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चुनाव सुधारों की जरूरत PDF Print E-mail
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Friday, 04 April 2014 10:34

केपी सिंह

जनसत्ता 4 अप्रैल, 2014 : लोकसभा चुनाव के लिए प्रचार जोर-शोर से चल रहा है। राजनेता चुनावी सभाएं करने में व्यस्त हैं।

चुनाव अधिकारी और प्रशासनिक तंत्र चुनावों को सुचारु रूप से संचालित करने के लिए प्रतिबद्ध हैं। मतदाता उम्मीदवारों की परीक्षा लेने के लिए कटिबद्ध हैं। चुनाव आयोग दिन-रात चुनावों का पर्यवेक्षण और निगरानी कर रहा है। ऐसे में चुनाव सुधारों की बात करना सामयिक हो जाता है।

 

चुनाव सुधारों का सिलसिला कमोबेश लगातार जारी रहा है। चुनाव आयोग की सक्रियता की पृष्ठभूमि में इसकी रफ्तार कभी कम, तो कभी ज्यादा होती रही है। पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त टीएन शेषन ने चुनाव सुधार की प्रक्रिया को नए आयाम दिए थे। उसी का नतीजा है कि अब चुनाव प्रचार के दौरान न कहीं पोस्टर नजर आते हैं और न पार्टियों के झंडे। दीवारों पर चुनावी नारे लिखने की रिवायत और लाऊड-स्पीकरों का शोर लगभग विलुप्त हो गया है। सुधारों का यह सिलसिला यहीं नहीं रुकना चाहिए। चुनावों के दौरान हुए अनुभवों और परिस्थितियों के अनुरूप चुनाव सुधारों पर चर्चा ही नहीं, उचित फैसले होते रहने चाहिए।

चुनाव-प्रचार का इलेक्ट्रॉनिकीकरण यानी इ-प्रचार चुनाव सुधारों की प्रमुख प्राथमिकता होनी चाहिए। चुनावों के दौरान लोगों को जनसभाओं में ढो कर लाना और उन्हें प्रमुख राजनेताओं के भाषण सुनने के लिए मजबूर करना बीसवीं सदी की याद दिलाता है। आजकल रोड-शो करके भी चुनाव प्रचार किया जाता है। इन जनसभाओं और रोड-शो के कारण आम आदमी को तरह-तरह की मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। भीड़ के कारण रास्ते और सड़कें रुक जाती हैं। बाजार बंद करा दिए जाते हैं। सुरक्षा के नाम पर अनेक पाबंदियां लगा दी जाती हैं। भीड़ सड़कों पर यदाकदा हुड़दंग भी मचाती है।

यह विचारणीय है कि इन जनसभाओं और रोड-शो से क्या प्रयोजन सिद्ध हो रहा है। जो बात राजनेता जनसभाओं और रोड-शो के माध्यम से कहना चाहते हैं, वही बात टीवी और इलेक्ट्रॉनिक संचार माध्यमों के जरिए भी कही जा सकती है। नरेंद्र मोदी के चाय पर चर्चा के कार्यक्रम ने यह सिद्ध कर दिया है कि बिना जनसभाएं किए भी मतदाताओं से सीधा संपर्क किया जा सकता है। आकाशवाणी, दूरदर्शन, टीवी चैनलों और केबल टीवी नेटवर्क के माध्यम से उम्मीदवारों को चुनावी बहस और चुनाव प्रचार करने के अवसर प्रदान किए जा सकते हैं। सरकारी खर्चे पर इस प्रकार का इलेक्ट्रॉनिक प्रचार करने की सुविधा सभी उम्मीदवारों को प्रदान करके चुनावी जनसभाओं पर प्रतिबंध लगाया जा सकता है।

