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महिला सशक्तीकरण और मोदी PDF Print E-mail
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Wednesday, 23 April 2014 11:23

अजेय कुमार

जनसत्ता 23 अप्रैल, 2014 : पिछले दिनों नरेंद्र मोदी के दो भाइयों- प्रहलाद और सोमाभाई के बयान छपे, जिनमें उन्होंने मोदी के विचारों की भूरि-भूरि प्रशंसा की है।

गौरतलब है कि मोदी ने पहली बार अपने हलफनामे में कबूल किया है कि जशोदाबेन उनकी पत्नी हैं। प्रहलाद का कहना था कि ‘उन्होंने कभी इस बात से इनकार नहीं किया कि वे विवाहित हैं। पहले चुनाव में विवाह संबंधी जगह कुछ कारणों से खाली छोड़ दी थी। उन्होंने यह जानबूझ कर किया या नहीं, यह उनका व्यक्तिगत मामला है।’ एक राज्य के मुख्यमंत्री के लिए क्या यह वाकई व्यक्तिगत मामला है! विदेश में ऐसे किसी कारनामे से उम्मीदवार का चुनाव रद्द हो सकता है।

 

यह मुद्दा दरअसल सच्चाई को जानबूझ कर छिपाने और एक अकेली औरत के प्रति अपनी जिम्मेदारी से मुंह मोड़ने का है। अब चूंकि मामला प्रधानमंत्री पद का है, तो शायद चुनाव रद्द होने के डर से मोदी ने इस जगह को फिर खाली छोड़ना ठीक नहीं समझा। इस बार चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश के हवाले से स्पष्ट कर दिया था कि नामांकन पत्र में केवल गलत जानकारी देने पर नहीं, बल्कि जानकारी न देने पर भी कार्रवाई हो सकती है।

दूसरे भाई, सोमाभाई का बयान था कि, ‘नरेंद्र भाई छह भाई-बहनों में अलग हैं... वे स्वामी विवेकानंद और भगवान गौतम बुद्ध के बलिदान और प्रतिबद्धता से भी काफी प्रभावित थे।’ तात्पर्य यह कि नरेंद्र मोदी तो बुद्ध के समान एक संन्यासी हैं, घर-परिवार छोड़ कर देश की सेवा में लगे हैं।

विवेकानंद ने अपने लेख ‘संन्यासी और गृहस्थ’ में लिखा था- ‘संन्यासी का धनी लोगों से कोई वास्ता नहीं, उसका कर्तव्य तो गरीबों के प्रति होता है। उसे निर्धनों के साथ प्रेमपूर्ण व्यवहार करना चाहिए और अपनी समस्त शक्ति लगा कर सहर्ष उनकी सेवा करनी चाहिए।’ पर विवेकानंद के भक्त तो अडानी-अंबानी जैसे लोगों से घिरे हुए हैं और उनके राज्य में फैक्ट्री मजदूरों को झारखंड और महाराष्ट्र जैसे राज्यों की तुलना में तीस से चालीस फीसद तक कम मजदूरी मिलती है। सबसे बुरी मार महिला मजदूरों पर पड़ी है। गुजरात में महिला श्रमिकों की संख्या में लगभग एक फीसद की गिरावट आई है, जबकि राष्ट्रीय स्तर पर उसमें एक फीसद का इजाफा हुआ है।

महिला सशक्तीकरण के लिए जरूरी है कि महिलाओं के प्रति आपका नजरिया प्रगतिशील हो। वाराणसी में भाजपा प्रवक्ता रविशंकर प्रसाद ने कहा कि मोदी की शादी बहुत कम उम्र में हो गई और शादी के फौरन बाद वे आरएसएस में शामिल हो गए और प्रचारक बन गए। जाहिर है, आरएसएस की विचारधारा और खासकर महिलाओं के प्रति आरएसएस और सरसंघ चालक गुरु गोलवलकर का दृष्टिकोण अवश्य ही उन्होंने आत्मसात करके प्रचारित भी किया होगा।

