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यह अपरिभाषित हिंसा है PDF Print E-mail
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Wednesday, 16 April 2014 11:40

गिरिराज किशोर

जनसत्ता 16 अप्रैल, 2014 : प्रिय अरविंदजी, मेरी मित्रता आपसे कानपुर में, मेरे उपन्यास ‘पहला गिरमिटिया’ के माध्यम से ही हुई थी।

तब आप हरिहरनाथ शास्त्री भवन, कानपुर में आरटीआइ के सिलसिले में भाषण करने आए थे। मैं अध्यक्ष के स्थान पर था। आठ मार्च को रोड शो के समय आप पर जो आक्रमण हुआ उसने बहुत-से संवेदनशील जनों को उद्वेलित किया होगा। बहुत-से प्रसन्न भी हुए होंगे, जैसे भाजपा के बड़े नेता श्री मल्होत्रा। मैं सोचने लगा, आपके साथ ऐसा क्यों हो रहा है? शायद इसलिए कि आप उन सब नेताओं से भिन्न हैं, जो हवा में चलते हैं और जेड आदि श्रेष्ठतम सुरक्षा-कवच में रहते हैं। आपने अपने मुख्यमंत्रित्व-काल में सुरक्षा कवच लेने से मना कर दिया था। अब भी आप उस तरह के सुरक्षा-कवच में नहीं चलते।

 

मुझे बचपन की याद आती है। स्कूल में कुछ कमजोर बच्चे होते थे, दबंग और शैतान बच्चे उन्हें जब देखो तब पीट देते थे। यहां तक कि क्लास में कमजोर बच्चों को अध्यापक दूसरे बच्चों से चपत लगवाते थे। यह अपरिभाषित हिंसा है। वही हिंसा आपके साथ भी हो रही है। पहले चुनावों में इस तरह की हिंसा नहीं होती थी। यह चुनाव विकृतिपूर्ण चुनाव तो है ही, इसमें भाषागत हिंसा चरम सीमा पर है। एकमात्र प्रस्तावित प्रधानमंत्री ने जिस तरह की भाषा के प्रयोग की शुरुआत की है, इसमें कोई शक नहीं इस आक्रामक प्रचारात्मक भाषा का मतदाताओं पर मनचाहा प्रभाव पड़ेगा। उन्हें हो सकता है यह असंयत भाषा अधिकतम सीटें दिला दे। उत्तेजना और समझदारी में अंतर होता है। युद्ध और चुनाव में उत्तेजनापूर्ण और असंयत भाषा जन के संयम को कुछ समय के लिए स्थगित करने में मदद करती है। स्टालिन, मुसोलिनी और हिटलर जब कभी बोलते थे, कहते हैं वे जनता को सम्मोहित कर देते थे। अटलजी वक्तृत्व में माहिर थे, पर उनके भाषण के सामने आज के नेताओं के भाषण नकारात्मकता को प्रोत्साहन देने वाले ज्यादा हैं।

आपके साथ उपरोक्त आक्रामकता संभवत: गुजरात की यात्रा के बाद आरंभ हुई है। दो बातें याद आती हैं। शायद आपकी कार के साथ एक्सीडेंट भी वहां हुआ था, हो सकता है वह वाकई एक्सीडेंट हो। दूसरा, वहां के मुख्यमंत्री का चकित करने वाला व्यवहार था। मैंने अभी तक यही जाना है कि आचार के हिसाब से कोई पूर्व मुख्यमंत्री किसी पदासीन मुख्यमंत्री से मिलने की इच्छा प्रकट करे तो उसे पुलिस द्वारा रुकवा देना असभ्यता न कह कर, कहूंगा, दुर्व्यवहार की कोटि में आता है। पहले जो आपको हवालात ले जाने की घटना हुई थी वह स्वागतार्थ औपचारिकता पूरी की गई थी। ताज्जुब है वहां की आतिथ्य सत्कार करने वाली जनता ने अपने ऊपर यह लांछन कैसे लगने दिया। उसी के विरोध में भाजपा कार्यालय के सामने आप (पार्टी) के लोगों का प्रदर्शन हुआ, जिसके लिए आपने माफ ी मांगी और चुनाव आयोग ने कारण बताओ नोटिस दिया था।

एक पूर्व मुख्यमंत्री के साथ हुए दुर्व्यवहार का चुनाव-आयोग को क्या स्वत: संज्ञान नहीं लेना चाहिए था? उसके बाद जब पहली बार आप मोदीजी के खिलाफ  चुनाव लड़ने का मन बना कर वाराणसी गए तो रोड शो के समय आप पर स्याही फेंकी गई, अंडे फेंके गए तो भी वहां की पुलिस उसे रोक नहीं पाई थी। आक्रमण का क्रम निरंतर जारी है। हरियाणा से दिल्ली तक रोड शो के दौरान कई बार चपत मारने की, सिर पर घूंसे मारने की घटनाएं हुर्इं। इस बार तो अति हो गई। नौ अप्रैल को फेसबुक पर मनीष पांडे ने लिखा है कि लाली बसपा का कार्यकर्ता है! दिल्ली पुलिस ने एक बार भी आक्रमणकर्ता को आक्रमण करने से पहले नहीं पकड़ा। क्यों? इसका कारण यह तो नहीं कि उनचास दिन सरकार चलाने के दौरान उन्होंने पुलिस के भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने का प्रयत्न किया था।

