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चुनौतियों के बीच चुनाव PDF Print E-mail
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Saturday, 05 April 2014 11:45

आनंद कुमार

जनसत्ता 5 अप्रैल, 2014 : भारतीय राजनीति एक नई करवट ले रही है। एकाएक संसदीय चुनाव के आयाम बदल रहे हैं।

एक तरफ व्यक्तित्वों की जरूरत से ज्यादा चर्चा करके मीडिया में इसे अमेरिकी राष्ट्रपति के चुनाव जैसा तेवर दिया जा चुका है, दूसरी ओर गैर-कांग्रेसी, गैर-भाजपाई मोर्चेबंदियां लगभग अप्रासंगिक दिख रही हैं। कांग्रेस में कुछ नया कर पाने की कोई संभावना विकसित नहीं हो रही है। भारतीय जनता पार्टी भी नेतृत्व में पीढ़ी परिवर्तन की पीड़ा से बेहाल है। संयुक्त मोर्चा की अनिवार्यता के आगे का आकाश भी दिखाई पड़ रहा है जहां आम आदमी पार्टी एक राष्ट्रीय आंदोलन से पैदा आवश्यकता से होकर राष्ट्रीय आकार लेने की ओर बढ़ रही है।

 

इस पूरी प्रक्रिया में सामाजिक अस्मिता की राजनीति का परिवारवाद के दलदल में धंसते जाना सबसे बड़ी नकारात्मक घटना लगती है। सुदूर दक्षिण भारत से शुरू अस्मिता और सामाजिक न्याय को पारिवारिक धंधे में बदलने की यह बीमारी हरियाणा से होते हुए उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखंड के तमाम दलों को बीमार बना चुकी है। इससे शूद्र बनाम शूद्र का मंडलोत्तर चक्र भी पूरा होता दीखता है।

यह किसी को समझाना कठिन होगा कि जाति व्यवस्था के खिलाफ खड़ी दलित ताकतें दलित-बहुजन-अल्पसंख्यक मोर्चा बनाने का मंडलवादी प्रयोग क्यों छोड़ रही हैं? आंबेडकरवादी, लोहियावादी और मार्क्सवादी धाराएं जैसे भारतीय जनता पार्टी और शिवसेना के जरिए संसदवाद की वैतरणी पार करना चाहती हैं।

इस चुनाव में न किसानों के मुद्दों की चर्चा है, न उद्योग-धंधों की मंदी पर बहस है। युवाओं की शिक्षा और रोजगार संबंधी समस्याओं की किसे परवाह है! महिला आरक्षण भी साझी साजिश का शिकार हो चुका है। न देशनीति की गंभीर बहस है, न विदेश नीति के बारे में कोई बड़े सवाल हैं।

वामपंथी दलों में इन दोनों दायरों के बारे में हमेशा कुछ तीखे सवाल पैदा करने की वैचारिक क्षमता रही है, लेकिन सामाजिक न्याय की राजनीति से पैदा वोट बैंक की पूंजी से अपना संसदीय कारोबार चलाने की वासना के चलते आज इस खेमे में भी चौतरफा चुप्पी है। ममता और मोदी को छोड़ कर बाकी सबको अपना करीबी बनाने की बेचैनी ने वामपंथी दलों के अंदर एक अप्रासंगिकता का भाव पैदा कर दिया है।

मुसलिम मतदाता के बीच एक नया आग्रह जरूर उभरता दिख रहा है। सच्चर समिति और रंगनाथ मिश्र आयोग की रिपोर्टों के बारे में सोनिया-मनमोहन टीम द्वारा कागजी घोड़े दौड़ाने से गहरी हताशा फैली है। फिर पसमांदा मुसलिम के रूप में परिवर्तनकारी जमातों का आग्रह भी फैलता जा रहा है। मुजफ्फरनगर के दंगों के बाद समाजवादी पार्टी और तीसरे मोर्चे का मुसलमानों के बीच कोई वजन नहीं बचा है। बंगाल में पैंतीस बरस तक चली उपेक्षा ने वामपंथियों को भी खाली एक किताबी विकल्प जैसा बना दिया है। ये सब कागज के फूल की तरह से न रखने लायक हैं न फेंकने लायक।

