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नई संभावना के वाहक PDF Print E-mail
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Monday, 17 March 2014 15:59

अरुण माहेश्वरी

जनसत्ता 17 मार्च, 2014 : भारत की राजनीति एक बड़ी करवट बदलती दिखाई दे रही है। जो चल रहा था, वह चल नहीं सकता और नया क्या हो, उसकी कोई साफ रूपरेखा नजर नहीं आती। इसमें एक ओर कांग्रेस है, जो लगातार सत्ता पर होने पर भी आज अपने को बदलाव की वाहक के रूप में पेश करना चाहती है। दूसरी ओर भाजपा है, जो विपक्ष में होने पर भी पुराने तौर-तरीकों और मूल्यों से चिपकी हुई पतित यथास्थितिवाद की पार्टी है।

तीसरा पक्ष उभरा है आम आदमी पार्टी का, स्वस्थ और नई जनतांत्रिक राजनीति का दावेदार और भारत के शहरी मध्यवर्ग के लिए बड़े आकर्षण का विषय। और एक चौथा पक्ष है, वामपंथियों और कई राज्यों में सत्ताधारी गैर-कांग्रेस, गैर-भाजपा दलों का, जो किसी भी रूप में नया नहीं, पुराने चुनावोत्तर जोड़-तोड़ के हिसाब पर तैयार हुआ विकल्प है।

जो दल इन चारों के बाहर हैं, वे क्या हैं और क्या नहीं हैं, कहना मुश्किल है। इन हालात में मतदाताओं में एक हिस्सा तो वह है, जो इन तमाम वर्षों में किसी न किसी राजनीतिक दल से अपने को जोड़ चुका है और आज भी जुड़ा हुआ है। दूसरा हिस्सा, हमेशा की तरह हवा के रुख पर अपने मत को स्थिर करता है। तीसरा एक बड़ा हिस्सा ऐसा है जिसका अपनी परंपरागत दलगत प्रतिबद्धताओं से मोहभंग हुआ है, लेकिन धर्मनिरपेक्षता और सांप्रदायिकता के प्रश्न पर कोई समझौता करने के लिए तैयार नहीं है। और चौथा हिस्सा, बहुत बड़ा हिस्सा आज के नौजवानों का है, जो आधुनिक है, उदार है और भ्रष्ट राजनीतिकों के चंगुल से मुक्ति और स्वस्थ जनतांत्रिक बदलाव चाहता है।

मतदाताओं के पहले तबके की संख्या जनता के आम मोहभंग के साथ दिन-प्रतिदिन कम हुई है, यानी दलगत प्रतिबद्धताएं कमजोर हुई हैं। मीडिया के विस्फोट से दूसरा तबका अब वैचारिक रुझानों के मामले में पहले जितना शून्य नहीं रहा है। निर्णायक भूमिका मतदाताओं का तीसरा और चौथा हिस्सा ही अदा करेगा। ये ही आज भारत में संख्या की दृष्टि से भी सबसे अधिक हैं। जो पुराने ढांचे में सोचते हैं, जो यह समझते हैं कि आज भी जाति, संप्रदाय और क्षेत्र की राजनीति निर्णायक साबित होगी, उनको करारा झटका लगने वाला है। ऐसे सारे लोग भारत के नए यथार्थ को, नए मतदाताओं और उनकी मानसिकता को समझने में विफल हैं।

भारत के अधिक से अधिक आर्थिक एकीकरण का अर्थ यही है कि पहचान पर आधारित राजनीति कमजोर हुई है। अरविंद केजरीवाल और आम आदमी पार्टी के प्रति सब जगह जो एक प्रकार का स्वत:स्फूर्त समर्थन दिखाई दे रहा है, उसके पीछे यही सच्चाई काम कर रही है। यह बहुत ही स्वागत-योग्य है। राहुल गांधी ने भी इस सच को पकड़ा है, लेकिन थोड़ी देर से। आम आदमी पार्टी की आगामी लोकसभा चुनावों में एक महत्त्वपूर्ण भूमिका होगी, इसे कोई पसंद करे या न करे।

भाजपा और कांग्रेस का सारा मजमा अरबों रुपयों के बल पर जम रहा है। ‘आप’ की ताकत पूरी तरह से साधारण जन हैं। सिर्फ साल भर पहले बनी इस पार्टी ने भारत के आम मतदाताओं की कल्पना को छुआ है। दिल्ली में इस पार्टी की शानदार सफलता ने कांग्रेस और भाजपा के दबदबे के सामने खुद को पूरी तरह से असहाय पा रहे साधारण जनों में एक नए आत्म-विश्वास और ऊर्जा का संचार किया है। अकेले इस पार्टी ने गुजरात में घुस कर मोदी के विकास के झूठ के परखचे उड़ाए हैं। मोदी-शासन के जन-विरोधी चरित्र का पर्दाफाश किया है। आज जो लोग इस पार्टी के नाम पर नाक-भौं सिकोड़ते हैं, उन्हें दिल्ली के परिणाम याद करने चाहिए।