‘ओपिनियन पोल’ मतदाताओं को सही चुनावी सूचना देने के बजाय चुनाव प्रचार का हिस्सा बनते जा रहे हैं। अलग-अलग विचारधाराओं से प्रभावित संचार माध्यम ‘ओपिनियन पोल’ के माध्यम से किसी न किसी राजनीतिक मन्तव्य की हित-साधना करते देखे जा सकते हैं। इन पर प्रतिबंध लगाने की मुहिम को अभिव्यक्ति के मूलभूत अधिकार पर कुठाराघात करने की दलील देकर संचार माध्यमों द्वारा निरस्त किया जाता रहा है। ‘ओपिनियन पोल’ पर पूर्ण प्रतिबंध लगाना शायद न्यायिक विवेचना की कसौटी पर खरा भी न उतर पाए। पर कुछ मापदंड तय करके इन्हें निर्देशित करना बेहद जरूरी है। चुनाव में सभी उम्मीदवारों को समान अवसरों का समतल मैदान उपलब्ध कराना चुनाव आयोग का मूल दायित्व है। जनसंचार माध्यमों पर आधिपत्य जमा कर जनमत को भरमाने और मतदाता के विवेक को अपहृत करने की इजाजत किसी भी सूरत में नहीं दी जानी चाहिए।

इलेक्ट्रॉनिक मशीनों की विश्वसनीयता पर शुरू से सवाल उठाए जाते रहे हैं। इनमें फेर-बदल करके यह व्यवस्था की जा सकती है कि मतदाता अपने डाले गए वोट की एक प्रति इन मशीनों से तुरंत पा सकें, जिसे वहां रखी गई मतपेटी में बतौर सबूत जमा किया जा सकता है। संशय की स्थिति में, बाद में इनकी गणना कराए जाने का प्रावधान नियमों में किया जा सकता है। चुनाव खर्च एक ऐसा विषय है, जो अच्छी विचारधारा वाले ईमानदार और योग्य नागरिकों को चुनाव में उम्मीदवार बनने से रोकता आया है। लोकतांत्रिक व्यवस्था वाले गणतंत्र में इस हकीकत पर गौर किया जाना चाहिए।

चुनाव प्रक्रिया इतनी महंगी है कि चाह कर भी आम आदमी चुनाव नहीं लड़ सकता। और अगर लड़ता भी है तो वह अपना चुनाव प्रचार नहीं कर सकता। फर्रुखाबाद सहित उत्तर प्रदेश में ‘आप’ के तीन उम्मीदवारों ने चुनाव लड़ने से इसलिए मना कर दिया कि उसके पास आवश्यक धन नहीं है।

चुनाव आयोग ने हाल ही में लोकसभा चुनाव की खर्च सीमा चालीस लाख से बढ़ा कर सत्तर लाख कर दी है। यह समझ से परे है कि आयोग ने ऐसा क्यों किया? अब जबकि चुनाव सरकारी खर्च पर कराने की बात हो रही है, चुनाव खर्च की सीमा बढ़ाना तर्कसंगत नहीं लगता है। आवश्यकता इस बात की है कि सभी उम्मीदवारों के चुनाव प्रचार के खर्च का वहन सरकारी खजाने से हो और चुनाव आयोग इसके लिए मापदंड निर्धारित करे। इसके लिए धन की व्यवस्था करने के लिए अलग से एक कोष स्थापित किया जा सकता है, जिसमें व्यापारिक संस्थानों से उनके सामाजिक दायित्वों को परिभाषित करने वाले कानून के तहत अंशदान लिया जा सकता है।

इससे उस भ्रष्ट परिपाटी पर भी अंकुश लग सकेगा, जिसके द्वारा उद्योगपति अपनी मनचाही सरकार बनवाने के लिए राजनीतिक पार्टियों को चंदा देते हैं। चुनाव प्रक्रिया की अवधि को और छोटा करने की जरूरत है। नामांकन शुरू होने की तिथि और चुनाव-चिह्न आबंटित किए जाने वाले दिन के बीच लगभग दस दिन का समय होता है। ‘आॅन-लाइन’ नामांकन स्वीकार करके और चुनाव-चिह्न आबंटन को स्वचालित करके यह प्रक्रिया तीन दिन में भी पूरी की जा सकती है। इस प्रकार चुनाव प्रक्रिया की अवधि को एक सप्ताह तक कम किया जा सकता है।

