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गैस की कीमत का खेल PDF Print E-mail
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Wednesday, 09 April 2014 11:40

धर्मेंद्रपाल सिंह

जनसत्ता 9 अप्रैल, 2014 : मनमोहन सिंह सरकार ने बड़ी चालाकी से विवादास्पद गैस मूल्य-वृद्धि का सांप

अगली सरकार के गले में डाल दिया है। चुनाव आयोग के निर्देश के कारण एक अप्रैल से प्राकृतिक गैस की प्रस्तावित मूल्य-वृद्धि पर रोक लग गई है। कल तक अपने फैसले का जोर-शोर से बचाव कर रहे तेल मंत्रालय ने गैस-कीमत बढ़ाने के लिए चुनाव आयोग से अनुमति मांगी थी। इस बीच आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल ने भी चुनाव आयोग को पत्र लिख कर विरोध जताया था। केजरीवाल ने प्रस्तावित मूल्य-वृद्धि को आचार संहिता का उल्लंघन बताते हुए कहा कि यह मामला सर्वोच्च न्यायालय के विचाराधीन है, इसलिए चुनावों के बीच कीमत बढ़ाने की इजाजत नहीं दी जानी चाहिए। आयोग ने केजरीवाल की मुराद पूरी कर दी, वहीं कांग्रेस को बदनामी से बचा लिया। इस मामले पर अब तक सीधे टिप्पणी करने से बच रही भारतीय जनता पार्टी को भी कहना पड़ा कि अगर उसकी सरकार बनी तो गैस मूल्य-वृद्धि के निर्णय की समीक्षा की जाएगी।

 

चुनाव आयोग के फैसले से रिलायंस कंपनी सन्न है। इकतालीस खरब रुपए की इस भीमकाय कंपनी ने अपने गैस कुओं से 4.2 डॉलर प्रति मिलियन ब्रिटिश थर्मल यूनिट (एमबीटीयू) की दर पर उर्वरक और बिजली कारखानों को गैस आपूर्ति का करार किया हुआ है, जो एक अप्रैल 2014 तक ही वैध है।

काफी समय से देश के कुछ वरिष्ठ नौकरशाह, सर्वोच्च न्यायालय के वकील और राजनेता आरोप लगाते आए हैं कि रिलायंस समूह को फायदा पहुंचाने के लिए ही यूपीए सरकार ने गैस-कीमत बढ़ाने का निर्णय लिया। यह भी आरोप लगा कि इस घोटाले में भाजपा की मूक सहमति है। केंद्र सरकार ने पिछले वर्ष जून में घरेलू गैस का मूल्य दोगुना (8.4 डॉलर प्रति यूनिट) करने का निर्णय लिया था, जिसकी अधिसूचना इस साल जनवरी में जारी की गई। अब उच्चतम न्यायालय में सरकार सफाई दे रही है कि उसने गैस मूल्य-वृद्धि नहीं, इसके फार्मूले की अधिसूचना जारी की थी। इसी कारण उसे मूल्य-वृद्धि के लिए चुनाव आयोग को पत्र लिखना पड़ा।

अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली के मुख्यमंत्री रहते रिलायंस उद्योग समूह के अध्यक्ष मुकेश अंबानी के खिलाफ पुलिस रिपोर्ट दर्ज कर कॉरपोरेट जगत में तहलका मचा दिया था। अंबानी से रिश्ते और चंदा लेने का सवाल पूछ कर उन्होंने कांग्रेस और भाजपा को कठघरे में खड़ा कर दिया है। भाजपा के प्रधानमंत्री पद के प्रत्याशी नरेंद्र मोदी को पत्र लिख कर केजरीवाल ने सवाल किए कि उनकी चुनावी रैलियों पर खर्च होने वाले करोड़ों रुपए उन्हें कौन दे रहा है? रिलायंस कंपनी के मालिक मुकेश अंबानी से उनका क्या रिश्ता है, और क्या चुनाव जीतने पर भाजपा सरकार घरेलू गैस की कीमत चार डॉलर प्रति यूनिट पर ले आएगी? यही सवाल उन्होंने कांग्रेस पार्टी के उपाध्यक्ष राहुल गांधी से पूछे हैं। केजरीवाल का आरोप है कि दोनों बड़े राष्ट्रीय दलों की रिलायंस समूह से सांठगांठ है।

यह पहला मौका है जब आम चुनाव में दो बड़ी पार्टियों के किसी उद्योगपति से रिश्तों पर सीधे सवाल किए जा रहे हैं। जो बातें गुप-चुप तरीके से कही जाती थीं, वे अब आमसभाओं में कही जा रही हैं। मुकेश अंबानी देश ही नहीं, दुनिया के सबसे अमीर लोगों में एक हैं। सत्ता के गलियारों में उनकी मजबूत पकड़ भी जगजाहिर है। बदनाम राडिया-टेप कांड में मुकेश अंबानी द्वारा कांग्रेस पार्टी को अपनी दुकान बताने की बात सार्वजनिक हो चुकी है। नरेंद्र मोदी से उनकी नजदीकी भी छिपी नहीं है। केजरीवाल का आरोप है कि अंबानी के खिलाफ केस दर्ज करने के बाद ही कांग्रेस और भाजपा ने हाथ मिलाकर उनकी सरकार गिरा दी।

