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क्रीमिया और कश्मीर का फर्क PDF Print E-mail
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Monday, 24 March 2014 12:18

पुष्परंजन

जनसत्ता 24 मार्च, 2014 : क्रीमिया को लेकर कश्मीर में दीवानगी पैदा करने की कोशिश जारी है।

क्रीमिया चूंकि सोलह मार्च के मतसंग्रह के आधार पर यूक्रेन से अलग हो गया, चुनांचे कश्मीरी अलगाववादी नेता एक बार फिर रायशुमारी का रायता फैलाने को आतुर हैं। सरहद पार उनके हममिजाज पाकिस्तानी बुद्धिजीवी मानते हैं कि चिनगारी को आग में बदलने के लिए इससे अच्छा अवसर हाथ नहीं आने वाला। हुर्रियत नेता मीरवाइज उमर फारूक और सैयद अली शाह गिलानी ने बयान दिया है कि क्रीमिया के फैसले से कश्मीर की जनता का मनोबल ऊंचा हुआ है। दोनों नेताओं ने कहा कि हुर्रियत नेतृत्व इसे आधार बना कर अंतरराष्ट्रीय मंच पर मांग करेगा कि कश्मीर में मतसंग्रह होना चाहिए। इसी इक्कीस मार्च को पाकिस्तानी दैनिक ‘द नेशन’ में कार्यकारी संपाद्र एमए नियाजी ने ‘क्रीमिया वोट्स, बट नॉट कश्मीर’ यानी ‘क्रीमिया वोट करे, पर कश्मीर नहीं’, शीर्षक से लेख लिखा और तमाम कुतर्क किए कि क्यों जनमत संग्रह के आधार पर कश्मीर को भारत से अलग कर दिया जाना चाहिए। यों हुर्रियत नेता और उनसे वैचारिक रूप से बगलगीर पाकिस्तानी बुद्धिजीवी जब गलथेथरी पर उतर आएं, तो उन्हें यह बताना जरूरी हो जाता है कि क्रीमिया और कश्मीर की भू-सामरिक और राजनीतिक परिस्थितियां एक दूसरे से बिल्कुल भिन्न रही हैं।

 

क्रीमिया, कश्मीर की तरह चारों ओर से जमीन से घिरा इलाका नहीं है। काला सागर के तट पर बसा क्रीमिया प्रायद्वीप जमीनी-समुद्री मार्ग के जरिए रूस, जार्जिया, तुर्की, माल्दोवा, रूमानिया, बुल्गारिया जैसे देशों से जुड़ा हुआ है। सम्राट अशोक से लेकर रणजीत सिंह, गुलाब सिंह और राजा हरि सिंह नलवे के शासनकाल तक जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न अंग रहा है। उससे उलट 250वीं सदी में सीथियन, गोथ, 350वीं सदी में हूण, चौथी से आठवीं सदी तक बुल्गार, 1016 में बैंजेटाइन, 1237 में मंगोल, 1441 में चंगेज खान के वंशज क्रीमिया खान और उसकी संतानों ने तीन सौ सालों तक क्रीमिया पर शासन किया। उसके बाद ओटोमन साम्राज्य (सल्तनते उस्मानिया) और फिर 1920 तक रूसी जार शासकों के अधिकार क्षेत्र में यह इलाका रहा है। 1500 से 1700 के बीच सुन्नी तातार शासकों ने लाखों गुलामों को इस इलाके  से उठा कर तुर्की और यूरोप में बेचा था।

काला सागर के तट पर बसा क्रीमिया आरंभ से यूरोप और रूस के लिए सामरिक रूप से महत्त्वपूर्ण रहा है। हिटलर क्रीमिया के रास्ते ही रूस पर कब्जा जमाना चाहता था। 1941 में नाजी सेना के नियंत्रण वाली ‘एक्सिस फोर्स’ को करारी शिकस्त क्रीमिया में मिली थी। इससे खार खाकर 18 मई 1944 को स्तालिन ने करीब दो लाख क्रीमियाई तातारों को साइबेरिया और मध्य एशिया की ओर भगा देने का आदेश दिया था। कड़कती सर्दी में पलायन करने वाले आधे से अधिक तातार मुसलमान मारे गए थे, जिसकी वजह से स्तालिन और खासकर रूसियों को यह कौम कभी नहीं माफ करती। 1989 में मिखाइल गोर्बाचेवने तातारों को क्रीमिया वापसी का आदेश दिया, जिसके बाद दो लाख साठ हजार तातार क्रीमिया लौटे।

सवाल यह है कि क्या कश्मीर में कभी ऐसा हुआ कि भारत के किसी शासक ने वहां की मुसलिम आबादी को देश से निकाल बाहर करने का आदेश दिया हो? क्या कश्मीर पर बाहरी ताकतों ने कभी बारी-बारी से एक अलग देश समझ कर शासन किया है? तो फिर इसकी तुलना क्रीमिया से कैसे की जा सकती है? कश्मीर में अलगाव और आतंक का एक लंबा इतिहास है, जिसमें लाखों लोग मारे गए, और कई लाख हिंदू परिवार उजड़ कर अपने ही देश में शरणार्थी हो गए। क्या ऐसा क्रीमिया में हुआ है?

