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विधायिका का दामन PDF Print E-mail
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Thursday, 20 March 2014 11:30

धर्मेंद्रपाल सिंह

जनसत्ता 20 मार्च, 2014 : उच्चतम न्यायालय ने दागी नेताओं को एक और झटका दिया है।

देश की सर्वोच्च अदालत के ताजा आदेश के अनुसार अब दागी सांसदों और विधायकों के खिलाफ आरोपपत्र दाखिल होने के एक साल के भीतर निचली अदालत को फैसला सुनाना पड़ेगा। अगर अदालत नेताजी को दो वर्ष या ज्यादा की सजा सुना देगी तब उनकी संसद या विधानसभा की सदस्यता स्वत: समाप्त हो जाएगी। किसी कारणवश अगर एक वर्ष के भीतर निर्णय नहीं आ पाता है तो संबंधित निचली अदालत को अपने राज्य के उच्च न्यायालय को देरी का कारण स्पष्ट करना पड़ेगा। विशेष परिस्थिति में ही उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश मुकदमा एक वर्ष से अधिक समय तक चलाने की छूट दे सकते हैं।

 

राजनीति में अपराधियों के बढ़ते प्रभाव पर अंकुश लगाने में यह आदेश निर्णायक साबित होगा। पिछले वर्ष जुलाई में सर्वोच्च न्यायालय ने अदालत द्वारा दोषी पाए जाने पर सांसदों और विधायकों की सदस्यता समाप्त करने और सजा पूरी करने के पांच साल बाद तक चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध लगा दिया था। इस आदेश की पहली चोट राष्ट्रीय जनता दल के प्रमुख लालू प्रसाद यादव और कांग्रेस सांसद रशीद मसूद पर पड़ी। दोनों को निचली अदालत दोषी करार दे चुकी है, जिस कारण वे अब आगामी आम चुनाव में खड़े नहीं हो सकते।

पब्लिक इंटरेस्ट फाउंडेशन की याचिका पर सुनवाई में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिए गए उक्त आदेश का असर अगले साल मई से दिखाई पड़ेगा। तब तक अनेक दागी राजनीतिकों के मुकदमों की सुनवाई पूरी हो जाएगी और कई को सजा भी सुना दी जाएगी। आज देश की संसद और विधानसभाओं में ऐसे जनप्रतिनिधियों की भरमार है जिनके खिलाफ गंभीर आपराधिक आरोप हैं। अभी तो दागी राजनीतिकों को अधिकतर दल खुले हाथ से टिकट बांटते हैं। टिकट देते समय प्रत्याशी की जीत की संभावना ही प्रमुख मापदंड होती है।

सन 2004 से अब तक संसद और विधानसभा के चुनावों में खड़े हुए प्रत्याशियों की घोषित औसत संपत्ति 1.37 करोड़ रुपए आंकी गई है। चुनावों में जीतने वाले उम्मीदवारों की औसत संपत्ति तो और भी अधिक (3.83 करोड़ रुपए) है। चुनाव जीतने वाले आपराधिक पृष्ठभूमि के सांसद और विधायक ज्यादा संपन्न हैं। उनकी औसत संपत्ति 4.30 करोड़ रुपए है। चुनावों में दागी सांसदों के जीतने की संभावना भी ज्यादा होती है। तथ्य गवाह हैं कि जिन प्रतिनिधियों के खिलाफ मामले दर्ज हैं उनका विजय प्रतिशत 74 रहा। शायद इसीलिए ‘बाहुबलियों’ को टिकट देने में सभी राजनीतिक दलों में मानो होड़ लगी है। 2004 से अब तक शिवसेना के पचहत्तर, आरजेडी के छियालीस, जद (एकी) के चौवालीस, भाजपा के इकतीस और कांग्रेस के इक्कीस फीसद दागी प्रत्याशी चुनावी समर में विजयी घोषित हुए हैं। इसका अर्थ यह हुआ कि संसद या विधानसभा में प्रवेश के लिए पैसे के साथ-साथ बाहुबल भी जरूरी है।

धनबल और बाहुबल के भरोसे चुनाव जीतने वालों की संपत्ति में इजाफे की रफ्तार आसमान छूने लगी है। आज राजनीति कमाई का सबसे अच्छा जरिया बन गई है। विधायिका में जाने वाले नेताओं की संपत्ति में पांच वर्ष में औसत एक सौ चौंतीस प्रतिशत वृद्धि बड़े-बड़े उद्योगपतियों को चौंकाती है। कुछ मामलों में तो संपत्ति में वृद्धि की दर एक हजार प्रतिशत से ज्यादा देखी गई है। इसीलिए अब समृद्ध व्यापारी और उद्योगपति भी संसद में प्रवेश पाने के लिए हाथ-पैर मारते हैं।

