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हिंदुत्व के नए हितैषी PDF Print E-mail
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Wednesday, 26 March 2014 11:00

सुभाष गाताडे

जनसत्ता 26 मार्च, 2014 : अस्सी के दशक में उत्तर भारत के कुछ शहरों में एक पोस्टर देखने को मिलता था।

रामविलास पासवान की तस्वीर वाले उस पोस्टर के नीचे एक नारा लिखा रहता था ‘मैं उस घर में दीया जलाने चला हूं, जिस घर में अंधेरा है।’ उस वक्त यह गुमान किसे हो सकता था कि अपनी राजनीतिक यात्रा में वे दो दफा भारतीय जनता पार्टी का चिराग रोशन करने पहुंच जाएंगे। 2002 में गुजरात जनसंहार के विरोध में केंद्रीय मंत्रिमंडल से दिए अपने इस्तीफे की ‘गलती’ को ठीक बारह साल बाद ठीक करेंगे, और जिस शख्स के ‘राजधर्म’ का निर्वाह न करने के चलते हजारों निरपराधों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा, उसी शख्स को मुल्क की बागडोर सौंपने के लिए चल रही मुहिम में जुट जाएंगे।

 

अपने आप को दलितों के अगुआ के तौर पर प्रस्तुत करने वालों की कतार में रामविलास पासवान अकेले नहीं हैं, जिन्होंने भाजपा का हाथ लिया है। रामराज नाम से भारतीय राजस्व सेवा में अपनी पारी शुरू करने वाले और बाद में सैकड़ों अनुयायियों के साथ बौद्ध धर्म स्वीकार करने वाले उदित राज, जिन्होंने संघ-भाजपा की मुखालफत में कोई कसर नहीं छोड़ी थी, वे भी हाल में भाजपा में शामिल हुए हैं। पिछले साल महाराष्ट्र के आंबेडकरी आंदोलन के नेता रिपब्लिकन पार्टी के रामदास आठवले भी भाजपा-शिवसेना गठजोड़ से जुड़ गए हैं। भाजपा से जुड़ने के सभी के अपने-अपने तर्क हैं। पासवान अगर राजद द्वारा ‘अपमानित’ किए जाने की दुहाई देते हुए भाजपा के साथ जुड़े हैं तो उदित राज ने मायावती की ‘जाटववादी’ नीति को बेपर्दा करने के लिए हिंदुत्व का दामन थामा है, उधर रामदास आठवले राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी से खफा होकर भाजपा-शिवसेना के महागठबंधन का हिस्सा बने हैं।

दलितों के एक हिस्से का हिंदुत्व की एकांगी राजनीति से जुड़ना अब कोई अचरज की बात नहीं रह गई है। अगर हम आंबेडकर की विरासत को आगे बढ़ाने का दावा करने वाली ‘बहुजन समाज पार्टी’ को देखें तो क्या यह बात भूली जा सकती है कि उत्तर प्रदेश में सत्ता हासिल करने के लिए नब्बे के दशक में और पिछले दशक की शुरुआत में इसने तीन दफा भाजपा से गठजोड़ किया था।

और यह मामला महज सियासत तक सीमित नहीं है। ‘झोत’ जैसी अपनी चर्चित किताब (जो संघ की विघटनकारी राजनीति पर केंद्रित थी) से सुर्खियों में आए और अन्य कई किताबों के लेखक रावसाहब कसबे भी पिछले दशक की शुरुआत में शिवसेना द्वारा उन दिनों प्रचारित ‘भीमशक्ति शिवशक्ति अर्थात राष्ट्रशक्ति’ नारे के सम्मोहन में आते दिखे थे। मराठी के दलित कवि नामदेव ढसाल, जिनके निधन पर पिछले दिनों अंग्रेजी की अग्रणी पत्रिकाओं तक ने श्रद्धांजलि अर्पित की थी, लंबे समय तक शिवसेना के साथ सक्रिय रहे थे। विडंबना यही थी कि वे महाराष्ट्र में आंबेडकरी आंदोलन में रैडिकल स्वर को जुबां देने के लिए, ‘दलित पैंथर’ के नाम से एक राजनीतिक संगठन की स्थापना करने के लिए चर्चित रहे थे, जिसने सत्तर के दशक के शुरुआती दिनों में शिवसेना के हिंसक तत्त्वों से मुकाबला किया था।

