मुखपृष्ठ
Bookmark and Share
बदला हुआ मध्यम वर्ग PDF Print E-mail
User Rating: / 9
PoorBest 
Thursday, 24 April 2014 12:06

विनोद कुमार

जनसत्ता 24 अप्रैल, 2014 : देश की आजादी का नेतृत्व मध्यम वर्ग ने किया था। चौहत्तर के जेपी आंदोलन में मध्यमवर्गीय युवाओं की भारी भागीदारी हुई थी।

सत्तर के दशक में चले नक्सलबाड़ी आंदोलन में मध्यवर्ग के पढ़े-लिखे युवाओं ने शिरकत की थी और बिहार, बंगाल के खेत-खलिहानों में और कोलकाता की सड़कों पर व्यवस्था परिवर्तन के लिए वे मारे गए थे। कम्युनिस्ट आंदोलन में भी मध्यम वर्ग की अहम भूमिका रही। लेकिन क्या अब मध्यवर्ग से हम इस तरह की नेतृत्वकारी भूमिका की कल्पना कर सकते हैं? यह आशंका इसलिए हो रही है कि मध्यवर्ग से अब ऐसे युवा कम निकल कर सामने आ रहे हैं जो सामाजिक-आर्थिक बदलाव की दिशा में सक्रिय हों। हम चुनाव में भाग लेकर सत्ता की राजनीति में पहुंचने की इच्छा रखने वाले लोगों की बात नहीं कर रहे, हमारा आशय वैसे युवाओं से है जो समाज को बदलने की इच्छा से सक्रिय होते हैं।

 

कुछ लोगों की समझ यह है कि जन आंदोलनों के लिए कुछ ऐतिहासिक परिस्थितियां होती हैं, कुछ अपने समय का परिवेश और दबाव होता है जो युवाओं को अपनी तरफ आकर्षित करता है। हमारी व्यवस्था में दो तरह के लोग हैं। एक वे, जो इस व्यवस्था की सुविधाओं का अधिकतम लाभ उठा रहे हैं। और फिर ऐसी जमात, जो हर तरह की सुविधाओं से, मूलभूत नागरिक सुविधाओं से भी वंचित है। तो, वंचित जमात के लोग संघर्ष कर रहे हैं। लेकिन उन आंदोलनों में मध्यमवर्गीय युवा कहां निकल कर आ रहे हैं?

इसकी जो वस्तुगत वजह दिखाई देती है, वह यह कि मध्यवर्ग अब वैसा नहीं रहा जैसा डेढ़-दो दशक पहले था। इस व्यवस्था से, सामाजिक-आर्थिक ढांचे से उसका रिश्ता बदल चुका है। पहले वह वंचित समाज के साथ गठजोड़ बना कर शोषण और विषमता पर टिकी इस व्यवस्था को बदलने की जद्दोजहद में दिखाई देता था, अब उच्च वर्ग के साथ गठजोड़ बना कर अपने आर्थिक आधार को मजबूत बनाने में लगा हुआ है। उसके और निम्न वर्ग के हित और सरोकार बिल्कुल भिन्न हो चुके हैं। इसलिए अगर वह किन्हीं तरह के आंदोलनों में सक्रिय भी दिखाई देता है तो उन आंदोलनों की एक मूल विशेषता यह है कि उनके केंद्र में महात्मा गांधी का अंतिम जन तो किसी भी हालत में नहीं।

आइए पहले हम इस बात पर विचार करें कि मध्यम वर्ग में आज की तारीख में आते कौन हैं। शिक्षक, प्रोफेसर, वकील, डॉक्टर, आइटी उद्योग में काम करने वाले, पत्रकार, मझोले व्यापारी, सार्वजनिक प्रतिष्ठानों, वित्तीय संस्थानों में काम करने वाले लोग। यानी मुख्यत: वैसे नौकरीपेशा लोग जो संगठित क्षेत्र में हैं। पूंजीवादी व्यवस्था को बचाने के लिए योजनाबद्ध तरीके से मध्यवर्ग की आर्थिक स्थिति को सत्ता निरंतर मजबूत कर रही है। इसे हम एक ठोस उदाहरण से समझें। छठे वेतन आयोग की सिफारिशें लागू होने के पहले जेएनयू हो या हैदराबाद का उस्मानिया विवि, वहां के प्राध्यापक परिसर में साइकिल से चलते थे। छठे वेतन आयोग की सिफारिशें लागू होते ही परिसर का वातावरण बदल गया। अब प्राध्यापक कारों पर चलते हैं। दूसरी तरफ छात्रों से उनका सरोकार भी पहले की तरह जीवंत नहीं रहा।

पहले सरकारी कर्मचारियों की यह हैसियत नहीं थी कि वे आसानी से कार खरीद सकें। सेवाकाल में घर बना सकें। सेवाकाल में वह एक अदद स्कूटर खरीद पाता था। अवकाश ग्रहण करने के कुछ पहले या बाद पेंशन के पैसे से एक घर की व्यवस्था कर पाता था। लेकिन आज की तारीख में बैंक में नौकरी शुरूकरने वाला एक पीओ एक-दो साल के अंदर कार खरीद लेता है। बड़े-से घर में रहता है, क्योंकि एक छोटे शहर में भी उसे हाउस रेंट के रूप में आठ हजार रुपए मिलते हैं। प्रतिमाह सत्तर लीटर पेट्रोल का खर्च वह वेतन के अतिरिक्त प्राप्त करता है।