लंबे समय से मांग की जा रही थी कि जिन राजनीतिकों पर हत्या, डकैती, अपहरण, फिरौती और भ्रष्टाचार जैसे गंभीर आरोप हैं और अदालत में जिनके खिलाफ आरोपपत्र दाखिल हो चुका है, उन्हें चुनाव में खड़े होने के अयोग्य करार दे दिया जाए। हाल में विधि आयोग ने अपनी एक रिपोर्ट में इस सुझाव का समर्थन करते हुए कहा है कि सजा के बाद उम्मीदवारी से अयोग्य ठहराने का प्रावधान कारगर नहीं रहा है।

अधिकतर राजनीतिक दल इस प्रस्ताव के सख्त खिलाफ हैं। उनका मत है कि जब तक किसी व्यक्ति पर आरोप सिद्ध न हो जाए, तब तक वह निर्दोष होता है। कानून की मूल अवधारणा भी यही है। अनेक बार व्यक्ति अदालत से बरी हो जाता है। महज आरोपपत्र दाखिल होने के कारण किसी नागरिक के चुनाव लड़ने पर रोक लगाना संविधान की मूल भावना का उल्लंघन ही कहा जाएगा।

हमारी न्याय-व्यवस्था में किसी मुकदमे का फैसला आने में कई बरस लग जाते हैं। अगर आरोपी पैसे वाला और प्रभावशाली है तो नामी वकीलों की मदद से मुकदमा दशकों तक खींचा जा सकता है। चारा घोटाले में लालू यादव के खिलाफ निचली अदालत का आदेश आने में सत्रह बरस लग गए। कानून की इस कमजोरी का फायदा उठा कर आज अपराधी बेखौफ हैं। गंभीर आपराधिक मामलों के अनेक आरोपी राजनीतिक बार-बार चुनाव जीत कर संसद और विधानसभा में पहुंच जाते हैं। कई बार तो वे मंत्री या अन्य संवैधानिक पद भी कब्जा कर लेते हैं। पुलिस और अदालत उनका कुछ नहीं बिगाड़ पाती।

वैसे तो देश के हर नागरिक को शीघ्र और सस्ता न्याय मिलना चाहिए, लेकिन न्यायाधीशों की कमी के कारण आज करोड़ों मामले लंबित पड़े हैं। यूरोपीय देशों में जहां एक लाख की आबादी पर पचास जज हैं वहीं भारत में यह संख्या महज 1.6 है। निचली अदालतों ही नहीं, उच्च और उच्चतम न्यायालय में भी न्यायधीशों के मंजूर पद बरसों से खाली पड़े हैं। दागी नेता इस कमजोरी का फायदा उठाते हैं।

एसोसिएशन ऑफ डेमोक्रेटिक रिफॉर्म के अनुसार वर्तमान लोकसभा के 543 सदस्यों में से एक सौ बासठ (तीस फीसद) दागी हैं। इनमें से छिहत्तर (चौदह प्रतिशत) के खिलाफ हत्या,   डकैती, अपहरण और धन वसूली जैसे


गंभीर मामले दर्ज हैं। देश भर के कुल 4032 विधायकों में से 1258 के खिलाफ आपराधिक मामले लंबित हैं जिनमें से चौदह फीसद पर थानों में गंभीर आपराधिक मामले दर्ज हैं।

दागी जन-प्रतिनिधियों को चुनने के मामले में उत्तर प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र, दिल्ली और झारखंड सबसे आगे हैं। आपराधिक पृष्ठभूमि वालों को टिकट देने में कांग्रेस, भारतीय जनता पार्टी, शिवसेना, समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी, राकांपा, तृणमूल कांग्रेस आदि दलों में तो मानो होड़ लगी है। निचली अदालत में मामले बरसों खिंच जाने के कारण संसद और विधानसभाओं में दागी जन-प्रतिनिधियों की संख्या लगातार बढ़ी है। एक उदाहरण देकर इस बात की पुष्टि की जा सकती है। 2004 में जहां लोकसभा में एक सौ अट््ठाईस दागी सांसद थे, वहीं 2009 में उनकी संख्या बढ़ कर एक सौ बासठ हो गई। अगर आरोपी राजनीतिकों को शीघ्र सजा मिल जाती तो ऐसे लोगों की संख्या बढ़ने का सवाल ही पैदा नहीं होता। अध्ययन से यह भी पता चलता है कि आज दागी जन-प्रतिनिधियों के खिलाफ दर्ज मामलों की औसत अवधि सात वर्ष है। मतलब यह कि वे संसद या विधानसभा का एक कार्यकाल तो आराम से निकाल लेते हैं।

भारतीय जनता पार्टी के रमाकांत यादव पर हत्या का मामला पिछले चौबीस साल से लंबित है। कांग्रेस के गुड््डू प्रेमचंद, तृणमूल के शिशिर कुमार अधिकारी, सपा के रामकिशन, भाजपा के दिलीप कुमार मनसुखलाल गांधी और झारखंड मुक्ति मोर्चा के कमलेश्वर बैठा के खिलाफ दंगे, डकैती, अपहरण जैसे गंभीर आपराधिक मामले दो दशक से ज्यादा समय से फैसले के इंतजार में अटके पड़े हैं। महंगे वकीलों की मदद से दागी राजनीतिक नेता अपने मुकदमे बरसों खिंचवा देते हैं। कई मामलों में तो लंबी सुनवाई के दौरान पीड़ित पक्ष की मृत्यु भी हो जाती है।