दरअसल, कहानी यहीं खत्म नहीं होती। 30 जून 1945 को क्रीमिया को रूसी सोवियत संघीय सोशलिस्ट रिपब्लिक (रशियन एसएफएसआर) का एक प्रांत (ओब्लास्ट) बना दिया गया। इसके कोई नौ साल बाद, 19 फरवरी 1954 को सुप्रीम सोवियत की प्रेजीडियम ने एक अध्यादेश पारित कर क्रीमिया प्रांत को ‘यूक्रेनियन सोवियत समाजवादी गणराज्य’ के अधीन कर दिया। क्रीमिया में मतसंग्रह कोई पहली बार नहीं हुआ है। 20 जनवरी 1991 को एक मतसंग्रह के जरिए ‘क्रीमिया ओब्लास्ट’ को स्वायत्त सोवियत समाजवादी गणराज्य बनाया गया। फिर उसके अगले महीने की बारह तारीख को ‘राडा’ यानी यूक्रेन की संसद ने क्रीमिया को स्वायत्त प्रदेश मान लिया था। तब न तो अमेरिका को आपत्ति हुई, न ही पश्चिमी यूरोप को। लेकिन सोवियत संघ के विघटन के बाद छब्बीस हजार दो सौ वर्ग मील क्षेत्रफल और लगभग चौबीस लाख की आबादी वाले क्रीमिया को यूक्रेन का हिस्सा मान लिया गया।

स्वायत्तता के लिए मतसंग्रह की बात करें तो जार्जिया से अलग होने वाले दक्षिणी ओसेटिया में 12 नवंबर 2006 को रायशुमारी हुई थी। जार्जिया के एक और प्रांत, अबखाजिया में 17 मार्च 1991 को इसी तरह का मतसंग्रह हुआ, और 1999 में वह जार्जिया से मुक्त हो गया। ये दोनों काला सागर से लगे काकेशस पर्वतमाला के देश हैं, और यहां पर रूसी मिसाइलें लगी हैं। कश्मीरी नेताओं को तब भी दक्षिणी ओसेटिया और अबखाजिया में हुई रायशुमारी की याद नहीं आई। सितंबर 1991 में कोसोवो को स्वतंत्र राष्ट्र घोषित करने के लिए मतसंग्रह हुआ। तब अमेरिका और उसके मित्रों को कष्ट नहीं हुआ। ताजा उदाहरण फाकलैंड आइलैंड का देते हैं। 10 से 11 मार्च 2013 को फाकलैंड में इस बात पर मतसंग्रह हुआ कि वहां की जनता ब्रिटेन के साथ रहे, या नहीं। मतसंग्रह में 1516 लोगों ने भाग लिया, और घोषणा हो गई कि 99.93 प्रतिशत जनता चाहती है कि फाकलैंड, ब्रिटेन का हिस्सा बना रहे।

कश्मीरी अलगाववादी नेताओं और उनके पाकिस्तानी


मित्रों से कोई पूछे कि क्रीमिया में जितना कुछ उठा-पटक हुआ है, क्या उतना कश्मीर में हुआ है। चौबीस साल पहले, जनवरी 1991 में जब क्रीमिया को स्वायत बनाए जाने के सवाल पर मतसंग्रह हुआ था, तब कश्मीरी अलगाववादियों को इसकी याद क्यों नहीं आई थी? क्रीमिया में रूसी मुद्रा लंबे समय से चलन में है, लेकिन अब आकर रूसी संसद ने क्रीमिया के विलय पर मुहर लगाने के साथ-साथ रूबल को आधिकारिक रूप से मान्यता दे दी है। क्रीमिया ‘रूसी टाइम जोन’ में है, मगर हमारे कश्मीर में न तो पाकिस्तानी मुद्रा चलती है, न ही जम्मू-कश्मीर में पाकिस्तान का मानक-समय मान्य है। इसलिए हुर्रियत नेता अलगाववाद का जो नया राग अलाप रहे हैं, उसमें उतना दम नहीं कि दुनिया उस पर ध्यान दे।

दुनिया की दृष्टि पुतिन पर केंद्रित है कि अब उनकी अगली चाल क्या होगी। यह तो साफ है कि रूस परप्रतिबंध लगता है, तो पुतिन भी यूरोप को नहीं बख्शेंगे। यूरोप अपनी आवश्यकता का तीस प्रतिशत गैस रूस से आयात करता है, इसलिए रूस की आर्थिक नाकेबंदी इतनी आसान नहीं है। रूस की आर्थिक कमर तोड़ने के लिए ओबामा मध्य-पूर्व से यूरोप को गैस आपूर्ति की योजना बनाने में लगे हैं। उसके बरक्स रूस के लिए चीन, पाकिस्तान, भारत ऊर्जा का बड़ा बाजार है।