इसी बीच आम आदमी पार्टी का सांप्रदायिकता के सवाल को सीधे-सीधे हिंदू-मुसलिम संबंधों के अंतर्विरोधों के रूप में पहचानने और राजसत्ता की मौजूदा भूमिका को सवालों के दायरे में लाने से कांग्रेस के बाद एक नया राष्ट्रव्यापी विकल्प बनने की आशा की चर्चा है, जिसे हाल में संपन्न हुए राष्ट्रीय एकता समागम ने स्वर दिया है। इस संवाद ने निष्कर्ष के रूप में भारतीय मुसलमानों की तमाम समस्याओं को तीन आयामों में पहचानने की अनिवार्यता पर बल देकर इन्हें भारतीय राष्ट्र निर्माण और नागरिकता निर्माण के सर्वव्यापी प्रसंग का काम कर दिखाया है- एक, सुरक्षा और सम्मान। दूसरा, शिक्षा और आजीविका। और तीसरा, प्रतिनिधित्व और जिम्मेदारी।

यह ताज्जुब की बात है कि 2014 का चुनाव दलित नेतृत्व के महाभटकाव का मौका बन गया है। बहुजन समाज पार्टी की राष्ट्रीय रंगमंच पर उपस्थिति की निरंतरता के बावजूद कोई अलग पहचान नहीं बची है। दिल्ली विधानसभा चुनाव के बाद इसके वोट बैंक में सेंध लग चुकी है।

दूसरी तरफ समाजवादी और प्रगतिशील रुझान वाले दलित खेमे में संसदवाद का दबाव इतना बढ़ गया है कि रामविलास पासवान के नेतृत्व वाली लोक जनशक्ति पार्टी 180 डिग्री का अंतर पैदा करके संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन से छिटक कर राष्ट्रीय जनतांत्रिक मोर्चे में शामिल हो गई। वामपंथी धारा से उपजी उदित राज की जस्टिस पार्टी भी भाजपा के भंवर में जा फंसी है। जातिप्रथा को चुनौती देते हुए हिंदू धर्म का त्याग करके विश्व के मीडिया में पहचान बनाने में सफल उदित राज निस्संकोच हिंदुत्व ही नहीं, मोदित्व तक के अनुरागी बन गए हैं। महाराष्ट्र के दलित पैंथर आंदोलन के अवशेष तो एक दशक पहले से ही शिवसेना के संरक्षण में फल-फूल रहे हैं। इस चुनाव को स्वायत्त आदिवासी विमर्श की अनुपस्थिति के लिए भी याद किया जाएगा। क्या साहित्य और राजनीति के बीच परस्पर विरोधी प्रवृत्तियों का विकास हो रहा है? इधर हिंदी समेत कई भारतीय भाषाओं में आदिवासी साहित्य और उसकी स्पष्ट आधारभूमि के बारे में चौतरफा चर्चा बढ़ रही है।

मगर इसी के समांतर राजनीति में, झारखंड के अलावा, आदिवासी जमातों की अलग गतिशीलता का अभाव है। इसका एक कारण आदिवासी राजनीति और नक्सलवादी राजनीति में बढ़ रही निकटता है। दूसरे, सभी छोटे-बड़े दलों में आदिवासी भारत के प्रश्नों के बारे में एक साझा सन्नाटा भी है। इससे चुनाववादी दलों का दृष्टिदोष सामने आता है। लेकिन अभी तो यही सच है।

