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कश्मीर समस्या और नई सरकार PDF Print E-mail
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Saturday, 19 April 2014 11:12

केसी त्यागी

जनसत्ता 19 अप्रैल, 2014 : आम चुनाव के अवसर पर कश्मीर समस्या पर भी बहस शुरू हुई है। भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी ने पहले ऊधमपुर और जम्मू की आमसभाओं में और फिर चुनाव घोषणापत्र में अनुच्छेद 370 पर पुनर्विचार की आवश्यकता पर जोर दिया, वहीं दूसरी ओर हुर्रियत कॉन्फ्रेंस के नरम धड़े के नेता मीरवाइज फारूक ने भारत की जनता से इस चुनाव में कश्मीर समस्या को सुलझाने के लिए उम्मीदवारों और राजनीतिक दलों पर दबाव बनाने का अनुरोध किया है। मीरवाइज फारूक ने कश्मीर में मानवाधिकारों के हनन, सैन्यशक्ति से कश्मीरियों के विरोध को कुचलने, काले कानूनों के जरिये घाटी में आतंक फैला कर, नौजवानों को उत्तेजित कर दमन द्वारा उनकी हत्या कराने का भी आरोप लगाया है। हुर्रियत कॉन्फ्रेंस के नेताओं ने इस समस्या को नजरअंदाज करने का दोषी केंद्र सरकार (मुख्यत: कांग्रेस शासन) को माना है। कुछ हुर्रियत नेता इस समस्या के समाधान के लिए अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में हुए प्रयासों की प्रशंसा भी करते रहे हैं।

पंद्रह अगस्त 1947 को अन्य रियासतों की तरह जम्मू-कश्मीर रियासत के राजा हरि सिंह भारतीय संघ में शामिल नहीं हुए और उन्होंने पाक और भारत दोनों सरकारों के सामने छह सूत्री फार्मूला रख कर नई परिस्थिति उत्पन्न कर दी थी। इस रियासत के राजा हिंदू और अवाम की बहुसंख्य आबादी मुसलिम होने से भी नया संकट पैदा हुआ। शेख अब्दुल्ला गांधीजी से प्रभावित होकर भारत से अंग्रेजी राज और रियासत से राजशाही को समाप्त करने की दोहरी जंग छेड़े हुए थे और उन्होंने भी जिन्ना के द्विराष्ट्रवाद के सिद्धांत को नकार कर भारतीय संघ में राज्य के विलय की मुहिम चला रखी थी। शेख अब्दुल्ला की लोकप्रियता बेमिसाल थी, उन्हें समूची कश्मीरी जनता का समर्थन प्राप्त था। इसी बीच बंटवारे के तुरंत बाद कबायली हमले ने वहां चिंताजनक हालात पैदा कर दिए। भारतीय सेना के हस्तक्षेप और शेख अब्दुल्ला की मुहिम के दबाव में राजा हरि सिंह को 27 अक्टूबर 1947 को भारत में विलय की घोषणा करनी पड़ी और शेख अब्दुल्ला अंतरिम पहली सरकार के वजीरे-आजम (मुख्यमंत्री) बने और डॉ कर्ण सिंह अठारह वर्ष की उम्र में सदर-ए-रियासत नियुक्त हुए।

महाराजा हरि सिंह की तर्ज पर शेख अब्दुल्ला भी कश्मीर की व्यापक स्वायत्तता के पैरोकार थे और अंत में 1952 में ‘दिल्ली समझौते’ के तहत अनुच्छेद 370 का प्रावधान किया गया। 17 अगस्त 1949 को जब सरदार पटेल द्वारा संविधान सभा में यह प्रस्ताव रखा गया, श्यामा प्रसाद मुखर्जी भी उपस्थित थे। कोई ऐसा अभिलेख नहीं है कि श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने धारा 370 पर अपनी असहमति प्रकट की हो। मुखर्जी ने कांग्रेस सरकार से त्यागपत्र नेहरू-लियाकत समझौते के विरोध में अप्रैल 1950 में दिया, जिसमें उन्होंने ‘परमिट सिस्टम’ का विरोध किया था।

