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प्रचार का प्रभामंडल PDF Print E-mail
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Friday, 18 April 2014 11:43

कनक तिवारी

जनसत्ता 18 अप्रैल, 2014 : नरेंद्र मोदी मिथक-पुरुष की तरह प्रचारित हैं। वे अक्षम कांग्रेस नेतृत्व की विफलता का पर्दाफाश करते

नए रक्षक के रूप में बाजार में खुद अपनी ब्रांडिंग करने में मशगूल हैं। यह तय है कि अंबानी, अदानी, टाटा, रुइया, मित्तल, जिंदल, अनिल अग्रवाल जैसे बीसियों बड़े उद्योगपति देश के सरकारी और आम जनता के संसाधनों के कब्जेदार बना दिए जाएंगे। इन घरानों में से कुछ ने मीडिया पर भी अपना मालिकाना हक और दबदबा कायम कर लिया है।

 

विरोध की आवाजें मीडिया की मोहताज होती हैं। अपनी तमाम कुटिलताओं के बावजूद गुलाम भारत में अंगरेज हुक्काम गांधी की आवाज को कई प्रतिबंधों के बावजूद मीडिया में खामोश नहीं कर पाया था। मोदी के नित-नए परिधान फिल्मी सितारों तक को बौना बना चुके हैं। इस देश के निठल्लों, युवजनों, सेवानिवृत्तों और क्रीड़ाप्रेमियों में लोकप्रिय क्रिकेट खिलाड़ी मोदी के प्रचार प्रभामंडल में ‘उडगन’ हो गए हैं। एक ‘नया अवतार, मसीहा और जननायक’ अपने ही हाथों अपनी संभावनाओं की कंटूर रेखाएं खींच रहा है। चुनाव परिणाम का ठीकरा आखिर जनता के सिर पर ही फूटेगा। क्लाइमैक्स के बाद एंटी-क्लाइमैक्स की नाटकीयता शुरू होती है। वह परिदृश्य में घटने वाली संभावित स्थितियों को अपनी मुट्ठी में बांधने को तत्पर भी है।

मीडिया और स्वयंभू तटस्थ राजनीतिक विश्लेषक पंडितों ने लोकसभा चुनाव को मतदाता के विवेक को परिवर्तन के रूप में प्रचारित करना शुरू किया है। जातिवाद, क्षेत्रीयतावाद, स्थानीय मुद्दों और उम्मीदवारों की छवि वगैरह पुराने विचार-आधारों को दरकिनार कर मतदाता को सुशासन, विकास और परिवर्तन की घुट्टी पिलाई जा रही है। कहा जा रहा है कि ये ही वे केंद्रीय प्रश्न हैं। इन पर पूरे देश में इस बार एक ही ढर्रे पर मतदान होने की संभावना है। ऐसी सरकार चुनी जा सकती है, जिसकी राजनीतिक और आर्थिक नीतियां सुस्पष्ट और पारदर्शी हों। साथ ही नेतृत्व में कुछ कर गुजरने की क्षमता हो।

बहुत-से अखबार और टीवी चैनल बड़े उद्योगपतियों के मालिकाना हक के तहत हैं। वे अपने हितों के अनुरूप चुनाव अभियान में हस्तक्षेप कर रहे हैं। उन्हें नए प्रयोग, नए नेतृत्व और नई नीतियों की देश-हित के नाम पर निजी स्वार्थों के लिए जरूरत है। नक्कारखाने में तूतियों का शोर नहीं होता। समझदार तार्किक और अनुभवी लोगों के प्रश्न पूछते ही उन्हें धकिया दिया जाता है। खुद भाजपा में लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, लालजी टंडन, जसवंत सिंह, यशवंत सिन्हा और लालमुनि चौबे वगैरह कई उदाहरण हैं। विकास शब्द की परिभाषा तो क्या, उसका शब्दकोशीय अर्थ नहीं बूझ सकने वाले लालबुझक्कड़ीय मतदाता भी गुजरात के विकास मॉडल को सिर-माथे पर लादे गली-चौराहों में अफवाहग्रस्त विचारक बने हुए हैं।

यह भी विरोधाभास है कि नवउपनिवेशवादी प्रवृत्तियों की मुखालफत करने वाले वामपंथी सत्तानशीन होने पर पूंजीवाद से छोड़छुट्टी या खुट्टी नहीं कर पाते। वे पूंजी के सामाजिक उपयोग और पूंजीवादियों की राजनीतिक भूमिका को गड्डमगड्ड कर देने के दोषी भी रहे हैं।

मौजूदा लोकसभा चुनाव में कट्टर सांस्कृतिक राष्ट्रवाद, आर्थिक उदारवाद, विकास का गुजरात मॉडल, 2002 के गुजरात दंगों में मुसलमानों का कत्लेआम और देशज कॉरपोरेट खिलाड़ियों की खुली सक्रिय भूमिका का सीधा घालमेल है। मनमोहन सिंह सरकार की तरह-तरह की विफलताओं ने भी इस चुनाव को बहुउद्देशीय बना दिया है।