आइटी सेक्टर में काम करने वाला युवक नौकरी के दो-चार वर्ष में घर, वाहन, फ्रिज, बड़ा टीवी आदि जुटा लेता है। दिल्ली विवि में कैजुअल टीचर के रूप में भी बहाल होने वाले प्राध्यापक के वेतन की शुरुआत साठ हजार रुपए प्रतिमाह से होती है। यह है मध्यम वर्ग का जलवा। यह अलग बात है कि टीवी पर पेट्रोल की कीमत बढ़ने पर, प्याज के दाम बढ़ने पर यही तबका सबसे अधिक बिसूरता दिखता है। और यही है हमारे टीवी चैनलों का आम आदमी।

लेकिन जो असली आम आदमी है, वह कहीं खो गया है। उसके सवाल कहीं खो गए हैं। असंगठित क्षेत्र का ठेका मजदूर। औद्योगिक मजदूर। राजमिस्त्री, प्लंबर। बिजली के सामान की मरम्मत करने वाला। खेतिहर मजदूर, गांव का मझोला किसान। खुदरा दुकानदार। खोमचा लगाने वाला। ठेले पर माल बेचने वाला। कपड़े आइरन करने वाला। कचरा चुनने वाला। सफाईकर्मी। यह है असली आम आदमी, जो विकास के इस दौर में भी कुल आबादी का साठ से सत्तर प्रतिशत है, जिसकी प्रतिदिन की आमदनी बारह से बत्तीस-छत्तीस रुपए प्रतिदिन कूती जाती है।

यह आम आदमी गरीबी रेखा के ऊपर-नीचे होता रहता है। जो बुनियादी सुविधाओं से वंचित गांवों में रहता है। सुरसा के मुंह की तरह निरंतर बढ़ते शहरों की झुग्गी-झोपड़ियों में रहता है। इस आदमी और मध्यवर्गीय आम आदमी की आर्थिक स्थिति में आज की तारीख में इतना बड़ा फर्क है कि जिसे पाटना आज की सबसे बड़ी चुनौती है।

आज से तीस वर्ष पहले यह फासला इतना बड़ा नहीं था। खेतिहर मजदूर और औद्योगिक मजदूरों के हालात मिलते-जुलते थे। कोयला क्षेत्र की सबसे बड़ी कंपनी बीसीसीएल में धनबाद के महतो खेतिहर किसान काम करना नहीं चाहते थे। किसानी सम्मान


का काम था। इसलिए सूरजदेव सिंह जैसे नेताओं को मजदूर अपने इलाके से लाने पड़े। लेकिन कोयला उद्योग के राष्ट्रीयकरण के बाद कोयला मजदूरों के वेतन और सुविधाओं में गजब की बढ़ोतरी हुई।

यही हालत इस्पात उद्योग की भी थी। बैंकों के राष्ट्रीयकरण के बाद बैंककर्मियों की हालत में भी सुधार हुआ। इसी तरह चौथे और पांचवें वेतन आयोग की सिफारिशें लागू होने के बाद सरकारी कर्मचारियों के वेतन-सुविधाओं में भी भारी इजाफा हुआ। हालात तो कुछ इस तरह बदले कि अब मझोले किसान भी खेती छोड़ पत्थरकट्टा मजदूर बनने के लिए लालायित रहते हैं।

और यह हुआ कैसे? ट्रेड यूनियन आंदोलन के द्वारा। संगठन-शक्ति और मोल-तोल के औजार से। वे औजार जो मनुष्य को दासता और गरीबी से मुक्त करने के लिए खुद मजदूर वर्ग ने गढ़े थे, उसका इस्तेमाल कर संगठित क्षेत्र तो अपने आर्थिक हालात सुधारता चला गया, लेकिन असंगठित क्षेत्र जहां का तहां पड़ा रह गया। औद्योगिक क्षेत्र के मजदूरों के वेतन जहां मूल्य सूचकांक के आधार पर तय होने लगे, वहीं खेतिहर मजदूर चार पैला धान पर खटता रहा। लेकिन इसका एक परिणाम यह भी हुआ कि जो औद्योगिक मजदूर सर्वहारा क्रांति का एक प्रमुख अगुआ माना जाता था और जिसने देश की आजादी के संग्राम में भी एक महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा की थी, वह अब बोनस और भत्तों के अलावा किसी राष्ट्रीय सवाल पर लड़ ही नहीं सकता है।

यही हाल मध्यवर्ग का भी है। वहां आंदोलन तो अब भी हो रहे हैं, लेकिन उन आंदोलनों और आंदोलनों की उपलब्धियों से सामान्य लोगों के जीवन पर कोई असर नहीं पड़ता। वे आंदोलन हमारी आज की व्यवस्था के दो अहम सवालों- गरीबी और विषमता- को छू भी नहीं पाते।

