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ऐसे कैसे आएंगे अच्छे दिन PDF Print E-mail
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Friday, 25 April 2014 12:19

पुण्य प्रसून वाजपेयी

जनसत्ता 25 अप्रैल, 2014 : एक ने देश को लूटा, दूसरा देश को लुटने नहीं देगा। एक ने विकास को जमीन पर पहुंचाया, दूसरा सिर्फ विकास की मार्केटिंग कर रहा है।

एक ने भ्रष्टाचार की गंगोत्री बहाई, दूसरा उसे रोक देगा। कुछ ऐसे ही दावों-प्रतिदावों या आरोपों-प्रत्यारोपों के साथ राहुल गांधी और नरेंद्र मोदी के भाषण लगातार सुने जा सकते हैं। लेकिन नेताओं की तमाम चिल्ल-पों में क्या देश की जरूरत की बात कहीं भी हो रही है! क्या किसी भी राजनीतिक दल या राजनेता के पास कोई ऐसा मॉडल है, जिसके सहारे देश अपने पैरों पर खड़ा हो सके। ध्यान दें तो आर्थिक सुधार की जो लकीर मनमोहन सिंह ने बतौर वित्तमंत्री 1991 में खींची उसके बाद सबसे प्रभावी तबका पैसे वाला समाज बनता चला गया। मध्यवर्ग का विस्तार भी इसी दौर में हुआ और वाजपेयी सरकार ने आर्थिक सुधार का ‘ट्रैक टू’ ही अपनाया।


बीते दस बरस मनमोहन सिंह ने बतौर प्रधानमंत्री देश को विकास का वही मॉडल दिया, जिसमें खनिज संसाधनों की लूट, खदानों के जरिए विकास का खाका, बिजली कारखानों से लेकर आधारभूत ढांचे के निर्माण, यानी विकास के इस मॉडल ने भ्रष्टाचार को इस अबाध रूप से फैलाया, जिसके दायरे में मंत्री से लेकर नौकरशाह और कॉरपोरेट से लेकर शासन-व्यवस्था तक आए। मगर विकास के इस मॉडल को किसी ने नहीं नकारा, सभी ने सिर्फ इतना कहा कि व्यवस्था विफल है। या फिर रिमोट से चलने वाला प्रधानमंत्री नहीं होना चाहिए।

यानी विकास का मौजूदा मॉडल हर किसी को मंजूर है, जिसमें सड़कें फैलते-फैलते गांव तक पहुंचें, गांव शहर में बदल जाएं, शहरों में बाजार हो। बाजार से खरीद करने वाला बीस फीसद उपभोक्ता समाज हो और देश के बाकी अस्सी फीसद के लिए सरकारी पैकेज की व्यवस्था हो। यानी राजनीतिक दलों की सियासत पर टिके लोग, जो वोट बैंक बन कर सत्ता की मलाई खाने में ही पीढ़ियां गुजार दें और हर पांच बरस बाद लोकतंत्र का नारा बुलंद करने लगें।

अब सवाल है 2014 के चुनाव के शोर में विकास के जिस मॉडल की गूंज है, उसमें नए शहर बनाने की होड़, जबकि सवाल गांव को पुनर्जीवित करने की उठना चाहिए। शहर-दर-शहर कारों की बढ़ती संख्या ही विकास का प्रतीक है। जबकि सार्वजनिक परिवहन प्रणाली पर कोई चर्चा नहीं है। पेट्रोल के बोझ तले देश के जीडीपी को आंका जा रहा है। सड़क भी टोल टैक्स पर जा टिकी है। यानी अब सफर भी राज्य के दायरे से बाहर हो चला है। जिसके पास पैसा है, वही सफर कर सकता है। स्वच्छता गायब है। पानी, इलाज, शिक्षा बाजार के हवाले किए जा चुके हैं।

सरकार जिम्मेदारी लेने को तैयार नहीं है और कोई मॉडल यह कहने को तैयार नहीं है कि न्यूनतम जरूरतों को उत्पाद में तो नहीं बदलना चाहिए। इसीलिए देश में शहर-दर-शहर पांच सितारा अस्पताल खोलने पर जोर है, लेकिन गांव-गांव डिस्पेंसरी का कोई जिक्र नहीं हो रहा है।

