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Saturday, 12 April 2014 10:31

अनन्या वाजपेयी

जनसत्ता 12 अप्रैल, 2014 : अब जब सोलहवीं लोकसभा के गठन के लिए 2014 के आम चुनाव शुरू हो चुके हैं, देखते-देखते और साफ -साफ  एक तमाशा नजरों के सामने उभर रहा है- भाजपा और नरेंद्र मोदी की तरफ नजरिए में हमारे खास टीकाकारों के बदलते तेवरों का तमाशा। तेवरों के ये बदलाव अलग-अलग रूप में हैं और अलग-अलग किस्म के तमाशबीनों और जानकारों के मुखौटों में से झलक रहे हैं। (लफ्ज ‘तेवर’ बयान के रूप में ज्यादा  और आलोचना के रूप में कम इस्तेमाल किया जा रहा है, खासतौर से फिलहाल)

हमें बताया जा रहा है कि मोदीजी ने रास्ता बदला है: मुमकिन सहयोगियों का भरोसा पाने और एक मिलीजुली सरकार का नेता बन सकने के लिए, अब उनका नया अवतार हिंदुत्व के चरमपंथी से बदल कर मध्यमार्ग के मंद दक्षिण-पंथी वाला हो गया है। हमें बताया जा रहा है कि भविष्य में उनका आचरण भूत में उनके आचरण से अलग होगा; सूबे के नेता वाली उनकी शख्सियत, जिसकी लोकप्रियता की हद गुजरात तक ही थी, उन्होंने तज दी है, और अब वे न सिर्फ देश के बल्कि दुनिया के सियासतदां बनने की ओर अग्रसर हैं। हमें बताया जा रहा है कि मोदीजी वैसे नहीं हैं जैसा कि उनके आलोचक कहते हैं; वे तो कभी फूट डालने वालने, फिरकापरस्त, तानाशाह और हिंसक थे ही नहीं; वे तो हमेशा से, मजहबी राजनीति और हिंसा में नही, बल्कि आर्थिक उन्नति और मूलभूत विकास में दिलचस्पी रखते हैं।

इसके अलावा हमसे यह भी कहा जा रहा है कि अब तक उदार कही जाने वाली मुहिम मोदीजी के खिलाफ  भेदभावपूर्ण रही है और उन्हें दुष्ट-आत्मा करार देने में जुटी रही है, और ऐसा खासतौर पर इसलिए रहा है क्योंकि कांग्रेस और वाम दलों की चापलूसी करने की आदत पड़ चुकी है। वरना गुजरात और उसके बाहर रहने वाले समझदार मुसलमान- जिन्हें ठोस आर्थिक अवसरों की दरकार है, न कि सेक्युलर मूल्यों की- मोदीजी को समर्थन देते हैं, जैसा कि उन्हें करना चाहिए, अगर वे दुनियादारी के हामी हैं, न कि कोरी भावुकता के। आखिरकार, मोदीजी या उनके प्रशासन के खिलाफ  कोई कानूनी सबूत ही नहीं है कि उन्होंने 2002 में गुजरात में मुसलमानों के खिलाफ  ऐसी हिंसा की योजना बनाई, भड़काई, उकसाई, अनदेखी की, खुद की या किए जाने में मदद की, जिसके चलते कम से कम एक हजार लोगों की जान गई और दसियों हजार बेघर हो गए। इन नए तथ्यों के चलते (‘नए’ क्योंकि ये उन तथ्यों से बहुत अलग हैं जिन्हें हम सच मानते आए हैं) वे, जिन्हें मोदीजी से बदगुमानियां थीं, अब उनके समर्थक हैं और उन्हें खुलेआम ऐसा एलान करने में कोई झिझक नहीं है।

मेरी राय में सियासी नजरियों के ये बदलते हुए तेवर असल में सियासी समझदारी से पल्ला झाड़ लेने के अद्भुत नमूने हैं। सियासी दंगल की इस लफ्फाजी को, जो पूरी तौर से भड़काऊ है, शालीन बातचीत का दर्जा दिया जा रहा है। घटनाक्रम जो भयानक रूप से सांप्रदायिक है, उसे मामूली और सेक्युलर करार दिया जा रहा है। चुप्पी को मासूमियत का सबूत माना जा रहा है। नकारने को बड़े और समझदार होने की निशानी माना जा रहा है। प्रशासन में कुशलता, अच्छे राजकाज और ऊंची विकास दर के दावे- जो अपने आप में जाहिरा गलत-से हैं, उन्हें अल्पसंख्यकों के प्रति उदासीनता ही नहीं बल्कि उनके अधिकारों के हनन का पर्याप्त बहाना और उचित पूरक कहा जा रहा है। मोदीजी के पसंदीदा मॉडल- बड़ी कंपनियों के आक्रामक निवेश- के तले पर्यावरण जो कीमत चुका रहा है, उसके परिणामों पर अशोभनीय उतावलेपन से परदे डाले जा रहे हैं। जैसा कि डॉ डेविड ब्रॉमविच ने 2008 के अपने एक बहुत आला निबंध, ‘यूफेमिज्म ऐंड अमेरिकन वैल्यूज’ (कोमल भाषा और अमेरिकी मूल्य) में लिखा था, ‘शब्दों की सच्चाई और हिंसा की असलियत दांव पर लगे हैं।’