सर्वोच्च अदालत का निर्णय लागू हो जाने के बाद आपराधिक पृष्ठभूमि वाले कथित राजनीतिकों के लिए लंबे समय तक बचे रहना कठिन हो जाएगा। एक साल के भीतर फैसला आने का नियम बन जाने से राजनीतिक दल भी दागियों को टिकट देने से कतराएंगे। आज देश भर की अदालतों में सैकड़ों राजनीतिकों के खिलाफ मुकदमे लंबित हैं।

तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जयललिता, कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री येदियुरप्पा, पूर्व संचार मंत्री ए राजा, द्रमुक नेता करुणानिधि की पुत्री कनिमोड़ी, कांग्रेस सांसद सुरेश कलमाड़ी, बसपा नेता मायावती, सपा अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव, हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री ओमप्रकाश चौटाला आदि के खिलाफ भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप हैं और उनके मुकदमे बरसों से घिसट रहे हैं। आशा है इन सभी मामलों में अब शीघ्र निर्णय आ जाएगा। इससे राजनीति को दागी नेताओं की काली छाया से बचाने के संकल्प को सहारा मिलेगा। साथ ही कानून-व्यवस्था पर आम आदमी का विश्वास बहाल होगा।

सर्वोच्च न्यायालय के ताजा फैसले का दूसरा आयाम भी है। बहुत-से राजनीतिक आरोपितों की शिकायत रहती है कि उन्हें सियासी बदले की भावना से झूठे मामलों में फंसाया गया है। यों तो फर्जी मामले में फंसाया जाना किसी के लिए भी यंत्रणादायक होता है, इससे उसकी प्रतिष्ठा-हानि भी होती है। जो सार्वजनिक जीवन में हों, उनके लिए यह और बुरा साबित होता होगा। अगर शीघ्र फैसला आए तो जिन्हें सचमुच अपनी निर्दोषिता का भरोसा है उन्हें राहत मिलेगी। पर दूसरी ओर, मुकदमे का जल्दी निपटारा राजनीति का बाना पहने अपराधियों के लिए लटकती तलवार है।

चुनाव सुधार के लिए 1990 में गोस्वामी समिति ने कुछ महत्त्वपूर्ण सुझाव दिए थे। इसके बाद वोहरा समिति (1993) और सरकार द्वारा चुनाव खर्च उठाए जाने के बारे में इंद्रजीत गुप्त समिति (1998) की सिफारिशें आर्इं, लेकिन सभी सुझाव ठंडे बस्ते में डाल दिए गए। परिणाम सामने है। आज हमारी चुनाव प्रणाली पर धनबल और बाहुबल का शिकंजा कसा जा चुका है। चुनाव आयोग ने 2010 में सभी प्रत्याशियों के चुनावी खर्च की निगरानी के लिए एक विभाग गठित किया था। इस विभाग के उड़नदस्तों ने पिछले तीन बरस में चुनाव के दौरान छापे मार कर एक सौ पचास करोड़ रुपए से ज्यादा का कालाधन पकड़ा है। करोड़ों रुपए की शराब भी बरामद की गई। जानकारों का कहना है कि आयोग ने जितना जब्त किया, उससे हजारों गुना ज्यादा शराब और कालाधन कानून की नजर से बच गए।

सर्वोच्च अदालत के इस निर्णय से दागी नेताओं को संसद और विधानसभाओं से पूरी तरह बाहर करने में कामयाबी नहीं मिल पाएगी। आदेश के अनुसार आरोपपत्र दाखिल होने के एक साल के भीतर निचली अदालत को फैसला सुनाना होगा, लेकिन आदेश में आरोपपत्र दाखिल करने की समय सीमा निर्धारित नहीं की गई है।

प्रभावशाली नेताओं के मामले में पुलिस अक्सर आरोपपत्र दाखिल करने में ही लंबा समय लगा देती है। कई बार आरोपपत्र तैयार होने के बावजूद पुलिस को उसे दाखिल करने की अनुमति नहीं दी जाती। महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण के खिलाफ आदर्श सोसाइटी घोटाले में ऐसा ही हुआ। राज्यपाल ने मुकदमा चलाने की अनुमति नहीं दी। दागियों की राजनीति से पूरी तरह सफाई के लिए ऐसी कमजोरियों का समाधान खोजा जाना जरूरी है। अदालत की पहल पर सफाई अभियान शुरू हो चुका है। आशा है बची-खुची कमजोरियां भी शीघ्र दूर कर ली जाएंगी।

 

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