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प्रचार बनाम खबर PDF Print E-mail
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Monday, 21 April 2014 11:49

अनिल चमड़िया

जनसत्ता 21 अप्रैल, 2014 : खास संदर्भों में खबरों के लिए घटनाएं या घटनाओं के लिए खबर होने लगी है। इसी अंदाज में किसी ने इ-मेल से निम्न सवाल हमारे सामने रखे हैं।

जब लालकृष्ण आडवाणी प्रधानमंत्री पद की कतार में थे, उन पर आतंकवादी हमले के अंदेशे की खबरें जब-तब आती रहती थीं। अब जब नरेंद्र मोदी भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में उभरे हैं तो उन्हें लेकर ऐसी खबरें आने लगी हैं। खुफिया एजेंसियों को महात्मा गांधी की हत्या होने की भनक नहीं लग सकी थी, न इंदिरा गांधी की हत्या होने की। चुनावी सभा में राजीव गांधी की हत्या की जा सकती है, इस षड्यंत्र की भी जानकारी खुफिया एजेंसियों को नहीं हो पाई थी। विधानसभा चुनाव से पहले छत्तीसगढ़ में कांग्रेस का लगभग पूरा राज्य-नेतृत्व नक्सलवादी हमले में खत्म हो गया, मगर खुफिया एजेंसियों को इसके बारे में पहले से कुछ पता नहीं लग पाया। लेकिन आडवाणी और मोदी पर मंडराते हर खतरे की जानकारी उन्हें रहती है। खुफिया एजेंसियों के उस नेटवर्क की भी जांच होनी चाहिए, जो उन्हें इस तरह की पूर्व सूचनाएं दे रहा है। कहीं यह चुनावों में लोकप्रियता हासिल करने और प्रचार पाने की कोशिश तो नहीं?

 

चुनाव और ऐसे ही खास मौके पर कई ऐसी घटनाएं सामने आने लगती हैं जिनका मकसद केवल प्रचार पाना रहता है! इसीलिए ऐसे प्रचार के प्रसारण और प्रकाशन और घटनाओं के किरदार के बीच एक खास इरादे को पूरा करने वाला संबंध दिखने लगता है। ‘सिटीजन फॉर डेमोक्रेसी’ ने निर्वाचन आयोग को 24 मार्च को एक पत्र लिखा। यह पत्र शायद किसी राजनीतिक पार्टी को लिखने की जरूरत महसूस नहीं हुई, क्योंकि प्रचार के खेल में सभी अपने-अपने तरीके से लगे हैं और चुनाव तो पूरी तरह प्रचार पर ही आश्रित हो गए हैं। लेकिन सिटीजन फॉर डेमोक्रेसी ने निर्वाचन आयोग के सामने महत्त्वपूर्ण सवाल उठाया है।

इस संस्था की शिकायत के अनुसार, दिल्ली पुलिस ने तेईस मार्च को जो पत्रकार-वार्ता की, उसे पहले टीवी चैनलों ने और दूसरे दिन अखबारों ने बहुत प्रमुखता से उछाला। पत्रकार-वार्ता में पुलिस अधिकारी ने आतंकवादी होने के संदेह में पकड़े गए चार युवकों के नामों के साथ कई अन्य नाम भी बताए। वे सारे नाम भारतीय जन-मानस में मुसलिम समुदाय के होने का बोध कराते हैं। उनके खिलाफ यह भी संदेह व्यक्त किया गया कि वे सभी भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी की हत्या करना चाहते थे। समाचार माध्यमों ने भी, पुलिस की तरह, मोदी की हत्या के लिए संदेह किए जाने वाले मुसलिम नामों को बार-बार उछाला।

इस शिकायत-पत्र में एक और महत्त्वपूर्ण बात यह भी लिखी गई कि दिल्ली के ओखला इलाके में दो मुसलिम युवकों को गिरफ्तार किए जाने के खिलाफ दिन भर विरोध-प्रदर्शन चला, लिहाजा उन दोनों को रात में पुलिस को छोड़ना पड़ा। लेकिन इस विरोध को चैनलों ने नजरअंदाज कर दिया। इस संस्था के महासचिव और मशहूर वकील एनडी पंचोली ने निर्वाचन आयोग से कहा कि यह चुनाव में आदर्श आचार संहिता का उल्लंघन है और इसके लिए दोषी पुलिसकर्मियों के खिलाफ कार्रवाई करनी चाहिए और ऐसी पत्रकार-वार्ता पर पाबंदी लगाने का आदेश भी जारी किया जाना चाहिए।