क्या है इन आंदोलनों का मतलब? संक्षेप में समझने की कोशिश करें। हमारे सामने एक पुल बन रहा है। उसके बगल में एक पट््टी पर दर्ज है पुल बनाने की लागत, ठेकेदार का नाम, काम शुरूहोने और खत्म होने की अवधि। हम यह भी जानते हैं कि जो पुल पांच लाख में बनना चाहिए था, उसे बीस लाख में बनाया जा रहा है। उस पुल के निर्माण में लगे मजदूरों को न्यूनतम मजदूरी नहीं दी जा रही है। लेकिन इन जानकारियों का हम क्या करें?

जन आंदोलन की ताकत के बगैर सूचना का अधिकार बेमानी बन कर रह गया है। इसी तरह रोजगार के अधिकार का मर्म समझने की हम कोशिश करें। आपने किसी आदिवासी मजदूर को रोजगार की मांग के लिए जुलूस निकालते देखा है? किसी खेतिहर मजदूर को रोजगार की मांग करते धरने पर बैठे देखा है?

बेरोजगार हमारे यहां शिक्षित बेरोजगारों को ही कहा जाता है। और उनकी भी बात करें तो, हमारे देश की अर्थव्यवस्था तमाम पढ़े-लिखों को न तो रोजगार दे सकती है और न बेरोजगारी भत्ता। आप नरेगा की बात करेंगे। वह तो एक और बड़ा मजाक है। आप नरेगा के तहत सवा सौ से डेढ़ सौ रुपए मजदूरी देने की बात करते हैं। लेकिन खुले श्रम बाजार में दैनिक मजदूरी दो सौ, ढाई सौ रुपए तक पहुंच गई है। इसलिए पिछड़े इलाकों, पिछड़े राज्यों से मजदूर पलायन करते हैं और पंजाब, हरियाणा, चेन्नई, बंगलुरु की तरफ रुख करते हैं। रोजगार गारंटी योजना उनके काम की नहीं।

चलते-चलते हम भ्रष्टाचार के खात्मे और सुशासन (गुड गवर्नेंस) की भी बात कर लें। बहुत ज्यादा मगजमारी की जरूरत नहीं। गुड गवर्नेंस से नागर जीवन थोड़ा सुगम हो सकता है, लेकिन उससे हालात नहीं बदलने वाले। मूल समस्या यह है कि अगर कोई काम करने के लिए आज की तारीख में हम सौ रुपए खर्च करने का बजट बनाते हैं तो अस्सी रुपए उस योजना को जमीन पर उतारने के सरंजाम में लगा देते हैं। उस योजना को क्रियान्वित करने वाले कर्मचारियों के वेतन, ग्रैच्यूटी और पेंशन पर खर्च कर देते हैं। गुड गवर्नेंस से इतना भर हो सकता है कि जो बीस रुपए जमीन पर खर्च होने हैं, उसकी लूट थोड़ी कम हो। लेकिन योजना और गैर-योजना मद का अनुपात पचास-पचास फीसद से अधिक न हो, यह तो नीति से जुड़ा प्रश्न है।

इसी तरह भ्रष्टाचार सिर्फ वह नहीं जो भारतीय दंड विधान की धाराओं से पारिभाषित होता है, बल्कि बड़ा भ्रष्टाचार यह है कि हम निम्नतम काम का न्यूनतम वेतन देते हैं। हमारे यहां सफाईकर्मी अभी तक बड़ी संख्या में दैनिक मजदूरी पर काम करते देखे जा सकते हैं। नरेगा के तहत एक मजदूर के श्रम की कीमत हम सवा सौ रुपए लगाते हैं, वहीं सरकारी दफ्तरों में काम करने वाले बाबू की कीमत तीस हजार रुपए महीने तय करते हैं। इसीलिए भ्रष्टाचार के विरोध का आंदोलन गरीब जनता को आंदोलित नहीं करता।

लेकिन मीडिया में मध्यमवर्गीय इन नए किस्म के आंदोलनों को बहुत तवज्जो दी जाती है। चूंकि अधिकतर मीडिया कॉरपोरेट घरानों से जुड़ा है, उन्हें इस तरह के आंदोलनों से कोई परेशानी नहीं। ये आंदोलन बुनियादी सवालों से कतरा कर निकल जाते हैं और यह भ्रम बनाते हैं कि इस व्यवस्था को बदले बगैर भी गरीबी और विषमता दूर की जा सकती है।

 

फेसबुक पेज को लाइक करने के लिए क्लिक करें- https://www.facebook.com/Jansatta

ट्विटर पेज पर फॉलो करने के लिए क्लिक करें- https://twitter.com/Jansatta

आपके विचार

 
 

आप की राय

सोनिया गांधी ने आरोप लगाया है कि 'भाजपा के झूठे सपने के जाल में आम जनता फंस गई है' क्या आप उनकी बातों से सहमत हैं?