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नीतिविहीन राजनीति का दौर PDF Print E-mail
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Saturday, 15 March 2014 11:14

विनोद कुमार

जनसत्ता 15 मार्च, 2014 : संसदीय राजनीति में आने के बाद पहली बार बसपा के टिकट पर पलामू सीट से संसदीय उपचुनाव लड़ने और हार जाने वाले कामेश्वर बैठा पिछली बार झामुमो के टिकट पर चुनाव लड़े और सांसद बने। इस बार उन्होंने झामुमो का दामन छोड़ भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़ने का फैसला किया है। भाजपा प्रदेश कार्यालय में उनका स्वागत हुआ और शायदउन्हें वहां से टिकट मिल भी जाए। जब पत्रकारों ने उनसे पूछा कि आपने झामुमो क्यों छोड़ दिया तो उनका कहना था कि ‘वहां लोकतंत्र नहीं।’ कामेश्वर बैठा एक जमाने में कट््टर माओवादी संगठन एमसीसी से जुड़े थे। माना जाता है कि दलित बहुल इस सीट पर माओवादी चुनाव के दौरान मदद भी करते हैं।

यह पूरा प्रकरण दिलचस्प इसलिए है कि एक धुर वामपंथी संगठन से जुड़ा व्यक्ति अब पार्टी के भीतर न सिर्फ लोकतंत्र चाहता है बल्कि उसे धुर दक्षिणपंथी संगठन में जाने से कोई गुरेज या नैतिक संकट नहीं। हमने कामेश्वर बैठा का उदाहरण महज इस तीक्ष्ण विरोधाभास को दिखाने के लिए यहां लिया, हालांकि यह तो भारतीय राजनीति का एक सामान्य परिदृश्य हो गया है। राजनेता लिबास की तरह दल बदलते हैं। थामस हंसदा जीवन भर राजमहल सीट से कांग्रेस के टिकट पर झामुमो से चुनाव लड़ते और जीतते-हारते रहे। उनके पुत्र विजय हंसदा ने पिता के उत्तराधिकार को संभाला और कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ते रहे।

इस बार वे कांग्रेस का दामन छोड़ झामुमो में शामिल हो गए हैं। रामविलास पासवान जैसे दिग्गज नेता, जो अब तक की राजनीति में भाजपा का विरोध करते रहे, अब भाजपा के समर्थक हो गए। ढेरों ऐसे नेता मिल जाएंगे जो अनेक दलों में रह चुके हैं। एक पार्टी छोड़ दूसरी पार्टी में जाने की खबरें लगातार आ रही हैं। क्या यह अवसरवादिता है या फिर माना जाए कि राजनीतिक दलों की अलग-अलग नीतियां और सैद्धांतिक आधार महज एक दिखावा हैं।

समाज को कम्युनिस्ट वर्गीकृत दायरे में देखते हैं। उच्च वर्ग, मध्य वर्ग और निम्न वर्ग। उसमें भी अनेक दर्जाबंदियां। समाजवादियों-लोहियावादियों का कहना है कि भारतीय समाज में जातियों का अस्तित्व है। कमोबेश उच्च जातियां ही उच्च वर्ग, मध्य जातियां ही मध्य वर्ग और निम्न जातियां ही निम्न वर्ग हैं। कुछ अपवादों को छोड़ समाज के इस वर्गीकरण को लोग मानते भी हैं। विभिन्न राजनीतिक दलों का उदय इसी सामाजिक ढांचे के भीतर से हुआ। अपने-अपने वर्ग के हितों को प्रमुखता देते हुए विभिन्न राजनीतिक दल अस्तित्व में आए। और एक सामान्य समझ यह है कि मंडल आयोग के आने के पूर्व तक कांग्रेस उच्च जातियों और उच्च वर्ग का, भाजपा मध्य वर्ग में ही बनियों का, विभिन्न समाजवादी खेमे के विभिन्न दल- जनता दल, लोक दल आदि- मध्य जातियों और मध्य वर्ग का और कम्युनिस्ट निम्न जातियों और निम्न वर्ग के हितों का प्रतिनिधित्व करते हैं और उनका जनाधार भी उन्हीं वर्गों के बीच सिमटा हुआ है। यह अलग बात है कि वोट की राजनीति के लिए विभिन्न राजनीतिक दल अपने वर्गीय जनाधार के बाहर भी पांव पसारते रहे।