यह तर्कपूर्ण मांग इस तरह से की गई कि कानून के अनुसार कोई व्यक्ति तब तक निर्दोष है जब तक कि उसे न्यायालय द्वारा अंतिम तौर पर दोषी नहीं ठहरा दिया जाता है। दूसरी बात यह कि पिछले दस-बारह वर्षों से मुसलिम युवकों को आतंकवादी होने के संदेह में गिरफ्तार करने की जितनी घटनाएं हुई हैं, उनमें ज्यादातर में देश के विभिन्न स्थानों में हुए बम विस्फोटों को अंजाम देने, राजनीतिकों की हत्या करने और देश में आतंक फैलाने की योजना तैयार करने जैसे आरोप लगाए गए और उन्हें उसी तरह से समाचार माध्यमों ने सुर्खियां बना कर पेश किया। लेकिन उनमें से ज्यादातर मामलों में लंबी सुनवाई के बाद न्यायालयों ने पुलिस के संगीन आरोपों से उन्हें बरी कर दिया। कइयों ने दस-दस साल सलाखों के पीछे गुजारे। उनका परिवार भी तबाह हुआ। इससे ज्यादा खतरनाक बात यह हुई कि समाज में एक ऐसी संदेह की दीवार लोगों के बीच खड़ी हुई, जैसी कि सिखों को लेकर 1980 के बाद से खड़ी होती गई थी। सिख युवकों के मामलों में भी अनगिनत घटनाओं में ये तथ्य सामने आए थे कि उन्हें जान-बूझ कर प्रताड़ित किया गया। तब भी खबरों की प्रस्तुति को लेकर सवाल खड़े हुए थे। पंजाब के संदर्भ में तो मीडिया के पुलिस के साथ जुड़ कर खबरें देने के विषय पर कई शोध भी हुए हैं और उन्हें पढ़ कर एक शर्मनाक स्थिति का अहसास होता है।

वकील पंचोली ने तर्क दिया है कि पुलिस चाहे तो संदेह होने के कारण गिरफ्तारी कर ले, लेकिन उसे प्रेस कॉन्फ्रेंस करने की जरूरत क्यों पड़ी और खासतौर से ऐसे मौके पर जब सांप्रदायिकता के आधार पर चुनाव में मतदाताओं को प्रभावित करने की कोशिश चल रही है। जाहिर-सी बात है कि इस तरह के प्रचारमूलक वाकयों से सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की कोशिशों को बल मिलेगा। प्रेस की आचार संहिता में भी यह बात कही गई है कि रिपोर्टिंग इस तरह नहीं की जानी चाहिए कि उससे सांप्रदायिकता की बू आती हो और एक समुदाय दूसरे समुदाय


के खिलाफ उत्तेजित हो सकता हो। इसीलिए नामों से भी परहेज बरतने की सलाह दी जाती है।

नरेंद्र मोदी की हत्या का षड्यंत्र रचने के आरोप में जून 2004 में इशरत जहां और उसके साथियों की हत्या की गई थी। उस समय मोदी राजनीतिक संकट से घिरे हुए थे और अटल बिहारी वाजपेयी यह मान चुके थे कि गुजरात के दंगों की वजह से उन्हें लोकसभा चुनाव में हार का मुंह देखना पड़ा। वे मोदी को हटाने के लिए मुंबई की कार्यकारिणी की बैठक में चर्चा करने की बात मीडिया के सामने कह चुके थे। इसी बीच मुख्यमंत्री मोदी की हत्या के इरादे से गुजरात में घुसे चार लोगों को पुलिस ने मुठभेड़ में मार गिराने का दावा किया। यह मुठभेड़ फर्जी साबित हुई, यानी मुठभेड़ का दिखावा कर चारों की सुनियोजित तरीके से हत्या की गई थी। इसमें खुफिया विभाग के एक अधिकारी समेत कई पुलिस अधिकारियों की मिलीभगत के आरोप सामने आ चुके हैं। सीबीआइ ने भी अपनी जांच में उसे सुनियोजित हत्या करार दिया है।