भाजपा और मीडिया ने अभी आम आदमी पार्टी (आप) के खिलाफ दो बातों का प्रचार जोर-शोर से चला रखा है। पहला यह कि कांग्रेस जो काम नहीं कर पाई, वह उसे ‘आप’ के माध्यम से करवा रही है। यानी ‘आप’ कांग्रेस की बी टीम है। दूसरा यह कि ‘आप’ माओवादियों-नक्सलियों और अराजक तत्त्वों का समूह है। इस प्रचार का पहला उद््देश्य यह है कि इसके दबाव में आकर ‘आप’ अपने हमलों को पूरी तरह से कांग्रेस पर केंद्रित कर दे और भाजपा को बख्श दे, क्योंकि जब से केजरीवाल ने गुजरात के विकास के झूठ को उजागर किया है, ‘आप’ के वार भाजपा के लिए काफी महंगे साबित होने लगे हैं। इस प्रचार का दूसरा उद््देश्य यह है कि वामपंथियों को अछूत-सा बताते हुए यह सुनिश्चित करे कि ‘आप’ का वामपंथियों से कोई संपर्क न बनने पाए। ऐसा होने पर भारत में स्वच्छ और ईमानदार राजनीति के एक नए अध्याय की शुरुआत होगी, जैसा समूचे लातिन अमेरिका में हो चुका है। यह भी कांग्रेस के खिलाफ विकल्प के तौर पर खुद को पेश करने की भाजपा की कोशिश पर बड़ा आघात होगा।

चुनाव आयोग के सूत्रों के अनुसार, 2009 के आम चुनाव में भाजपा को कुल मतों का 18.8 प्रतिशत मिला था। कांग्रेस को 28.55 प्रतिशत। नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा के मतों में एक प्रतिशत वृद्धि की भी संभावना नहीं है। उनकी एक आडंबरपूर्ण तानाशाह की सूरत किसी के भी मन में सिवाय डर के और कुछ पैदा नहीं कर सकती। आखिरी समय तक राहुल गांधी कोई करिश्मा कर दिखाएं तो दूसरी बात है, अन्यथा कांग्रेस के मतों में भी गिरावट के आसार दिखाई देते हैं। इसीलिए दिल्ली में जो


हुआ, इस बार सारे भारत में वही होगा।

सांप्रदायिकता के खिलाफ प्रतिरोध की अनुलंघनीय प्राचीर- तेरह प्रतिशत नए नौजवान मतदाता और तेरह प्रतिशत अल्पसंख्यक मतदाता। बाकी चीजें अतिरिक्त। 2014 के आम चुनाव में कुल अस्सी करोड़ मतदाता भाग लेंगे। इनमें दस करोड़ मतदाता पहली बार मत देंगे। यानी लगभग तेरह प्रतिशत नए नौजवान मतदाता होंगे। भारत का नौजवान और कुछ भी हो, सांप्रदायिक नहीं हो सकता। इस बार यह नौजवान ही निर्णायक होगा। आगामी आम चुनाव में नौजवान मतदाता हर अहंकारी नेता को धूल चटाएगा, इसमें शक नहीं। नौजवान धर्म, जाति और क्षेत्र पर आधारित पहचान की राजनीति को एक सिरे से ठुकराएं। समाज के सभी तबकों के बीच सौहार्द, मेलजोल और शांतिपूर्ण सहजीवन को बढ़ावा देने वाले परिवेश के पक्ष में अपना मत दें। यही युवा धर्म है।

भारतीय राजनीति में परदे के पीछे से काम करने वाली सबसे बड़ी शक्ति है राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ। नाम संस्कृति का और काम शुद्ध सत्ता की राजनीति का। कहने के लिए चरित्र का निर्माण करता है, लेकिन वास्तव में आदमी को दोहरे चरित्र का बनाता है। जब छह दिसंबर 1992 के दिन इनके इशारे पर बाबरी मस्जिद गिराई गई थी, उसके बाद ‘इंडिया टुडे’ के 15 फरवरी 93 के अंक में संघ के दोहरेपन पर एक टिप्पणी छपी थी- संघ की उलटबांसियां: बोली कुछ, मतलब कुछ।

