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देशप्रेम इस तरह पैदा नहीं होता PDF Print E-mail
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Tuesday, 01 April 2014 12:02

कुमार प्रशांत

जनसत्ता 1 अप्रैल, 2014 : भारतीय जनता पार्टी के प्रधानमंत्री-उम्मीदवार नरेंद्र मोदी के चुनाव-प्रचार में

भव्यता भी है, दक्षता भी, प्रगल्भता भी है, तंज और रंज भी। सत्य के आग्रही वैसे भी वे नहीं रहे हैं और ये तो चुनाव के दिन हैं! इन दिनों में यह जिंस किसी के, किसी काम आती नहीं है। इसलिए हम नरेंद्र मोदी के कहे की ऐसी कोई कसौटी नहीं करेंगे। लेकिन हम देख रहे हैं कि चुनाव जैसे-जैसे करीब आते जा रहे हैं- बातें, भाषण, आरोप-प्रत्यारोप आदि सभी मर्यादाएं तोड़ते जा रहे हैं। जो मर्यादाएं तोड़ते हैं वे समझें या न समझें, समाज समझता भी है और भुगतता भी है।

 

सार्वजनिक जीवन में शुचिता रहे और बढ़े, यह राजनेताओं की चिंता का विषय भले न हो लेकिन हम नागरिकों की गहरी चिंता और सावधानी का विषय होना चाहिए, क्योंकि चुनाव गुजर जाएंगे लेकिन यह गिरावट समाज को ज्यादा ही गर्त में ले जाएगी, ले जाती रहेगी। इसलिए पदों की और सत्ता की खोज में वे जितने भी विकल हों, हमें उनकी हर फिसलन की खबर रखनी चाहिए और उनकी खबर लेनी चाहिए।

जम्मू में, सत्ताईस मार्च की अपनी विजय रैली में जिस तैश और तेवर में नरेंद्र मोदी ने आम आदमी पार्टी पर हमला किया और उसका उपहास किया वह सार्वजनिक व्यवहार की मर्यादा से बहुत बाहर चला गया। कभी विनोबा भावे ने चुनावी प्रक्रिया पर गहरी चुटकी लेते हुए कहा था: यह आत्मप्रशंसा, परनिंदा और मिथ्या भाषण का पर्व होता है। अब हम देखते हैं कि सारे राजनीतिक दल इसका अक्षरश: पालन करते हैं, लेकिन कुछ इसमें दूसरों से ज्यादा माहिर होते हैं। नरेंद्र मोदी इसी श्रेणी में आते हैं। इतिहास, भूगोल आदि के अपने ज्ञान का अप्रतिम परिचय तो कई बार दिया है उन्होंने, इस बार अपनी भाषा का और तेवर का संयम भी खो दिया।

वे जम्मू में बोल रहे थे, इसलिए पाकिस्तान-विरोधी भावनाओं से खेलने और हिंदू भावनाओं को उभारने की राजनीतिक रणनीति उन्हें मुफीद पड़ रही थी। वे बहुत क्रोधित थे, उन्माद से भरे थे, चेहरा धूप और तनाव से लाल हुआ जा रहा था और उतार-चढ़ाव के साथ बोलने के अपने नाटकीय अंदाज में वे भूल ही गए थे कि देश उन्हें देख भी रहा है- याकि इसी कारण वे इतने उन्माद में थे। लेकिन यह सब करते हुए वे भूल रहे थे कि किसी वार्ड के नगरसेवक का चुनाव नहीं लड़ रहे हैं, प्रधानमंत्री की दावेदारी कर रहे हैं; और इस शैली और तेवर का प्रधानमंत्री देश को साथ लेकर नहीं चल सकेगा। वे अब तक आम आदमी पार्टी और अरविंद केजरीवाल का अस्तित्व भी मानने को तैयार नहीं थे, इस सभा में वे खासतौर पर इन पर ही बरसे!

वैसे यह भी सच है कि अरविंद केजरीवाल ने भी मोदी पर निशाना लगाने का कोई मौका कभी खोया नहीं है। वे कई बार असंयमित भाषा का इस्तेमाल करते रहे हैं, असावधान आंकड़े पेश करते रहे हैं और हर मौके पर उन्हें घेरते रहे हैं। बनारस पहुंचने और नरेंद्र मोदी के खिलाफ चुनाव लड़ने की घोषणा के बाद से स्वाभाविक ही है कि उनकी आवाज में तल्खी बढ़ गई है, लेकिन वह सब राजनीतिक विरोध की सीमा के बाहर नहीं गया है कभी!

