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अभिमन्यु नहीं, अर्जुन चाहिए PDF Print E-mail
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Friday, 21 March 2014 12:02

विकास नारायण राय

जनसत्ता 21 मार्च, 2014 : ताज्जुब नहीं कि क्रोनी कैपिटल के चक्रव्यूह में घुस कर ताल ठोंकने पर

आमादा अरविंद केजरीवाल की तस्वीर घिरे हुए अभिमन्यु वाली लगती है। सत्ता और पूंजी के याराने के निशाने पर, मुकाबले में डटे एक जुनूनी की! वह भी बिना किसी परिपक्व संगठन या विश्वसनीय अनुभव की मदद के! पर जैसे अभिमन्यु की आत्मघाती सरफरोशी ने पौराणिक महाभारत को खालिस सामरिक पैंतरेबाजी की उठापटक से अलग एक नैतिक आयाम प्रदान कर दिया था, ‘आप’ का भ्रष्टाचार मिटाने का जुनून 2014 के चुनावों को सत्ता हथियाने के आम राजनीतिक पैंतरों से इतर एक जवाबदेह रणभूमि में बदल रहा है।

 

हालांकि ‘आप’ को इस ‘महाभारत’ में एक अर्जुन भी चाहिए, बेरोकटोक भ्रष्टाचार के विरुद्ध उनके चुनावी अभियान में अभिमन्यु ही रह-रह कर लक्षित होता है। संग्राम में पार्टी के सेनापति अरविंद की भंगिमा अपने घोषित नायक भगत सिंह जैसी दिखती है- देश-सेवा में जान की बाजी तक लगाने वाली। आज उनका यही तल्ख उतावलापन, जो ‘आप’ की मुहिम की प्रमुख पहचान बन गया है, पारंपरिक चुनावबाजों के निशाने पर है। हालांकि राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों की लफ्फाजियों के बीच अरविंद की अलग तरह की जनपक्षधर विश्वसनीयता भी है, पर कौन नहीं जानता कि महाभारत जीतने के लिए अभिमन्यु नहीं, अर्जुन चाहिए।

तो भी, सारे महाभारत में अभिमन्यु जैसा कोई दूसरा जुनूनी नायक नहीं हुआ। भारतीय मानस में अभिमन्यु के मासूम उत्सर्ग की परंपरा ऐसी गहरी पैठी हुई है कि हर काल में कोई न कोई अभिमन्यु देशवासियों का प्रेरणास्रोत बन कर उभरता रहा है। स्वतंत्रता संग्राम के दौर का कालजयी नायक भगत सिंह भी अभिमन्यु सरीखा ही था। उसका बलिदान भी मुक्तिगाथाओं का अमिट हिस्सा बन चुका है। हालांकि उसका फांसी चढ़ना औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध सशस्त्र संगठित प्रतिरोध की अंतिम घड़ियां ही साबित हुआ, पर अभिमन्यु की शहादत की तरह, इससे दौर का अन्याय और अनाचार भरपूर बेपर्दा हुआ।

क्या गांधी जैसे महानायक के रहते भगत सिंह भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का अर्जुन बन सकते थे? बेशक उनके विचारों और उनकी संगठन-क्षमता में यह संभावना भी निहित थी। पर वह महाभारत ही क्या, जिसमें अभिमन्यु न हो और उसकी बलि न चढ़े! राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन के तब के वृत्तांत बताते हैं कि भगत सिंह ने साम्राज्यवादी शासन के एक ऐसे चक्रव्यूह में घुस कर धमाका करने का निर्णय समझ-बूझ कर किया था, जिसका कोई सुरक्षित निकास नहीं था। उन्होंने खुद की शहादत को भारतीय क्रांति की मशाल के रूप में देखा, और उनका यही रूप भारतीय जन-मानस में आज तक रचा-बसा चला आ रहा है। पर क्या गुलामी के जुए से देश की मुक्ति के संघर्ष के उस मोड़ पर भगत सिंह की रणनीति का अर्जुनी-कौशल से युक्त होना कहीं ज्यादा संगत नहीं रहा होता?

इतिहास में हमेशा वही नहीं होता, जो होना चाहिए। पर इतिहास बंद गली नहीं है। उसका सबक, संभावनाओं का भी सबक है। जरूरी नहीं कि केजरीवाल-दौर का हश्र अभिमन्यु की चक्रव्यूह नियति सरीखा हो या कसक-भरे भारतीय इतिहास के उस पन्ने जैसा, जिस पर भगत सिंह की शहादत लिखी गई। विशेषकर, जब ‘आप’ के राजनीतिक प्रयोगों में महती अर्जुन-संभावनाएं छिपी हुई हैं। तो भी, महाभारत में उतरने से पहले जैसे अर्जुन ने अपने सारे संशय दूर कर लिए थे, वही बात अरविंद केजरीवाल को लेकर, उनके उनचास दिन के दिल्ली के शासन के लिए नहीं कही जा सकती; न ही ‘आप’ के मौजूदा चुनाव अभियान में आश्वस्त कर सकने वाली ऐसी बानगी की पुख्ता जमीन ही दिखाई देती है। दरअसल, वे महाभारत में तो उतर गए हैं, पर उनकी ‘गीता’ अभी प्रकाश में आनी है।