1953 में शेख अब्दुल्ला की निर्वाचित सरकार बर्खास्त कर दी गई और उन्हें राष्ट्र-द्रोह के आरोप में लगभग बीस वर्षो तक नजरबंद रखा गया। उनकी गिरफ्तारी के विरोध में और रियासत में जनमत संग्रह को लेकर व्यापक आंदोलन चलते रहे और 1952 के दिल्ली समझौते की मूल भावना और अनुच्छेद 370 को निष्प्रभावी बना दिया गया। इसीलिए आंदोलनकारी 1953 से पूर्व की स्थिति बहाल करने के लिए भी निरंतर मुहिम चलाते रहे हैं।

कहने की आवश्यकता नहीं कि बीस वर्षों तक वहां केंद्र की कठपुतली सरकारें चलती रहीं और शायद ही कभी निष्पक्ष चुनाव हुए हों, जिसका उल्लेख शेख अब्दुल्ला ने इंदिरा गांधी को शेख-इंदिरा समझौते के अवसर पर लिखे अपने पत्र में किया है। हां, नेशनल कॉन्फ्रेंस को तोड़ कर वहां ‘इंडियन नेशनल कांग्रेस’ जरूर अस्तित्व में आ गई। घाटी के निरंतर बिगड़ते हालात को मद््देनजर रख पुन: फरवरी 1975 में शेख-इंदिरा समझौता हुआ, जिसके तहत शेख साहब पुन: मुख्यमंत्री बने और निम्न विषयों पर सहमति बनी।

एक- जम्मू और कश्मीर भारतीय संघ का अविभाज्य अंग हैं और संघ के साथ उनके संबंधों का निर्धारण, भविष्य में भारतीय संविधान की धारा 370 के अंतर्गत ही होगा। दो- हालांकि कानून बनाने की अवशिष्ट शक्तियां राज्य के पास रहेंगी, पर संघीय संसद का ऐसे तमाम विषयों पर कानून बनाने का अधिकार बरकरार रहेगा जिनका संबंध भारत की क्षेत्रीय अखंडता और प्रभुसत्ता को भंग करने, चुनौती देने या नकारने के किसी प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष प्रभाव और भारतीय क्षेत्र के किसी भाग को उससे अलग करने या भारत के किसी क्षेत्र को संघ से अलग करने या भारतीय राष्ट्रीय ध्वज, भारतीय राष्ट्रीय गान व भारतीय संविधान का अपमान करने की किसी भी गतिविधि को रोकने से हो।

तीन- अगर जम्मू-कश्मीर राज्य में भारतीय संविधान के किसी प्रावधान को अनुकूल और संशोधित अवस्था में लागू किया गया हो तो ऐसे अनुकूलों और संशोधनों को धारा 370 के अंतर्गत राष्ट्रपति के आदेश के जरिए बदला जा सकता है तथा इस बारे में निजी प्रस्ताव को उसके गुणावगुणों के आधार पर देखा जाएगा। लेकिन जम्मू-कश्मीर राज्य में पहले से ही लागू संविधान के उन प्रावधानों को, जो संशोधित या अनुकूलित अवस्था में लागू किए गए थे, बदला नहीं जाएगा।

चार- कल्याण कार्यों, सांस्कृतिक मामलों, सामाजिक सुरक्षा, वैयक्तिक कानून तथा व्यावहारिक कानून आदि के मामलों में अपने खुद के कानून बनाने की जम्मू-कश्मीर की स्वतंत्रता को राज्य की विशेष परिस्थितियों के अनुरूप सुनिश्चित करने के उद््देश्य से इस बात पर सहमति व्यक्त की जाती है कि राज्य सरकार 1953 के बाद संसद द्वारा राज्य के लिए बनाए गए या राज्य में लागू किए गए समवर्ती सूची के विषयों से जुड़े किसी भी कानून की समीक्षा कर सकती है, उसमें संशोधन कर सकती है या चाहे तो उसे रद््द कर सकती है।

