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गुजरात मॉडल का मिथक PDF Print E-mail
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Thursday, 17 April 2014 12:15

कनक तिवारी

जनसत्ता 17 अप्रैल, 2014 : भाजपा ने अपना अश्वमेध वाला घोड़ा सिकंदर महान की तरह भारत विजय अभियान के नाम पर छोड़ दिया है।

वह भारत विजय किए बिना मानने वाला नहीं है। सिकंदर भी विश्व-विजय के बिना मानने वाला नहीं था, लेकिन सतलज नदी पार नहीं कर पाया। वापस वतन लौटा तो घर तक पहुंचते अज्ञात जगह पर उसे फौत होना पड़ा। पिछले लोकसभा चुनावों में भाजपा का ‘फील गुड’ और ‘इंडिया शाइनिंग’ का नारा फील बैड और कांग्रेस शाइनिंग में तब्दील हो गया। उससे सबक लेकर भाजपा, बल्कि संघ परिवार ने गुजरात मॉडल के विकास को राष्ट्रीय स्तर पर लागू करने का खुद में जोश भर लिया है।

 

भाजपा ने बहुत सावधानी के साथ लगभग पांच सौ करोड़ रुपयों का अंतरराष्ट्रीय संचार एजेंसियों जैसे एप्को, वर्ल्डवाइड, अंतरराष्ट्रीय विज्ञापन एजेंसी ओगिल्वी ऐंड माथेर की सहायक कंपनी सोहोस्क्वेयर और मैक्कान वर्कग्रुप की सहायक कंपनी टैग को प्रचार अभियान का ठेका दे रखा है। इनमें से कुछ एजेंसियां पिछले लोकसभा चुनाव के पहले से ही भाजपा के पक्ष में कार्यरत रही हैं। अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली राजग सरकार की चुनाव पूर्व जन-वाहवाही के अभियान में प्रमोद महाजन के संयोजकत्व में भाजपा ने एक सौ पचास करोड़ रुपयों का व्यय किया ही था। चुनाव में फिजूलखर्ची की परंपरा को देखते हुए औसतन प्रत्येक उम्मीदवार आसानी से पांच करोड़ रुपयों तक खर्च कर लेगा। दिल्ली फतह करने का यह अंतरराष्ट्रीय प्रचार-बुद्धि का भारतीय राजनीतिक अनुभव-उत्कर्ष बनने का संभावना क्षण लाया गया है।

यह गुजरात मॉडल क्या है और क्या है इसका मिथक? विदेशी प्रत्यक्ष पूंजी निवेश, रोजगार सुविधाओं, लोक-स्वास्थ्य और साक्षरता जैसे कई मानकों पर गुजरात 2011 की जनगणना के वक्त देश में सत्रहवें स्थान पर रहा। कुछ मानकों पर वह इतने नीचे नहीं रहा, लेकिन अग्रणी प्रदेश होने के उसके दावे गलत सिद्ध हुए। राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण के दस्तावेजों के अनुसार गुजरात पोषण-आहार, शिक्षा, रोजगार, वेतन, उपभोक्ता मूल्य सूचकांक, ग्रामीण नियोजन, स्वास्थ्य, पर्यावरण वगैरह में काफी पिछड़ा रहा है। इन सब तथ्यों को झुठलाते हुए मोदी के गाल बजाने पर चिढ़ कर उनके विरोधियों ने उन्हें सोशल मीडिया पर फेकू की उपाधि से सुशोभित किया। दुर्योधन जब अति कर रहा था तब भी धृतराष्ट्र सहित कुरुवंश के दीवानेखास में भीष्म पितामह, द्रोणाचार्य, कृपाचार्य वगैरह उपस्थित तो थे ही। क्या यही भूमिका भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व से बेदखल किए गए नेता और संघ नेतृत्व अदा नहीं कर रहे है?