अभी हाल में ललित कला अकादेमी, दिल्ली, में एक प्रदर्शनी हुई थी- ‘सहमत’ की पच्चीसवीं जयंती के अवसर पर। संगठन ‘सहमत’ आंदोलनकारी रंगकर्मी सफदर हाश्मी के नाम पर शुरू हुआ; सफदर को 1989 में चौंतीस साल की उम्र में मार दिया गया था। छल, समझौते, मधुरता, मिलीभगत, मत-प्रचार की तेजी से बढ़ती हुई आवाजें क्या छिपा रही हैं ये प्रदर्शनी में दिखाई गई कई छवियां बआवाजे-बुलंद बता रही थीं। गुजरात में 2002 की विचलित कर देने वाली खूंख्वार आगजनी, बलात्कार, कत्ल और खदेड़े जाने की छवियां! राख हुए घर, सदमे खाई हुई जीवित लाशें। जल कर राख और विरूपित अमदाबाद- न सिर्फ अनेकानेक फोटो में दर्शित, बल्कि रुदन भरे चित्रों, मूर्तियों और कविताओं में अंकित।

गुलबर्गा सोसाइटी और नरोदा पाटिया के हमारे साझे जमीर पर लगे हुए दाग जो धीरे-धीरे ही भर पाएंगे- बिना किसी हल्के-से एक संकेत के कि ऐसा कांड हुआ है, और उसके लिए अनकही ही सही, मगर जिम्मेदारी का अहसास, मोदीजी और उनके सेनापतियों से जो उस समय गुजरात के शासक थे- एक क्षमा-याचना चाहे वह देर से ही और खामोश जुबान से की जाए, इन दागों का भर पाना शुरू भी नहीं हो सकता। अगर मोदीजी की निगरानी में इतना घोर नरसंहार हो सकता है, तो क्या गारंटी है कि यह फिर नहीं होगा? हमें यह कैसे विश्वास आए कि कभी इंसाफ हो पाएगा, अगर उस कांड की जिम्मेदारी ही कोई लेने के लिए तैयार


नहीं है?

छवियां वो दर्शा सकती हैं जो शब्द छिपाने की कोशिश करते हैं। मगर ये समझने के लिए कि मोदीजी आखिर किस मिट््टी के बने हैं और उन्हें जिताना चाहिए या नहीं, उनकी भाषा ही सबसे भरोसेमंद गाइड है। उनकी भाषा हिंदू भक्ति, धार्मिक उग्रवाद, मुसलमानों से नफरत, और हिंदुत्व-राष्ट्रवाद के भय और भ्रमों से ओतप्रोत है। यह वह शख्स है जिसने 2002 में मारे गए मुसलमानों को कार के नीचे आ जाने वाले पिल्लों के बराबर माना था; जिसके लोकप्रिय चुनाव के नारे ‘हर हर मोदी’ और ‘नमो नमो’ हैं; जिसने यह कहा था कि बांग्लादेश के मुसलमान आप्रवासियों को बसाने के लिए असम में गैंडों को मारा जा रहा है; जिसने फारसी-उर्दू जबान में राहुल गांधी को ‘शहजादा’ और सोनिया गांधी को ‘सुल्ताना’ कहा ताकि एक ही झटके में नेहरू-गांधी परिवार के राजवंशीय रूप और उसके खास सदस्य के ‘विदेशी’ मूल पर आघात किया जा सके; जिसने मुसलमानों के जनसंहार की हिंसा को अपने कुख्यात बयान में एक ‘प्रतिक्रिया’ का नाम दिया- उस ‘क्रिया’ के खिलाफ, जिसमें फरवरी 2002 में अयोध्या से लौटते हुए उनसठ करसेवक, गोधरा में रेलगाड़ी में आग लगने से मारे गए थे।

