।

खुफिया विभाग की रिपोर्ट आयोग के पास सीधे भी पहुंचनी चाहिए, उस पर तत्काल कार्रवाई होना जरूरी है।

आयोग में यदि मीडिया में प्रकाशित समाचारों और इस तरह की रिपोर्टों की छानबीन करने का कोई प्रकोष्ठ है तो उसे सक्रिय किया जाना चाहिए। अगर नहीं है तो ऐसे प्रकोष्ठ का निर्माण किया जाना चाहिए। अभी सामान्यत: कार्रवाई दूसरी पार्टी की शिकायत पर होती है। जबकि किसी तरह की भी आचार संहिता के उल्लंघन का संज्ञान स्वत: आयोग के द्वारा भी लिया जाना चाहिए।

आप के संयोजक और प्रत्याशियों पर हिंसात्मक आक्रमणों के संदर्भ में यह जरूरी है कि किसी उच्चस्तरीय जांच एजेंसी से तत्काल जांच करा कर निर्णायक कार्रवाई की जाए। अगर और भी ऐसे मामले हों उनकी भी जांच की जाए। 

गुजरात में केजरावाल को पुलिस द्वारा हिरासत में लिए जाने पर आप के पदाधिकारियों के सार्वजनिक रूप से माफी मांगने के बावजूद आप को दोषी माना गया था। उसका सकारात्मक असर हुआ था। लेकिन गुजरात के प्रशासन से नहीं पूछा गया कि जब सामान्य यात्री को गुजरात में प्रवेश करने पर हिरासत में नहीं लिया जाता तो एक पार्टी के नेता को हिरासत में क्यों लिया गया था।

चुनाव में भाग लेने वाली सब पार्टियां समान हों। उनमें कुछ पार्टियां आर्थिक रूप से कमजोर हैं। सब पार्टियों के प्रचार के स्तर अलग-अलग हैं। उदाहरण के लिए, दिल्ली में मैंने स्वयं देखा है कि भाजपा और कांग्रेस के रात में हर चौराहे पर ग्लेज्ड और नियोनलाइटेड बड़े-बड़े होर्डिंग लगे हैं। यह मतदाता के मन में समानता का भाव उत्पन्न नहीं करता। लखनऊ और अन्य राजधानियों में भी यही स्थिति है। प्रचार के समान मानक होने चाहिए। अखबारों में सूचना मात्र के लिए एक आकार और लंबाई-चौड़ाई के विज्ञापन हों। पूरे-पूरे पृष्ठ के रंग-बिरंगे विज्ञापन असमानता पैदा करते हैं। 

हो सकता है कि मेरा यह सुझाव लागू करने के लिए नियमों में परिवर्तन करना पड़े। नेताओं को भी इसे मानने में कठिनाई होगी। चुनाव न्यूनतम समय में संपन्न कराए जाएं। उस दौरान देश भर में राष्ट्रपति शासन लागू हो। चुनाव प्रक्रिया समाप्त होने की घोषणा होते ही सामान्य स्थिति स्वत: वापस आ जानी चाहिए। मंत्री, मुख्यमंत्री, केंद्रीय मंत्री आदि सब सरकारी तामझाम से रहित होकर समान स्तर पर प्रचार में भाग लें। सत्ता की हनक चुनाव में हस्तक्षेप करती है। बड़े-छोटे नेता का भेद पैदा करती है। मुझे याद है नेहरू चुनाव प्रचार के लिए रेल से सफर करते थे। डॉ लोहिया आदि विरोधी नेता भी सड़क के रास्ते या रेल से आते-जाते थे। अब छोटे से छोटा नेता हेलिकॉप्टर से आता-जाता है। इसके लिए पूंजीपतियों परआश्रित हो जाता है और अपनी स्वतंत्रता हमेशा के लिए खो देता है। निष्पक्ष जनतंत्र के लिए कुछ कठिन निर्णय आवश्यक हैं। 

पुनश्च: माननीय मुख्य चुनाव आयुक्त को 21 अप्रैल के पत्र के तारतम्य में ई-मेल किए गए 24 अप्रैल के पत्र में, अस्सी घाट पर चुनाव संबंधी विमर्श में सम्मिलित होने के लिए गए दिल्ली के पूर्व मंत्री और आप के वरिष्ठ सदस्य सोमनाथ भारती को भाजपा (समाचारपत्रों के अनुसार) के कार्यकर्ताओं द्वारा पीटे जाने, उनकी कार तोड़ने और आप के तीन कार्यकर्ताओं को जख्मी किए जाने के संदर्भ में निवेदन किया था कि इससे पहले कि कोई हादसा हो उच्चस्तरीय जांच का आदेश दिया जाना जरूरी है। मैंने ऊपर भी लिखा है कि आखिर एक ही पार्टी के लोगों को निशाना बना क र उन पर शृंखलाबद्ध आक्रमण जनतंत्र के लिए चिंता की बात है। संबंधित पार्टी द्वारा कदम न उठाया जाना, उच्छृंखलता को बढ़ावा दिया जाना समझा जा सकता है। इसका आरोप आयोग पर भी आएगा। 

आजादी से पहले सड़कों पर बेलचा पार्टी और खुदाई खिदमतगार हरे रंग की वर्दी में सड़कों पर मार्च करते थे। लोग डर के मारे बच्चों को घरों में छिपा लेते थे। काशी में भगवा कपड़ों में शंखनाद के साथ हुए प्रदर्शन को देख कर पता नहीं क्यों आजादी से पहले निकलने वाले मार्चों का ध्यान आ गया। चुनाव आयोग को किसी भी प्रकार के भय या आशंका को विराम देने के लिए एक मानक तय कर देना चाहिए। सब पार्टियां और उनके प्रत्याशी ऐसे जुलूसों में केवल राष्ट्रीय झंडा और आयोग द्वारा आबंटित चुनाव चिह्न का प्रदर्शन करें। वरना दूसरे लोग भी अपने-अपने रंग और धार्मिक चिह्नों का प्रदर्शन करने लगेंगे।   


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