संघ परिवार की यह चतुर कूटनीति रही है कि गुजरात के विकास मॉडल की तुरही बजाते समय अपने स्थायी एजेंडे यानी सांप्रदायिक धु्रवीकरण को भूलना श्रेयस्कर नहीं होगा। इसलिए देश में छोटे-मोटे सांप्रदायिक दंगों और विवादों के चलते हिंदू-मुसलिम सौहार्द की पतली त्वचा को उस घाव के ऊपर से खरोंचा जाता रहा, जो भारत विभाजन के पहले से कुछ लोगों द्वारा स्थायी नासूर बनाए जाने के कुचक्र का शिकार है। गुजरात का विकास मॉडल उस खरोंच पर भी मरहम की तरह लगाता दिखाया जाए, लेकिन सौहार्द की त्वचा को पपड़ियाने नहीं दिया जाए। यही तो विराट मोदी अभियान के नए महाभारत का युद्ध पर्व है।

अगर सर्वोच्च न्यायालय नहीं होता तो ऐसा ही अभियान अयोध्या में लंका कांड में तब्दील होने को हमेशा बेताब रहता। संघ परिवार के आंतरिक रणनीतिकार यह स्वीकार करने में गुरेज नहीं कर सकते कि गुजरात विकास मॉडल के आर्थिक उद्घोष और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के सांप्रदायिक आग्रह को समांतर के बदले अंतर्निर्भर रणनीति का हिस्सा बनाया जाए। इस बार सोमनाथ से आडवाणी के नेतृत्व में अयोध्या की धार्मिक यात्रा नहीं, बल्कि नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में वडोदरा से वाराणसी होते हुए दिल्ली की राजनीतिक यात्रा की जाए। त्रेता युग के राम गांधीनगर से लड़ कर अपने वंशज अवतार द्वापर के कृष्ण को वाराणसी से इतिहास का नायक बनाएं। अन्यथा आरएसएस की दूरदृष्टि के लिए नागपुर में तीसरा नेत्र उपलब्ध है ही।

सत्ता एक दिन, एक माह, एक वर्ष या एक दशक में हासिल नहीं की जाती। स्थायी सत्तानशीनी के लिए बहुप्रतीक्षित तकनीकी पर भरोसा करना होता है। हिंदुत्व के समझ-विस्तार और स्थापना के लिए वीर सावरकर और गुजरात के ही श्यामजी कृष्ण वर्मा वगैरह के जमाने से बीसवीं सदी के आते-आते कोशिशें शुरू हो गई थीं। संयोग और विरोधाभास यह भी हुआ कि गुजरात से ही उसके समांतर, बल्कि मुठभेड़ करती एक समावेशी हिंदुत्व की परिकल्पना मोहनदास करमचंद गांधी के जेहन से निकली। वर्षों भिड़ने और पिछड़ने के बाद आठवें दशक के अंत में अयोध्या में राम मंदिर बनाने के नाम पर एक छींका टूटा। 1992 में राम मंदिर बनाने की श्रद्धा के मिस्टर जैकिल बाबरी मस्जिद ढहाने के मिस्टर हाइड में तब्दील हो गए।

इस हादसे के बाद एक बार पूरे कार्यकाल के लिए भाजपा के नेतृत्व में केंद्र में राजग की सरकार बनी। उसके पतन के बाद यह महसूस किया जाने लगा कि 2004 और 2009 के चुनावों में हिंदुत्व के कार्ड के बदले यूपीए का विकास कार्ड भारी पड़ा। वैसे भी 1977 के जनता पार्टी उद्भव वाले चुनाव और 1984 के इंदिरा गांधी की हत्या से उत्पन्न सहानुभूति वाले चुनाव को छोड़ कर राजनीतिक पार्टियां, मुख्यत: कांग्रेस आर्थिक मुद््दों और विकास को लेकर चुनाव मैदान में उतरती रही। केवल हिंदुत्व के सहारे सत्ता में आकर स्थायी रूप से काबिज रहना भाजपा के लिए संभव न दिखने पर धर्म और अर्थ की एक नई कॉकटेल तैयार करना संघ के रणनीतिकारों को जरूरी और मुफीद लगा।