अल्पसंख्यक तो कांग्रेस के साथ थे ही, कांग्रेस ने दलितों, आदिवासियों को जोड़ा। जनता दल और लोकदल जैसे दलों का आधार तो मूलत: पिछड़ी जातियां हैं, लेकिन छिटपुट अगड़े भी शामिल हो जाया करते हैं, और कम्युनिस्ट, जिनका जनाधार तो मूलत: निम्न जाति और वर्गों में था, औद्योगिक मजदूरों के दायरे में शामिल होने वाले अगड़ी और पिछड़ी जाति के लोगों को भी जोड़ने में कामयाब रहे। लेकिन मंडल आयोग की सिफारिशें लागू होने के पहले तक का परिदृश्य यही था कि बिहार में कोई अगड़ा ही मुख्यमंत्री हो सकता था। चाहे वे श्री बाबू हों, या केबी सहाय या फिर जगन्नाथ मिश्र। कांग्रेस शासित अन्य राज्यों में भी इसी तरह का परिदृश्य था।

लेकिन दक्षिण भारत में होने वाले तीव्र दलित आंदोलन और उत्तर भारत में मंडल उभार के बाद दलित और पिछड़ा राजनीति में भारी उलटफेर हुआ। दलितों ने अपना नेता ढंूढ़ लिया तो कुछ पिछड़ों के मसीहा हो गए। दोनों की अपनी-अपनी पार्टियां भी हो गर्इं।

नतीजा यह हुआ कि राजनीति में अगड़ों का वर्चस्व नहीं रहा। साथ ही कोई एक पार्टी अपने बलबूते बहुमत हासिल करने में प्राय: विफल होने लगी। गठबंधन की राजनीति का दौर शुरूहुआ। केंद्र में ही नहीं, राज्यों में भी कुछ अपवादों को छोड़ गठबंधन सरकार बनने लगी। सकारात्मक पक्ष यह कि राजनीति में सहिष्णुता बढ़ी। नकारात्मक पक्ष यह कि सत्ता पर काबिज होने के लिए दलीय राजनीतिक प्रतिबद्धताओं, नीतियों और सिद्धांतों को तिलांजलि दे गठजोड़ बनने लगे।

विभाजन की पृष्ठभूमि और एक कट््टर हिंदूवादी द्वारा महात्मा गांधी की हत्या की वजह से धर्मनिरपेक्षता भारतीय राजनीति के मूल में रही है। लेकिन बाबरी मस्जिद के ध्वंस, उसके बाद हुए दंगों और गुजरात में मुसलमानों के कत्लेआम के पूर्व देश में कांग्रेस-विरोधी गठजोड़ ही बनते थे। बाबरी मस्जिद और राम जन्मभूमि यात्रा के बाद धर्मनिरपेक्षता के नाम पर राजनीति में एक नए किस्म के ध्रुवीकरण का दौर शुरू हुआ।

मगर इस धर्मनिरपेक्षता की झीनी चादर को थोड़ी देर के लिए अलग कर दीजिए, तो तमाम राजनीतिक दलों का चरित्र लगभग एक समान है। आप झंडों के रंग को देख कर तो उन्हें अलग कर सकते हैं, लेकिन नेताओं की चाल-ढाल, चरित्र सब बेहद मिलते-जुलते हैं। चुनावी राजनीति की प्रकृति और स्वरूप, जनप्रतिनिधि बनने के बाद मिलने वाली एक तरह की सुविधाएं और उपभोग ने उनकी चारित्रिक विशेषताओं को लगभग मिटा दिया है। जनप्रतिनिधियों को मिलने वाली सुविधाओं में निरंतर वृद्धि हो रही है। छिटपुट प्रतीकात्मक विरोध के अलावा, सभी बेशर्मी से उसको स्वीकार


