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चुनावी बहस के विरोधाभास PDF Print E-mail
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Thursday, 03 April 2014 11:59

विनोद कुमार

जनसत्ता 3 अप्रैल, 2014 : चुनाव का समय है। तरह-तरह की बातें हो रही हैं। जनता इस चुनाव से क्या चाहती है,

उसकी आकांक्षाएं क्या हैं? इसको लेकर लेख लिखे जा रहे हैं। टीवी चैनलों पर बहस चल रही है। एक अंग्रेजी अखबार ने पूरे पेज का घोषणापत्र छापा, जिसे जनता की आकांक्षा के रूप में पेश किया गया। लेकिन गौर से देखने पर जो बात सबसे पहले जेहन में उतरती है, वह यह कि जन आकांक्षाओं के रूप में वहां जो मुद््दे पेश किए गए हैं, वे दरअसल मध्यवर्ग की जन आकांक्षाएं हैं। और मध्यवर्ग हाल के वर्षों में मुटियाने के बावजूद कुल आबादी का एक चौथाई हिस्सा ही है। मसलन, आयकर में छूट की ही बात लें। चुनाव के वक्त यह बड़ा मसला हो जाता है, जबकि हमारे देश में मुट्ठी भर लोग ही आयकर दाता हैं। विशाल आबादी को इससे कोई खास फर्क नहीं पड़ता कि आयकर में कितनी छूट मिलने जा रही है।

 

इसी तरह एक दूसरा उदाहरण लें। घोषणापत्र में इस बात पर जोर दिया गया है कि विदेशी निवेश को पूरी छूट दी जाए, जितना संभव हो निजीकरण को तेज किया जाए, आदि। यह सही है कि देश का एक तबका ऐसा ही चाहता है। लेकिन इसे जन आकांक्षा के रूप में पेश करना एक तरह की बेईमानी है। सवाल उठता है कि अगर जनता यही चाहती है तो पोस्को के खिलाफ कौन लड़ रहा है। नियमगिरि में वेदांता के खिलाफ लड़ने वाली आदिवासी जनता इस देश की है या नहीं? सिंगूर और नंदीग्राम में सड़कों पर उतर कर माकपा सरकार का विरोध करने वाले कौन थे?

जन आकांक्षा के रूप में यह इच्छा व्यक्त की गई है कि छोटे और मझोले उद्योगों को बढ़ावा दिया जाए। छोटे उद्योगों की राह की तमाम रुकावटों को खत्म किया जाए। यकीनन। इससे रोजगार के नए अवसर पैदा होते हैं। लेकिन यह सदिच्छा ही है। क्योंकि आप जिन नीतियों पर देश को ले जाना चाहते हैं, उन नीतियों ने ही लघु और मझोले उद्योगों को खत्म किया है। आजादी के बाद बाजाफ्ता एक सूची बनाई गई थी कि किन-किन उपभोक्ता वस्तुओं का उत्पादन बड़े उद्योग नहीं करेंगे। लेकिन नई औद्योगिक नीति और उदारीकरण का दौर शुरूहोते ही लघु उद्योग खत्म होते चले गए। जब रिलायंस कंपनी गैस उत्पादन से लेकर सब्जी बेचने तक का काम करेगी तो यही परिणाम होगा। टाटा कंपनी खुरपी-कुदाल से लेकर जहाज तक बनाएगी तो लघु और मझोले उद्योग कैसे जीवित बचेंगे?

सभी राज्यों में औद्योगिक क्षेत्रों का विकास किया गया था। खासकर बड़े उद्योगों के आसपास के इलाकों में, ताकि बड़े उद्योगों की जरूरत की वस्तुएं छोटे उद्योगों में बनें। लेकिन जब बड़ी कंपनियों को ही तमाम वस्तुएं बनाने की छूट रहेगी, तो छोटे उद्योग कैसे बचेंगे। ज्यादातर औद्योगिक क्षेत्र अब वीरान नजर आते हैं। एक तरफ निजीकरण की वकालत, नियंत्रण-मुक्त वाणिज्य-व्यापार की आकांक्षा और दूसरी तरफ लघु और मझोले उद्योग के विकास की बात करना हवाई किले बनाने जैसा है।

जहां तक उद्योग शुरूकरने के लिए मदद और प्रोत्साहन की बात है तो यह शुरुआती दौर में खूब किया गया। लेकिन जब उद्योग के लिए संभावना ही नहीं बची तो फिर उद्यमियों ने अधिकारियों से मिल कर सरकारी सबसिडी और बैंक का कर्ज गायब करना शुरूकर दिया। इससे हुआ यह कि लघु उद्यमी तो अमीर हो गए, लेकिन उद्योग जमीन पर लगे नहीं और न रोजगार पैदा हुआ। होने लगी ट्रेडिंग। यानी कार्यादेश प्राप्त किया जाने लगा और माल की सप्लाई बाजार से माल खरीद कर की जाने लगी। लघु और मझोले उद्योग को बचाना है तो सबसे पहले यह तय करना होगा कि उन उद्योगों में क्या बनेगा और उन वस्तुओं के लिए बड़े उद्योगों को प्रतिबंधित करना होगा।