इस संधिबिंदु पर इतिहास, संयोग और भूगोल ने नरेंद्र मोदी को खड़ा किया। यह बात अलग है कि अगर शरद पवार के साथ सिंचाई के पानी की बंदरबांट के पुख्ता आरोप महाराष्ट्र के किसानों की कीमत पर नितिन गडकरी पर नहीं लगे होते तो उन्हें अग्रसर करने के लिए


भाजपा की राष्ट्रीय अध्यक्षी संबंधी प्रावधान को संशोधित करने को लेकर संघ परिवार को कोफ्त नहीं होती।

भाजपा की कई सरकारें खुलेआम प्राकृतिक संसाधन, लौह अयस्क, कोयला, जंगल, जमीन, बॉक्साइट वगैरह बड़े उद्योगपतियों को खैरात की तरह दे रही हैं। कांग्रेस उसमें से, आरोपों के अनुसार, छोटा हिस्सा मिल जाने से ही इतनी खुश दिखाई देती है कि न तो जन आंदोलन कर पाती है, न ही न्यायालयों में परिणामधर्मी मुकदमे लड़ पाती है। अपराध जगत में ऐसा भी समय आता है, जब चोरी करने वाले पकड़े जाते हैं और डकैत मूंछों पर ताव देते दाऊ या ताऊ कहलाते हैं। उसका यह भी कारण है कि दोनों बड़ी राष्ट्रीय पार्टियों के आर्थिक फलसफे की इबारत और बनावट तो एक ही है। दोनों किसान-विरोधी, मजदूर-विरोधी, गरीब-विरोधी और छोटे व्यापारियों की विरोधी भी हैं। दोनों के वैश्विक और भारतीय उद्योगपतियों से कारोबारी और सियासी रिश्ते हैं। दोनों में अंतर केवल नेतृत्व के चेहरों का है। एक पार्टी कहती है उसने आर्थिक चिंतन के सरदार को नेता चुना। दूसरी पलट कर कहती है उसने असरदार नेता को चुना है। नेता या चेहरा कोई भी हो, वह तो राजनीतिक और आर्थिक व्यवस्था का सिरदर्द था और बनने ही वाला है।

रेलगाड़ी के अनारक्षित डिब्बे में सीट पर अपनी चादर या कंबल बिछा कर कब्जा कर लेने वाला यात्री अपने गंतव्य पर जब उतर जाता है, तब उस सीट की ताक में बैठा कोई हमसफर उसी बर्थ पर कब्जा कर लेता है। कांग्रेस और भाजपा में अनेक सदस्यों और कार्यकर्ताओं के स्तर पर व्यापारिक हितों का टकराव नहीं साझा है। इसलिए भाजपा को कांग्रेस की खामियों, विलोप और चूक के संबंध में अन्य विरोधी पार्टियों के मुकाबले अवलोकन के अनुकूल अवसर उपलब्ध होते रहे हैं। वामपंथियों, समाजवादियों और बहुजन समाज पार्टी आदि के सदस्यों की सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि सामंजस्य के आधार पर उस तरह घनीभूत नहीं हो पाती।

हिंदुत्व की विजय की महत्त्वाकांक्षा के कुलांचे भरते हुए संघ परिवार और भाजपा को यह रास आया कि विकास की कांग्रेसी विफलता को प्रतिद्वंद्वी आर्थिक मॉडल दिखा कर दोनों लोक साध लिए जाएं। गुजरात में हुए 2002 के दंगों से दक्षिणपंथी योजनावीरों को निश्चित तौर पर आघात लगा था। कांग्रेस और अन्य विरोधी दलों ने कटुतम आलोचना भले की, वे भाजपा की अगली कार्ययोजना को कमतर आंकते रहे। राजग के अन्य साथी घटक दलों को भी यह भांपना संभव नहीं हुआ कि अंतत: भाजपा का एजेंडा क्या है।