चुनाव आयोग का दायित्व शांति और व्यवस्था के साथ चुनाव कराना तो है ही, जो वह कर रहा है। मुझे यह मालूम नहीं कि प्रत्याशियों और पार्टी के नेताओं की सुरक्षा और सम्मान की रक्षा करना भी है या नहीं, अगर है तो यह हमलों की शृंखला केवल केजरीवाल के साथ कैसे हो रही है। यदि मैं धृष्टता नहीं कर रहा हूं तो चुनाव आयोग को भविष्य में इस तरह की घटनाओं को रोकने के लिए, गहरी छानबीन का काम देश की किसी सक्षम एजेंसी को सौंपना चाहिए। ऐसा हो सकता है कि भविष्य में इस तरह का अमानवीय व्यवहार और ज्यादा शिद्दत से हो। यह काम कैडर वाली पार्टियों के लिए आसान है। यही नहीं, बनारस और दिल्ली में आक्रमण करने वालों को पुलिस को सौंपा गया। पुलिस ने क्या किया? इस बारे में कहीं कुछ पता नहीं चला। आप अहिंसात्मक ढंग से सामना कर कहे हैं। लेकिन जब दोषियों को जनता पीटती है तो पुलिस उनकी रक्षा नहीं कर पाती। क्यों? क्या चुनाव आयोग ने राज्य सरकारों से रिपोर्ट मंगाई? इस समय जनतंत्र की रक्षा की जिम्मेदारी चुनाव आयोग पर है।

आठ अप्रैल की उपरोक्त घटना के बाद कांग्रेस और भाजपा के प्रवक्ताओं ने प्रसन्न भाव से कहा था कि यह सब इसलिए हो रहा है क्योंकि केजरीवाल अपनी जिम्मेदारी से भाग गए और आश्वासन पूरे नहीं किए।  किसी संविधानवेत्ता ने इस स्थिति पर अभी तक कोई टिप्पणी नहीं की। राजनीतिक जरूर इस बात को फैला रहे हैं और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया समर्थन दे रहा है। सामान्य आदमी के सोच के तहत मैं आपको याद दिलाना चाहता हूं, संविधान और उससे जुड़ी नैतिकता के आधार पर चौ. चरण सिंह और चंद्रशेखरजी ने भी उस स्थिति में त्यागपत्र दिया था जब उनको समर्थन देने वाली पार्टी ने समर्थन वापस ले लिया था, जैसे दिल्ली सरकार के साथ उनचास दिन पुरानी सरकार गिराने के समय हुआ था। उस समय सवाल क्यों नहीं उठा?

उत्तर प्रदेश में घटी दो घटनाओं का मुझे स्मरण है। वह


एक ही पार्टी के भीतर का मामला है। तत्कालीन मुख्यमंत्री डॉ संपूर्णानंद द्वारा खड़े किए गए मुनीश्वरदत्त उपाध्याय और चंद्रभानु गुप्त के बीच प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष का चुनाव हुआ था। मुख्यमंत्री ने घोषणा कर दी थी कि अगर उपाध्यायजी हार गए तो वे पद से त्यागपत्र दे देंगे। गुप्तजी जीत गए तो मुख्यमंत्री ने त्यागपत्र नहीं दिया। उस वक्त लोग पार्टी की गरिमा का ध्यान रखते थे, हाइकमान को हस्तक्षेप करना पड़ा।

इसी प्रकार जब चौ. चरण सिंह ने कांग्रेस छोड़ी तो चंद्रभानु गुप्त की सरकार अल्पमत में हो गई थी। गुप्तजी उठे और सीधे गवर्नर के यहां जाकर त्यागपत्र दे आए। हाइकमान को अच्छा नहीं लगा। मीडिया ने जब पूछा आपने त्यागपत्र क्यों दिया, तो उनका जवाब था, मैं गलत परंपरा नहीं डालना चाहता था। सत्ता में बने रहने से जरूरी है परंपराओं को कायम रखना। इंदिरा गांधी ने सत्ता में बने रहने के लिए आपातकाल लगाया था, जबकि हार के बाद त्यागपत्र दे देना चाहिए था। उसी गलती का परिणाम था कि केंद्र में जनता पार्टी की सरकार बनी थी।

वाजपेयीजी भी तेरह दिन की सरकार चलाने के बाद चले गए थे। उन्होंने भी त्यागपत्र देना उचित समझा था। केजरीवाल भी पहले ही संपूर्णानंदजी की तरह घोषित कर चुके थे कि जन लोकपाल बिल पास नहीं हुआ तो वे त्यागपत्र दे देंगे। क्या कोई भी मुख्यमंत्री सत्ताईस और बयालीस के अनुपात में रह कर सरकार चला सकता था? जनहित में क्या कोई भी निर्णय लेना या बिल पास कराना अल्पमत वाली सरकार के लिए संभव था? कांग्रेस और भाजपा, दोनों ने मिलकर आप सरकार के पैरों के नीचे से दरी खींची। गिर गए तो सवाल कर रहे हैं कि आप गिरे क्यों?

