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जंगल के असल दावेदार PDF Print E-mail
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Wednesday, 19 March 2014 11:43

विनय सुल्तान

जनसत्ता 19 मार्च, 2014 : पिछले साल की दो घटनाएं इस देश में जल, जंगल और जमीन की तमाम लड़ाइयों पर

लंबा और गहरा असर छोड़ेंगी। पहली घटना दिल्ली से दो हजार किलोमीटर की दूरी पर स्थित नियमगिरि की है। यहां ग्रामसभाओं ने एक सुर में अपनी जमीन ‘वेदांता’ के हवाले करने से इनकार कर दिया। इसके बाद वेदांता कंपनी को नियमगिरि छोड़ना पड़ा। नियमगिरि जल, जंगल और जमीन की लड़ाई लड़ रहे लोगों के लिए एक मॉडल बन गया है। इस घटना के बाद लोगों को पहली बार विश्वास हुआ कि कॉरपोरेट घरानों के साथ उनकी सीधी लड़ाई विजयी मोड़ तक भी पहुंच सकती है।

 

साल बीतते-बीतते दूसरी बड़ी घटना हुई चौबीस दिसंबर को, जब वीरप्पा मोइली को पेट्रोलियम के साथ-साथ पर्यावरण मंत्रालय भी सौंपा दिया गया। इसके परिणाम को हम इस तथ्य से अच्छी तरह समझ सकते हैं कि माननीय मंत्री ने अपने कार्यकाल के शुरुआती तीन हफ्तों में सत्तर परियोजनाओं को मंजूरी दे दी। डेढ़ लाख करोड़ वाली इन परियोजनाओं में पोस्को इस्पात संयंत्र (ओड़िशा), विजनीनाम ट्रांसशिपमेंट टर्मिनल (तिरुवनंतपुरम) और महान कोयला खदानें (मध्यप्रदेश) शामिल हैं। इतना ही नहीं, उन्होंने वन संरक्षण कानून, 2009 में संशोधन का प्रस्ताव भी दिया, जिससे वनभूमि को आसानी से कॉरपोरेट के हाथ में सौंपा जा सके। इसके अलावा पर्यावरण मंत्रालय विभिन्न राज्यों के इकसठ कोयला-क्षेत्रों पर फिर से विचार कर रहा है। ये परियोजनाएं दूसरे चरण की पर्यावरणीय मंजूरी न मिलने के चलते रुकी हुई हैं।

इस बीच लोकसभा चुनाव के कारण कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी विभिन्न तबकोंके लोगों के साथ नुक्कड़ सभाएं करते हुए उनके मुद््दों को अपनी पार्टी के घोषणापत्र का हिस्सा बनाने की कवायद कर रहे हैं। इसी सिलसिले में वे फरवरी में झारखंड के दो दिन के दौरे पर थे। रांची में उन्होंने एक पांचसितारा होटल के बगीचे में आदिवासी महिलाओं से बातचीत की। बातचीत के दौरान राहुल ने राज्य सरकारों से वनाधिकार कानून को सख्ती से अमल में लाने की गुजारिश की, जबकि दूसरी तरफ उनकी ही सरकार का मंत्री वनाधिकार कानून की धज्जियां उड़ाने में लगा हुआ है। ये बातें समझने के लिए ज्यादा दिमागी कसरत की जरूरत नहीं है कि वर्तमान सरकार की प्रतिबद्धताएं क्या हैं और ये किस ओर जा रही हैं।

मध्यप्रदेश के सिंगरौली जिले में पड़ने वाले महान के जंगल एशिया के सबसे पुराने और घने साल जंगलों में शुमार हैं। यूपीए-एक के दौर में 2006 में शिबू सोरेन के अधीन कोयला मंत्रालय ने इस कोयला क्षेत्र का आबंटन किया था। यह आबंटन गया था लंदन की कंपनी एस्सार और हिंडाल्को के पक्ष में। परियोजना का उद्देश्य एस्सार के प्रस्तावित बारह सौ मेगावाट और हिंडाल्को के साढ़े छह सौ मेगावाट बिजली संयंत्रों के लिए कोयले की आपूर्ति करना था। दोनों कंपनियों ने मिलकर बीस हजार करोड़ की लागत से एक उपक्रम ‘महान कॉल लिमिटेड’ बनाया।

दिसंबर 2008 में वन एवं पर्यावरण मंत्रालय ने महान कोयला परियोजना को पर्यावरणीय प्रभाव आकलन अधिसूचना 2006 के तहत मंजूरी भी दे दी। इसके बाद पर्यावरण मंत्रालय और केंद्रीय खदान आयोजन एवं विकास संस्थान (सीएमपीडीआइएल) ने फरवरी 2010 में अपनी संयुक्त कवायद के बाद इसे ‘प्रवेश निषेध क्षेत्र (नो गो जोन)’ के रूप में चिह्नित किया। तब के पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने महान कोयला क्षेत्र की बाबत लिखे आधिकारिक नोट में कहा, ‘इस कोयला ब्लॉक में खनन की अनुमति दिए जाने से अन्य खंडों में भी खनन की इजाजत दिए जाने के रास्ते खुल जाएंगे। यह मात्रा और गुणवत्ता दोनों के लिहाज से बेहद समृद्ध वनाच्छादित क्षेत्र को तबाह कर डालेगा।’ हालांकि वर्ष 2008-2009 में चार बार समीक्षा किए जाने और 2011 में मध्यप्रदेश का दौरा करने के बाद पर्यावरण मंत्रालय की सलाहकार समिति ने इस परियोजना को नामंजूर कर दिया था।