याद रखना जरूरी है कि पौराणिक महाभारत में हार-जीत चक्रव्यूह के सीमित दायरे में नहीं, व्यापक रणक्षेत्र में हुई थी। इस लिहाज से देखें तो दिल्ली के उन उनचास दिनों के ‘आप’ के शासनकाल में भी कितने ही अर्जुनी क्षण आए और गंवाए गए! उदाहरण के लिए इनमें से दो का उल्लेख किया जा सकता है, जिन्हें आज पछतावे से ही याद किया जाएगा। एक था, अंबानी-मोइली आपराधिक षड्यंत्र के मामले में केजरीवाल सरकार द्वारा दर्ज किए मुकदमे को तार्किक परिणति तक ले जाने, यानी पूंजी और शासन के भ्रष्ट याराने को निर्णायक तौर से भेदने के राजनीतिक निश्चय के प्रदर्शन का अवसर।

केजरीवाल सरकार के एंटी-करप्शन ब्यूरो द्वारा दर्ज प्रथम सूचना रिपोर्ट (एफआइआर) के अनुसार एक षड्यंत्र के तहत, देश की जनता को तगड़ा चूना लगाने के लिए, गैस की कीमतें चौगुना बढ़ाई जाने की व्यवस्था की जा रही थी। इसलिए प्रमुख षड्यंत्रकारियों- वीरप्पा मोइली और मुकेश अंबानी की जांच एजेंसी की हिरासत में पूछताछ आवश्यक थी, और लिहाजा, उनकी तुरंत गिरफ्तारी की कार्यवाही की जानी चाहिए थी। पर यह क्षण आया और चला भी गया।

‘आप’ के चुनाव प्रचार में अब ठीक ही भ्रष्टाचार के साथ सांप्रदायिकता के जहर को भी आम आदमी के प्रमुख शत्रु के रूप में चिह्नित कर निशाने पर लिया जा रहा है। पर दिल्ली के मुख्यमंत्री के रूप में केजरीवाल से दूसरी बड़ी चूक इसी मुद्दे पर हुई। उनकी सरकार ने 1984 के सिख-संहार पर तो एसआइटी का गठन कर ‘विशिष्ट’ कांग्रेसी दंगाइयों को भी कानूनी लपेटे में लेने का अपना दृढ़ मन्तव्य दिखा दिया। पर इसी तर्ज पर, मुजफ्फरनगर की प्रायोजित उन्मादी हिंसा के संदर्भ में, भाजपा के चुनाव-केंद्रित


सांप्रदायिक ध्रुवीकरण को छेदने का अवसर भी उनके सामने था, जिसे निकल जाने दिया   गया। उसी समय एक और समांतर एसआइटी गठित की जानी चाहिए थी।

भाजपा का केंद्रीय चुनावी दफ्तर दिल्ली में है, जहां की सहमति से ही, प्रथम-दृष्टया माना जाना चाहिए, सांप्रदायिक विद्वेष फैलाने के षड्यंत्र के तहत, मुजफ्फरनगर दंगों के मुख्य आरोपियों को मोदी के चुनावी-मंचों से महिमामंडित करने को स्वीकृति दी गई होगी। क्या यह भी एक फौरी जांच का विषय नहीं बनना चाहिए था?

महाभारती दांव-पेचों के बीच यह नहीं भूलना चाहिए कि आत्मघात की अनिवार्यता, जितनी चक्रव्यूह के गठन में, उतनी ही अभिमन्यु की नासमझी में भी छिपी है। ‘आप’ ने दिल्ली की अपनी सरकार को, शत्रुओं का सजाया चक्रव्यूह समझ कर अभिमन्यु की मन:स्थिति से चलाया। यह शुरू से ही स्पष्ट था कि कांग्रेस ने उन्हें आत्मघात में लटक जाने के लिए एक लंबी रस्सी पकड़ाई थी। छद्म समर्थन पर टिकी उस सरकार को आज नहीं तो कल जाना ही पड़ता। पर क्या उस अल्प-जीवन को भी एक व्यापक अर्जुनी रणक्षेत्र की भूमिका में नहीं बदला जाना चाहिए था?