यह सच है कि महज चार दशक के भीतर तूफानी गति से तरक्की कर रिलायंस ग्रुप देश का अग्रणी औद्योगिक घराना बन गया है। रिलायंस समूह की ताकत का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि उसकी मुखालफत करने वाले मंत्री मणिशंकर अय्यर और जयपाल रेड्डी से रातोंरात तेल मंत्रालय छीन लिया गया था। आरोप है कि रिलायंस समूह को पांच खरब रुपए से ज्यादा का लाभ पहुंचाने के लिए ही केंद्र सरकार ने घरेलू गैस की कीमत में सौ फीसद इजाफा करने का फैसला किया। केंद्र सरकार का यह निर्णय शुरू से ही विवादास्पद रहा है। भाकपा के सांसद गुरुदास दासगुप्त ने इस मामले पर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को कई बार पत्र लिखे, लेकिन कोई जवाब न मिलने पर उन्होंने सर्वोच्च अदालत का दरवाजा खटखटाया, जहां अब इस मामले पर सुनवाई हो रही है।

पिछले वर्ष प्राकृतिक गैस की कीमत बढ़ाने के फैसले पर मनमोहन सिंह के  मंत्रिमंडल में भी दो राय थी। मूल्य बढ़ाने के पैरोकार तेल, वित्त और कानून मंत्रालयों के मंत्रियों का तर्क था कि इससे गैस उत्पादन के क्षेत्र में विदेशी निवेश और तकनीक मिलेगी।

नतीजतन, गैस उत्पादन बढ़ेगा और गैस-आयात पर खर्च हो रही कीमती विदेशी मुद्रा की बचत होगी। जवाब में जयराम रमेश और जयपाल रेड्डी जैसे मंत्रियों ने पूछा कि देश में मौजूद गैस भंडार की अभी तक कोई वैज्ञानिक पुष्टि नहीं है। बिना पुष्टि के उत्पादन बढ़ने, विदेशी निवेश आने और गैस-आयात का खर्च कम हो जाने की बात कैसे कही जा सकती है?

रिलायंस के गैस-उत्पादन के दावे को ध्यान में रख कर देश में गैस से चलने वाले कई बिजलीघर और उर्वरक कारखाने लगा दिए गए हैं। बीस शहरों में पाइप से घरेलू गैस सप्लाई का जाल बिछा दिया गया, लेकिन कंपनी ने कभी भी आठ करोड़ मीट्रिक टन गैस उत्पादन का लक्ष्य अर्जित नहीं


किया। उसके कुओं से फिलहाल सिर्फ 1.3 करोड़ टन गैस निकाली जा रही है। किल्लत के कारण सरकार को ऊंचे दाम पर गैस आयात करनी पड़ रही है। मौजूदा गैस संकट का फायदा उठा कर रिलायंस ने दाम बढ़ाने का दबाव बनाया है, जिसके आगे सरकार झुक गई है। विशेषज्ञों का मत है कि रिलायंस ने जान-बूझ कर गैस उत्पादन घटाया है, जिसकी निष्पक्ष जांच जरूरी है।

गैस मूल्य-वृद्धि का असर देश की खाद्य और ऊर्जा सुरक्षा पर पड़ना लाजमी है। फिलहाल पैंतीस फीसद गैस उर्वरक-कारखानों को चलाने में खर्च होती है। उर्वरक उद्योगों को हर साल सरकार करोड़ों रुपए की सबसिडी देती है। लागत-वृद्धि का अर्थ है सबसिडी में इजाफा, जिसकी भरपाई आम करदाता के पैसे से ही की जाएगी। सस्ती और साफ बिजली बनाने के लिए देश में गैस आधारित बिजलीघर लगाए गए हैं। गैस की कीमत बढ़ जाने से बिजली भी महंगी हो जाएगी, जिसका खमियाजा आम उपभोक्ता को ही भुगतना पड़ेगा। डीजल से चलने वाले वाहनों से हो रहे प्रदूषण को कम करने के लिए सीएनजी से चलने वाली गाड़ियां बाजार में उतारी गई थीं। कुछ समय पहले तक ऐसे वाहन काफी लोकप्रिय थे, क्योंकि उन्हें चलाने की लागत डीजल के मुकाबले लगभग आधी आती थी और प्रदूषण भी नहीं होता था। सरकार की मेहरबानी से अब डीजल और सीएनजी की कीमत लगभग बराबरी पर आ चुकी है। ऐसे में सीएनजी वाहनों की मांग घटना और वायु प्रदूषण बढ़ना लाजमी है।