‘हम मंदिर बनाएंगे’, हम मस्जिद ढहाएंगे। ‘मस्जिद ढहाया जाना दुर्भाग्यपूर्ण तो है पर शर्मनाक नहीं’, दुर्भाग्यपूर्ण है, क्योंकि मुसलमानों ने इसे स्वेच्छा से नहीं छोड़ा और इसे टूटना ही था, मगर यह हिंदू गौरव की बात है। ‘मुसलमानों का तुष्टीकरण हुआ है’, हिंदुओं ने सहअस्तित्व स्वीकार किया है, पर मुसलमानों ने नहीं। ‘धारा 370 खत्म होनी चाहिए’, कश्मीर में हिंदुओं को बसाओ और मुसलमानों को भगाओ। ‘भारत-पाक महासंघ बनाना चाहिए’, इस महासंघ में भारत में रह रहे मुसलमानों को पाकिस्तानी इलाकों में भेज दिया जाएगा। ‘मुसलमान खुद को महम्मदी हिंदू कहें’, मुसलमान यहां रहना चाहते हैं तो उन्हें स्वयं हिंदू धर्म स्वीकार कर लेना चाहिए।

‘इस देश में आप गर्व के साथ अपने को हिंदू नहीं कह सकते’, आज भी मुसलमानों का राज है। ‘मुसलमान अधिक बच्चे पैदा करते हैं’, उनकी जबरी नसबंदी की जाए। ‘मुसलमानों को वोट बैंक बना दिया गया है’, उनका मताधिकार छीन लेना चाहिए। ‘मुसलमान भाजपा-शासित राज्यों में सुरक्षित हैं’, भाजपा को वोट दो, नहीं तो दंगे झेलो। ‘भारत धर्मनिरपेक्ष देश है, क्योंकि यहां हिंदू बसते हैं’, सभी मुसलमान कट्टर मजहबी होते हैं।

अगर कोई आरएसएस की मूलभूत विचारधारा, उसके फासिस्ट सांप्रदायिक चरित्र का अच्छी तरह अध्ययन करे तो पता चलेगा कि संघ का यह कथित दोहरापन उसमें आज आकस्मिक तौर पर पैदा हो गई बात नहीं है। यह उसके अस्तित्व का अनिवार्य अंग है।

प्रेमचंद की कही पुरानी बात है- सांप्रदायिकता को अपने असली चेहरे में सामने आते शर्म आती है। राजनाथ सिंह की मांग कि सेना को शासन के मामलों में खुली छूट दे दी जाए, यह बताने के लिए काफी है कि भाजपा के हाथ में देश का जनतंत्र सुरक्षित नहीं रह सकता। हिटलर ने जनतांत्रिक रास्ते से सत्ता पर आकर सेना के जरिए ही नाजी शासन की स्थापना की थी, जर्मनी में अंध-राष्ट्रवाद की आंधी पैदा की और पूरे यूरोप को इतिहास के सबसे भयंकर युद्ध में झोंक दिया। अंत में खुद जर्मनी एक खंडहर, विशाल श्मशान में बदल गया।

दिल्ली में कुलियों के साथ और अब वाराणसी में रिक्शे वालों के साथ राहुल गांधी की बातचीत भारत की राजनीति के नए और संभावनापूर्ण सच की ओर संकेत है। प्रचार की यह पूरी तरह से भिन्न शैली खुद में कम मानीखेज नहीं है। साहित्य में रूपवाद की हम कितनी ही आलोचना क्यों न करें, कोई भी गंभीर साहित्य-समीक्षा रूप से ही वस्तु की पहचान की ओर पहला कदम उठाती है। वैसे ही राजनीति का भी अपना एक सौंदर्यशास्त्र होता है। जो दल प्रचार के पुराने तौर-तरीकों से चिपके हुए है़ं, उनकी राजनीति भी निश्चित तौर पर किसी संरक्षणवादी सोच की शिकार है। भाजपा की तरह का बेइंतहा तामझाम, आमजनों से नेता की सायास दूरी, सैनिक जनरलों को साथ लेकर उग्र राष्ट्रवाद की थोथी हुंकारें, नरेंद्र मोदी की चौड़ी छाती की स्तुति यह बताने के लिए काफी है कि बड़े-बड़े संपत्तिवानों के बल पर की जा रही यह राजनीति आम जनता पर एक बर्बर शासन लादने की फासिस्ट राजनीति है।

क्या भारत में एक आदमी भी ऐसा होगा जो नरेंद्र मोदी का समर्थन इसलिए करेगा कि उन्होंने शायद कभी चाय भी बेची थी? विश्वास नहीं होता। ‘टाइम्स नाउ’ पर रविशंकर प्रसाद, सीताराम येचुरी के सामने बगलें झांकते और झेंप मिटाने के लिए अकारण खिलखिलाते दिखाई दे रहे थे। भारत का नौजवान मतदाता नरेंद्र मोदी को नहीं स्वीकार सकता, यह सच जैसे-जैसे सच्चाई की शक्ल लेता दिखाई देगा, भाजपा के प्रवक्ताओं की ‘खिलखिलाहट’ उसी अनुपात में बढ़ती दिखाई देगी। उनकी तुलना में सीताराम बेहद संयमित, यथार्थपरक और तार्किक थे। एंकर की ‘खिलखिल’ अबोधपन के स्वाभाविक अलंकार जैसी थी।

 

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