मुझे स्मरण आता है कि जब गांधीजी दक्षिण अफ्रीका पहुंचने के बाद मेरित्सपीटर्सबर्ग से प्रिटोरिया की पहली यात्रा पर थे तो पहले तो उन्हें ट्रेन से मय सामान के फेंक दिया गया था। फिर जब रास्ते में ट्रेन छोड़नी पड़ती थी और स्टेट कोच यानी घोड़ागाड़ी से जाना पड़ता था (जिसका टिकट रेल के टिकट के साथ ही मिल जाता था), कोच के मुख्य साईस ने, जिसे वे लीडर कहते थे, उन्हें कोच के अंदर नहीं बैठने दिया क्योंकि वहां गोरे बैठे थे। कोच बॉक्स पर साईस के पास जाड़े में बैठाया। क्योंकि उन्हें जल्दी पहुंचना था। वे न चाहते हुए भी चुपचाप बैठ गए। सबेरे तीन बजे लीडर, जो उनकी सीट पर बैठा था, बाहर निकल कर आया और गंदा कपड़ा पायदान पर डाल कर कहा ‘सामी तुम यहां बैठो मैं वहां बैठ कर सिगरेट पीऊंगा।’ गांधी ने मना कर दिया। उसने उन्हें लात और घूंसों से मारना शुरू कर दिया। गांधी ने कोचबॉक्स का डंडा पकड़ लिया, तय कर लिया कि भले ही हाथ टूट जाए वे नहीं हटेंगे। अंदर बैठे गोरों ने जब देखा कि लीडर एक पढ़े-लिखे आदमी को बेरहमी से मार रहा है तो उन्होंने पूछा तुम क्यों पीट रहे हो। उसकी बात सुन कर उन्होंने कहा ‘उसके पास टिकट है, तुमने इसे बाहर बैठाया और इसकी सीट पर खुद बैठे। जब उसकी जगह अंदर है उसे अंदर बैठने दो।

गांधी को पहला अनुभव था कि अन्याय अनुगूंज पैदा करता है और तटस्थ और विरोधी लोगों को भी न्याय के पक्ष में खड़ा होने को प्रेरित करता है। पहली बार सत्याग्रह का वह अंकुर फूटा था। आप कल गांधी-समाधि पर जाकर बैठे, यह एक अंत:प्रेरणा है। उसी के फलस्वरूप आप लाली से मिलने गए, जिसे एक संवेदनहीन भाजपा प्रवक्ता ने मिलीभगत कहा, जबकि श्री पांडे ने फेसबुक पर लिखा है वह भाजपा का कार्यकर्ता है। वे कहते हुए मुस्कुरा रहे थे, जैसे उनकी चाल सफल हो गई हो। यही कांग्रेस के प्रवक्ताओं का भी हाल है। इस संवेदनहीनता का दुष्प्रभाव अंतत: इन्हीं लोगों को भोगना होगा। आज नहीं तो कल।

कांग्रेस तो गांधी को भुला कर हाशिये पर है ही। मोदीजी भाजपा के सर्वेसर्वा हैं। उनका एक मंत्र है बदला, जिसका उच्चारण उनके सिपहसालार शाह ने मुजफ्फरनगर में किया। बदले का चुनाव है। दूसरा है राम मंदिर। बाकी तो भराव है। कई बार तो लगता है कि 2002 से लेकर आज तक बदले का दौर चल रहा है। एक बदला पार्टी के अंदर तब हुआ जब मोदीजी गुजरात पहली बार मुख्यमंत्री होकर गए थे। पार्टी के विरोधी चाहे सीनियर थे या जूनियर, सब संपला कर दिए गए। दूसरा बदला अब हुआ जब प्रधानमंत्री पद के प्रत्याशी बनाए गए। आडवाणीजी से लेकर टंडनजी तक सब नगण्य कर दिए गए।

केजरीवालजी, जब गांधीजी दक्षिण अफ्रीका गए तब भी अकेले थे। भारत में भी उन्होंने अकेले ही ब्रिटिश राज को बिहार में नीलहा कानून तोड़ कर पहली चुनौती दी थी। फिर एक के बाद एक के बाद दूसरा कानून तोड़ते चले गए थे। चाहे भाजपा हो या कांग्रेस या कम्युनिस्ट, सब सुरक्षित और यथास्थिति की राजनीति के आदी हैं। इस यथास्थिति को आपने चुनौती दी है। घड़ियाल-ताल में अगर कोई पांव डाल दे तो सब घड़ियाल दौड़ पड़ते हैं। या तो डर कर पांव निकाल लो या फिर निडर होकर उतर पड़ो। मैं केवल यह कहना चाहता हूं भले ही आपका संगठन सुनियोजित नहीं है, कई लोगों में निष्ठा की कमी है, पर आपने परिवर्तन के इस ऐतिहासिक क्षण को पकड़ा है। आप घबराए नहीं। समय आपके साथ है।

 

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