चुनाव के दौरान की जाने वाली अवांछित व्यक्तिगत टिप्पणियों और भाषा को मर्यादित करना एक बड़ी चुनौती है। हालांकि चुनाव प्रचार के दौरान राजनीतिक व्यक्तियों


और पार्टियों के आचरण पर निगरानी रखने के लिए राजनीतिक दलों की आपसी सहमति से आदर्श आचार संहिता तैयार की गई है, पर इस संहिता के उल्लंघन की लाखों शिकायतें चुनाव आयोग के पास पहुंचती हैं। आदर्श आचार संहिता के उल्लंघन के मामलों में चुनाव आयोग के अधिकारों को फिर से परिभाषित करने की जरूरत है।

चुनाव प्रक्रिया एक प्रकार का खेल है, जिसे संचालित करने के लिए कायदे-कानून बने हुए हैं। खेल के मैदान में खेल को नियमों के अनुसार संचालित करने के लिए अंपायर या रेफरी होते हैं, जिन्हें खेल और खिलाड़ियों पर नियंत्रण करने के लिए निर्णायक शक्तियां दी जाती हैं। चुनाव आचार संहिता लागू करने के लिए चुनाव आयोग को अंपायर या रेफरी के समान अधिकार प्राप्त नहीं हैं। और उन्हें जो अधिकार प्राप्त हैं उनका प्रयोग करते समय चुनाव आयोग प्राय: झिझक जाता है। आचार संहिता के प्रावधानों का उल्लंघन करने पर आयोग अमूमन राजनेताओं को मंत्रणा देकर छोड़ देता है। गंभीर उल्लंघन करने पर उम्मीदवारी रद्द करने तक का अधिकार आयोग को प्राप्त है, पर यह असाधारण शक्ति है, जिसका प्रयोग करना आयोग शायद गैर-जरूरी समझता है। आवश्यकता इस बात की है कि मंत्रणा और उम्मीदवारी रद्द के बीच कई अन्य प्रकार के प्रभावी दंडात्मक प्रावधानों से आयोग को सुसज्जित किया जाए, ताकि चुनाव प्रक्रिया बाधित न हो और आयोग का शिकंजा भी मजबूत हो सके।

चुनाव में मतदान करना राष्ट्रीय दायित्व घोषित किया जाना चाहिए। काफी अधिक संख्या में मतदाता विभिन्न कारणों से मतदान के दिन अपने केंद्र से दूर होते हैं और मतदान करने से वंचित रह जाते हैं। ऐसे मतदाताओं को सूचना प्रौद्योगिकी की मदद से इंटरनेट के जरिए मतदान करने की सुविधा उपलब्ध कराने के बारे में सोचने की जरूरत है। मतदान न करने को अपराध घोषित करना व्यावहारिक नहीं होगा, पर मतदान करने के अवसरों को बढ़ा कर मतदान का प्रतिशत अवश्य बढ़ाया जा सकता है।

आपराधिक मुकदमों में विचाराधीन और सजायाफ्ता व्यक्तियों को चुनाव लड़ने के अयोग्य ठहराने की दलील पर वास्तविकता की पृष्ठभूमि में गौर करने की जरूरत है। राजनीति का निरपराधीकरण करना देशकाल और परिस्थितियों की मांग है। पर मूल प्रश्न यह है कि अपराधी किसे माना जाए? उसे, जिसके विरुद्ध न्यायालय ने चार्जशीट जारी की है या उसे जिसे न्यायालय से सजा मिली है।