नरेंद्र मोदी की परेशानी दूसरी है। लंबे समय से गुजरात में लगातार एकछत्र राज करने और भारतीय जनता पार्टी की रीढ़ की हड््डी लगातार झुकते जाने के कारण नरेंद्र मोदी राजनीतिक विरोध की नहीं, राजनीतिक आदेश की शैली में बात करने के आदी हैं। यह उनके कच्चेपन की और अपने पांव से बड़े जूते में पैर डालने जैसी बात की चुगली खाता है। वैसे भी उनकी अब तक की रणनीति यही रही है कि कभी किसी के साथ विमर्श में उतरना नहीं, मुद्दों की बातें करना नहीं, प्रेस से किसी गंभीर चर्चा में उलझना नहीं!

नरेंद्र मोदी  के पास उनकी अपनी ही बातें हैं, अपने ही तर्क हैं, अपने ही आंकड़े हैं, अपनी ही कहानियां हैं और अपनी ही छवि पर मुग्धता है। इसलिए उन्हें चाय पर चर्चा जैसा कार्यक्रम सूझा। चाय पर चर्चा करते अधिकतर लोग वे होते हैं जो उतने वक्त के लिए ही देश-दुनिया की फिक्र करते हैं जितने वक्त चाय की प्याली चलती है। इधर चाय खत्म, उधर देश-दुनिया की चिंता खत्म! अब आगे तो अपना धंधा-पानी देखना है! मोदी अपनी ऐसी ही छवि बना रहे हैं। यह उनकी और उनकी पार्टी की पसंदगी है। लेकिन जम्मू में बोलते हुए उन्होंने आम आदमी पार्टी, अरविंद केजरीवाल आदि को पाकिस्तान का एजेंट और भारत का दुश्मन करार दिया। ऐसा उन्होंने क्यों कहा? वे गहरी हिकारत से, फेफड़े की पूरी ताकत लगाते हुए बोले: इनकी आधिकारिक वेबसाइट पर भारत का जो नक्शा है, उसमें इन्होंने कश्मीर को पाकिस्तान को दे दिया है!

दूसरी बात कही उन्होंने, कि इनके एक बड़े नेता कहते हैं कि कश्मीर में जनमत-संग्रह कराना चाहिए। इतना कह कर वे गरजे: पाकिस्तान में लोग खुशी से नाच रहे हैं, सारे अखबार वहां के इसी खबर से भरे हैं। और इसलिए ये लोग देशद्रोही हैं!

इसे कहते हैं भीड़बाज!

ऐसा आदमी लोगों की समझ और संवेदना बढ़ाना नहीं चाहता, उन्हें उन्मादग्रस्त कर, वोट उगलवाना चाहता है। यह लोकतंत्र में मिली नागरिक आजादी की आड़ में आदमी या मतदाता को भीड़ में बदलने की गर्हित कोशिश है। कश्मीर का सवाल बहुत नाजुक है। इसके संदर्भ में उठाया एक गलत कदम फिर से देश का भूगोल बदल सकता है।

राजनीति


और सांप्रदायिकता के मिश्रण का यह खतरा ही था जिसकी अनदेखी करने के कारण (याकि उसका फायदा उठाने की कोशिश में!) यह देश टूटा था। उस जहर को पीने और उसका वार अपनी छाती पर झेलने तब संघ परिवार समेत कोई भी संगठित संप्रदाय आगे नहीं आया था। गाली और गोली दोनों गांधी के ही हिस्से में आई थीं।

आज फिर मोदी उन्हीं सांप्रदायिक ताकतों को उभार रहे हैं ताकि कुछ वोट उनके हिस्से में आ जाएं! क्या इसे देशद्रोह नहीं कहना चाहिए? आम आदमी पार्टी ने कहा है कि उसकी वेबसाइट पर ऐसा कोई नक्शा है ही नहीं। अगर ऐसा कोई नक्शा हो तो ‘आप’ उसके लिए माफी मांग सकती है, वह नक्शा बदला जा सकता है। लेकिन मोदी जो जहर फैलाने में लगे हैं वह न तो माफी मांगने से मिट सकता है और न बदला जा सकता है। वह जहर भारत का नक्शा बदल देगा और जैसे हम 1947 में कुछ नहीं कर पाए थे, इस बार भी कुछ नहीं कर पाएंगे।

कश्मीर के संदर्भ में जनमत संग्रह की बात कई लोग कहते रहे हैं, संयुक्त राष्ट्र में हमारा वादा भी यही था। तब से अब तक हालात भी बहुत बदले हैं, राजनीतिक सच्चाइयां बहुत नया रूप लेकर आ खड़ी हुई हैं। इसलिए जनमत संग्रह की बात अपना संदर्भ खो बैठी है। आज वैसा करने से यह समस्या ज्यादा ही जटिल और विस्फोटक बनेगी। इतिहास अपनी गति में वहां से बहुत आगे निकल गया है, लेकिन इस सच्चाई से भी कोई भारतीय मुंह नहीं मोड़ सकता कि कश्मीर पीछे छूट गया है। वहां का अवाम बहुत असंतुष्ट और बहुत अशांत है।

