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मतदाता का मानस PDF Print E-mail
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Tuesday, 15 April 2014 10:43

कुमार प्रशांत

जनसत्ता 15 अप्रैल, 2014 : हमारे मतदाताओं में बहुत सारे और गहरे बदलावों की जरूरत है।

सबसे पहला फर्क तो इस मानसिकता में होना जरूरी है कि हम राजतंत्र की प्रजा नहीं, लोकतंत्र के लोक हैं। भाग्यविधाता की यह हैसियत तो संविधान ने हमें दे दी है, भाग्यविधाता का यह आत्मविश्वास हममें अब तक नहीं आया है। वह आ जाए तब जो चाहते हैं कि कमल जीते, उनके लिए यह देखना भी जरूरी होगा कि यह कमल खिलेगा तो किस तालाब में? उच्छल जलधि तरंग वाला मानवों का महासागर किसी ताल-तलैया में बांधा जाए, यह हमें कैसे स्वीकार करना चाहिए? हाथ जीते तो जीते जरूर लेकिन हम यह जरूर देखें कि यह अब तक रहा है किसके साथ और रहेगा किसके हाथ? हमें यह देखना ही होगा कि यह साइकिल सैफई तक ही क्यों जाती है और उसे हमेशा वे ही क्यों चलाते हैं जिन्हें कहीं चक्की पीसते होना चाहिए था? हाथी तभी क्यों चलता है जब सामने कुर्सी दिखाई देती है? झाड़ू का हाल ऐसा क्यों है कि वह सफाई कम और पिटाई ज्यादा करती है; और अंतत: अपने आंगन में ही ज्यादा गंदगी बटोर लाती है? और ये सारे क्षेत्रीय दल राजनीति में अपनी साख बनाने से कहीं ज्यादा ध्यान इस पर क्यों रखते हैं कि किस शाख पर बैठ कर फल के सबसे करीब पहुंचा जा सकता है?

 

हमारी राजनीति की सबसे भयंकर त्रासदी यह है कि सत्ता ही उसका एकमात्र साध्य रह गई है जिसे पाने के लिए उसने किसी भी साधन को वर्जित नहीं माना है। इसलिए आज हम ऐसे मुकाम पर खड़े हैं जहां सभी एक-दूसरे को अधिक काला बता रहे हैं लेकिन कोई यह कहने की जुर्रत नहीं कर पा रहा है कि हम दूसरे से अधिक सफेद हैं। लोकतंत्र कालेपन की स्पर्धा का खेल नहीं है, यह तो सफेदी का दायरा बड़ा करने की कलाकारी का नाम है। और इसमें सबसे बड़ी ताकत, सबसे बड़ी संख्या, सबसे बड़ा तुरुप का पत्ता और सफेदी लगाने वाला सबसे बड़ा ब्रश मतदाता के पास है!

इस चुनाव में फैसला इस बात का नहीं होना है कि प्रधानमंत्री कौन बनेगा; फैसला इस बात का होना है कि आगे का भारत कैसा बनेगा और किधर चलेगा! कांग्रेस हमें इतने सालों से यही समझाती आई है कि राजनीति ऐसे ही चलती है जिसमें भ्रष्टाचार भी होगा, परिवारवाद भी होगा, कमीशनखोरी भी होगी, जातीयता, सांप्रदायिकता भी होगी और इन सबके साथ-साथ देश में कुछ विकास भी होगा, थोड़ा-बहुत काम भी होगा। वे सभी यही कहते हैं: राजनीति ऐसे ही चलती है भाई!

भारतीय जनता पार्टी भी इन सारी बातों को मानती है और अपने सत्ता-काल में यही सब करती भी रही है, लेकिन वह हमें कांग्रेस से अलग भी एक बात समझाती रही है। वह कहती है कि भारतीय समाज हिंदुओं की मुट्ठी में रहना चाहिए क्योंकि यह देश उनका है, उनकी यहां बहुसंख्या है और वे ही भारतीय संस्कृति के वाहक हैं। भाजपा यह नहीं कहती कि दूसरे हैं ही नहीं। वह दूसरों को भी इस देश में जगह देती है लेकिन जगह देने का अधिकार अपने हाथ में रखना चाहती है। उसका राजनीतिक दर्शन समाज को धर्म, जाति, भाषा, लिंग आदि हर स्तर पर तोड़ कर अपनी मुट्ठी में रखने का है। अटल-आडवाणी की जोड़ी ने दर्शन के स्तर पर इसे स्वीकार करते हुए भी, छवि के स्तर पर इसे बदलने का खतरा उठाया था। उन्होंने इसे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से दूर ले जाने की कोशिश की थी जिसकी सजा संघ आज तक आडवाणी को दे रहा है। नरेंद्र मोदी और उनके दरबारियों ने फिर से छवि और दर्शन दोनों स्तरों पर संघ को आश्वस्त कर लिया है और देश को अपनी मुट्ठी में करने में जुटे हैं।

