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नोटा में निहित संभावनाएं PDF Print E-mail
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Tuesday, 22 April 2014 11:40

केपी सिंह

जनसत्ता 22 अप्रैल, 2014 : उच्चतम न्यायालय के निर्देशों के बाद चुनाव आयोग ने मतदाताओं को नोटा का बटन दबाने की सुविधा प्रदान कर दी है।

पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज बनाम भारत सरकार प्रकरण में पिछले वर्ष सत्ताईस सितंबर को दिए गए निर्णय के अनुसार, इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन में नोटा का विकल्प देना अनिवार्य बना दिया गया है। पिछले साल नवंबर-दिसंबर में पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में इसकी शुरुआत हुई थी। अगर मतदाता उम्मीदवारों में से किसी को भी वोट न देना चाहता हो तो वह नोटा का बटन दबा सकता है। मुद््दा यह है कि इससे क्या प्रयोजन सिद्ध होगा? और अगर इसका कोई प्रयोजन नहीं है तो इस विकल्प की क्या आवश्यकता थी?

 

आम चुनाव लोकतंत्र का महापर्व है। प्रत्येक मतदाता की भागीदारी के बिना यह पर्व अधूरा रह जाता है। अभी तक के आम चुनावों में औसतन पचास से साठ प्रतिशत मतदाता वोट डालते रहे हैं। चुनाव आयोग ने इस बार अस्सी प्रतिशत मतदाताओं को वोट के अधिकार का प्रयोग करने के लिए प्रोत्साहित करने का लक्ष्य रखा है। नोटा ऐसे लोगों को मतदान करने के लिए प्रोत्साहित करता है जो इस कारण वोट देने नहीं जाते थे कि सभी उम्मीदवार उन्हें नापसंद होते थे।

वोट देने का अधिकार एक कानूनी अधिकार है। इस अधिकार का प्रयोग करके मतदाता अभिव्यक्ति के मूलभूत अधिकार की उपलब्धता की सार्वजनिक घोषणा करता है। पहले के चुनावों में कुछ मतदाता इससे वंचित रह जाते थे। मतदान केंद्र में जाकर कोई मतदाता अगर यह पाता था कि उम्मीदवारों में से कोई भी उसका मत पाने का पात्र नहीं है तो वह अपने वोट देने के कानूनी अधिकार का प्रयोग किए बिना वापस लौटने को मजबूर हो जाता था। लेकिन मतपत्र को हाथ में लेकर किसी को भी वोट न देना इतना आसान नहीं होता था। ऐसे मतदाता के पास दो ही विकल्प होते थे। वह या तो बिना मोहर लगाया मतपत्र मतपेटी में डाल देता था, या खाली मतपत्र चुनाव अधिकारी को लौटा देता था।

चुनाव अधिकारी को खाली मतपत्र लौटाने की एक निर्धारित प्रक्रिया होती थी। इसके लिए चुनाव अधिकारी मतदाता से एक फार्म भरवा कर उसके हस्ताक्षर करवाता था जिससे उस मतदाता की पहचान सार्वजनिक हो जाती थी। इस प्रकार चुनाव में मत की गोपनीयता के मूल सिद्धांत की अवहेलना होती रहती थी। दूसरी ओर, बिना मोहर लगाए मतपत्र को मतपेटी में डाल देने से गिनती के समय उसे किसी उम्मीदवार के पक्ष में मोहर लगा कर प्रयोग करने की संभावना भी बनी रहती थी। दोनों ही परिस्थितियां चुनाव प्रक्रिया की शुचिता के लिए एक गंभीर चुनौती थीं। नोटा के बटन ने इन मुश्किलों को आसान कर दिया है। नोटा का बटन मतदाता को यह गारंटी देता है कि वह गोपनीयता के साथ अपने वोट के अधिकार का प्रयोग करके सभी उम्मीदवारों को ठुकरा सकता है।

नोटा की अहमियत समझने के लिए चुनाव में मत की गोपनीयता के महत्त्व को समझना जरूरी हो जाता है। मत के जरिए मतदाता किसी एक को चुन कर बाकी उम्मीदवारों को नकारता है। अगर यह सार्वजनिक हो जाए कि किसी मतदाता ने किसे चुना है तो इससे उसके व्यक्तिगत और सामाजिक रिश्ते प्रभावित हो सकते हैं। कई बार उसकी व्यक्तिगत सुरक्षा भी खतरे में पड़ सकती है। निर्वाचित प्रतिनिधि द्वारा उन मतदाताओं के प्रति भेदभावपूर्ण व्यवहार करने का अंदेशा बना रहता है जिन्होंने चुनाव में उसे नकार दिया था। यही नहीं, ऐसे मतदाता जो वोट देने नहीं जाते, वे भी पहचाने जाते हैं। कई बार गांव के गांव चुनाव का बहिष्कार कर देते हैं क्योंकि पूर्व के सभी जनप्रतिनिधि उनकी अपेक्षाओं पर खरे नहीं उतरे हैं।