गुरुजी का मत था: ‘महिलाओं को मताधिकार देना व्यर्थ है।... एक हिंदू के नाते मैं यह मानने को बाध्य हूं कि हमारे लिए और बुरे दिन आने वाले हैं। इतिहास साक्षी है कि जहां कहीं महिलाओं ने शासन किया है, वहां अपराध, असमानता और अराजकता इस प्रकार फैली है कि इसका उल्लेख नहीं किया जा सकता।’

गुरुजी ने स्त्री-पुरुष समानता के बारे में  अपनी गंभीरता ‘चिल्ड्रन ऑफ दि मदरलैंड’ में व्यक्त की है: ‘आजकल इस बात का बड़ा शोर है कि स्त्री-पुरुष समानता हो और पुरुष के शिकंजे से उनको मुक्ति मिले। विभिन्न पदों पर उनके लिए आरक्षण की मांग सेपरेट सेक्स के आधार पर की जा रही है। पहले कास्टिज्म, कम्युनलिज्म, लिंगुइज्म वगैरह की सूची लंबी थी। अब इसमें एक इज्म और जोड़ दीजिए- सेक्सिज्म।’

विधवाओं के बारे में गुरुजी का मत है: ‘हिंदू-संस्कृति में महिलाओं को एक कन्या, पत्नी, माता और सुमंगली के रूप में सम्मानित किया गया है, लेकिन विधवा को नहीं। विधवा को सभी सार्वजनिक, सरकारी और धार्मिक समारोहों के लिए वर्जित माना गया है।’ ऐसी ‘वर्जित महिलाओं’ पर जब दीपा मेहता ने वाराणसी में ‘वाटर’ फिल्म की शूटिंग करनी चाही थी तो उन्हें वहां संघियों की लाठियों का सामना करना पड़ा था। हिटलर की तरह गोलवलकर भी महिलाओं को केवल बच्चे पैदा करने की मशीन समझते थे, जिनके लिए मानवीय आजादी की कोई दरकार नहीं।

एचडी मालवीय ने अपनी पुस्तक ‘डेंजर्स ऑफ राइट रिएक्शन’ में गोलवलकर द्वारा गुजरात विश्वविद्यालय में दिए गए भाषण को उद्धृत किया है, जिसमें उन्होंने कहा था कि ‘हमारे पूर्वजों ने साहस के साथ बुद्धिमतापूर्ण नियम बनाया कि हर जाति की विवाहित महिला को अपना पहला बच्चा नंबूदिरी ब्राह्मण से ही पैदा करवाना चाहिए।’ निस्संदेह यह विचार हिटलर के शुद्ध और शक्तिशाली आर्य जाति के विचारों की श्रेणी का है। जब हिंदू कोड बिल पर संसद में चर्चा हुई तो आरएसएस ने इसका जम कर विरोध किया कि यह धर्म के खिलाफ है, वे वास्तव में इसके उस प्रावधान का विरोध कर रहे थे, जो पैतृक संपत्ति में पुत्रों के साथ-साथ पुत्रियों को भी अधिकार देता था।

डॉ हेडगेवार सोचते थे: ‘स्त्री-पुरुष संबंध के बारे में परंपरागत भारतीय विचार है कि वह घी और आग की तरह है, अगर आप उन परिणामों से बचना चाहते हैं तो एक ही रास्ता है, यानी दोनों के बीच दूरी बनाए रखी जाए। इसलिए शुरू में डॉक्टरजी ने लड़कों और नौजवानों को एक जगह एकत्र किया। यह सुनिश्चित करने के लिए कि वे भटक न जाएं, उन्होंने लड़कियों और महिलाओं को संघ में प्रवेश की इजाजत नहीं दी।’ (गंगाधर इंदुरकर की पुस्तक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ: अतीत और वर्तमान से)