क्या इस बार के चुनाव में ईमानदारी की पुन: प्राण-प्रतिष्ठा हुई है? आम आदमी पार्टी तो अपने चुनावी नारे के रूप में कह चुकी है कि इस बार ईमानदार को वोट दीजिए। कांग्रेस भी भ्रष्टाचार को दूर करने के दावे के साथ अपने घोषणापत्र में राजनीतिक व्यवस्था के सुधार की वकील बन रही है।

भारतीय जनता पार्टी जरूर धारा के विपरीत तैरते हुए अपने पुराने दागियों


से लेकर अन्य दलों के चतुर-सुजान लोगों तक को फिर से चुनावी मोर्चे का नायक बनाने में संकोच नहीं कर रही है। यह इसके लिए आत्मघाती साबित हो सकता है। क्षेत्रीय दल अपनी दागदार छवि के प्रति बेपरवाह दिखते हैं। इनमें टिकटों के बंटवारे में परिवारवाद, पैसावाद और दबंगवाद बदस्तूर जारी है।

लेकिन इस चुनाव में सबसे दिलचस्प परिस्थितियां मीडिया, दलों और मतदाता के त्रिकोण के बीच पैदा हुर्इं। मतदाता दलों से ज्यादा मीडिया पर भरोसा कर रहा है। नेताओं की कथनी और करनी का अंतर जगजाहिर है। छवि रचना के लिए देशी-विदेश कंपनियों की सहायता ली जा रही है। मीडिया पूरी तरह व्यवसायीकरण की तरफ फिसलता जा रहा है। चुनाव के मौके को मुनाफा कमाने का मौका मानना गलत नहीं है लेकिन मुनाफे की तलाश में समाज द्वारा बनाई गई लक्ष्मण रेखा को लांघ जाना जरूर चिंताजनक है।

उदाहरण के लिए नरेंद्र मोदी एकाएक पूरे मीडिया जगत के सुपर स्टार की तरह चमकने लगे हैं। आज किसी भी अखबार, पत्रिका या टीवी चैनल में किसी न किसी बहाने से नरेंद्र मोदी से ही शुरुआत होती है। कुछ अपवादों को छोड़ कर चौतरफा मोदीनाम लिखा और बांचा जा रहा है। वैसे यह इस खूबी से किया जा रहा है कि न तो मोदी के सोच का पता चल रहा है, न व्यक्तिगत गुणों और सीमाओं की जानकारी मिल रही है। फिर भी किस्सा नरेंद्र मोदी जारी है।

दूसरी तरफ कांग्रेस का भी नपा-तुला प्रस्तुतिकरण सामने है। आप टीवी और अखबार के जरिए इसका आभास नहीं लगा सकते कि कांग्रेस में कितनी गहरी दरारें पड़ चुकी हैं। मोदित्व से पैदा भूचाल और दिल्ली विधानसभा चुनावों से उत्पन्न संज्ञा-शून्यता का कहीं कोई विवरण या विश्लेषण नहीं है। सिर्फ आम आदमी पार्टी और उससे जुड़े लोगों को ही छिद्रान्वेषण की विषयवस्तु बनाया गया। कुछ टीवी चैनल तो इसे शौकिया कर रहे होंगे लेकिन कई चैनलों की विषयवस्तु को देख कर पेड न्यूज वाली बीमारी के फैलने का आभास होता है। जब दल-व्यवस्था बिगड़ चुकी हो, कार्यपालिका की साख न्यूनतम हो गई हो और न्यायपालिका संदेह के दायरे में हो, तब कम से कम मीडिया को मुनाफे और सामाजिक साख के बीच संतुलन बनाए रखना ऐतिहासिक जरूरत है।

