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हम कैसा भविष्य चाहते हैं PDF Print E-mail
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Thursday, 10 April 2014 11:59

लाल्टू

जनसत्ता 10 अप्रैल, 2014 : चुनाव का वक्त है। भारत में कहीं दुंदुभि बज रही है तो कहीं संग्राम शुरू हो गया है।

पड़ोस में एक और देश अफगानिस्तान में अभी बीते शनिवार को चुनाव हुए हैं। दोनों मुल्कों के माहौल में फर्क गौरतलब है। भारत में अपनी तमाम सीमाओं के बावजूद लोकतंत्र की जड़ें मजबूत दिखती हैं। मीडिया का बड़ा हिस्सा बिका हो सकता है, पर प्रिंट और दृश्य दोनों माध्यमों में पर्याप्त आजादी का दावा है। सभी ताकतवर राजनीतिक दल भ्रष्ट हैं, कोई पैसों के लेन-देन में तो कोई बौद्धिक धरातल पर; हर तरह के भ्रष्टाचार का बोलबाला है।

 

फिर भी हमें अपने लोकतंत्र पर नाज है कि कम सही, सामाजिक गैर-बराबरी और दकियानूसी सोच के विरोध में उठती आवाजें बुलंद हैं। अफगानिस्तान में ऐसा नहीं है। यह वह मुल्क है, जिसे रूस ने थोड़ा बनाया, थोड़ा बिगाड़ा तो अमेरिका ने बिल्कुल ही तबाह कर दिया। फिर अपने ही बनाए दानव तालिबान से लड़ने फौजें भेजीं। इस बार चुनाव तब हो रहे हैं, जब अमेरिकी वहां से पूरी तरह दफा होने को हैं। कोई नहीं जानता कि आगे क्या होने वाला है।

अफगानिस्तान हमेशा ऐसा नहीं था। हालांकि भारत की ही तरह वहां के गांव काफी पिछड़े हुए थे, 1980 तक काबुल जैसे शहर आधुनिक रंगत के बढ़िया नमूने थे। विश्वविद्यालय में छात्र-छात्राएं हमारे युवाओं की तरह मिल-जुल सकते थे। खुले सोच और रूढ़ि का द्वंद्व था, पर किसी की कल्पना में भी यह नहीं था कि हालात आज जैसे हो जाएंगे, जब औरतें कैदियों की तरह जी रही होंगीं, पुरातनवादियों का बोलबाला होगा।

उपराष्ट्रपति के पद की प्रार्थी हबीबा सरोबी के साथ कोई तीन सौ स्त्रियां प्रांतीय परिषदों के लिए चुनाव मैदान में थीं। इनमें से एक जाकिया वारदाक की बेटी मरियम वारदाक का कहना है कि उसने गांव जाकर देखा कि एक महिला पच्चीस वर्षों से अपने जेठ-देवरों के सामने बुर्का नहीं उतार सकती। शुक्र है कि हम अफगानिस्तान नहीं भारत में हैं। तमाम खाप पंचायतों के बावजूद अधिकतर लोग अपनी जिंदगी अपने ढंग से जीने को आजाद हैं। पर भारत में कब तक यह माहौल रहेगा, जो आज है! क्या माहौल सुधरेगा या वह और भी बिगड़ेगा! इस बार के चुनावों में यह सवाल बहुत गंभीर बन कर सामने आ रहा है। कई लोग कहेंगे कि अरे अफगान लोग पिछड़े लोग हैं। वहां रूढ़िवाद हो सकता है, हमारे यहां नहीं होगा।

याद करें कि उन्नीसवीं सदी से लेकर बीसवीं सदी की शुरुआत तक सारे यूरोप में जर्मन बुद्धिजीवियों की धाक थी। दर्शन, विज्ञान, संगीत, हर क्षेत्र में जर्मनी और दीगर मुल्कों से आगे था। फिर दो दशक में ही ऐसा हुआ, जिससे आज तक जर्मन लोग उबर नहीं पाए हैं। यहूदियों के खिलाफ भावनाएं भड़काते हुए नाजी पार्टी सत्ता में आई और जब तक हिटलर ने आत्महत्या की, जर्मनी ही नहीं, सारी दुनिया बदल चुकी थी। लंदन शहर आधा तबाह हुआ तो ड्रेस्डेन जैसे शहर मिट््टी में मिला दिए गए। मित्र-शक्ति में शामिल जापान- उफ! हिरोशिमा, नागासाकी का वह भयानक विनाश, कौन इन बातों को भूल सकता है? आखिर कैसे होता है यह सब कि अच्छे-भले समाज देखते ही देखते इस तरह रसातल में डूब जाएं कि विनाश और तबाही के बिना उनको वापस लाना संभव ही न हो। इसका मुख्य कारण यह है कि जब विनाशकारी ताकतें सत्ता में आने की प्रक्रिया में होती हैं, अधिकतर लोग खासकर युवा इस झंझा को ताड़ नहीं पाते। उन्हें लगता है कि जितना भी हो, कुछेक गड़बड़ियां होंगी, पर सारे देश में तबाही लाने की बात कपोल-कल्पना है।