आरोप पर जोर देने के बजाय हत्या का इरादा रखने वालों के नामों पर जोर दिए जाने से पुलिस को क्या हासिल होता है? प्रचार माध्यमों के सामने आने से पुलिस को क्या हासिल होता है और वह भी खास तरह की घटनाओं को ही लेकर मीडिया के सामने क्यों आती है? यहां तक कि जिन पर आरोप लगाए जाते है उन्हें प्रेस के सामने लाने से पहले उनका ‘मेकअप’ भी अपने प्रचार के उद््देश्यों को पूरा करने के इरादे से किया जाता है। इसलिए हैरत की बात नहीं कि जब इस तरह की घटनाएं सामने आती हैं तो लगता है खास तरह के प्रचार का एक तंत्र विभिन्न संगठनों और संस्थाओं में बिखरा हुआ है। दिल्ली की घटना के बाद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े संगठनों और नेताओं ने पुलिस को शाबाशी दी और वह भी बड़े जोर-शोर से प्रचारित हुई।

जब इशरत जहां समेत चार लोगों को मारा गया, तब गुजरात विधानसभा में विपक्ष के नेता और पूर्व मुख्यमंत्री अमर सिंह चौधरी ने नकली मुठभेड़ पर अपनी प्रतिक्रिया यह कह कर दी थी कि इस समय नरेंद्र मोदी राजनीतिक संकट झेल रहे हैं और यह घटना सोच-समझ कर तैयार की गई है। उन्होंने यह भी अफसोस जाहिर किया था कि गुजरात की पुलिस राजनीतिक कंधा बनने का काम करने लगी है।

हाल की घटनाओं से यह बात स्पष्ट होने लगी है कि लोकतंत्र के लिए स्थापित संस्थाएं बतौर संस्था काम नहीं कर रही हैं बल्कि उन संस्थाओं में कई हिस्से दिखने लगे हैं और उनमें से कई हिस्से संकीर्ण हितों को ध्यान में रख कर संस्थागत शक्तियों का दुरूपयोग करने लगे हैं। मीडिया को लेकर इस समय सबसे ज्यादा चिंता जाहिर की जा रही है, क्योंकि यह सत्ता से सीधे तौर पर नियंत्रित भी नहीं है लेकिन लोकतंत्र की एक संस्था के रूप में काम करने के बजाय किसी नेता, किसी पार्टी, किसी धर्म, किसी घराने के हित में उसका दुरूपयोग होने लगा है।

मीडिया को लेकर एक महत्त्वपूर्ण सवाल यह भी खड़ा होता है कि देश में जब सांप्रदायिकता आधारित ध्रुवीकरण की कोशिश की जा रही हो तो उस स्थिति में उसकी क्या भूमिका होनी चाहिए। दिल्ली की तेईस मार्च की जो रिपोर्टिंग की गई उसे क्यों मुसलिम नामों के साथ प्रचारित किया गया? क्या महज इसलिए कि पुलिस ने कहा? तो क्या पुलिस जिस तरह से अपनी खबरों को प्रचारित करना चाहे उसे करने की इजाजत दी जानी चाहिए? अगर ऐसा है तो फिर मीडिया की स्वतंत्रता का अर्थ क्या है, खासतौर से तब, जबकि पुलिस द्वारा आतंकवादी के रूप में प्रचारित किए गए दर्जनों युवक अदालतों में निर्दोष साबित हो चुके हैं। क्या मीडिया ने यह तय कर लिया है कि वह बार-बार इस तरह की गलतियां दोहरा सकता है, क्योंकि इन गलतियों को दोहराने से उसका कुछ नुकसान नहीं होने वाला है? मीडिया की विश्वसनीयता के संकट में पड़ने से नुकसान तो लोकतंत्र का ही होगा और समाज में पहले से बनी हुई खाई और चौड़ी होगी।

मीडिया का यह दायित्व बनता है कि वह किसी भी खबर या सामग्री को प्रकाशित-प्रसारित करे तो यह जरूर देखे कि वह प्रचार की मंशा से प्रेरित न जान पड़े। अगर निरे प्रचार के लिए घटनाएं चुनी जाती हैं, या घटनाओं को वैसा रंग दिया जाता है, तो उन्हें चिह्नित किया जाना चाहिए, न कि उनमें शामिल होने की कोशिश की जाए। मीडिया यह तर्क नहीं दे सकता कि उसे तो जैसा बताया जाता है वैसा वह पेश कर देता है। यह तो अपने पूर्वग्रहों को पेश करने के लिए एक बहाने या आड़ की पूर्ति करने वाला तर्क कहा जाएगा। वह खुद को भीड़ की मानसिकता का नहीं कह सकता। मीडिया खुद भी जांच-पड़ताल करने वाली संस्था है।

 

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