क्रीमिया के रूसी संघ का हिस्सा बन जाने की घटना को लेकर यूक्रेन बेबस और बौखलाया हुआ है। यूक्रेन के प्रधानमंत्री आर्सेनी यातसेनयुक ने बयान दिया कि यह अंतरराष्ट्रीय स्तर की चोरी है, जिसमें कोई देश आता है, और डाका डालकर चला जाता है। मगर एक सच यह भी है कि यूक्रेन और क्रीमिया की बंदरबांट हुई है। इस बंदरबांट के विरोधियों और समर्थकों के रुख को देख कर अगर हम शीतयुद्ध के जिन्न के बोतल से निकलने की बात कहें, तो जल्दबाजी होगी। दुनिया इस सवाल पर दो भागों में बंटी नहीं दिखती। लेकिन यह जरूर है कि क्रीमिया और यूक्रेन के बीच ‘बर्लिन की दीवार’ जैसी चीज खड़ी कर दी गई है।

यूक्रेन अब पश्चिमी खेमे में है, और क्रीमिया रूसी संघ का हिस्सा बन गया है। शुक्रवार को एक ही समय यूक्रेन और क्रीमिया का भविष्य तय हो रहा था। ब्रसेल्स में यूरोपीय संघ के नेताओं ने यूक्रेन के नए प्रधानमंत्री के साथ राजनीतिक संबद्धता वाला समझौता किया है। समझौते में यूक्रेन को वित्तीय सुविधाएं देने और आवश्यकता पड़ने पर सैन्य सहयोग देने का संकल्प किया गया है। इस समझौते से यूके्रन में उन लोगों के सपने को पर लगे हैं, जो लंबे समय से इस देश को यूरोपीय संघ का सदस्य बनाए जाने की मांग कर रहे थे। लेकिन इसका मतलब यह नहीं हुआ कि यूक्रेन, यूरोपीय संघ का सदस्य बन गया। यूक्रेन, अमेरिका और उसके यूरोपीय मित्रों का एक सामरिक ठिकाना बन चुका है, यही आज का सच है। क्रीमिया को भारत ने रूस का हिस्सा मानने की शीघ्रता क्यों की, इसकी समीक्षा की आवश्यकता है, जबकि पांच दिन बाद शुक्रवार को रूसी संसद ने क्रीमिया पर मान्यता की मुहर लगाई है।

एक सवाल यह भी है कि क्रीमिया में रहने वाले तेरह प्रतिशत तुर्क मुसलमान, जिन्हें हम तातार के नाम से जानते हैं, उनके भविष्य का क्या होगा? तातार पहले से ही रूसियों के भरोसे के लोग नहीं रहे हैं, इसलिए उन्होंने रविवार वाले मत संग्रह का बहिष्कार किया था। संभव है कि सीमापार यूक्रेन से इन्हें जिहाद के लिए उकसाया जाए, और उसे ‘अमेरिकी क्लब’ का समर्थन मिले। सीआइए लंबे समय से तातार नेताओं का इस्तेमाल अपने हितों के लिए कर रही थी। लेकिन इस पूरे प्रकरण में सीआइए की बुरी तरह से शिकस्त हुई है। 19 मार्च को अमेरिकी संसद की खुफिया मामलों की समिति ने सीआइए के निदेशक जॉन ब्रेंनन की अच्छी खबर ली है। सीआइए के निदेशक ने माना कि अमेरिका का मिशन क्रीमिया में नाकाम हुआ है। जॉन ब्रेंनन ने स्वीकार किया कि साल भर से सीआइए को दक्षिणी यूक्रेन के क्रीमिया क्षेत्र की गतिविधियों पर नजर रखने और जानकारी जुटाने के काम पर लगाया गया था। यह हास्यास्पद है कि सीआइए ने अमेरिकी कांग्रेस को पिछले दिनों सुनिश्चित किया था कि रूस, यूक्रेन के क्रीमिया वाले हिस्से को कब्जे में नहीं लेगा।

अमेरिकी संसद की खुफिया मामलों की समिति के अध्यक्ष माइक रोजर ने इसकी जांच का आदेश दिया है कि आखिर किस बिना पर सीआइए ने ऐसी गलत सूचना दी थी कि कुछ नहीं होने वाला, जबकि क्रीमिया की सीमा और काला सागर पर रूसी सैनिकों का जमावड़ा बढ़ता जा रहा था। ऑफिस ऑफ द डायरेक्टर ऑफ नेशनल इंटैलिजेंस (ओडीएनआइ) ने यह सूचना क्रीमिया पर कब्जे के तीन दिन पहले शुक्रवार को अमेरिकी कांग्रेस के सदस्यों से साझा की थी। इसका मतलब यही निकाला जा रहा है कि अमेरिकी खुफिया एजेंसियां वर्चस्व की लड़ाई में एक-दूसरे को काट रही थीं। बहुत संभव है कि ऐसी शर्मनाक गलती के लिए सीआइए के निदेशक जॉन ब्रेंनन नप जाएं। क्रीमिया कांड में अमेरिकी खुफिया व्यवस्था की भद पिटी है, यह ओबामा की जन्नत की हकीकत है।

 

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