यह था वह मनोवैज्ञानिक वातावरण, जिसके तहत भाजपा ने इंडिया शाइनिंग के अपने पुराने 2004 के नारे को नई बोतल में भरा। नवउदारवाद, निजीकरण और वैश्वीकरण की समर्थक ताकतों को भाजपा ने अपने राजनीतिक छाते के नीचे खड़े करने का जतन भी किया। देश के पहले दस बड़े नवधनाढ्यों में से अधिकतर ने भाजपा के कार्यवृत्त को लेकर हामी भर दी। अतिरिक्त लाभ यह मिला कि जो गुजरात पहले से ही कांग्रेस के कार्यकाल में विकसित रहा, उसका भी श्रेय लूटने में मोदी ने कोई हिचकिचाहट नहीं दिखाई। पुराने तथ्यों, आंकड़ों, उपलब्धियों वगैरह को मोदी प्रशासन की छवि को रोशन करने के काम में इस तरह इस्तेमाल किया गया कि जन-स्मृति को पुराना कुछ भी याद नहीं रहा। सब कुछ नया-नया लगा।

इसी बीच मोदी और उद्योगपतियों की अंतरंग मुलाकातें संख्या और पारस्परिकता में बढ़ती रहीं। लक्ष्य एक था। शक्तियां दो। धनुष उद्योगपतियों का और तीर पर भाजपा और मोदी का नाम लिखा गया। आजादी की लड़ाई में जो पार्टी पांडव पक्ष की तरह थी, भांडा फूटे भ्रष्टाचार के कारण उसे हिंदुत्व की ताकतों ने कौरव कहना शुरू कर दिया। वैसे खुद उनकी भूमिका अंगरेजों के प्रति बहुत अधिक विरोधी की नहीं थी।

मूलत: कुछ नहीं बदला। हिंदुत्व का नया नामकरण गुजरात का विकास मॉडल हुआ। केवल विकास मॉडल कहने से बिहार, महाराष्ट्र और तमिलनाडु वगैरह के भी उस सूची में घुस जाने के अफसाने बुने जाते। 2002 के गुजरात दंगों के दाग मिटाने के लिए पार्टी कार्यकर्ताओं को हटा कर बाजार को केंद्रीय भूमिका दी गई। विदेशी विज्ञापन एजेंसियों को पार्टी के मस्तिष्क का चीरघर बनाया गया। कार्यकर्ता संघ-दक्ष की आवाज पर रेंगते भर रहे। अमेरिकी चुनावों में धनबल का उपयोग होता है। उस परिघटना को भी पछाड़ने के गुर सिखाए जाने लगे।

चुनाव-प्रचार मतदाताओं को रिझाने या प्रभावित करने के बदले उनमें नई संस्कारशीलता डालने का माध्यम बनाया गया है। चुनाव परिणाम चाहे जो हों। भाजपा और मोदी के पक्ष में केवल वोट नहीं चाहिए। इस विचारधारा की विकास गंगा में हर तीज-त्योहार पर एक डुबकी लगाने की हिंदू संस्कारशीलता की मर्यादा के खूंटे से मतदाता को बांधने का जतन किया जा रहा है।

यह वाचाल प्रचार हुआ कि 2002 के बाद गुजरात दंगा-मुक्त प्रदेश है, जबकि बाकी राज्य ऐसा दावा नहीं कर सकते। यह तो वैसा ही हुआ कि 2001 के महाभूकंप आने के बाद गुजरात का ही भुज भूकंप-मुक्त इलाका हो गया है। गुजरात के मुसलमान इस कदर भयभीत कर दिए गए हैं कि उनकी ओर से दंगा करने की संभावनाएं ही नहीं हैं। मोदी के नेतृत्व में बकरी के मुकाबले यह शेर की प्रकृति की हिंदू सांप्रदायिकता है, जो पुचकार की मुद्रा में दहाड़ लेती है कि वह बकरी के साथ एक ही घाट पर साबरमती का पानी पी रही है।

 

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