हिंदुत्व की राजनीति के साथ दलित अगुआओं के बढ़ते सम्मोहन का मसला नेतृत्व तक सीमित नहीं है। समूचे दलित आंदोलन में ऊपर से नीचे तक एक मुखर हिस्से में- यहां तक कि जमीनी स्तर के कार्यकर्ताओं तक- इसके प्रति एक नया सम्मोहन दिख रहा है। यह सिलसिला भले पहले से मौजूद रहा हो, मगर गुजरात जनसंहार के दिनों में इसकी अधिक चर्चा सुनने को मिली थी। गुजरात दंगों में दलितों और आदिवासियों की भागीदारी काफी विचलित करने वाली थी। दलितों-आदिवासियों के हिंदुत्वकरण के इस तथ्य के बरक्स हमें यह भी स्वीकार करना पड़ेगा कि इन समुदायों में ऐसे भी तमाम लोग थे जिन्होंने अपने आप को खतरे में डालते हुए मुसलमानों की हिमायत और रक्षा की थी।

संघ-भाजपा के प्रति इन सभी में उमड़े ‘प्रेम का खुमार’ और इनके द्वारा भाजपा का दामन थामने का यह सिलसिला निश्चित ही इस बात को विलुप्त नहीं कर सकता कि भाजपा के मातृसंगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने मनुस्मृति के प्रति अपने सम्मोहन से कभी भी तौबा नहीं की है। वही मनुस्मृति जिसने शूद्रों, अतिशूद्रों और स्त्रियों को सैकड़ों सालों तक तमाम मानवीय अधिकारों से वंचित रखा था। याद रहे कि स्वतंत्र भारत के लिए संविधान निर्माण की प्रक्रिया जिन दिनों जोरों पर थी, उन दिनों संघ परिवार ने नए संविधान निर्माण के बजाय ‘मनुस्मृति’ से ही काम चलाने की बात की थी। अपने मुखपत्र ‘आर्गेनाइजर’, (30 नवंबर, 1949, पृष्ठ 3) में संघ की ओर से लिखा गया था कि ‘‘हमारे संविधान में प्राचीन भारत में विलक्षण संवैधानिक विकास का कोई उल्लेख नहीं है। मनु की विधि स्पार्टा के लाइकरगुस या पर्सिया के सोलोन के बहुत पहले लिखी गई थी। आज तक इस विधि की जो ‘मनुस्मृति’ में उल्लेखित है, विश्व भर में सराहना की जाती रही है और यह स्वत:स्फूर्त धार्मिक नियम-पालन और समानुरूपता पैदा करती है। लेकिन हमारे संवैधानिक पंडितों के लिए उसका कोई अर्थ नहीं है।’’

हालांकि तब से गंगा-जमुना से काफी सारा पानी गुजर चुका है, लेकिन यह नहीं कहा जा सकता कि मनुस्मृति को लेकर अपने रुख में हिंदुत्व ब्रिगेड की तरफ से कोई पुनर्विचार हो रहा है। फर्क महज इतना ही आया है कि भारतीय संविधान की उनकी आलोचना- जिसने आंबेडकर के शब्दों में कहा जाए तो ‘मनु के दिनों को खत्म किया है’- अधिक संश्लिष्ट हुई है। हालांकि कई बार ऐसे मौके भी आते हैं जब यह आलोचना बहुत दबी नहीं रह पाती। विश्व हिंदू परिषद के नेता गिरिराज किशोर, जो संघ के प्रचारक रह चुके हैं, उनका अक्तूबर 2002 का वक्तव्य बहुत विवादास्पद हुआ था, जिसमें उन्होंने एक मरी हुई गाय की चमड़ी