अगर इस परियोजना पर काम शुरू हो जाता है तो ग्यारह हजार हेक्टेयर में बसे चौदह गांव तबाह हो जाएंगे। इसके अलावा अन्य चालीस गांवों पर आजीविका का संकट खड़ा हो जाएगा। इन चौवन गांवों में बयासी हजार की आबादी रहती है, जिनमें बड़ी तादाद दलितों और आदिवासियों की है। विस्थापन महान-निवासियों के लिए कोई नई चीज नहीं हैं। सन 1962 में यहां रिहंद बांध बना था। उस समय तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने यहां के लोगों से वादा किया था कि वे सिंगरौली को स्विट्जरलैंड बना देंगे। आजादी के साढ़े छह दशक बाद अब मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान सिंगरौली को सिंगापुर बनाने का वादा कर जमीन छोड़ने की अपील कर रहे हैं। सिंगरौली के स्विट्जरलैंड से सिंगापुर बनाने की इस यात्रा में कई परिवार विस्थापित हुए। कई परिवार तो ऐसे हैं जो पांचवीं बार विस्थापन की मार झेल रहे हैं। परियोजना दर परियोजना उन्हें स्विट्जरलैंड, सिंगापुर, हांगकांग के सब्जबाग के साथ उनकी जमीन से बेदखल किया जाता रहा। आदिवासी और दलित समुदाय हर बार इसका निशाना बनते रहे हैं।

जनजातीय मामलों के मंत्री वी किशोर देव ने पिछले साल जून में मध्यप्रदेश के तत्कालीन राज्यपाल को लिखे पत्र में कहा ‘मोटे तौर पर देखें तो सिंगरौली जिले में बड़ी मात्रा में वनभूमि को गैर वन-उद्देश्यों के लिए परिवर्तित किया जा रहा है, लेकिन एक भी जगह सामुदायिक वनाधिकार प्रदान नहीं किया गया। प्रभावित होने वाली जनजातियों और क्षेत्र के सीमांत वर्गों के कड़े प्रतिरोध के बावजूद महान कोल लिमिटेड को वन तथा खनन की स्वीकृति दे दी गई।’

वनाधिकार कानून के 2009 में जारी परिपत्र के अनुसार, मंत्रालय द्वारा स्वीकृति दिए जाने से पहले ग्रामसभाओं की सहमति जरूरी है। सिंगरौली में नियमगिरि को दोहराए जाने के डर से ग्रामसभाओं में बैठे कंपनी के आदमियों ने


फर्जी प्रस्ताव सरकार को सौंप दिए। पिछले साल मार्च के ऐसे ही एक प्रस्ताव को ‘सूचनाधिकार’ के तहत हासिल करने से यह धोखाधड़ी उजगार हुई। लगभग दो सौ लोगों की उपस्थिति वाली ग्रामसभा में ग्यारह सौ लोगों की उपस्थिति बताई गई। इसके प्रस्ताव में छेड़खानी की गई और हस्ताक्षर करने वाले कई ऐसे भी लोगों के नाम थे, जो दिवंगत हो चुके हैं।

जब आदमजात के रहने का ठिकाना न हो तो जंगल के जानवर भी विमर्श का हिस्सा बनने का हक खो देते हैं। महान साल के सबसे पुराने जंगलों में से एक है। सरकारी आंकड़ों के हिसाब से 1182 हेक्टेयर के इस जंगल में सकल वनाच्छादन चौरानवे फीसद है। साल, साजा, महुआ, तेंदू सहित यहां एक सौ चौंसठ किस्म की पादप प्रजातियां पाई जाती हैं। इसके अलावा तेंदुआ, भालू, लकड़बग्घा, चिंकारा, चौसिंगा जैसे जानवरों का भी यहा बसेरा है। लुप्त होने के कगार पर खड़े गिद्धों के लिए यह सबसे सुरक्षित पर्यावासों में से एक है। ग्लोबल रजिस्टर आॅफ माइग्रेटरी स्पेशीज की मानें तो यह जंगल 102 प्रवासी प्रजातियों की सैरगाह है।

इस परियोजना के शुरू होने से 12,780 पेड़ों की बलि चढ़ना तय है। इससे न सिर्फ रिहंद जलाशय की विभाजक रेखा गड़बड़ा जाएगी बल्कि वन्यजीव पर्यावासों को उत्तर से दक्षिण तक जोड़ने वाला महत्त्वपूर्ण गलियारा भी तबाह हो जाएगा।