भारत में स्थानीय स्तर पर कभी प्राकृतिक तो कभी इंसानी दरिंदगी से तबाही के नमूने दिखते रहे हैं। पर ऐसा आज तक नहीं हुआ कि सारा देश किसी विनाशलीला से सीधे प्रभावित हो। यहां तक कि विभाजन की अंतहीन पीड़ा से भी देश का अधिकतर छूटा हुआ था। अभी हो रहे चुनावों में पहली बार ऐसी स्थिति है कि हम देश के हर कोने में विनाश लाने वाली ताकतों के सत्ता में आ सकने की संभावना देख रहे हैं। देश में हर जगह कम-ज्यादा आधार इन ताकतों का है।

खाप पंचायत और राम सेना के स्त्री-विरोधी हिंसक कार्यकलाप; अमदाबाद, कंधमाल, मुजफ्फरनगर आदि अनेक इलाकों में लघु-संप्रदाय पर अत्याचार; पुस्तकों पर ऊलजलूल तर्कों के आधार पर प्रतिबंध- यह सब जो अब तक टुकड़ों में होता रहा है, हिंदुत्ववादी ताकतें उन सबको संगठित रूप देने को तत्पर हैं। दूरदराज के इलाकों में कहीं स्कूल बना कर, कहीं भगतसिंह और विवेकानंद का गलत इस्तेमाल कर लोगों में जहर फैलाया जा रहा है। खतरनाक बात यह है कि जैसा पिछली सदी में जर्मनी, इटली, स्पेन के साथ और बाद में अफगानिस्तान में देखा गया, थोड़े समय में बड़ा मुनाफा कमाने के लालच से, भारत में भी विश्व-स्तर का पूंजीवाद इन ताकतों की मदद कर रहा है। भारत में लोकतंत्र की जड़ें इतनी भी मजबूत नहीं हैं, इस बात को हम पहली बार तब जान पाए थे जब पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने आपातकाल की घोषणा की थी।

आपातकाल के दौरान जिस तरह की ज्यादतियां हुर्इं और नागरिक अधिकारों का हनन हुआ, उसकी कल्पना पहले किसी ने न की थी। इतिहास हमें संभावनाओं को दिखला देता है, उन पर गौर करना या उन्हें अनदेखा करना हमारा काम है।

सवाल उठ सकता है कि एक पार्टी और उसके लोकप्रिय नेता का ऐसा विरोध हम क्यों कर रहे हैं। नरेंद्र मोदी ने बड़ी सावधानी से अपनी नई छवि गढ़ी है। बीस साल पहले से मुख्यमंत्री बनने तक जैसा सांप्रदायिक जहर वे उगलते थे, उससे बच कर बड़े व्यापारियों के मित्र की इस छवि को बनाने में कई पैंतरे उन्होंने अपनाए। कोई पत्रकार गुजरात के 2002 में हुए दंगों पर सवाल करे तो वे चुप्पी साध लेते। उन्हें


पता था कि चुप रहने पर जो निंदा होगी वह कुछ कह देने पर होने वाली स्थिति से ज्यादा विकट होगी।

कई जगह देश के इतिहास-भूगोल पर अंट-शंट कह कर पहले ही काफी फजीहत हो चुकी थी। जहां भीड़ भाजपा समर्थकों और संघियों की दिखी तो कह दिया कि दंगों का दुख है, पर इसका कोई अपराध-बोध उन्हें नहीं है। उन्हें सचमुच पहले जैसा जहर उगलने की जरूरत नहीं है। वैसे भी जो जमीनी काम है वह तो संघ के सेवक कर ही रहे हैं।

अमित शाह ने मुजफ्फरनगर में अपने सहयोगियों के साथ वह आग लगा ही दी जिसके लिए वे वहां गए थे। बाकी जेटली, राजनाथ सिंह से लेकर रामदेव तक अपना काम कर ही रहे हैं। इसलिए मध्यवर्ग के उस बड़े हिस्से को, जो खुलेआम सांप्रदायिक होना पसंद नहीं करता, साथ रखने के लिए सावधानी से छवि बनाए रखनी थी। पर महीनों देश-विदेश के पूंजीपतियों के पैसों से धुआंधार चुनाव प्रचार में लगे रह कर दिखने लगा कि लहर सचमुच वैसी है नहीं, जैसा कहा जा रहा था। पार्टी भी पूरी तरह से उनके साथ नहीं है। तो अब बेचारे थकने भी लगे हैं और जहां थोड़ा-सा भी माहौल अनुकूल लगता है, वहां अपनी पुरानी शैली में भड़काने का काम कर आते हैं। जम्मू में केजरीवाल को पाकिस्तान का एजेंट घोषित कर दिया। असम के धेमाजी में भाषण देते हुए कहा है कि गैंडों को मार कर बांग्लादेशियों के लिए जगह बनाई जा रही है। कभी कह दिया कि सरकार गोहत्या के लिए बनाए कसाईखानों को बढ़ा रही है।