इस प्रकार के व्यक्ति या व्यक्तियों के समूह भविष्य में निर्वाचित प्रतिनिधि या विफल उम्मीदवारों के भेदभाव और उपेक्षा के पात्र बन सकते हैं। लिहाजा, सार्वजनिक हित में प्रत्येक मतदाता के मत की गोपनीयता की गारंटी चुनाव से संबंधित कानूनों में विशेष रूप से स्थापित की गई है। मत की गोपनीयता भंग हो जाने पर मत अवैध माना जाता है।

बांग्लादेश, फ्रांस, स्वीडन, स्पेन, ब्राजील, अमेरिका आदि अनेक देशों ने अपने मतदाताओं को नकारात्मक मत देने की सुविधा प्रदान की हुई है। कोलंबिया और स्पेन के मतदाता खाली मतपत्र छोड़ कर उम्मीदवारों को ठुकरा सकते हैं। फिनलैंड और अमेरिका में मतदाताओं को मतपत्र पर कोई भी काल्पनिक नाम लिख कर उसे मत देने की सुविधा प्राप्त है। ब्राजील, यूनान, यूक्रेन, चिली और बांग्लादेश में मतपत्र पर नोटा का विकल्प होता है। फ्रांस और बेल्जियम में भारत की तरह इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन का प्रयोग होता है और वहां नोटा का बटन मतदाताओं को उपलब्ध है।

चुनाव आयोग ने नोटा की अहमियत को बहुत पहले पहचान लिया था। दस दिसंबर 2001 को आयोग ने कानून मंत्रालय को चिट्ठी लिखी थी कि ‘वोट न देने का अधिकार’ ‘वोट देने के अधिकार’ में निहित होता है। वोट देने के अधिकार का मतलब हमेशा किसी एक उम्मीदवार को चुनना ही नहीं होता। सभी उम्मीदवारों को ठुकरा कर भी वोट के अधिकार का प्रयोग किया जा सकता है। चुनाव प्रक्रिया में वोट के अधिकार का प्रयोग करना किसी एक उम्मीदवार को चुनने से ज्यादा महत्त्वपूर्ण होता है।

आयोग ने आगे कहा था कि इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन में ऐसे लोगों के लिए एक बटन उपलब्ध कराया जाए जो किसी भी उम्मीदवार को नहीं चुनना चाहते हों। आयोग ने यह भी सुझाव दिया था कि ऐसे लोगों के मतों


की संख्या भी चुनाव परिणाम-पत्र में लिखी जाए, जिन्होंने नोटा का बटन दबा कर नकारात्मक मत दिया हो। मगर आयोग के इस सुझाव पर संबंधित सरकारों ने कोई कदम नहीं उठाया। मजबूर होकर कुछ प्रबुद्ध लोगों ने उच्चतम न्यायालय में गुहार लगाई। न्यायालय ने इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों में नोटा का भी विकल्प रखने का निर्देश जारी किया।

उच्चतम न्यायालय में इस मामले की सुनवाई के दौरान सरकारी पक्ष ने कई प्रकार की दलीलें देकर नोटा का प्रस्ताव स्वीकार न करने की प्रार्थना की थी। चुनाव आयोग ने सरकारी पक्ष के विपरीत और अपने पहले के प्रस्ताव के अनुसार नोटा का प्रावधान करने की पुरजोर सिफारिश की। आयोग ने उच्चतम न्यायालय को यह भी बताया कि मतदाता को नोटा का बटन दबाने की सुविधा बिना किसी अतिरिक्त खर्च के उपलब्ध कराई जा सकती है। इसके लिए वर्तमान में प्रयोग की जाने वाली इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों में किसी प्रकार के फेरबदल की आवश्यकता नहीं है।

मूल प्रश्न अब भी अनुत्तरित रह जाता है कि नोटा प्रयोग करने वाले मतदाताओं के मतों की संख्या जान लेने से क्या हासिल होगा? इस प्रश्न का उत्तर न तो उच्चतम न्यायालय ने अपने निर्देशों में दिया है और न ही चुनाव आयोग ने इसका कोई प्रयोजन बताया है। ठीक भी है, इसका उत्तर देना दोनों ही संवैधानिक संस्थाओं के अधिकार-क्षेत्र से बाहर की विषयवस्तु है। आयोग का अधिकार क्षेत्र लोगों को अभिव्यक्ति के अधिकार की उपलब्धता सुनिश्चित कर रहा है और न्यायालय आमतौर पर वही आदेश देते हैं जिनके लिए याचिका में प्रार्थना की जाती है। नोटा के विकल्प को अर्थवान बनाने के उपाय ढूंढ़ना सरकार और प्रबुद्ध लोगों का दायित्व है।

