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पुस्तकायन : संबंधों की रागात्मक बुनावट PDF Print E-mail
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Sunday, 23 March 2014 11:49

ओम निश्चल

जनसत्ता 23 मार्च, 2014 : पवन करण स्त्री-पुरुष के जटिल संबंधों और समाज के मनोविज्ञान को अपनी कविता के केंद्र में बिठा लेने वाले कवियों में हैं। कोट के बाजू पर बटन संग्रह उनके इस कौशल की गवाही देता है। आज कविता अपनी संक्षिप्ति, सारग्राहिता और उद्धरणीयता के उलट जिस आख्यानपरकता या वृत्तांतमयता में घटित हो रही है, उसे अंजाम देने वाले कवियों में पवन करण अग्रणी हैं। ऐसी कविताएं भाषा या शिल्प में नहीं, घटना की विश्लेषणात्मक किस्सागोई में घटित होती हैं, मानो वे समाज की नब्ज टटोल रहे हों। उनकी कविताएं बताती हैं कि समाज किस दिशा में जा रहा है, लड़के-लड़कियां प्रेम के कौन से नुस्खे आजमा रहे हैं, किन-किन धोखादेह स्थितियों से आज की स्त्रियां गुजर रही हैं या संबंधों से संवेदना की सच्चाई आज कैसे मुंह मोड़ चुकी है।

पवन करण इस संग्रह में फिर अपनी सुपरिचित राह पर चलते दिखाई देते हैं। स्त्री की चेतना को लगभग आधिकारिक समझ और संवेदना के साथ कविताओं में उपस्थित करने वाले पवन करण की एक कविता पर स्त्रीविरोधी संवेदना का अभियोग भी लगाया गया है। पर कविता की अपनी आचार संहिता कुछ अलग होती है। उसके पाठ भी अलग-अलग हो सकते हैं। आज के उभरते स्त्रीवादी समाजों में जहां स्त्री अपने अधिकारों को लेकर सजग हुई है, वह उपभोग के किसी भी पुरुषवादी आशय का विरोध करती है। लिहाजा, यह वर्जनाओं से घिरे समाज में कविता के लिए निहित आचार संहिताओं से पार जाने का दुस्साहस भी है।

इन कविताओं के बारे में कहा गया है कि ‘भले ही तकनॉलाजी और मैनेजमेंट के प्रशिक्षण ने बहुत जगहों पर आदमी को ही हाशिये पर सरका दिया हो, पर मध्यवर्गीय भद्रलोक की वर्जनाओं से भिड़ंत की धमक वाली ये कविताएं पाठक के संवेदनतंत्र में कुछ अलग प्रकार से हलचल पैदा करती हैं, क्योंकि भारतीय समाज अभी अपना नग्न फोटो सेशन कराने को उत्सुक प्रेमिका और बेटी के बीच पिता के प्यार के अंतर और विवाह की तैयारी करती प्रेमिका से पति की आंतरिकता को जानने को उत्सुक आहत प्रेमी को अपने संस्कारों के बीच जगह नहीं दे पाया है।’ कहना यह कि पवन करण की कविता पहली ही मुठभेड़ में हमारे जड़ीभूत संस्कारों को झटका देती है कि यह क्या, पर वह समाज की नग्नता से अधिक कविता की ही नग्नता प्रतीत होती है।

पवन करण भाषा और शिल्प के नहीं, कथ्य के कवि हैं। उनकी कविताओं का अपना समाजशास्त्र और मनोविज्ञान है। उनकी कविताओं में समाजशास्त्र और मनोविज्ञान की घुसपैठ दिखती है। वे स्त्री और पुरुष के संबंधों को एक सामाजिक परिघटना के रूप में देखते हैं, बेशक इस प्रक्रिया में वे ऐसे समाज की प्रवृत्तियों को अपनी कविता के दर्पण में उतारने का दावा करते प्रतीत होते हैं, जो अभी या तो अत्यंत विरल या कल्पनातीत हैं। ‘स्त्री मेरे भीतर’ की सफलता से अभिभूत उनका कवि स्त्री-विवेचन का दामन छोड़ना नहीं चाहता। वह अभी तक उनके यहां अपने उसी फार्म में मौजूद है- कभी प्रेमिका, कभी बेटी, कभी भाभी, कभी पत्नी कभी बुआ और कभी छिनाल के रूप में।

जिस समाज में अब भी प्रेम को एक समस्या या विकृति माना जाता हो, यौनिकता पर चर्चा को भद्रलोक की रुचियों के विरुद्ध, उस समाज की आदतों में दबी-छिपी विकृतियों-व्याधियों को चिह्नित करने का जोखिम कविता में सरल नहीं है। यह समाज भी ऊपरी चाकचिक्य से परिचालित है। इसके अंत:करण में व्याप्त कचरे की अभी जैसे सदियों से सफाई नहीं हुई है। हमारी सभ्यता का एक बड़ा कवि यही करता है जैसा मुक्तिबोध ने किया था, निराला ने किया, धूमिल ने किया, कुंवर नारायण और केदारनाथ सिंह कर रहे हैं, ज्ञानेंद्रपति और अरुण कमल कर रहे हैं। पवन करण अपनी क्षमताओं में कितना सफल होते हैं, यह बात दीगर है, पर ऐसा करने का बीड़ा तो वे उठाते ही हैं। कहीं-कहीं उनमें असहज प्रयोग भी दिखते हैं, जब वे पिटाई प्रसंग में पिता की पिटाई की ‘तिलमिलाहट’ को ‘पिटाई का स्वाद’ कह कर अभिहित करते हैं।