करार का उल्लंघन करने के बावजूद सरकार ने अब तक रिलायंस पर कोई जुर्माना नहीं लगाया है। उलटे रंगराजन समिति की आड़ में गैस की कीमत बढ़ाने का फैसला किया गया। रंगराजन समिति के मूल्य-निर्धारण फार्मूले को विशेषज्ञ दोषपूर्ण मानते हैं। घरेलू बाजार में किसी चीज की कीमत लागत-मूल्य और मुनाफे को जोड़ कर तय की जानी चाहिए, जबकि अंतरराष्ट्रीय बाजार में मूल्य-निर्धारण मांग और आपूर्ति के आधार पर होता है। इसलिए अंतरराष्ट्रीय मूल्यों को घरेलू बाजार पर लागू करना अनुचित कहा जाएगा। मनमोहन सरकार के मूल्य-वृद्धि निर्णय में और भी कई लोचे हैं। अगर यह फैसला लागू हो गया तो तेल की तरह गैस की कीमत भी अंतरराष्ट्रीय बाजार के मुताबिक ऊपर-नीचे होती रहेगी।

सबसे बड़ा सवाल है कि रिलायंस को घरेलू गैस की कीमत रुपए में नहीं, डॉलर में चुकाने का निर्णय क्यों लिया गया? इसका अर्थ यही है कि डॉलर का मूल्य ऊपर जाने पर गैस का दाम स्वत: बढ़ जाएगा।

मामले की तह तक जाने के लिए थोड़ा और पीछे जाना पड़ेगा। फिलहाल देश की जरूरत का पचहत्तर फीसद तेल और एक तिहाई गैस आयात करनी पड़ती है। ठेका मिलने के बाद रिलायंस से सार्वजनिक उपक्रम एनटीपीसी ने समझौता किया, जिसके अनुसार उसे 1.79 डॉलर प्रति यूनिट के मूल्य पर सत्रह वर्ष तक गैस सप्लाई होनी थी। उत्पादन शुरू होने के कुछ समय बाद ही रिलायंस ने कीमत बढ़ाने का दबाव बनाना शुरू कर दिया और उसे इसमें सफलता भी मिल गई। सरकार ने कीमत सीधे 1.79 से बढ़ा कर 4.20 डॉलर प्रति यूनिट करने की इजाजत दे दी। रिलायंस को इससे भी संतोष नहीं हुआ। उसने फिर कीमत बढ़ाने की मांग शुरू की, जिसका तत्कालीन पेट्रोलियम मंत्री जयपाल रेड्डी ने कड़ा विरोध किया।

इसी बीच रिलायंस का गैस उत्पादन रहस्यमय ढंग से 68 करोड़ टन से घट कर 15 करोड़ टन रह गया। आरोप लगा कि रिलायंस ने जान-बूझ कर उत्पादन घटा दिया है। सीएजी की रिपोर्ट में भी इसका उल्लेख आया है। रिलायंस का जवाब था कि तकनीकी कारणों से गैस उत्पादन घटा है। तभी बहुराष्ट्रीय तेल कंपनी बीपी ने 7.2 अरब डॉलर देकर रिलायंस में तीस फीसद हिस्सेदारी खरीदी। इस सौदे से विशेषज्ञों के कान खड़े हो गए, क्योंकि यह तो सबको पता है कि बीपी जैसी दिग्गज कंपनी कभी घाटे का सौदा नहीं करेगी।

जयपाल रेड्डी ने रिलायंस के गैस उत्पादन घटने के दावे की सच्चाई जानने के लिए तकनीकी आॅडिट की मांग की तो मुकेश अंबानी ने उसे ठुकरा दिया। फिर रेड््डी को तेल मंत्रालय से हटा दिया गया। वीरप्पा मोइली ने पेट्रोलियम मंत्रालय का पदभार संभालते ही गैस की कीमत बढ़ाने की कवायद शुरू कर दी। ऊर्जा और उर्वरक मंत्रालय के विरोध के बावजूद उन्हें अपने मिशन में सफलता मिल गई।

सरकार ने ठेका देते वक्त रिलायंस से जो करार किया था, विशेषज्ञ उसे इकतरफा और रिलायंस को फायदा पहुंचाने वाला मानते हैं। कोई भी परियोजना लगाने वाली कंपनी उसके साथ जुड़े जोखिम की खुद जिम्मेदार होती है, लेकिन करार में यह जिम्मेदारी सरकार पर डाल दी गई है। इसीलिए कम गैस निकलने से हो रहे तथाकथित घाटे को रिलायंस सरकार पर डालना चाहती है। दोषपूर्ण करार के कारण सरकार के हाथ बंधे हुए हैं।

सर्वोच्च न्यायालय ने अपने एक आदेश में कहा था कि समस्त प्राकृतिक संसाधन देश की संपत्ति हैं। गैस प्रकृति की देन है और उस पर रिलायंस कंपनी नहीं, देश की जनता का अधिकार है। ऐसे में कॉरपोरेट घरानों को प्राकृतिक संसाधनों पर एकाधिकार जमाकर अंधाधुंध मुनाफा कमाने की छूट नहीं दी जा सकती।

 

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