भारत में अधिकतर जनप्रतिनिधि बहुमत के आधार पर नहीं बल्कि अल्पमत से चुने जाते हैं। कानून में यह व्यवस्था की जा सकती है कि अगर नोटा का प्रयोग करने वाले मतदाताओं की संख्या बाकी सभी से अधिक होगी तो वहां दोबारा चुनाव होगा और दूसरी बार के चुनाव में वही लोग पुन: उम्मीदवार नहीं होंगे। इससे हालांकि ऐसे चुनाव क्षेत्रों में चुनाव प्रक्रिया लंबी होने का अंदेशा है, फिर भी यह प्रक्रिया मतदाताओं को उन्हें अपनी मर्जी का जनप्रतिनिधि चुनने की गारंटी देती है, जो सच्चे लोकतंत्र का तकाजा है। लोकतंत्र की सर्वोच्चता और शुचिता की खातिर इतना खतरा उठाने के लिए तैयार होना महंगा सौदा नहीं है।

नोटा राजनीतिक दलों के लिए भी एक मंथन का विषय हो सकता है। अगर नोटा का विकल्प चुनने वाले मतदाताओं की संख्या नगण्य नहीं है तो राजनीतिक दलों को यह संदेश जाता है कि उनका उम्मीदवार लोगों को पसंद नहीं था। बेहतर होगा अगले चुनाव में सभी दल अपने उम्मीदवार बदल दें। राजनीतिक पार्टियां आपसी सहमति से इस बात पर भी फैसला कर सकती हैं कि अगर नोटा के मतों की संख्या जमानत बचाने योग्य आवश्यक मतों से अधिक हो तो वहां दोबारा चुनाव होना चाहिए। हरियाणा के असंध विधानसभा क्षेत्र में वर्ष 2009 में हुए चुनाव में सभी उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो गई थी, फिर भी सबसे अधिक मत पाने वाला उम्मीदवार विधायक बन गया था। यह लोकतंत्र का मजाक ही कहा जाएगा। आपसी सहमति से इस प्रकार का प्रावधान संबंधित कानून और आदर्श चुनाव आचार संहिता में स्थापित किया जा सकता है।

एक प्रबुद्ध वर्ग यह दलील दे रहा है कि नोटा के पक्ष में पड़े मतों को आधार बना कर मतदाताओं को चुने गए जनप्रतिनिधि को वापस बुलाने का अधिकार (राइट टु रिकॉल) दिया जाना चाहिए। पर यह विचारणीय है कि भारत जैसे देश में यह अधिकार देना कितना व्यावहारिक होगा। भारत में लगभग अठहत्तर प्रतिशत जनप्रतिनिधियों को कुल पड़े मतों का बहुमत प्राप्त नहीं होता है। उनके विरुद्ध पड़े कुल मतों की संख्या उनको प्राप्त हुए मतों की संख्या से अधिक होती है। विशेषज्ञों की राय में भारतीय लोकतंत्र अभी प्रतिनिधि वापसी के अधिकार को चुनाव प्रक्रिया में स्थापित करने के लिए तैयार नहीं है। इससे राजनीतिक अस्थिरता बढ़ेगी। प्रतिनिधि वापसी के अधिकार को व्यावहारिक बनाने के लिए पहले वोट देना अनिवार्य बनाना पड़ेगा ताकि मतदान का प्रतिशत बढ़े।

नोटा का प्रयोग करने वालों की संख्या की जानकारी उन मतदाताओं के लिए आत्मतोष का साधन बन सकती है जिन्होंने इसका प्रयोग किया था। इसका प्रयोग करने वाले मतदाताओं को यह संख्या आभास करा देती है कि उनके मत से इत्तिफाक रखने वाले और कितने लोग हैं। इससे भविष्य में उन्हें अपना मत-निर्धारण करने के लिए आवश्यक महत्त्वपूर्ण सूचना उपलब्ध हो जाएगी।

लोकतंत्र दिन-प्रतिदिन विकसित होने वाली राजनीतिक प्रणाली है। मतदाताओं को नोटा का विकल्प प्रदान करना एक अच्छी शुरुआत है। समय के साथ इसकी अहमियत का अंदाजा लोगों को हो जाना स्वाभाविक है। इसकी सबसे बड़ी अहमियत यही है कि इसके माध्यम से मतदाता भ्रष्ट और आपराधिक छवि वाले उम्मीदवारों को ठुकरा सकता है। इससे निश्चित ही मतदान का प्रतिशत बढ़ेगा। नोटा का विकल्प देकर भयमुक्त वातावरण में मतदाताओं को वोट देने के अधिकार की गारंटी देने वाली संस्थाएं साधुवाद की हकदार हैं।

 

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