एक लोकप्रिय मांग या जनाकांक्षा यह बताई जाती है कि श्रम बाजार लचीला होना चाहिए। आशय यह कि कोई उद्यमी जब चाहे मजदूर रख सके और जब चाहे उसे अपने यहां से हटा सके।

यह बात भी सुनने में सही लगती है। वैसे, धीरे-धीरे लगभग तमाम श्रम कानूनों को खत्म किया जा चुका है। लेकिन त्रासदी यह है कि तमाम स्थायी प्रकृति के काम भी आज बड़े कारखानेदार, यहां तक कि सरकारी कंपनियां अनुबंधित या पीसरेटेड श्रमिकों से कराने की फिराक में रहती हैं। सरकारी स्कूलों में शिक्षा का बड़ा बोझ पैरा-शिक्षकों का है। तमाम किस्म के रखरखाव, नियमित सफाई आदि के काम अब ठेका श्रमिक कर रहे हैं।

आजादी के बाद संसद में ठेकेदारी प्रथा के उन्मूलन संबंधी विधेयक पेश किया गया था। क्योंकि उस वक्त जो लोग राजनीतिक नेतृत्व कर रहे थे, वे यह भी चाहते थे कि श्रमिकों को मानवीय गरिमा के साथ जीने का हक मिले। उसे साप्ताहिक अवकाश मिलना चाहिए, काम के घंटे तय होने चाहिए, चिकित्सा सुविधा आदि मिलनी चाहिए, भले ही मुनाफा थोड़ा कम हो। लेकिन अब तो शुद्ध मुनाफे के लिए ही उद्योग लगते हैं।

श्रमिकों को उनके श्रम का वाजिब हक न देना और उनके लिए सामाजिक सुरक्षा आदि की बातें करना एक तरह से धोखा ही है। जन आकांक्षा के रूप में कंपनियों की इस चिंता को भी शामिल किया गया है कि भूमि अधिग्रहण कानून को ऐसा बनाया जाए कि कंपनी भागे नहीं। अभी जो भूमि अधिग्रहण कानून बना है, लगता है उतने से उद्योग जगत यानी निजी कंपनियां खुश नहीं। उन्हें तो माले-मुफ्त जमीन चाहिए। उद्योग के नाम पर जमीन लेकर वापस सरकार को ही या फिर बिल्डरों को बेचने की छूट चाहिए। यह भी गौरतलब है कि जमीन अधिग्रहण की मार सामान्यत: किसी बड़े पर नहीं पड़ती। इसका शिकार गरीब आदिवासी ही होते रहे हैं। फिर


यह कौन-से जन की आकांक्षा है?

बातें तो अनेक हैं लेकिन हम यहां उन्हीं मुद्दों पर चर्चा कर रहे हैं जो बहस का हिस्सा बन रहे हैं। अब कृषि क्षेत्र को ही लें। कृषि को लेकर हमारी चिंता यह है कि कृषि क्षेत्र में करीब साठ फीसद लोग लगे हैं, लेकिन उसका योगदान हमारे जीडीपी में महज चौदह फीसद है। और इलाज यह बताया जा रहा है कि वाणिज्यिक खेती की जाए। उसमें भी बाहरी पूंजी निवेश हो। किसान वैसी फसलें लगाएं जिनका बाजार भाव हो। साथ ही जमीन की उत्पादकता को बढ़ाने की भी बात की गई है। जाहिर है, इसके लिए पूंजी की जरूरत है। और पूंजी गरीब किसान के पास नहीं। तो खेती भी निजी कंपनियों के जिम्मे छोड़ दी जाए।

यह अजीब विरोधाभास है कि जिस क्षेत्र से सर्वाधिक लोगों को आज रोजगार मिल रहा है, जो उनके जीवन का आलंबन है, उसका योगदान जीडीपी में महज चौदह फीसद है। विडंबना यह भी कि जिन राज्यों में कृषि का बाजारीकरण हुआ, वहां के किसान ही आत्महत्या कर रहे हैं। चाहे वह महाराष्ट्र हो या आंध्र प्रदेश। पुरानी तकनीक और व्यवस्था में खेतीबाड़ी करने वाले बिहार, ओड़िशा और झारखंड में किसान आत्महत्या नहीं कर रहे। इससे यह तो स्पष्ट है कि खेती का बाजारीकरण या व्यवसायीकरण तो किसी भी तरह से समाधान नहीं खेती की समस्याओं का। पूरी दुनिया में यह बहस तीव्र है कि रासायनिक खादों का इस्तेमाल कैसे कम हो और हम उनका उपयोग कर खेती की उर्वरा-शक्ति बढ़ाने की बात करें तो यह विनाशकारी ही होगा। शुरुआत तो यहां से करनी होगी कि खेतीयोग्य जमीन का रकबा कम न हो। उनकी सिंचाई क्षमता बढे।