गुजरात मॉडल को इस तरह प्रचारित किया गया है मानो वही आधुनिक रामराज्य है। राम अल्पसंख्यकों के खिलाफ कट्टर हिंदुत्व के धनुर्धर प्रवक्ता के रूप में विश्व हिंदू परिषद की राजनीतिक तिजारत के सबसे बड़े प्रवक्ता बना दिए गए हैं। मोदी, भाजपा और संघ परिवार ने शब्दों में भले नहीं कहा होगा, लेकिन गांधी के उलट उनके रामराज्य की प्रचारित परिकल्पना के ढांचे में मोदी के गुजरात मॉडल को फिट कर देना संघ परिवार और कॉरपोरेट दुनिया को ठीक रास आ रहा होगा।

हैरत की बात है कि तथाकथित संभावित विकास के पुरोधा यह नहीं कहते कि उनकी आर्थिक नीतियों के कारण आम जनता के रहन-सहन का स्तर सुधरेगा, नौकरियां मिलेंगी, महंगाई और मुद्रास्फीति कम होगी, अमीर को बहुत अधिक अमीर बनने के अवसर मिलने के बदले गरीब को बहुत अधिक गरीब बनाने के कुचक्र रोके जाएंगे। आम मतदाता फिर भी विकास के उन्मादी नारे में इस कदर गाफिल रखा जा रहा है कि अपना राजनीतिक विवेक उस दौलत की चकाचौंध के लिए गिरवी रख दे, जो नवधनाढ्य अरबपतियों की तिजोरियों में कैद होने वाली है।

इस सिलसिले में कांग्रेस तो क्या, आम आदमी पार्टी सहित तमाम क्षेत्रीय राजनीतिक दल भी सैद्धांतिक रूप से कॉरपोरेट आॅक्टोपस की गिरफ्त से बाहर नहीं हैं। कम्युनिस्टों के नेतृत्व के वामपंथी दल अनुकूल अवसर मिलने पर भी अपने प्रचारतंत्र में वह मारक क्षमता गूंथ पाने में विफल दीख रहे हैं, जबकि इन पार्टियों का जनवादी राजनीतिक चरित्र रहा है।

आंकड़ों का अंकगणित, लेकिन गुजरात गौरव गायन के पक्ष में नहीं दिखाई पड़ता। अपनी तमाम आर्थिक तरक्की के बावजूद गुजरात औद्योगिक पूंजीनिवेश के क्षेत्र में ओड़िशा और छत्तीसगढ़ के बाद ही उद्योगपतियों की रुचि का प्रदेश है। वहां रोजगार और नियोजन के आंकड़े ढलान की ओर हैं। इंस्टीट्यूट आॅफ अप्लाइड मैनपॉवर रिसर्च की मानव विकास संबंधी ताजा रिपोर्ट के अनुसार, गुजरात मानव विकास के मानकों पर तमिलनाडु, महाराष्ट्र, हरियाणा


और हिमाचल प्रदेश वगैरह के पीछे खड़े होकर देश में नौवें स्थान पर है। 1999-2000 से इसमें यथास्थिति रही है।

स्वास्थ्य सूचकांकों को लेकर भी मोदी प्रशासन पिछड़ा हुआ है। जच्चा की मृत्यु दर में तमिलनाडु का अनुपात सत्तानवे और महाराष्ट्र का एक सौ चार है। वहीं यह अंक गुजरात में एक सौ अड़तालीस है। नवजात शिशुओं की मृत्युदर तमिलनाडु में इकहत्तर और महाराष्ट्र में छप्पन तथा राष्ट्रीय औसत में छियासी 1992-93 में रही है। वह घट कर तमिलनाडु में बाईस, महाराष्ट्र में पच्चीस और राष्ट्रीय औसत में चौवालीस हो गई है। यही आंकड़ा गुजरात के लिए पहले बहत्तर और अब इकतालीस अंक पर टिक गया है।

गुजरात के बच्चों का कुपोषण राष्ट्रीय चिंता का विषय है। 1992-93 में पचास प्रतिशत बच्चे कुपोषित थे। वह आंकड़ा 2005-06 में 51.7 प्रतिशत पर पहुंच गया। हाशिये पर पड़े लोगों के स्वास्थ्य सूचकांक भी गुजरात में अस्वस्थ नजर आते हैं। अनुसूचित जातियों का मृत्यु सूचकांक 1992-93 में तमिलनाडु में नब्बे अंकों पर था। वह 2005-06 में घट कर सैंतीस हो गया। गुजरात में वह सत्तर से घट कर पैंसठ पर ठहर गया। आदिवासियों के लिए यह अंक 2005-06 में छियासी पर ठहरा हुआ है, जबकि राष्ट्रीय औसत बासठ तक उतर गया है।