राजनीतिक परिदृश्य पर जो दूसरे दल सक्रिय हैं वे सब इसी का हिसाब करते रहते हैं कि कैसे इतनी सीटें मिल सकें कि सत्ताधारी गठबंधन में शरीक होने की पूरी कीमत वसूली जा सके। जयललिता, ममता, मायावती से लेकर मुलायम, नीतीश, लालू आदि की राजनीति का चरम इतना ही है- रहबर नहीं, सहयात्री! बेचारे वामपंथी इस मेले में खो गए हैं! किताबी क्रांति इतनी ही अधूरी और भ्रम में डालने वाली होती है और इसलिए इतिहास गवाह है कि किताबों से क्रांति नहीं होती, क्रांतियां अपनी किताब आप लिखती हैं।

फिर बचती है एक पार्टी ‘आप’, जिसे पार्टी कहें कि जमावड़ा, यह न वे जानते हैं न देश जानता है। असंतोष और अस्वीकार दोनों जब मिल जाते हैं तो बड़ी ताकत बन जाती है। ‘आप’ ने इसे नजदीक से देखा है। उसने समझा हो कि न समझा हो लेकिन यह अटल सत्य है कि आप जैसे ही इसे संगठित करने लगते हैं, असंतोष आकार की मांग करने लगता है और अस्वीकार पूछने लगता है कि आपको स्वीकार क्या-क्या है? ‘आप’ इस गुत्थी को अब तक समझ नहीं पाई है और इसी कारण सुलझा भी नहीं पा रही है।

हमारी पार्टी नई है, हमारा संगठन नहीं है, हमें अनुभव नहीं है और हम किसी वाद को नहीं मानते हैं जैसी बातें जब-तब ‘आप’ के मंच से सुनाई देती हैं। ये बातें अगर ठीक हैं तो इसकी फिक्र ‘आप’ को होनी चाहिए, देश को क्यों हो? मतदाता तो पूछता है कि अगर यह सब है ही नहीं तो लड़ाई में उतरे क्यों? ‘आप’ को समझने की जरूरत है कि वाद और मतवाद में फर्क होता है। संकीर्ण मतवाद बांधता है, शुद्ध वाद (विचार) मुक्तकरता है। वाद दिशा है जिसे आपने एक बार ठीक से समझ लिया तो उसका आसमान तलाशना आपका काम है।

यह तो हुई


पार्टियों की बात, लेकिन मतदाता का क्या? अगर आप मतदाता हैं तो आपको मत देने का अपना आधार बदलना होगा। इस बार फैसला देश की दिशा का होना है तो मतदान विचार को आधार मान कर करना होगा। हमने व्यक्तियों को देख कर वोट दिया है, पार्टियों को देख कर वोट दिया है, हमने परिवारों को देख कर वोट दिया है। हमने उन्माद में आकर वोट दिया है, हमने गुस्से में आकर वोट दिया है। लेकिन नतीजा एक ही आया है- ढाक के तीन पात! इस बार हम देखें कि जो हमारा वोट मांग रहा है उसकी विचारधारा क्या है? मोदी जैसे लोग कहते हैं- विकास!  राहुल जैसे लोग कहते हैं- गरीब! लेकिन विकास अपने आपमें कोई विचाराधारा नहीं है। आपके पास विचारधारा हो तो वह बताती है कि विकास कैसे होगा, किसका होगा और किस कीमत पर होगा!

अधिकतर उम्मीदवारों के पास हमें कोई विचारधारा नहीं मिलेगी। किरण खेर कहती हैं कि वे मोदी के लिए एक सीट जुटाने भर के लिए चुनाव में खड़ी हुई हैं तो हेमा मालिनी कहती हैं कि मैंने जीवन में बहुत सारे अनुभव लिए हैं, सो चुनाव लड़ने का अनुभव भी लेने का मन हुआ। कुमार विश्वास कहते हैं कि आरएसएस तो अच्छा है, भाजपा उस पर वेताल की तरह सवार है। प्रियंका गांधी कहती हैं कि उन्हें अपने भाई और मां की सीटों से ही मतलब है, पार्टी से नहीं! मोदी छप्पन इंच का सीना फुला कर कहते हैं कि मैं और केवल मैं आपको सारी मुसीबतों से निकाल लाऊंगा। कोई उनसे पूछे कि क्या हमें मसीहा चुनना है? मसीहाई देखते-देखते निरंकुश तानाशाही में बदल जाती है। नरेंद्र मोदी के संदर्भ में इसकी पूरी आशंका है।