इस क्रम में ‘आप’ की सामरिक पूंजी को भी समझना होगा। उसके सदस्यता अभियान, बेदाग उम्मीदवार या पारदर्शी कोष इसका एक अंश मात्र हैं। देश की राजनीति में उसकी उपस्थिति को मीडिया ने नहीं, उन छोटे-बड़े हजारों आंदोलनों और बेनाम सरफरोशों ने गतिवान रखा है, जो दशकों से भारत के कोने-कोने में सामाजिक प्रतिरोधों की अलख बने हुए हैं। ‘आप’ ने आम आदमी की इस लोकतांत्रिक ऊर्जा को एक कामकाजी राजनीतिक मंच दिया है; यही है ‘आप’ की सामरिक पूंजी का अक्षय स्रोत।

क्या अरविंद केजरीवाल में अर्जुन बनने की संभावना है? इस समीकरण को दो टूक शब्दों में यों रखा जा सकता है- क्या उनके नेतृत्व में ‘आप’ की राजनीति को जनता के नजरिए से चलाया जा सकेगा? इतिहास में महत्त्वपूर्ण राजनीतिक क्रांतियां बेशक तारीखों और नायकों के संदर्भ से दर्ज की जाती हों, पर वे अंतत: होती हैं रोजाना घटने वाली छोटी-छोटी असंख्य क्रांतियों का योग ही।

यही है ‘आप’ का अर्जुनी रणक्षेत्र। इसे अंबानियों और मोदियों के बिछाए चक्रव्यूह को तोड़ने तक सीमित नहीं रखा जा सकता है। इस धरातल पर, रास्ते में रोड़े अटकाने वाली शिखंडी जमात- बिकाऊ मीडिया, भ्रष्ट नौकरशाही और दलाल राजनीतिकों- से ही निपटना लक्ष्य नहीं हो सकता। इस रणक्षेत्र में जन-शत्रु व्यवस्था के आयाम चिह्नित करने होंगे और तद्नुसार संहार की रणनीतियां बनानी होंगी। केजरीवाल की सटीक टिप्पणी कि देश में मोदी की नहीं, गुस्से की लहर है, में जनता की मुक्ति-कामना भी प्रतिबिंबित होनी चाहिए।

मसलन, भगत सिंह के क्रांतिकर्म ने देशवासियों को राजनीतिक स्वतंत्रता का बहुआयामी अर्थ, एक नया विचार ‘इंकलाब जिंदाबाद’ के रूप में दिया था। भगत सिंह के साथी विजय कुमार सिन्हा के अनुसार 1928 के एसेंबली बम कांड की मार्फत लोगों तक पहुंचे इस नारे ने तब तक के सर्वप्रचलित ‘वंदे मातरम’ को लोकप्रियता में दूसरे नंबर पर पीछे छोड़ दिया। यानी अब स्वतंत्रता संग्राम के फलक पर औपनिवेशिक आधिपत्य की गुलामी से मुक्ति का परचम फहराना ही पर्याप्त नहीं रह गया, बल्कि मानवीय शोषण के हर हथकंडे के खात्मे का लक्ष्य मुखर हो चला। केजरीवाल ने भी कितनी ही बार दोहराया होगा कि उनकी पार्टी का मकसद चुनाव जीतना नहीं, व्यवस्था परिवर्तन है। ‘स्वराज’ के अपने मॉडल को उन्होंने राजनीतिक ताकत और आर्थिक पहल दोनों को जनता के हाथ में देने के सिद्धांत पर आधारित किया है।

इसके बरक्स, सत्ता प्रतिष्ठानों के नजरिए वाले राजनीतिक दलों के लिए चुनाव ही असली महाभारत है। मतदाता के सामने ‘सुशासन’ की बात करते मोदी और ‘सशक्तीकरण’ का राग अलापते राहुल गांधी ऐसे ही महाभारत के प्रमुख किरदार बने हुए हैं। चुनावी जीत हासिल करने की शातिर कवायद में ‘कांग्रेस-मुक्त भारत’ किसी मोदी का वोट दिलाने वाला विकास-नारा बनने दिया जाता है। इसी तरह ‘आरएसएस रोको’ की धुन बजा कर कोई राहुल गांधी वोटों का लाभदायक ध्रुवीकरण हासिल करने की ठान सकता है। पहली बार, चुनावों के माध्यम से सत्ता का चरित्र तय करने में, ‘आप’ की सक्रियता ने भगत सिंह को मुखरता दी है। हालांकि इस प्रतीकात्मकता से हवा में तैरती अर्जुनी-शंकाएं कम करके नहीं आंकी जानी चाहिए।

गिनाने को ‘आप’ के बड़बोलेपन और भटकाव के भी अनेक प्रसंग गिनाए जा सकते हैं। खुद केजरीवाल ने पार्टी की आशातीत सफलताओं के संदर्भ में कितनी ही बार खुद को ‘एक छोटा-सा आदमी’ कह कर जनता की निर्णायक शक्ति से पार्टी का संतुलन बिठाया है। पर दूसरों की तरह शायद उन्हें भी गुमान न हो कि जनता की धैर्य भरी अपेक्षाएं उन जैसों को नायकत्व की किन ऊंचाइयों तक पहुंचा सकती हैं। देश के आम आदमी को आज अर्जुन चाहिए, अभिमन्यु नहीं। भगत सिंह की शहादत की तिरासीवीं बरसी पर बनारस में ‘आप’ की रैली अंतत: एक और मासूम उत्सर्ग की प्रस्तावना का मंच न सिद्ध हो!

 

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