सवाल है कि जिस व्यक्ति की जवानी इन तमाम शिक्षाओं के बीच निखरी हो, वह किस हद तक महिला सशक्तीकरण जैसे मुद्दे पर आधुनिक-प्रगतिशील रवैया रख सकता है। आज के समाज में नारी मुक्ति आंदोलन की उपस्थिति और मतदान में महिलाओं की लगभग पचास प्रतिशत की भागीदारी को देखते हुए मोदी बेशक महिला सशक्तीकरण की बात करें, पर मन-मस्तिष्क से


वे अपने गुरुओं द्वारा दी गई शिक्षा-दीक्षा का अपमान नहीं कर सकते।

छह जनवरी, 2013 को एक बयान में आरएसएस सरसंघ चालक मोहन भागवत ने कहा था कि ‘पति और पत्नी एक सामाजिक बंधन’ में बंधे हैं, जहां पत्नी घर के काम का खयाल रखती है और पति का कर्तव्य घर के लिए कमा कर लाना और पत्नी की रक्षा करना होता है। एक साल बाद, नरेंद्र मोदी ने अपने ‘इंद्रधनुषी दृष्टिकोण’ के सात खंभों में महिलाओं और परंपराओं को एक महत्त्वपूर्ण स्थान दिया है। मोदी के अनुसार ‘परंपरा’ परिवार का प्रतीक बन गई है, और ‘परिवार के सम्मान’ का प्रतीक परिवार की औरत है। यह महत्त्वपूर्ण है कि परिवार के आधुनिक और जनतांत्रिक परिवार में बदलने के स्थान पर मोदी परंपरा की रक्षा के लिए पारंपरिक परिवार को मजबूत करने की बात करते हैं। दूसरे शब्दों में यह घरेलू और विरासत के मामलों में पुरुष प्रधानता और उसके वर्चस्व को पुष्ट करना है।

आरएसएस की ‘राष्ट्र सेविका समिति’ की वेबसाइट के प्रस्तावना पृष्ठ पर यह साफ लिखा है कि किसी भी देश की मजबूत नींव इस बात पर निर्भर करती है कि उस देश की महिलाओं में अपने परिवारों को गढ़ने की कितनी क्षमता है। एक आदर्श महिला एक प्रबुद्ध मां है जो एक बेटी, एक बहन, एक पत्नी और मां के रूप में शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक और आध्यात्मिक रूप से ताकतवर हो। जिससे वह देश को बचा सके और देश, धर्म और संस्कृति के प्रति गहरी भक्ति और गर्व की भावना परिवार में पैदा कर सके।

इसी समझ को मोदी ने आगे बढ़ाया है, जब वे कहते हैं कि महिला ज्ञान और सदाचार का एक प्रतीक है। इसे ही मोदी ‘महिला का सशक्तीकरण’ कहते हैं। यह महत्त्वपूर्ण है कि मोदी महिलाओं को समाज के आधुनिकीकरण की प्रक्रिया में सहभागी होने में बाधक ताकतों को अपना निशाना बनाने के बजाय महिलाओं की पारंपरिक भूमिका को ही मजबूत बनाने की बात करते हैं। स्पष्ट है कि मोदी का दृष्टिकोण महिलाओं के अधिकारों या आधुनिक महिला के बदलते स्वरूपों की आवश्यकता को समझने वाला नहीं है। बल्कि महिला को एक नव-परंपरावादी और उसके कौशल को विकसित करके संस्कृति के प्रतीक के रूप में उसकी भूमिका को मजबूत करने की बात करने वाला है।