पांच- जैसा कि संविधान की धारा


368 के अंतर्गत पारस्परिक प्रावधान है, राज्य में लागू इस धारा को राष्ट्रपति के आदेश के जरिए संशोधित करके ऐसी व्यवस्था की जाए कि निम्नलिखित विषयों को प्रत्यक्षत: प्रभावित करने की मंशा से जम्मू-कश्मीर के संविधान में संशोधन के लिए राज्य विधायिका द्वारा बनाया जाने वाला कोई भी कानून तब तक लागू न हो, जब तक कि उस कानून के विधेयक पर राष्ट्रपति की स्वीकृति नहीं ले ली जाती। ये विषय हैं- (क) राज्य की शक्तियां, उसके कार्य, कर्तव्य, विशेषाधिकार और उन्मुक्तियां। (ख) चुनावों से जुड़े मामलों पर भारत के चुनाव आयोग का पर्यवेक्षण, दिशा-निर्देशन, नियंत्रण और बिना किसी भेदभाव के मतदाता सूचियों में प्रविष्टियां, बालिग मताधिकार का सुनिश्चितीकरण और विधान परिषद का गठन, जिसका जम्मू-कश्मीर के संविधान की धाराओं 139, 140 व 150 में प्रावधान है। छह- राज्यपाल और मुख्यमंत्री के पदनाम के सवाल पर कोई समझौता संभव नहीं था, लिहाजा इस मामले को छोड़ दिया जाता है, हालांकि पूर्व में वजीरे-आजम और सदरे-रियासत पद स्वीकार कर लिए गए थे।

दिल्ली में 1977 में हुए राजनीतिक बदलाव के फलस्वरूप आई जनता पार्टी की सरकार ने 1978 में पहली बार निष्पक्ष चुनाव कराए और शेख साहब पुन: मुख्यमंत्री बने। जनता पार्टी के समाजवादी और गांधीवादी नेता इस सरकार से सौहार्दपूर्ण रिश्ते बनाने में कामयाब रहे। शेख साहब की मृत्यु के बाद फारूक अब्दुल्ला मुख्यमंत्री बने और अपने पिता की तरह उनका भी केंद्र से टकराव बढ़ा, जिसकी परिणति उनकी सरकार की बर्खास्तगी में हुई और गुलाम मोहम्मद शाह की कठपुतली कांग्रेस-समर्थित सरकार वजूद में आई।

यह वही दौर है जब केंद्र सरकार के खिलाफ और जनमत संग्रह के लिए जन आंदोलन तेज हुए। इसी प्रकार 1990 तक चलता रहा। समूची घाटी में दमन और हिंसा का नंगा नाच होता रहा और हजारों नौजवान ‘आजादी’ का परचम लेकर सीमा पार कर गए। बाकी कसर एमयूएफ के उम्मीदवारों को 1987 के चुनावों में धांधली कर पूरी की गई। यहां यह उल्लेख करना आवश्यक है कि  इस चुनाव में हुई धांधली में नेशनल कॉन्फ्रेंस और कांग्रेस दोनों शामिल थीं।

वर्ष 2010 में पुन: आजादी की मांग तेज हुई। संघर्षों में सौ से अधिक युवक मारे गए। इसी परिदृश्य में केंद्रीय गृह मंत्रालय ने जम्मू व कश्मीर में स्थायी शांति, स्थिरता और खुशहाली सुनिश्चित करने और कश्मीर मसले का व्यापक राजनीतिक समाधान निकालने के लिए तीन वार्ताकारों के एक दल का गठन किया। वार्ताकारों में शामिल वरिष्ठ पत्रकार दिलीप पडगांवकर, शिक्षाविद राधाकुमार और पूर्व केंद्रीय सूचना आयुक्त एमएम अंसारी ने ‘जम्मू और कश्मीर की जनता के साथ एक नया समझौता’ नाम से रिपोर्ट बनाई।