आइए हम कुछ बुनियादी जन-सुविधाओं की भी बात करें और चल रही बहस के विरोधाभासों को देखें। सबसे पहले स्वास्थ्य को लें। हमारी ग्रामीण महिलाएं रक्त की कमी और बच्चे कुपोषण के शिकार हैं। इसके लिए आम तौर पर उन्हें ही जिम्मेदार ठहरा दिया जाता है। या उसे अज्ञान से जोड़ दिया जाता है। इस अज्ञान को दूर करने के लिए टीवी पर धुआंधार प्रचार किया जाता है। आमिर खान कुपोषण को खत्म करने का संकल्प खुद भी लेते हैं और देशवासियों को भी दिलाते हैं।

इसी तरह महिलाओं को स्वास्थ्य केंद्र में बच्चा जनने की सलाह दी जाती है। सवाल है कि बहुसंख्यक आबादी के पास दो जून भरपेट भोजन के भी हालात नहीं तो वह गर्भवती औरत को पौष्टिक आहार कहां से खिलाए? स्वास्थ्य केंद्र्रों की हालत ऐसी कि न वहां दवा रहती है न चिकित्सक। ले-देकर बात होती है कि सरकार चिकित्सा मद में ज्यादा बजट का प्रावधान करे। लेकिन बजट में अधिक प्रावधान से भी हालात सुधरेंगे, इसके आसार नहीं।

हमारी स्वास्थ्य सेवा की मूल समस्या यह है कि मेडिकल की पढ़ाई बेहद महंगी और समय लेने वाली है। इसकी वजह से जरूरत के मुताबिक चिकित्सक बनते ही नहीं। और जो दस-बीस लाख रुपए खर्च कर और आठ वर्ष का समय लगा कर डॉक्टर बनता है, वह गांव की तरफ रुख ही नहीं करना चाहता। सरकारी चिकित्सा व्यवस्था इसलिए ध्वस्त हो जाती है और इलाज के लिए लोग रुख करते हैं निजी चिकित्सा केंद्रों की तरफ, जो बेहतर इलाज के नाम पर उनका सर्वस्व हर लेते हैं।

एक सामान्य खेतिहर कठोर श्रम कर जो दो-चार पैसे साल में बचाता है, वह एक बार के इलाज में खर्च हो जाता है। इसलिए सबसे पहली जरूरत है इस बात की कि मेडिकल की पढ़ाई सस्ती और कम समय लेने वाली हो।

यही स्थिति शिक्षा के क्षेत्र की भी है। दिनोंदिन उसका भी व्यवसायीकरण हो रहा है। दो तरह की शिक्षा-व्यवस्था सर्वमान्य हो चली है। गरीबों के अलग स्कूल, अमीरों के अलग स्कूल। जिसके पास भी साधन जुटा कि उसने अपने बच्चे को निजी स्कूल में डाला। ऐसे वातावरण में सरकारी स्कूलों की सुध कौन लेगा? कम से कम स्कूली शिक्षा तो एक तरह के स्कूलों में हो। और यह काम देश की सरकार ही कर सकती है। लेकिन यहां तो बहस यह छिड़ी है कि सरकार कोई काम करे ही नहीं। सब कुछ निजी हाथों में छोड़ दे। उसका काम तो सिर्फ देश के लिए कानून बनाना और उसका कठोरता से पालन कराना है।

दरअसल, हम आज देश में एक ऐसी व्यवस्था बना रहे हैं जो गरीब आदमी का सर्वस्व छीन रही है। यानी ऐसी व्यवस्था जिसमें विपन्नता बढे, विषमता की खाई बढे और फिर हम उनके पास लाल कार्ड, खाद्य सुरक्षा विधेयक, विधवा पेंशन, वृद्धा पेंशन, आदि लेकर पहुंच रहे हैं।

जरूरत है ऐसी सरकार की, जो ऐसी व्यवस्था बनाए, जिसमें हर आदमी श्रम कर इतना कमा सके कि वह भरपेट भोजन कर सके और अपने बाल-बच्चों को पढ़ा सके और उनका इलाज करा सके। इसके लिए बस हमें करना यह है कि मानवीय श्रम की सही कीमत लगाएं। यह बात किसी की चेतना को क्यों नहीं झकझोरती कि जब मनरेगा के तहत कड़ी धूप में मजूरी करने वाले की मजूरी सवा सौ से डेढ़ सौ रुपया प्रतिदिन तय करते हैं, उसी वक्त सातवें वेतन आयोग का गठन कर किसी बाबू का वेतन दो हजार रुपए प्रतिदिन करने की तैयारी किस नैतिकता के तहत करते हैं!

 

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