उतारने के ‘अपराध’ में झज्जर में भीड़ द्वारा की गई पांच दलितों की हत्या को यह कह कर उचित ठहराया था कि ‘हमारे पुराणों में गाय का जीवन मनुष्य से अधिक मूल्यवान समझा जाता है।’ मध्यप्रदेश की मुख्यमंत्री के तौर पर अपने कार्यकाल में उमा भारती ने गोहत्या के खिलाफ अध्यादेश जारी करते हुए मनुस्मृति की भी हिमायत की थी। (जनवरी 2005)

संघ-भाजपा के मनुस्मृति-सम्मोहन का एक प्रमाण जयपुर उच्च न्यायालय के प्रांगण में भैरोंसिंह शेखावत के मुख्यमंत्रित्व-काल में नब्बे के दशक के पूर्वार्द्ध में बिठाई गई मनु की मूर्ति के रूप में मौजूद है। जयपुर भारत का एकमात्र शहर है जहां मनु महाराज हाइकोर्ट के प्रांगण में विराजमान हैं और संविधान निर्माता आंबेडकर की मूर्ति प्रांगण के बाहर कहीं कोने में स्थित है।

कोई यह कह सकता है कि ये तमाम विवादास्पद वक्तव्य, लेख या घटनाएं अब अतीत की चीजें बन गई हैं, और हकीकत में दलितों के प्रति संघ-भाजपा के नजरिये में आमूल फर्क आया है।

इसकी पड़ताल हम मोदी के ‘गुजरात मॉडल’ को देख कर कर सकते हैं, जहां शहरों से लेकर गांवों तक अस्पृश्यता आज भी बड़े पैमाने पर व्याप्त है, जबकि सरकारी स्तर पर इससे लगातार इनकार किया जाता रहा है। कुछ समय पहले ‘नवसर्जन’ नामक संस्था द्वारा गुजरात के लगभग सोलह सौ गांवों में अस्पृश्यता की मौजूदगी को लेकर किया गया अध्ययन (जिसका प्रकाशन ‘अंडरस्टैंडिंग अनटचेबिलिटी’ के नाम से हुआ है) किसी की भी आंखें खोल सकता है। मंदिर प्रवेश से लेकर जलाशयों के साझे इस्तेमाल आदि तमाम बिंदुओं को लेकर यह रिपोर्ट बताती है कि सर्वेक्षण में लिए गए गांवों में से 98 फीसद गांवों में अस्पृश्यता देखने को मिली है। गौरतलब है कि 2009 में प्रकाशित ‘नवसर्जन’ की उपरोक्त रिपोर्ट पर मुख्यधारा के मीडिया में काफी चर्चा हुई और विश्लेषकों ने ‘वायब्रेंट (स्पंदित) गुजरात’ की असलियत पर सवाल उठाए।

इस बात के मद्देनजर कि यह रिपोर्ट ‘समरस’ बताई जाने वाली गुजरात की छवि सवालिया निशान लगा रही थी, घबराई मोदी सरकार ने आनन-फानन में सीइपीटी विश्वविद्यालय के विद्वानों को इसकी पड़ताल और समीक्षा करने को कहा। दरअसल, राज्य सरकार खुद को क्लीन चिट देने के लिए इतनी उतावली थी कि उसने एक दूसरा तरीका भी अपनाया। सामाजिक न्याय मंत्री फकीरभाई वाघेला की अध्यक्षता में संबंधित विभागों के सचिवों की एक टीम गठित कर उसे यह जिम्मा सौंपा गया कि वह रिपोर्ट के निष्कर्षों को खारिज कर दे। इस उच्चस्तरीय समिति ने अपने मातहत अधिकारियों को आदेश दिया कि वे अनुसूचित जाति के लोगों से यह शपथपत्र लिखवा लें कि उनके गांव में अस्पृश्यता नहीं है।