पवन करण की कविता की प्रकृति लंबी कविताओं की है। वे एक आख्यान के सहारे कविता की रचना करते हैं। छोटी कविताओं में उनका जादू वैसा नहीं चलता जैसा लंबी कविताओं में। लंबी कविता के प्रारूप


में ही उनकी कविताई का रंग खिलता है। इसी संग्रह में दो दर्जन से ज्यादा ऐसी कविताएं हैं। उनमें भी वे कविताएं, जहां वे इस समाज में स्त्री-पुरुष संबंधों की पड़ताल करते हैं। वे इसी समाज से एक पिता की खोज करते हैं, जो अपनी बिटिया जैसी उम्र की स्त्री के प्रेम में गिरफ्तार है, जिसकी वजह से बेटी को अपने पिता में एक पुरुष नजर आता है तो उसकी मां के चेहरे पर तनाव का एक स्थायी भाव। (वह अब मुझसे भी डरने लगी है)

एक दूसरी कविता ‘क्या मैं तुम्हें बदला हुआ-सा नहीं लगा’ में प्रेमिका से पत्नी बनी स्त्री से स्वगत संवाद है। इसमें कविता कहां है, यह तो नहीं कहा जा सकता, पर हां, एक ऐसा साधारणीकरण जरूर दिख सकता है कि जिसमें तमाम पतियों की सूरतें दिखें। ‘बड़ी बुआ’ भी लगभग वैसी ही कविता है, ऐसी बुआओं पर आमतौर पर कहानियां मिल जाती हैं। प्रेम किया, छली गर्इं, ब्याही गर्इं, विधवा हुर्इं और जीवन निरर्थक गुजर गया। पवन करण की कविताओं में संवेदना की जामा तलाशी लेने पर अक्सर खाली हाथ लौटना पड़ता है। पर कभी-कभी उनकी आंखों की कोर गीली भी दिखती है, मसलन, ‘छिनाल’, ‘जिसे वह अपने विस्तार की तरह आई देखती’, ‘अपने विवाह की तैयारी करती प्रेमिका’, ‘उस भले आदमी के पास मैं अपना समय छोड़ आई हूं’ जैसी कविताओं में, जहां लगता है कि कवि खुद ऐसी स्थितियों से गुजरा है।

पर ऐसी कविताएं भी यहां हैं जैसे ‘मैं जानती हूं वह मुझसे क्या जानना चाहता है’ में पुरुष के सहज कौतूहल का चित्र खींचा गया है, जो अपनी प्रेमिका के विवाह के बाद उसके दांपत्य के बारे में सुनना-जानना चाहता है- अपने पौरुषेय भाव को जीते हुए। ऐसी कविताओं में पवन करण को महारत है। वे एक संशयी पुरुष का मनोविज्ञान पढ़ते हैं।

ऐसी कविताओं से अलग भी कुछ कविताएं हैं, जो पवन करण के वैविध्य का परिचय देती हैं, मसलन ‘बाजार’। बाजार लूट के लिए गला काटने के लिए उकसाता है, वह उस शख्स का स्वागत करता है, जिसकी जेबें भरी हों, चाहे नोट खून से लिथड़े ही क्यों न हों। इसी तरह ‘सीवर लाइन’ कविता उस आदमी का कातर चित्र खींचती है, जो सीवर लाइन में काम करने उतरता तो है, पर वापस नहीं लौटता। अंतरजातीय विवाह के लिए अब भी समाज अग्रसर नहीं हुआ है। उसकी चेतना पर आज भी नफरत और निषेध की धूल अंटी पड़ी है। पवन समाज के इस संकरे विवेक पर तमाचा मारते हैं और उस मां से अपनी कोखजायी बेटी के बारे में चंद सवाल करते हैं, जिसने अपनी पसंद से एक विजातीय दलित से शादी रचा ली है; फलस्वरूप, समाज के तानों से अपमानित होकर उसके बेटे ने खुदकुशी कर ली है। कवि हाशिये में ठिठके उस आदमी की आवाज को अनदेखा नहीं करता, जो अब भी यही बुदबुदा रहा है: ‘पिछली सदी की तरह/ नहीं होगी मेरी कोई आवाज/ अगली सदी में भी/ हाथों में कुछ जूते/ और मुंहों पर कई गालियां/ मेरे लिए वहां भी होंगी तैयार।’ (अगली सदी में)

‘कोट के बाजू पर बटन’ में कुछ और भी कविताएं हैं, जो पवन करण के कविता-विवेक पर अपनी मुहर दर्ज कराती हैं। जैसे, ‘पेशी से वापस लौटते हुए कैदी’, ‘गाय हमारी माता है’, ‘प्रधानमंत्री के कमांडो’ और ‘अमेरिका के राष्ट्रपति होने के मजे’ कविताओं में उनके कुछ प्रेक्षण; पर उन्हें पढ़ते हुए अब लगने लगा है कि वे अपने ही कथ्य और अंदाजेबयां के ‘सेचुरेशन पाइंट’ पर पहुंच चुके हैं। अन्यथा ‘प्रधानमंत्री के कमांडो’ कविता में प्रधानमंत्री के नाड़े खोलने और कमांडो की पेशाब के जमीन पर नाचने’ जैसे चित्रण की भला क्या जरूरत! कुछ मिलते-जुलते नुस्खे उनकी कविताओं में बार-बार आते हैं, जिन्हें वे पहले ही ‘स्त्री मेरे भीतर’, ‘अस्पताल के बाहर टेलीफोन’ और ‘कहना नहीं आता’ में आजमा चुके हैं।

कोट के बाजू पर बटन: पवन करण; राधाकृष्ण प्रकाशन, 7/31 अंसारी रोड, दरियागंज, नई दिल्ली; 250 रुपए।

 

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