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धर्म को सत्ता क्यों चाहिए PDF Print E-mail
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Thursday, 27 March 2014 11:26

राजकिशोर

जनसत्ता 27 मार्च, 2014 : धर्मसत्ता वंध्यापुत्र या आकाशकुसुम जैसा शब्द है।

वंध्या है तो पुत्र कैसे हुआ? आकाश में कहीं फूल खिलते हैं? इसी तरह, जहां धर्म है, वहां सत्ता कैसे? दुनिया में कम से कम दो ऐसी जगहें हैं जहां किसी की सत्ता नहीं हो सकती- विज्ञान और धर्म। बड़े से बड़े वैज्ञानिक की स्थापना को एक विद्यार्थी अपनी किसी मामूली खोज से ध्वस्त कर सकता है। क्योंकि यहां मालिक व्यक्ति नहीं, विचार है। किसी देश का सर्वोच्च वैज्ञानिक संस्थान कहता है कि लोहे को सोना कहा जाए, तो उसके अधीन काम करने वाले वैज्ञानिक भले ही इसे स्वीकार कर लें और इनमें से कुछ चापलूसी की अदम्य कामना से यह सिद्ध भी करने लगें कि लोहे में वे सारे गुण होते हैं जो सोने में पाए जाते हैं, तब भी लोहा लोहा रहेगा और सोना सोना। क्योंकि यहां वस्तु अपने अधीन है, किसी और के अधीन नहीं। अधीनता या अधीनस्थता प्रकृति में नहीं है, यह आदमी का निजी आविष्कार है।

 

धर्म में सत्ता का तत्त्व हो, यह बात समझ में नहीं आती, लेकिन धर्म जहां भी पाया जाता है, अपनी सत्ता के साथ ही पाया जाता है। सच तो यह है कि व्यक्ति का धर्म, धर्म नहीं होता। वह उसका अपना विचार होता है। धर्म को अगर व्यक्तिगत मामला बना दिया जाए, तो धर्म का अस्तित्व ही नहीं रह जाएगा। वास्तव में, एक विचारधारा के रूप में धर्म का अस्तित्व समुदाय से है। कोई भी समुदाय अपनी शक्ति या संख्या कम नहीं करना चाहता, इसीलिए जन्मना हिंदू या जन्मना मुसलमान जैसी घटना अब भी अस्तित्व में है। वरना चेतना के विकास के साथ-साथ जन्म से जुड़े इस तर्क को कभी का खत्म हो जाना चाहिए था। हम सभी जानते हैं कि ईश्वर किसी को हिंदू या मुसलमान बना कर नहीं भेजता, ‘पुण्य’ का यह काम हम खुद करते हैं। पर मनुष्य की इस अधिनायकवादी क्षमता को किसी भी धर्मशास्त्र में चुनौती नहीं दी गई है।

वास्तव में धर्म के खिलाफ पहला तर्क यहीं से पैदा होता है। क्या यह बात अजीब नहीं लगती कि व्यक्ति धर्म को नहीं चुनता, बल्कि धर्म ही व्यक्ति को चुनता है? मानो धर्म झाड़ी में दुबका हुआ कोई जानवर हो जो किसी का जन्म होते ही उस पर हमला कर देता है। खुद धर्म में इतनी शक्ति नहीं होती कि वह आदमी को अपनी ओर आकर्षित करे। इसीलिए धर्म के प्रसार में मां-बाप का सहारा लिया जाता है, जिनके सामने हर बच्चा असहाय होता है। कितना अच्छा हो, अगर बच्चों को, जन्म लेते ही, समाज से अलग करने का कार्यक्रम कुछ समय तक चलाया जाए। तभी उसका समग्र विकास हो सकता है। अपनी संतान पर अपना धर्म लादने की कुप्रथा खत्म हो जाए, तो देखना है कि पचास साल बाद कितने हिंदू रह जाते हैं, कितने मुसलमान और कितने सिख।

अर्थात अन्य सभी सत्ताओं की तरह धर्मसत्ता में भी तानाशाही का तत्त्व होना अनिवार्य है। धर्म कैसा भी हो, उसका एक जरूरी अवयव होता है विवेक। यानी क्या करना ठीक है और क्या करना ठीक नहीं है। लेकिन व्यक्तिगत विवेक नहीं, जिसके आधार पर कुछ भी अपनाया या कुछ भी छोड़ा जा सकता है, सामुदायिक विवेक, जिससे किसी तरह की छूट या छुट्टी नहीं मिल सकती। जैसे कोई मुसलमान सूअर का मांस नहीं खा सकता या कोई हिंदू गाय का मांस नहीं खा सकता, जबकि ईसाई किसी भी जानवर का मांस खा सकता है। स्पष्ट है कि मुद्दा गाय, सूअर या बकरे में निहित कोई खास गुण या अवगुण नहीं है, मुद्दा यह है कि धर्मसत्ता क्या कहती है। धर्मसत्ता चाहे तो किसी भी तरह के मांसाहार को निषिद्ध कर सकती है। यानी क्या करना चाहिए और क्या नहीं, इसका निर्णय करने का अधिकार मुझे नहीं है, मेरे लिए यह निर्णय पहले ही किया जा चुका है। धर्म भले ही आदमी को मुक्त करे, पर धर्मसत्ता हमेशा आदमी को बांधती है।