वर्ष 2003 में गुजरात सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में यह शपथपत्र दाखिल किया था कि उसके राज्य में हाथ से मल उठाने की प्रथा नहीं है, जबकि कई अन्य रिपोर्टों और इस मसले पर तैयार वृत्तचित्र में उसकी मौजूदगी को दिखाया गया है। वर्ष 2007 में जब टाटा इंस्टीट्यूट आॅफ सोशल साइंसेज ने अपने अध्ययन में उजागर किया कि राज्य में बारह हजार लोग हाथ से मल उठाते हैं, तब भी राज्य सरकार का यही रुख था।

यह भी मुमकिन है कि नरेंद्र मोदी चूंकि इस अमानवीय पेशे को ‘आध्यात्मिक अनुभव’ की श्रेणी में रखते आए हैं, इस वजह से भी सरकार खामोश रही हो। याद रहे कि वर्ष 2007 में मोदी की एक किताब ‘कर्मयोग’ का प्रकाशन हुआ था। आइएएस अधिकारियों के चिंतन शिविरों में दिए मोदी के व्याख्यानों का संकलन इसमें किया गया था, जिसमें उन्होंने दूसरों का मल ढोने और पाखाना साफ करने के वाल्मिकी समुदाय के ‘पेशे’ को ‘आध्यात्मिकता के अनुभव’ कहा था। इस किताब में मोदी कहते हैं: ‘मैं नहीं मानता कि वे (सफाई कामगार) इस काम को महज जीवनयापन के लिए कर रहे हैं। अगर ऐसा होता तो उन्होंने पीढ़ी-दर-पीढ़ी इस काम को नहीं किया होता...किसी वक्त उन्हें यह प्रबोधन हुआ होगा कि वाल्मिकी समुदाय का काम है कि समूचे समाज की खुशी के लिए काम करना, इस काम को उन्हें भगवान ने सौंपा है; और सफाई का यह काम आंतरिक आध्यात्मिक गतिविधि के तौर पर जारी रहना चाहिए। इस बात पर यकीन नहीं किया जा सकता कि उनके पूर्वजों के पास अन्य कोई उद्यम करने का विकल्प नहीं रहा होगा।’’ (पेज 48-49)

उपरोक्त वक्तव्य टाइम्स आॅफ इंडिया में नवंबर 2007 में प्रकाशित हुआ था। यों तो गुजरात में इस वक्तव्य पर कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई, मगर जब तमिलनाडु में यह समाचार छपा तो वहां दलितों ने इस बात के खिलाफ उग्र प्रदर्शन किए जिसमें मैला ढोने को ‘आध्यात्मिक अनुभव’ की संज्ञा दी गई थी। उन्होंने जगह-जगह मोदी के पुतले फूंके। अपनी वर्ण-मानसिकता उजागर होने के खतरे को देखते हुए मोदी ने इस किताब की पांच हजार प्रतियां बाजार से वापस मंगवा लीं, मगर अपनी राय नहीं बदली।

वर्ष 1956 की बात है। आगरा की सभा में आंबेडकर ने वहां एकत्रित दलित समुदाय के बीच, अपने आंसुओं को रोकने की कोशिश करते हुए, कहा था कि ‘मेरे पढ़े-लिखे लोगों ने मेरे साथ धोखा किया।’ सत्ता और संपत्ति की हवस में लिप्त और उसके लिए हर किस्म के मौकापरस्त गठबंधन करने पर आमादा उनके अनुयायियों को देख कर, जो कि हमारे वक्त के नीरो की पालकी उठाने को बेताब हैं, यही अहसास होता है कि उनकी भविष्यवाणी कितनी सही थी।

 

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