सवाल महान जंगलों तक सीमित नहीं है। तेरह राज्यों में जमीन के अधिग्रहण के खिलाफ जोरदार आंदोलन चल रहे हैं। भूमि अधिग्रहण पर 1894 में बने पहले कानून में यह साफ था कि गैर-सरकारी उपक्रमों के लिए जमीन का अधिग्रहण नहीं किया जाएगा। भारतीय शासक वर्ग ने आजादी के बाद इस कानून को बार-बार बदल कर लोगों को उनकी जमीन से बेदखल करना जारी रखा। 1984 में हुए संशोधन के बाद सरकार को निजी कंपनियों के लिए भूमि अधिग्रहण करने का अधिकार हासिल हो गया। आजादी के बाद से लगभग डेढ़ लाख वर्ग किलोमीटर भूमि का अधिग्रहण किया गया, जो कि बांग्लादेश के क्षेत्रफल के बराबर है। इस प्रक्रिया के तहत लगभग दस करोड़ लोग बेघर हुए।

सन 1960 के बाद विस्थापन के जितने आंकड़े उपलब्ध हैं उनसे पता चलता है कि इस देश में विकास की सबसे ज्यादा कीमत आदिवासियों ने ही चुकाई है। कुल विस्थापितों का पैंतालीस फीसद हिस्सा आदिवासियों का है।

अरुंधति राय इस त्रासदी को बयान करते हुए कहती हैं, ‘लाखों-लाख विस्थापितों का अब कोई वजूद नहीं है। जब इतिहास लिखा जाता है, वे इसमें नहीं होते। आंकड़ों में भी नहीं। उनमें से कुछ लगातार तीन बार और चार बार विस्थापित हुए हैं। कभी बांध के लिए, यूरेनियम की खान के लिए, बिजली परियोजना के लिए वे विस्थापित होते रहे हैं। एक बार वे लुढ़कना शुरू करते हैं तो फिर रुकने की कोई जगह नहीं होती। इनमें से बहुत बड़ी संख्या आखिरकार हमारे बड़े शहरों की परिधि में मौजूद झोपड़पट्टियों में खप जाती है, जहां यह सस्ते निर्माण मजदूरों की बहुत बड़ी भीड़ में बदल जाती है (जो और ज्यादा परियोजनाओं पर कार्य करती है जिससे और ज्यादा लोग बेदखल होते हैं)।’

चित्र में ही सही, पर आपने आदिवासियों को अपने सिर पर लकड़ी ढोते देखा होगा। आदिवासियों का जंगल से किस किस्म का साहचर्य है उसे समझने के लिए यही काफी है। हजारों सालों से जंगलों के बचे रहने का यही राज है कि आदिवासी समाज ने लकड़ियां सिर पर ढोई हैं और हम उन्हें ट्रकों पर लादने पर आमादा हैं। महान के बाशिंदे रामनारायण साहू जंगल और लोगों के बीच के संबंध को इस तरह बयान करते हैं, ‘सदियों से हम जंगल पर अपनी जीविका के लिए निर्भर रहने वाले लोग हैं। अपने हिसाब से जंगल जाते हैं, जितनी जरूरत होती है उतना भर काम करते हैं। खेती से खाने लायक अनाज उपजा लेते हैं।... बहुत-से लोग जिनके पास जमीन नहीं है वे भी जंगल से इसी तरह अपनी जीविका बड़े आराम से चला लेते हैं। फिर क्यों हमें जबर्दस्ती ड्राइवर, मजदूर बनाने पर सरकार तुली है?’

वनोपज यहां रहने वाले समाजों के लिए जीवन-मरण का प्रश्न है। तेंदू, महुआ, साल, चिरौंजी, शहद आदि चीजें इन समाजों की आजीविका का पैंतालीस से साठ फीसद हिस्सा जुटाती हैं। मार्च से मई के दौरान जब खेती के नाम पर कुछ नहीं होता, तब ये वनोपज ही जीने का सहारा बनते हैं। उनके लिए जंगल से दूर होने का मतलब है वजूद खत्म हो जाना। आप उस आदमी को कैसे दिहाड़ी मजूरी में झोंक सकते हैं जिसने सुंदर और उपयोगी सामान बनाने में खुद को बांस की खपच्चियों के साथ साधा हो। विकास की जिल्द ओढ़े हमारी ऊर्जा की हवस हमें तेजी से तबाही की ओर घसीट रही है। ऐसे में खुद को आधुनिक कहने वाली सभ्यता सवालों के घेरे में आ जाती है, जिन्हें सही मायने में जीने का शऊर अब तक नहीं आया।

दरअसल, यह सिर्फ जल, जंगल और जमीन की लड़ाई नहीं है, यह दो सभ्यताओं के बीच टकराव है। आदिवासी समुदाय का जंगलों के साथ जिस किस्म का रिश्ता रहा है उससे सबक लेने की जरूरत है, न कि उसे तबाह करने की।

 

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