भारतीय गणतंत्र के भीतर वह आंतरिक शांति और भौतिक संतोष का अनुभव कर सके, इसका रास्ता खोजना हम सबकी जिम्मेवारी है। पिछले साठ वर्षों का इतिहास चीख-चीख कर कह रहा है कि राज्य की फौजी ताकत और राजनीति की कुचालें यह नहीं कर सकती हैं। तब कोई प्रशांत भूषण अगर कहता है कि हालात सुधरे नहीं तो बंदूक के बल पर, कश्मीरियों को मार कर हम कब तक उन्हें रखेंगे, तो इसमें देशद्रोह कहां से आ गया? यह तो विकल्पों का लोकतांत्रिक विमर्श है।

कश्मीर साथ रहे, इसकी कामना जिन्हें है उन्हें किसी के भी साथ, कहीं भी ऐसे किसी विमर्श से डरना नहीं चाहिए। कहा तो प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने ही था न कि सरकार किसी से भी, कहीं भी बातचीत के लिए तैयार है; और किसी ने पूछा कि क्या संविधान के दायरे के बाहर जाकर भी बात करने को सरकार तैयार है, तो वे तपाक से बोले थे: राष्ट्र-हित के दायरे के भीतर रह कर हर किसी से बात हो सकती है! अब मोदी क्या कहेंगे अटलजी को? देशद्रोही?

देश से खेलना और देश बनाना दो सर्वथा भिन्न चीजें हैं। अटलजी ने जब गुजरात के मरे-कुटे मुसलमानों के बीच खड़े होकर राजधर्म के पालन की बात कही थी मोदी से, तब वे यही फर्क समझाना चाह रहे थे। तब मोदी जिस कठघरे में खड़े थे, वह देशद्रोह का कठघरा था। लेकिन अटलजी को तब लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, जसवंत सिंह आदि सबने अकेला और निहत्था कर दिया था; और अटलजी खुद अकेले होकर ऐसी लड़ाई लड़ते, ऐसी गहरी उनकी राजनीति नहीं थी। भारतीय जनता पार्टी में आज जो सियापा चल रहा हे, उसकी जड़ कहीं उस चूक में खोजनी चाहिए।

समय जिस तरह और जिस तेजी से बदलता जा रहा है, उसमें बहुत सारी अवधारणाएं भी अपना मतलब और अपना स्वरूप बदलती जा रही हैं। इस बदलाव को पहचानना और समझना जरूरी है। नहीं, कश्मीर के संदर्भ में विकल्पों की चर्चा करना देशद्रोह नहीं है। पाकिस्तान की हितकामना करना पाकिस्तान का एजेंट होना नहीं है। लेकिन भारतीय मुसलमानों को पाकिस्तानी या परदेशी मानना देशद्रोह है।

देशप्रेमियों की संख्या बढ़ना देशप्रेम की कसौटी है और आप यह काम अपने दुखी, असंतुष्ट या अशांत नागरिकों की देशभक्ति पर शंका करके नहीं कर सकते। एक समुदाय को दूसरे के खिलाफ खड़ा करने से, एक के खिलाफ दूसरे को भड़ास निकालने का मौका देने से, किसी एक समुदाय में असुरक्षा की भावना भरने से देशप्रेम पैदा नहीं होता। मोदी के गुजरात में मुठभेड़ के नाम पर हुई अधिकतर हत्याएं अपराध हैं। ऐसी हत्याएं देशद्रोह हैं। किसानों की जमीन खेती से निकल कर किसी दूसरे काम के लिए देना देशभक्ति नहीं है, क्योंकि भूखे को देने के लिए किसी इंसान के पास दूसरा कुछ नहीं है।

विकास का क्या पैमाना हो सकता है? यह नहीं कि हम अपने लोगों को कितना-कितना दे पाते हैं, बल्कि यह कि हम अपने कितने-कितने लोगों की जीवन की बुनियादी जरूरतें पूरी कर पाते हैं। देश भूखा रहे, नंगा रहे, प्यासा रहे, अंधकार में रहे, शिक्षा-स्वास्थ्य सुविधा-छत के बिना रहे और हम हवाई अड्डों की, मॉलों की, बहुलेनी सड़कों, कारों आदि की संख्या गिनते रहें तो यह देशद्रोह है। अगर मोदी और हम सभी इसे पहचानेंगे तो भीड़बाजी नहीं करेंगे और चुनावों को देश की किस्मत बिगाड़ने नहीं देंगे।

 

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