राहुल से कोई पूछे कि आजादी के बाद से अब तक देश सबसे अधिक समय तक तो आपकी ही पार्टी और आपके ही परिवार के हाथ रहा है। फिर गरीबी का यह चूहा जिंदा क्यों है? पिछले दस साल तो सीधे ही मां-बेटे के हाथ रहे हैं। आंकड़ों के बहुत सारे जादूगर आपने जमा भी कर लिए लेकिन यह सच्चाई छिपती नहीं कि लोगों की बुनियादी जरूरतें पूरी नहीं हुई हैं। एक बारीक पेच है जिसे समझने में हम अक्सर चूक जाते हैं कि गरीबी मिटाने का काम अमीरी बढ़ाने से पूरा नहीं होता। इसलिए विनोबा भावे ने तब एक बड़ी गहरी बात कही थी जब राहुल के नाना की सरकार हुआ करती थी और अधिकतम जमीन रखने की मर्यादा तय की जा रही थी। वे अपनी शैली में दो टूक बोले थे: सीलिंग की नहीं, फ्लोरिंग की मर्यादा बनाइए! सीलिंग तो उसी से तय हो जाएगी।

अब यह बात राहुल को कैसे समझाई जाए कि दुनिया में जमीन ही एकमात्र वह कारखाना है जिसमें उत्पादन होता है। गरीबी के खिलाफ सबसे बड़ा युद्ध इसी कारखाने में लड़ा जाता है। आप उद्योगों के नाम पर, विकास की संरचना के नाम पर, भूमि अधिग्रहण कानून के नाम पर, सेज या मॉल आदि के नाम पर इस कारखाने की व्याप्ति को जितना कम करते जाएंगे, गरीबी के खिलाफ लड़ाई उतनी ही कमजोर और नकली होती जाएगी।

ऐसी संभावना है कि इस चुनाव के बाद देश को एक ऐसा प्रधानमंत्री मिलेगा कि जिसका जन्म आजाद भारत में हुआ हो। हम उससे क्या चाहेंगे? रोजगार के नकलीपन की चर्चा किए बगैर मैं सरकार का यह आंकड़ा स्वीकार कर रहा हूं कि उसने पिछले दस सालों में कुल डेढ़ करोड़ रोजगार पैदा किया है।

इससे हम खुश हों कि इसी सरकार का यह आंकड़ा भी याद रखें कि प्रतिवर्ष हमारे सामने एक करोड़ बीस लाख नए लोगों को रोजगार देने की चुनौती खड़ी होती जाती है। इन दो आंकड़ों के आईने में हम अपने युवाओं का चेहरा देखें तो उनकी लाचारी और त्रासदी समझी जा सकती है। और हमें यह बात खूब समझ लेनी चाहिए कि हमारा हर बेरोजगार युवा एक बम है जो कभी भी, किसी भी आतंकवादी के हाथ पड़ सकता है। महंगाई, खासतौर पर खाद्य महंगाई लगातार दो अंकों में घूमती रही है। महंगाई भूख भी पैदा करती है और हताशा भी और ये दोनों मिल कर एक पस्तहिम्मत इंसान बनाते हैं।

आज जैसे पतनशील समाज में ईमानदारी से बड़ा कोई वाद नहीं है! अपने उम्मीदवारों का जीवन देखिए, ईमानदारी के संदर्भ में उनके पिछले कीर्तिमानों को तौलिए। क्या इस आदमी का नाम किसी बड़े घोटाले में आया है? क्या यह किसी सांप्रदायिक-जातीय हिंसा में शामिल रहा है? क्या यह आदमी आपके गांव, नगर, मुहल्ले के असामाजिक तत्त्वों में गिना जाता है? क्या महिलाओं के संदर्भ में इसकी कुख्याति रही है? क्या यह आदतन दल-बदलू है? अगर इनमें से एक भी श्रेणी में यह आदमी आता है तो यह हमारा मत पाने का अधिकारी नहीं है।

‘नोटा’ के बारे में भले प्रशासकों का विवेक अभी पक्का नहीं हुआ है लेकिन अयोग्य उम्मीदवारों और असावधान दलों पर मतदाता के अंकुश की संभावना इस बटन में है। इसका इस्तेमाल जितना बढ़ेगा, हम उनकी नकेलें उतनी ज्यादा कस सकेंगे। जिस देश के कुल मतदाताओं का बावन फीसद अठारह से चालीस साल के आयु-वर्ग में आता हो, क्या उससे इतने विवेक की आशा रखना ज्यादती है?

 

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