किसी भी सत्ता की ताकत यह होती है कि हम उससे डरते हैं। बहुतों को तो पता तक नहीं चल पाता कि वे डरते हैं। उनका डर इतना अमूर्त हो चुका रहता है कि वे उसे पहचान भी नहीं पाते- कहीं-कहीं तो यह प्रेम में बदल जाता है। अकबर के शब्दों में, बीए किया, नौकर हुए, पेंशन मिली, फिर मर गए। जीने और मरने का एक ढर्रा बन जाता है। इस ढर्रे में विचार के लिए कोई जगह नहीं है। वस्तुत: जीने के लिए विचार नहीं, मेहनत की जरूरत होती है। अगर समाज के सभी सदस्यों को मेहनत करने की सुविधाजनक जगह और मेहनत का उचित पारिश्रमिक दिया जाने लगे, तो वे विचार करने का कष्ट क्यों करेंगे? विचार मूलत: एक दैहिक आवश्यकता है। देह की जरूरतों को पूरा करने के लिए विचार की न्यूनतम मात्रा भी काफी है। इस सीमा से परे विचार जहां भी है, वह प्रश्न या विद्रोह की शक्ल में है।

अन्य किसी भी सत्ता की तरह धर्मसत्ता प्रश्नों से घबराती है। इसलिए वह एक ऐसा दिमाग बनाती है जिसमें संदेह और प्रश्न के स्थान पर श्रद्धा और विश्वास हो। धर्म अगर जनता की अफीम है तो धर्मसत्ता वह केंद्र है जहां यह अफीम बांटी जाती है। यह चौबीसों घंटे खुली रहने वाली दुकान है। दुकान खुली रहती है, दुकानदार बदलते रहते हैं। हर समाज में सौ-डेढ़ सौ सालों में एक नई दुकान खुल जाती है। एक बार में सौ लोग भी किसी नई दुकान की अफीम चाट लें, तो पांच सौ साल में उनकी संख्या लाखों में हो जाएगी और वे गर्व से बताएंगे कि हम क नहीं, ख हैं, मानो


ख किसी और रास्ते से ख बने हों।

और सत्ताएं अपने बल पर खड़ी होती हैं तथा अपना यह बल उन्हें लगातार बनाए रखना पड़ता है, धर्मसत्ता ने अपना अवलंबन एक ऐसी चीज को बनाया है जो अमर-अजर है। ईश्वर न कभी बूढ़ा होता है न मरता है। हां, वह हम सब को बूढ़ा या बीमार जरूर कर देता है, ताकि मृत्यु की तारीख तय करने में कोई समस्या न हो। धर्मसत्ता इस महाबली का लाभ उठा कर अपने को भी अजर-अमर बना लेती है। जो कोई उसके ईश्वर को शक की निगाह से देखता है, उस पर वह टूट पड़ती है। आज ईश्वर की हैसियत बहुत कमजोर हो चुकी है, इसलिए धर्मसत्ताएं भी सिमटती जा रही हैं। लेकिन दुश्मन चूंकि हमारे भीतर है और हम हमेशा अपने मित्र नहीं होते, इसलिए धर्म के नाम पर अधर्म की सत्ता कमजोर भले होती जाए, पर खत्म नहीं हो रही है। रोम की तरह, ईश्वर भी एक दिन में नहीं बना था। इसलिए वह एक दिन में खत्म हो जाए, यह आशावाद नहीं, उसकी चटनी है।

कोई भी संस्था कुछ मान्यताओं पर खड़ी होती हैं। मान्यताओं के ढह जाने पर संस्था भी ढह जाती है। धर्म ही एकमात्र संस्था है जिसकी पूंजी अभौतिक होती है। हवा गुणे हवा भागे हवा धन हवा घटा हवा- उत्तर हवा। चूंकि यह पूंजी भौतिक नहीं होती, इसलिए उसे प्रमाणित करने की जरूरत भी नहीं पड़ती। पता नहीं कितने लोगों ने ईश्वर का अवतार होने का दावा किया है और उनके अनुयायियों ने इस रूप में उन्हें स्वीकार भी कर लिया है। इस दावे को परखने का कोई सभ्य तरीका नहीं है, क्योंकि ईश्वर को विज्ञान की किसी भी प्रयोगशाला में उपस्थित होने के लिए समन जारी नहीं किया जा सकता। इसलिए धर्मसत्ता हमेशा हवा में टंगी होती है। लेकिन उसके पैर जमीन पर मजबूती से टिके रहते हैं। वह अपना टैक्स वसूल करना कभी नहीं छोड़ती।