एक सामाजिक संस्था ‘निरंतर’ ने गुजरात के स्कूलों में पढ़ाई जाने वाली पुस्तकों का अध्ययन किया है। निरंतर का विश्लेषण यह दिखाता है कि इन पाठ्य पुस्तकों में जहां एक ओर महिलाओं को बच्चों का लालन-पालन और नैतिक मूल्य सिखाने वाली भूमिका दी गई है वहीं पुरुष अपनी ऐतिहासिक शासक की भूमिका में हैं। इतिहास वास्तव में पुरुषों के संघर्ष की गाथा है- गुफामानव, राजा, योद्धा, संत, आविष्कारक, नेता, उत्पादक और उपभोक्ता। इस परंपरा की तथाकथित रक्षक महिलाओं के स्वास्थ्य का आलम यह है कि सीएजी ने माना है कि गुजरात में महिलाओं और बच्चों के लिए चलाए जाने वाले समाज कल्याण के कार्यक्रमों का क्रियान्वयन आधे-अधूरे मन से किया गया। पोषाहार कार्यक्रम विशेष रूप से आवश्यकता से कहीं कम संख्या में चलाए गए। इस परिस्थिति में इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि इस राज्य में हर तीसरा बच्चा कुपोषित है और 55.3 प्रतिशत महिलाओं में गंभीर रूप से खून की कमी है।

भाजपा ने अपना चुनाव अभियान परंपरागत प्रतीकों से महिलाओं को लामबंद करने पर केंद्रित किया है और इसका महिला मोर्चा सक्रिय रूप से गृहिणियों का समर्थन जुटाने के लिए ‘कमल, मेहंदी और रंगोली’ बांटते हुए घूम रहा है। ऐसी लामबंदी का अर्थ पारंपरिक विचार को महिमामंडित करना, इसके सार्वजनिक प्रदर्शन को बढ़ावा देना और इस तरह एक नए संदर्भ में इस परंपरा को दुबारा जीवित करने के लिए प्रोत्साहित करना है। भाजपा सरकारों के सामाजिक कल्याण के प्रयास भी इसी विचारधारा द्वारा निर्धारित मापदंडों के आसपास केंद्रित रहे हैं। मुख्यमंत्री कन्यादान योजना, माता यशोदा योजना इसी तरह से महिलाओं को बेहतर मां और पत्नियों की भूमिका में स्थापित कर श्रम के पारंपरिक लैंगिक विभाजन की पुष्टि करने का ही काम कर रही हैं।

गुजरात में ‘नारी के सम्मान’ की किस तरह रक्षा की गई, इसकी एक झलक हर्षमंदर ने फ्रंटलाइन में दी थी, ‘आठ साल का सद्दाम बताता है कि किस तरह मर्दों ने हमला किया... बलात्कार का मतलब, जब औरत को नंगा करते हैं और फिर उसे जला देते हैं।’ नरोदा पटिया का निर्णय मील का पत्थर था, जिसमें रेशमबानो नदीमभाई सईद (गवाह 142) ने गवाही दी कि किस तरह उसकी गर्भवती बहन कौसरबानो को, सुरेश लंगड़ा और भवानी सिंह नामक बजरंग दल के गुंडों ने खींचा और उसके पेट में तलवार घुसा कर उसके गर्भ को बाहर निकाल कर दोनों को बाद में जिंदा जला दिया गया।

एक और भीषण कहानी नईमुद्दीन इब्राहिम शेख (गवाह 148) की है, जिसमें उन्होंने अपनी पत्नी जरीना के साथ हुए सामूहिक बलात्कार की गवाही देते हुए कहा कि भीड़ ने एक तलवार से उनकी पत्नी के दोनों हाथ काट दिए और उसे पूरी तरह नग्न करके उसके साथ बलात्कार किया। देश के प्रधानमंत्री पद के दावेदार मोदी दिल्ली में बलात्कार की घटनाओं का विरोध किस नैतिक बल से कर सकते हैं?

आज राजनीतिक बहसों में सामाजिक परिवर्तन के मुद्दों का गायब होना एक गंभीर चुनौती है। जिस तरह के विकास और परंपरा की रट मोदी लगा रहे हैं, उससे महिला सशक्तीकरण असंभव है।

 

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