यह साख भी तो मुनाफे की गारंटी देती है, लेकिन इस पहलू पर किसका ध्यान है?यह जरूर संतोष की बात है कि पिछले कई आम चुनावों की तुलना में 2014 का लोकसभा चुनाव घोषणापत्रों को फिर से प्रासंगिक बना चुका है। कांग्रेस ने सबसे पहले अपना घोषणापत्र जारी करके अपनी छवि बनाई है। वैसे इसकी अधिकतर बातें बहुत कुछ हवाई हैं। आम आदमी पार्टी का घोषणापत्र भी आ गया है; पार्टी ने इसके जरिए एकसूत्री दल होने की छवि से छुटकारा पाने की कोशिश की है। अब देश को भारतीय जनता पार्टी के घोषणापत्र का इंतजार है जिसे अटल बिहारी-आडवाणी वाली भाजपा के घोषणापत्रों से अलग होना लाजिमी है। प्रादेशिक दलों के राष्ट्रीय चुनाव के लिए पेश किे जाने वाले घोषणापत्र कई मायनों में किताबी जमा-खर्च ही रहते आए हैं। इस बार प्रादेशिक दल कैसे अपनी छवि को घोषणा पत्र की प्रस्तुति के जरिए बेहतर बनाएंगे, यह देखने की बात है।

चुनाव प्रक्रिया की असली कसौटी विविध दलों द्वारा अपने प्रतिद्वंद्वियों के प्रति सहिष्णुता और सम्मान से जुड़ी है। इस मायने में अधिकतर दलों का आचरण निराशाजनक है। भारतीय जनता पार्टी सबसे ज्यादा असहिष्णु पार्टी बन कर उभर रही है। टिकट बंटवारे पर हुए घमासान में इसका संकेत मिलता है। आम आदमी पार्टी के साथ किए गए सलूक में इसी समस्या का दूसरा महत्त्वपूर्ण पहलू है। कांग्रेस जाने-अनजाने अपने प्रतिपक्षियों के प्रति खतरनाक हद तक गैर-जिम्मेदार हो चुकी है। कोई निरंतरता और गंभीरता नहीं है। प्रामाणिकता भी नहीं है। एक नेतृत्व के प्रति समर्पण के लिए मशहूर यह पार्टी विरोधियों के प्रति अपने बयानों में बहुत निष्ठुर दिखती है। आम आदमी पार्टी को भी कुछ लोग सिर्फ कांग्रेस और भाजपा की आलोचना के भरोसे मीडिया में बनी रहने वाली पार्टी के रूप में उभरने का दोषी मानते हैं। विरोधियों के प्रति सम्मानपूर्ण सहिष्णुता लोकतंत्र का तकाजा है। जिस देश में राजनीतिक दल अपने प्रतिपक्षी के प्रति अमर्यादित होने पर उतारू हो जाते हैं, वहां सामाजिक जीवन में असहिष्णुता और हिंसा का दौर शुरू होना अवश्यंभावी है।

यह चुनाव पूरे देश के पैमाने पर विभिन्न सामाजिक आंदोलनों से जुड़े व्यक्तियों, समूहों और संगठनों के संसदीय दिशा में मुड़ने के लिए जरूर याद किया जाएगा। 1980 में जनता पार्टी के बिखरने के बाद सामाजिक आंदोलनों और संसदीय चुनावों के बीच संबंध विच्छेद की शुरुआत हुई थी। अब तीन दशक बाद, यानी दो पीढ़ियों के अंतराल पर आंदोलन और निर्वाचन लोकतंत्रीकरण की व्यापक प्रक्रिया के दो पहियों की तरह एक दूसरे के साथ जुड़ रहे हैं। इससे लोकतंत्रीकरण को रफ्तार मिलेगी, इसमें कोई शक नहीं है। अगर आंदोलनों से जुड़े व्यक्तित्व चुनावों में जीते तो दलों में भी इनका महत्त्व बढ़ेगा, लेकिन अगर चुनाव के मोर्चे पर आंदोलनों के प्रतीकों को उल्लेखनीय सफलता नहीं मिली तो यह रिश्ता खतरे में पड़ जाएगा। जबकि आंदोलनों के बाद चुनाव और चुनाव के बाद आंदोलन ही भारतीय लोकतंत्र के स्वास्थ्य सुधार का आज सहज उपाय बचा है।

 

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