ये सब बातें इसलिए कहनी पड़ रही हैं कि कुछ मतदाता और कुछ समझें न समझें, सांप्रदायिक भाषा समझते हैं। पाकिस्तान और बांग्लादेश का नाम लेकर मुसलमानों के खिलाफ भावनाएं भड़काई जा सकती हैं। ऐसा ही गोहत्या का संदर्भ भी है। उन्हें पता है कि आम लोगों की स्मृति में इतना नहीं रहता कि गोहत्या का कारोबार भाजपा के नेतृत्व वाली राजग सरकार के दिनों में भी वैसा ही चलता था जैसा आज चलता है। उनके अपने राज्य गुजरात से भी मांस का निर्यात बढ़ता गया है। पर सांप्रदायिक सोच तर्क नहीं कुतर्क से नियंत्रित होता है। पड़ोसी देशों के साथ समस्याएं आपसी विमर्श से सुलझाई जा सकती हैं, यह सोचना सही तो है, पर इसके लिए संयत मानसिकता चाहिए, जो खुशहाल माहौल में पनपती है। जहां आधी जनता भुखमरी और गरीबी का शिकार है, ऐसी बदहाली के माहौल में- वे सब बदमाश हैं हम उनको मजा चखा देंगे जैसी मार-काट की भाषा जल्दी घर करती है।

इंसान के अंदर की इसी हैवानियत को भड़का कर मोदी और संघ परिवार अपनी ताकत बढ़ा रहे हैं। लोकतंत्र की कमजोरियों का पूरा फायदा ये लोग उठाएंगे। सत्ता में आने के बाद ये लोग क्या करेंगे? जैसे अफगानिस्तान को विकास की राह से भटका कर उसे मध्य-कालीन स्थितियों में धकेल दिया गया, ऐसा ही यहां भी हो सकता है। स्त्रियों के अधिकार छीने जाएंगे। धर्म और जाति के नाम पर लोगों पर जुल्म ढाए जाएंगे। इतिहास की किताबों में अपने ढंग से मनगढ़ंत बातें डाली जाएंगी। जहां पारिस्थितिकी में असंतुलन से समूची धरती के विनाश को लेकर हर ओर इंसान परेशान है, और विश्व-स्तर की मानवीय चेतना के निर्माण की जरूरत गंभीर होती जा रही है, वहीं ये संकीर्ण राष्ट्रवाद पर आधारित भावनाओं को बढ़ाएंगे।

इन मानव-विरोधी ताकतों को आर्थिक समर्थन नवउदारवादी पूंजी के सरगनाओं से मिल रहा है। कांग्रेस के नेतृत्व में सरकार ने नवउदारवादी नीतियां देश पर लागू कीं। राजग सरकार ने उसे आगे बढ़ाया और पिछले दस साल में यूपीए ने इसके ढांचे को और मजबूत किया। शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे प्राथमिक क्षेत्रों में निजीकरण को बढ़ाया गया, बड़ी तादाद में लोगों को विस्थापित कर खनन का कारोबार बढ़ा।

जब इन नीतियों का विरोध बढ़ने लगा तो कुछ कल्याणकारी कदम उठाए गए। इससे कांग्रेस से सरमाएदारों की जमात का भरोसा कम हो गया। मोदी के तानाशाही रवैए में उनको भरोसा है कि जन-विरोध को कुचलने में वे कामयाब होंगे। आखिर अपनी हिंदुत्व की विचारधारा को तमाम विरोधों के बावजूद उन्होंने नकारा नहीं है। नवउदारवाद और सांप्रदायिकता का यह मेल भारत के लोकतंत्र को ध्वस्त कर देगा। अभी यह देख पाना संभव नहीं है, पर जब जुल्म का दौर शुरू होगा, हम असहाय दर्शक बने रह जाएंगे या एक-एक कर धरती से हमारा निशान मिटता जाएगा।

ऐसा नहीं कि बर्बरता पर हिंदुत्ववादियों का एकाधिकार है। हर समुदाय में कट्टरपंथी हैं और सरमाएदार अपने फायदे के लिए उन सबके साथ समझौता करते रहते हैं। नरेंद्र मोदी जैसे लोग, जिनमें संघ परिवार के अलावा जमात-ए-इस्लामी या ऐसे ही और दलों के नेता भी आते हैं, हमारे अंदर के शैतान को जगाते हैं कि सोचो जो आदमी तुम्हारे समुदाय का नहीं है, वह तुम्हारे बराबर कैसे हो सकता है। जिसे मोदी लहर कहा जा रहा है, उसकी जड़ में यह क्रूर मानसिकता है, जो कभी उदासीनता तो कभी खूंखार हिंसक प्रवृत्ति बन कर सामने आती है। हर हर मोदी जैसे आक्रामक नारे भी सुनाई पड़ने लगे हैं।

यूरोप से लेकर अफगानिस्तान तक का इतिहास हमारे सामने है। अनपढ़ लोगों को भड़काना आसान है। कम से कम हम पढ़े-लिखे लोग चुनाव के हक का इस्तेमाल करते हुए एक बार गंभीरता से सोचें कि हम इस मुल्क का कैसा भविष्य चाहते हैं।

 

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