दरअसल, देश में इतनी विविधता है कि मॉडल के दो चेहरे भी जनता को मान्य हैं और दोनों एक-दूसरे का विरोध करते हुए भी सत्ता तक पहुंचा देते हैं। याद कीजिए, सात बरस पहले बंगाल में सिंगूर से नंदीग्राम तक में किसानों की जमीन को लेकर आंदोलन हुआ। जिस ममता ने टाटा को नेनो कार के लिए सिंगूर में जगह नहीं दी, वे बंगाल में किसान-मजदूर के संघर्ष के सहारे सत्ता तक पहुंच गर्इं और उसी टाटा की नेनो को जिस मोदी ने गुजरात में जगह दी, उसी गुजरात के विकास मॉडल ने मोदी को प्रधानमंत्री पद का दावेदार बना दिया। तो कौन-सा मॉडल सही है, यह सवाल ममता और मोदी को लेकर या बंगाल, गुजरात को लेकर बांटा तो जा सकता है, लेकिन क्या देश के सामने विकास का कौन-सा मॉडल होना चाहिए इस पर सिर्फ ममता या मोदी का जिक्र कर खामोशी बरती जा सकती है?

ध्यान दें तो देश में विकास की असमान नीतियों ने मौसम को ही बदल दिया है। लेकिन किसी भी मॉडल में बिगड़ती प्राकृतिक परिस्थितियों को संभालने या प्रकृति के साथ खिलवाड़ करने वाली योजनाओं पर रोक की कोई आवाज उठाई नहीं गई है। ग्लेशियर पिघल रहे हैं। बेमौसम बरसात और ठंड ने किसानों के सामने खेती पर टिकी जिंदगी जीने को लेकर ही नई चुनौती खड़ी कर दी है। उस पर कोई मॉडल किसी राजनीतिक दल की चर्चा में नहीं है। खेती की जमीन कहीं आधारभूत ढांचे के नाम पर, कहीं योजनाओं के नाम पर, तो कहीं रिहाइश के लिए हथियायी जाने लगी। मनमोहन सिंह की सत्ता के दौरान ही नौ फीसद खेती की जमीन किसानों से छीन ली गई। करीब तीन करोड़ किसान निर्माण मजदूर में बदल गए। इसी दौर में लाखों किसानों ने देश भर में खुदकुशी कर ली।

महाराष्ट्र में तिरपन हजार किसानों की विधवाएं जीवित हैं। लेकिन आज भी खुदकुशी करने वाले किसान की विधवा को मुआवजा तब तक नहीं मिलता, जब तक जमीन के पट््टे पर उसका नाम न हो। और जमीनी हकीकत है कि विधवाओं के नाम पर जमीन होती नहीं।

खुदकुशी करने वाले किसान


के बाप या भाई के पास जमीन चली जाती है। विधवा को वहां भी संघर्ष करना पड़ता है। लेकिन किसी राजनीतिक दल के मॉडल में यह कोई प्राथमिकता नहीं कि किसानी कैसे बरकरार रहे। इसके उलट स्वामीनाथन रिपोर्ट के आधार पर किसानों के विकल्प के सवाल जरूर हैं। विकास के किसी मॉडल में ग्रामीण-आदिवासियों के लिए कितनी जगह है यह 1991 में बही आर्थिक सुधार की हवा ने ही दिखा दिया था। जबकि झारखंड से लेकर ओड़िशा और बंगाल से मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक तक के आदिवासी बहुल इलाकों की खनिज संपदा तक पर देश के जिन प्रमुख दस उद्योगपतियों की परियोजनाएं चल रही हैं, वे मनमोहन सिंह के दौर में बहुराष्ट्रीय उद्योग का तमगा पा गए। बेरोजगारी से निपटने के लिए मनरेगा लाया गया। भूख से निपटने के लिए खाद्य सुरक्षा कानून आ गया। अशिक्षा से निपटने के लिए चौदह बरस तक मुफ्त शिक्षा का एलान हो गया।