यह वही शख्स है जिसने अपने हिंदू राष्ट्रवादी होने की व्याख्या की कि, ‘मैं हिंदू हूं और मैं राष्ट्रवादी हूं’; जिसने ‘सच्ची शासन प्रणाली’ को ‘धर्म’ कहा, संविधान को एक ‘धार्मिक ग्रंथ’ करार दिया और जनसेवा को ‘पूजा’ कहा (यानी धार्मिक अर्चना के स्वरूप), जिसने 2002 के अधिकतर पीड़ितों के राहत शिविरों को ‘बच्चे जनने की फैक्ट्री’ की संज्ञा दी। इन जुमलों में वे अनगिनत व्यक्तिगत गाली-गलौज और कटाक्ष शामिल नहीं हैं जिनका शिकार इन्होंने अपने विरोधियों को बनाया, खासतौर पर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह (जिनको मोदीजी ने ‘मौन मोहन सिंह’ कह कर उनके कार्यकाल में जाहिर हुए भ्रष्टाचार के मामलों पर उनकी चुप्पी पर कटाक्ष किया), और आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल को (जिनको मोदीजी ने ‘एके-49’ की संज्ञा दी, और इस एक ही तीर से केजरीवाल के दिल्ली के मुख्यमंत्री के रूप में 49 दिन का हवाला देने के साथ-साथ एके-47 की तर्ज पर- जिसे कश्मीर के अलगाववादी अक्सर इस्तेमाल करते हैं- केजरीवाल को एक किस्म का देश-द्रोही भी करार दे दिया)।

कई दफा मोदीजी नहीं बल्कि उनके वफादार सेवक, भक्त और उनके मुंहबोले प्रवक्ता बदले की बात करते हैं, न कि भाईचारे की, और मुसलमानों और हिंदुओं के हवाले से, आक्रमणकारियों बनाम धरतीपुत्रों की। वे कहते हैं कि हमें सेक्युलर रास्ते या विकास में से किसी एक को चुनना है, मानो देश के लिए इस बेसिरपैर के विकल्प और विकास की इच्छा में कोई जाहिरा तर्कसंगत रिश्ता हो। वे कहते हैं कि हमें इस बात पर गौर करना चाहिए कि कितने खास मुसलमान भाजपा के साथ जुड़ रहे हैं- जैसे गिने-चुने ऊंचे तबके के लोगों की मौका-परस्ती किसी ऐसे विकल्प की तरफ इशारा करती हो जो उन करोड़ों अल्पसंख्यकों के लिए है या नहीं है, जो नागरिक अधिकारों से वंचित और एक घेरे में कैद हैं।

वे  कहते हैं कि मोदीजी ने सम्मान देना और संयम सीख लिया है- जैसे चुनाव के समय बनावट, मुखौटे पहनना और झूठ, अनजाने पैंतरे, जो पहले कभी सुने नहीं गए और जिनकी अपेक्षा हम अपने चुनाव के दंगल में वोट मांगने वाले सियासतदानों से नहीं करते! वे कहते हैं कि मोदीजी एक साफ  छवि के आदमी हैं- मानो जाहिरा तौर पर धन-संबंधी कम भ्रष्टाचार, हमारे जनतंत्र के सहनशीलता, भाईचारे और विविधता में एकता जैसे बुनियादी मूल्यों की सख्त कमी की भरपाई कर सकता हो।

क्या हम वाकई चाहते हैं कि मोदीजी और उनकी मंडली के इन और इन जैसे अनेक और भड़काऊ शब्दों को भूल जाएं, नजरअंदाज कर दें, जान-बूझ कर गलत मायने निकालें या समझें? क्या हमें मोदी शिविर, मीडिया के एक हिस्से और प्रबल मुहिम चला सकने वालों की इस, डॉ ब्रॉमविच के शब्दों में, ‘मृदुभाषी सांठगांठ’ में शरीक होना चााहिए? क्या हम लेडी मैकबेथ की बीमारी के शिकार होना चाहते हैं जिसमें हम अपने खून से रंगे हाथों को धोते रहें, धोते रहें, ताकि हम आने वाले हफ्तों में सत्ता की लगाम उनके हाथ सौंप दें? अमेरिका के संदर्भ में और राष्ट्रपति जॉर्ज बुश के 9/11 के बाद ‘आतंक के खिलाफ जंग’ के हवाले से, डॉ ब्रॉमविच ने लिखा था, ‘जनतंत्र मृदु भाषा के साथ लगातार सांठगांठ में रहता है।’ हिंदुस्तान के जनतंत्र और खासतौर पर उसके हक  में बोलने वाले पढ़े-लिखे उदार समुदाय में प्रिय लगने वाली भाषा के लिए एक डरावना-सा प्रेम उमड़ता हुआ लगता है जो हमारे राज्यतंत्र को नैतिक जिम्मेदारी और समझदारी से दूर, और दूर लेकर जा रहा है। समय आ गया है खरे को खरा और खोटे को खोटा कहा जाए, नहीं तो कहीं बहुत देर न हो जाए!

(अनुवाद: अशोक लाल)

 

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