इस समिति ने बहुत सारे सुझाव दिए, जिनमें से प्रमुख कुछ इस प्रकार हैं:

संसद राज्य के लिए कोई कानून तब तक नहीं बनाएगी जब तक इसका संबंध देश की आंतरिक और बाहरी सुरक्षा से और इसके महत्त्वपूर्ण आर्थिक हितों विशेषत: ऊर्जा और जल संसाधनों की उपलब्धता से न हो। 1953 में दी गई स्वायत्तता में हस्तक्षेप करने वाले केंद्रीय कानूनों को वापस लिया जाए और इसके लिए संवैधानिक समिति का गठन हो। नियंत्रण रेखा के आर-पार लोगों, वस्तुओं और सेवाओं की आवाजाही की खुली छूट मिले। सेना और अर्द्धसैनिक बलों की संख्या घटाई जाए और उन्हें मिले विशेषाधिकार वापस लिए जाएं। राजनीतिक कैदियों को तत्काल रिहा किया जाए।

केंद्र सरकार ने इस रिपोर्ट से अपने आप को अलग करते हुए कहा कि इस रिपोर्ट में दिए गए प्रस्ताव वार्ताकार समिति के अपने विचार हैं; केंद्र सरकार इस विषय पर पूर्व निर्धारित समय पर चर्चा का स्वागत करेगी।

आज हालात पहले से भी अधिक गंभीर हैं। इस प्रश्न पर आज सहमति बनाना आसान नहीं है। चुनाव के बाद आने वाली सरकार को कश्मीर मसले को प्राथमिकता देते हुए सभी पक्षों के साथ वार्ता करनी होगी। सेना के अनावश्यक प्रयोग से बचना होगा। अब जब मीरवाइज फारूक ने इस मसले पर भारत के अवाम का आह्वान कर बहस की शुरुआत की है तो हुर्रियत कॉन्फ्रेंस के बाकी नेताओं को भी बिना शर्त वार्ता प्रारंभ करनी चाहिए। और भारत सरकार को इस मौके को खाली नहीं जाने देना चाहिए, ताकि एक सौहार्दपूर्ण वातावरण में वार्ता प्रारंभ की जा सके। 9/11 और पाकिस्तान में उसामा बिन लादेन की सैनिक कार्रवाई में हुई मृत्यु ने अमेरिका को भी चिंतित किया है। वर्ष 2014 में नाटो अफगानिस्तान से संपूर्ण सेना वापसी पर पुन: विचार कर रहा है, इसीलिए अमेरिका और यूरोपीय संघ के देश कश्मीर में किसी भारत-विरोधी शक्ति के हस्तक्षेप को एक सीमा तक ही बर्दाश्त करेंगे।

अटल बिहारी वाजपेयी ने भारत-पाक मैत्री का भी सार्थक प्रयास किया था और कश्मीर समस्या को मानवीय आधार पर हल करने पर जोर दिया था। मीरवाइज फारूक समेत घाटी के सभी संजीदा नेता और समूह बदलती परिस्थितियों का ठीक आकलन कर किसी एक निष्कर्ष पर पहुंचने की पहल करें ताकि दक्षिण एशिया में शांति कायम हो और कश्मीर के बाशिंदों को अमन-चैन की जिंदगी और मौलिक अधिकारों की आजादी मिल सके। समाधान में कांग्रेस और भाजपा का रुख या तो ढीलाढाला या विरोधी रहा है। गैर-कांग्रेस, गैर-भाजपा राज्यों के क्षत्रप अवश्य अधिक स्वायत्तता के प्रस्ताव को समर्थन दे सकते हैं।

 

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