अगर हालात को परखें तो कमोबेश ऐसे ही हालात देश के आइआइटी और आइआइएम से निकले छात्रों की संख्या और आठवीं कक्षा तक भी न पहुंच पाने वाले बच्चों के मामले में हैं। इतना ही नहीं, देश में विकास के जो हालात हैं उनमें उच्च शिक्षा पाने वाले सिर्फ साढ़े तीन फीसद छात्रों में से तिरसठ फीसद छात्र देश के बाहर रोजगार के लिए चले जाते हैं। जबकि देश के कुल सैंतालीस फीसद बच्चे जो कक्षा एक में दाखिला लेते हैं, उनमें से बावन फीसद से ज्यादा आठवीं के बाद पढ़ाई छोड़ देते हैं। तो फिर विकास का कौन-सा मॉडल देश को पटरी पर लेकर आएगा। सवाल देश के कुल छह लाख से ज्यादा गांवों के हालात का भी है। क्योंकि शहरों की तादाद जिस तेजी से बढ़ी है उसमें गांवों के सामाजिक-आर्थिक हालात को अनदेखा किया जा रहा है।

जिस आर्थिक सुधार की हवा में देश का शहरीकरण हो रहा है, उसमें समूचे देश में आज दो हजार से कम शहर हैं, जबकि छह लाख से ज्यादा गांव हैं। खत्म किए जा रहे गांव को लेकर कोई मॉडल किसी राजनेता के पास नहीं है। नए पनपते शहरों के आर्थिक हालात से अब भी गांव के हालात अच्छे हैं, बावजूद इसके शहरीकरण पर जोर है, जबकि महाराष्ट्र की पहचान सबसे ज्यादा गरीब शहरियों को लेकर है। जाहिर है, ऐसे में सवाल नए मॉडल का है, जो गांव को पुनर्जीवित कर सके। देसी अर्थव्यवस्था के तहत स्वावलंबन ला सके। रोजगार के लिए पलायन करने वाले लोगों को लौटा सके।

और अगर ऐसा संभव नहीं है तो फिर कितने बरस हिंदुस्तान के पास हैं यह समझना जरूरी है, क्योंकि सामाजिक असमानता देश में तनाव और हताशा ज्यादा फैला रही है।  मौजूदा मॉडल के पास ऐसा कोई हथियार नहीं है, जिससे हाशिये पर पड़े देश के बहुसंख्यक तबके को आगे बढ़ाने के लिए कोई व्यवस्था हो। बावजूद इसके जिस मॉडल को देश की सियासत अपनाए हुए है और आर्थिक सुधार के बाद से शहरीकरण कर जेब की ताकत बढ़ाने का जिक्र कर खुश हो रही है, जरा उसके भीतर भी झांक कर देश का भविष्य देख लें। 2023 में भारत के इतने लोग अरबपति हो चुके होंगे कि भारत का नंबर अरबपतियों के मामले में चौथे नंबर पर होगा, तो खुश हुआ जा सकता है।

लेकिन इसी दौर में गरीबी रेखा से नीचे लोगों के आंकड़े में भारत दुनिया में नंबर एक पर होगा, सच यह भी है। यानी जिस मॉडल पर देश चल रहा है उसमें नौ बरस बाद भारत गर्व कर सकेगा कि उसके पास 1302 अरबपति होंगे। यानी दुनिया में चौथे नंबर पर और इन्हीं नौ बरस बाद चौवालीस करोड़ बाईस लाख से ज्यादा बीपीएल होंगे और भारत का नंबर गरीबी रेखा से नीचे वालों की तादाद में नंबर एक होगा। तो कौन-सा मॉडल भारत को चाहिए, जिसमें चंद अरबपतियों पर गर्व किया जाए या ज्यादा गरीबों को लेकर जनसंख्या का रोना रोया जाए।

आइआइटी और आइआइएम से निकले दशमलव दो फीसद से कम छात्रों की पढ़ाई पर या सत्ताईस फीसद बच्चों की पढ़ाई की व्यवस्था न कराने पर। किसी एक छात्र को ओबामा के दफ्तर में रखा गया या किसी अंतरराष्ट्रीय कॉरपोरेट में किसी एक आइआइएम के छात्र को सौ करोड़ का पैकेज मिल गया। यह मॉडल तो देश को सोने की चिड़िया नहीं बना सकता, उल्टे सोने का पिंजड़ा बना कर दीन-हीन भारत को कैद जरूर रखा जा सकता है।


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