छह वर्ष से अधिक और चौदह वर्ष से कम उम्र के बच्चों को संविधान के अनुच्छेद 21 (क) के अनुसार स्तरीय और वांछित शिक्षा पाने का मौलिक अधिकार है। इसकी हालत भी गुजरात में अच्छी नहीं है और न ही प्रौढ़ शिक्षा की। गुजरात इस सिलसिले में पहले इक्कीसवें नंबर पर था। अब देश में छब्बीसवें नंबर पर आ गया है।

विशेषज्ञ अतुल सूद के अनुसार, गुजरात ने कुछ क्षेत्रों में अवश्य प्रगति की है, लेकिन वहां भी उसे अन्य प्रदेशों के मुकाबले पिछड़ने का सुयश प्राप्त होता रहता है। 1993-94 में ग्रामीण गुजरात में 43.3 प्रतिशत गरीबी थी। उसे 2011-12 में गुजरात ने घटा कर 21.5 प्रतिशत कर दिया। इसी अवधि में तमिलनाडु ने ऐसी ही गरीबी को 51.2 प्रतिशत से घटा कर 15.8 प्रतिशत कर दिया।

हाशिये पर पड़े तरह-तरह के कमजोर वर्गों के स्वास्थ्य, शिक्षा, गरीबी और जीवनयापन के अन्य सूचकांकों के संदर्भ में भी तथ्यपरक रिपोर्टों के आधार पर गुजरात के पास नाज करने के लिए बहुत कुछ नहीं है। ‘थोथा चना बाजे घना’ की अनुकृति में इसके बावजूद यह मोदी की मुुहावरे वाली छप्पन इंची छाती है, जो हुंकार, गर्जना, ललकार, दहाड़, चीत्कार, चुनौती वगैरह में विश्वास करती हुई पौराणिक शैली में आधुनिक जनयुद्ध करने पर आमादा है।

नव विकासवाद के मोदीनुमा प्रवर्तक विदेशी पूंजीनिवेश की प्रत्यक्षता के विरोधी नहीं, बल्कि कायल हैं। उन्हें उतनी ही मात्रा और शिद्दत के साथ भारतीय पूंजीपतियों का निवेश भी चाहिए। राष्ट्रीय उत्पादन सूचकांक बढ़ाने के लिए उन्हें उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण की उपादेयता में कोई संदेह नहीं है। विकास प्रक्रिया में मानवीय चेहरा उकेरने के नाम पर सामंतवादी मुद्राएं आर्थिक सुधार, साक्षरता, पेयजल, नवजात शिशुओं का संरक्षण जैसे कार्यक्रमों को प्राथमिकता के स्तर पर प्रचारित करती हैं। इसके साथ-साथ यह अंदरूनी चेतावनी भी गूंजती रहती है कि राज्य की आर्थिक व्यवस्था लोकप्रियता की भेंट न चढ़ जाए।

नवउपनिवेशवाद एक ऐसा सपना बनाया गया है, जिसे साकार करना जरूरी है। उसके लिए ‘गरीबी हटाओ’ जैसे सपने फिलहाल प्रतीक्षा कर सकते हैं। उद्योगपतियों को सस्ती दरों पर भूमि और अन्य वित्तीय संसाधन उपलब्ध कराना अंतत: उत्पादकता से जुड़ा समीकरण है। उससे प्राप्त उत्पाद को कमजोर वर्गों के लिए उपयोग में लाए जाने से विकास की प्रक्रिया भोथरी नहीं हो पाएगी।

उद्योगों को अपने मुनाफे का एक न्यूनतम निश्चित अंश कॉरपोरेट उत्तरदायित्व के तहत आसपास के इलाकों में खर्च करने की लचर रस्म अदायगी को भी अर्थशास्त्र के पंडित विकास का शुभंकर मानते हैं। मध्यवर्ग को यह रूमानी झांसा दिया जा रहा है कि प्रशासन को भ्रष्टाचार-मुक्त और चुस्त कर देने से विकास का सीधा असर उसके जीवन में उतरने लगेगा। कोई नहीं बताता कि वैश्वीकृत पूंजीवादी निजीकरण की अर्थव्यवस्था की इब्तिदा ही भ्रष्टाचार और घूसखोरी के आधार पर होती है। इस व्यवस्था के तहत किसी भी स्तर पर भ्रष्टाचार से निजात कैसे पाई जा सकती है?

कोई भी तेज धावक दलदल में दौड़ कर कीर्तिमान बनाना तो दूर, लक्ष्य तक पैदल भी नहीं पहुंच सकता। विकास का मौजूदा मॉडल मोदी या भाजपाजनित नहीं है। पिछली सदी के आखिरी दो दशक में वह नरसिंह राव के प्रधानमंत्रित्व-काल में तत्कालीन वित्तमंत्री मनमोहन सिंह द्वारा भस्मासुर की कथा के अनुरूप ईजाद किया गया था। उस पूरी व्यवस्था के हाथ-पांव और नीयत में फर्क हुए बिना मनमोहन सिंह के बदले मोदी का चेहरा लटकाए जाने की वर्जिश को क्रांतिकथा के बीजपाठ के रूप में समझाया जा रहा है!

 

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