अगर यह कानून बना दिया जाए कि कुछ निश्चित घंटे काम करने के बाद ही किसी को रोटी मिलेगी, तब देखिएगा कि धर्मसत्ता डगमगाती है या नहीं। कोई भी सत्ता लाइन में खड़ा होना पसंद नहीं करती। शासक शासितों में ही एक हो, यह एक क्रांतिकारी विचार है, इसीलिए लोकतंत्र एक क्रांतिकारी इरादा है। पर समानता के नाम पर खड़ी की गई संस्थाएं भी विषमता के स्थल पैदा करने में संकोच नहीं करतीं, इसलिए निर्वाचित शासक भी अपने आप को कुछ विशिष्ट मानने लगता है। सब लोग बराबर हैं, पर वह कुछ ज्यादा ही बराबर है। इसलिए ईश्वर की तरह वह भी लाइन में कभी नहीं लगता।

धर्म दुनिया का सबसे पुराना और सबसे बड़ा लोकतंत्र है। सभी ईसाई अपने आप को भगवान की संतान मानते हैं। इसलिए वे भाई-बहन हुए। बहुत-से हिंदू भजन भी ऐसा ही गाते हैं। जिन धर्मों में ईश्वर को मान्यता नहीं है, वहां तो लोकतंत्र ही लोकतंत्र है, क्योंकि आत्माओं में जाति प्रथा नहीं होती। लेकिन यह सब सिद्धांत है। व्यवहार में सभी धर्म लोकतंत्र-विरोधी हैं। धर्म इसी दुनिया का उत्पाद है, इसलिए वह अपनी मातृभूमि के अनिवार्य गुणों से अछूता नहीं रह सकता। पूरी दुनिया में समाजवाद आ जाए- जो बहुत कठिन है, लेकिन असंभव नहीं, तब तमाम ईश्वर भागते नजर आएंगे, क्योंकि किसी के भी शास्त्र में समानता के पक्ष में कोई आदेश नहीं है।

इसीलिए धर्म में तो समानता की संभावना है, पर धर्मसत्ता में हरगिज नहीं। धर्म इसीलिए आकर्षक होता है, क्योंकि वह मनुष्य के भीतर मौजूद सद्गुणों को जगाए रखने की कोशिश करता है, लेकिन धर्मसत्ता मनुष्य के भीतर मौजूद सभी अवगुणों को अभिव्यक्त और पुष्ट करती है। वह अच्छाई की ताकत पर खड़ी होकर बुराई का पक्ष लेती है। चूंकि धर्मसत्ता के बिना धर्म रह ही नहीं सकता- वह व्यक्ति का अपना विचार हो जाएगा, इसलिए अच्छाई और बुराई का यह धूपछांही खेल जारी रहता है।

दरअसल, किसी भी संगठित व्यवस्था में सिर्फ अच्छाई नहीं हो सकती। व्यवस्थाएं आदमी ही बनाता है, इसलिए प्रत्येक व्यवस्था, आदमी की ही तरह, अपूर्ण रहने को बाध्य है। जो कानून ज्यादातर के लिए ठीक है, वह कुछ के लिए खराब हो सकता है। एक बार किसी ने गांधीजी से पूछा- प्रेम और न्याय में कौन बड़ा है? गांधीजी ने क्षण मात्र में जवाब दिया- प्रेम, क्योंकि जहां प्रेम है, वहां अन्याय हो ही नहीं सकता। अब भी आम मान्यता यह है कि प्रेम न्याय के मार्ग में बाधा है। गांधीजी की तरह सोचें तो यह न प्रेम है न न्याय। धर्मसत्ता की समस्या भी यही है। जहां तक वह सत्ता है, धर्म नहीं है। जहां तक वह धर्म है, वहां सत्ता के लिए कोई गुंजाइश नहीं है।

वास्तव में असली सत्ता तो नैतिक ही हो सकती है, जो सत्ता ही नहीं है, प्रेरणा का स्रोत है। धार्मिक व्यक्ति किसी और को यह अधिकार नहीं दे सकता कि वह उसका कर्तव्य निर्धारित कर दे। जहां तक दखल का सवाल है, इसके लिए कानून काफी है। धर्मसत्ता ज्यादा से ज्यादा वाद-विवाद सभा का काम कर सकती है। इससे ज्यादा की कामना करना अतिक्रमण है, कमीज को त्वचा से सिल देना है।

 

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