सजायाफ्ता व्यक्ति को चुनाव लड़ने से रोकने पर किसी को आपत्ति नहीं होनी चाहिए। पर यह तथ्य महत्त्वपूर्ण है कि ऐसे व्यक्ति को सजा किस अपराध में मिली है? चुनिंदा गंभीर अपराधों में सजा पाए व्यक्तियों को चुनाव लड़ने के अधिकार से वंचित किया जाना चाहिए। पर न्यायालय द्वारा चार्जशीट किए जाने पर किसी व्यक्ति को चुनाव के अयोग्य ठहराना एक गंभीर त्रुटि होगी, जिसके दूरगामी परिणाम होंगे। भारतीय न्याय-व्यवस्था की यह हकीकत है कि लगभग उन सभी मुकदमों में जहां अपराधी नामित हो, पुलिस अदालत में चालान दे ही देती है। बिरला ही पुलिस के अनुसंधान में पाक-साफ निकल पाता है।

पुलिस की मानसिकता होती है कि जैसे-तैसे नामित आरोपी को अदालत के हवाले कर दिया जाए ताकि अदालत ही उसके भाग्य का फैसला कर सके। आदर्श स्थिति में अदालत द्वारा चार्जशीट देने से पहले आरोपी के विरुद्ध सबूतों को देखा जाना चाहिए। पर किसी भी अप्रिय स्थिति या आरोप से बचने के लिए अदालतें लगभग उस प्रत्येक व्यक्ति को चार्जशीट जारी कर देती हैं, जो पुलिस द्वारा उनके पास भेजे जाते हैं। इसलिए आरोपित व्यक्तियों को चुनाव के अयोग्य ठहराने की दलील पर बहुत सोच-विचार कर ही अंतिम निर्णय किया जाना चाहिए।

चुनाव से पहले लोक-लुभावन वादे और विकास परियोजनाओं की घोषणा पर भी निगरानी किए जाने की आवश्यकता है। चुनावों के छह महीने पहले से एक स्वतंत्र न्यायिक आयोग इस प्रकार की घोषणाओं और वादों का परीक्षण कर सकता है। सरकारी खजाने से मतदाताओं को टीवी, लैपटॉप, साड़ी आदि देने का वादा करना रिश्वत देने के समान है। चुनाव से ठीक पहले कुछ विशेष वर्गों को आर्थिक और सामाजिक लाभ पहुंचाने की घोषणाओं पर नजर रखी जानी चाहिए। सत्तारूढ़ दल सत्ता का नाजायज इस्तेमाल न करे और राजनीतिक पार्टियां सरकारी धन की बंदरबांट करने के वादों के आधार पर वोट न मांगें, इसकी रोकथाम की जानी चाहिए।

आरक्षित वर्गों के लिए सुरक्षित चुनाव क्षेत्र निर्धारित करने की वर्तमान प्रक्रिया पर भी पुनर्विचार करने की जरूरत है। एक बार आरक्षित हो गई सीट तब तक आरक्षित रहती है जब तक अगला पुनर्गठन आयोग इसकी समीक्षा न करे। किसी भी सीट को दस वर्ष से अधिक आरक्षित रखना तर्कसंगत नहीं लगता। आरक्षित सीटें हर दस वर्ष बाद बदलती रहनी चाहिए। इसके लिए कानूनों में आवश्यक संशोधन किए जा सकते हैं। इसी से जुड़ा हुआ विषय संसद और विधानमंडलों में महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित करने से संबंधित है। यह व्यवस्था होनी चाहिए कि राज्य को इकाई मान कर प्रत्येक राजनीतिक दल कम से कम एक तिहाई महिलाओं को चुनाव में उम्मीदवार बनाए।

चुनाव लोकतंत्र की वैतरणी है। इसकी शुचिता बनाए रखना सरकार, चुनाव आयोग और प्रत्येक जिम्मेदार नागरिक का कर्तव्य है। इसके लिए चुनाव आयोग को अग्रणी भूमिका निभाने का दायित्व दिया गया है। जनता अब जागरूक हो चुकी है। चुनाव आयोग की किसी भी अच्छी पहल को भरपूर जन-समर्थन मिलेगा, इसमें किसी को संदेह नहीं होना चाहिए।

 

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