करते हैं।

विधायक और सांसद क्षेत्रीय विकास निधि के रूप में मिलने वाले पैसे का भारी दुरुपयोग होता है। लेकिन यह व्यवस्था खत्म हो, यह कोई नहीं चाहता। लोकसभा और राज्यों में विधानसभा की ढेरों समितियां बनती हैं। उनके अध्यक्ष और सदस्य बन कर सभी पार्टियों के सांसद-विधायक अतिरिक्त कमाई करते हैं। और यह सब करते किसी तरह की नैतिक हिचकिचाहट भी नहीं। टॉलस्टाय कहते हैं कि मनुष्य जो जीवन जीता है, उसे सही ठहराता है। अगर वह ऐसा न करे तो उसका जीना मुश्किल हो जाएगा।

यह समरूपता उनकी अर्थनीति में भी दिखाई देती है। आरक्षण को लेकर उनमें भारी अंतर्विरोध रहा है, लेकिन आरक्षण की चालू व्यवस्था को लेकर उनमें कोई विरोध नहीं। नई औद्योगिक नीति और उदारीकरण को लेकर, विकास के चालू मॉडल को लेकर उनमें किसी तरह का बुनियादी फर्क नहीं। कांग्रेस और भाजपा में अमेरिका को लेकर ठनती रहती है। नाभिकीय समझौते के दौरान संसद में खूब तमाशा हुआ। लेकिन कौन नहीं जानता कि अमेरिकापरस्त नीतियों के जितने बड़े समर्थक मनमोहन सिंह रहे हैं, उससे कम भाजपा के नेता नहीं। सभी देश में निजीकरण और खुली अर्थव्यवस्था के पैरोकार बन गए हैं। सिद्धांत रूप में कम्युनिस्ट पार्टियां सरकारीकरण की थोड़ी पक्षधर दिखती हैं, लेकिन व्यवहार में बुद्धदेव भट््टाचार्य जैसे कम्युनिस्ट नेता टाटा की कार कंपनी सिंगूर में लगाने के लिए और नंदीग्राम में सेज बनाने के क्रम में सत्ता से बेदखल हो गए।

और राजनीतिक दलों की इस समरूपता या नीतिविहीनता का ही परिणाम है कि समकालीन भारतीय राजनीति में अजीबोगरीब घटनाएं होते हम हर रोज देख रहे हैं। सिर्फ सत्ता में बने रहने के लिए या उस पर काबिज होने के लिए नेता तरह-तरह के स्वांग करते हैं, लफ्फाजियों का सहारा लेते हैं। बात शुरूकरते हैं लालू और नीतीश से। गुजरात में जब कत्लेआम हुआ तो नीतीश राजग में बने रहे, अब राजनीतिक मजबूरियों की वजह से मोदी को बहाना बना राजग से बाहर निकल आए हैं। योजना तो संभवत: कांग्रेस के साथ जाने की रही थी, किसी कारण मामला बना नहीं तो तीसरा मोर्चा बनाने निकल पड़े हैं। सवाल उठता है कि जब लालू और नीतीश दोनों धर्मनिरपेक्षता के बड़े हिमायती हैं तो वे आपस में मिल क्यों नहीं जाते?

अब रामविलासजी को लीजिए। वे भी चौहत्तर आंदोलन की ही उपज हैं। उनका अपना राजनीतिक दल है, लेकिन एक सामाजिक संगठन भी, जिसे अर्जक संघ के रूप में हम जानते हैं- देवी-देवता, पूजा-पाठ के तौर-तरीके का विरोध करने वाला एक उग्र सामाजिक संगठन। मनुवादी संस्कृति के बड़े भारी विरोधी। धर्मनिरपेक्षता तो एक चादर है जिसे जब इच्छा हो धारण कर लो, जब इच्छा हो उतार फेंको। लेकिन क्या वे यह नहीं जानते कि मोदी कथित भंगियों और सफाईकर्मियों के बारे में क्या धारणा रखते हैं? मोदी का कथन है कि सफाई का काम दलित ईश्वरीय प्रेरणा और आध्यात्मिक सुख के लिए करते हैं। उस मोदी की गोद में बैठते रामविलासजी को जरा भी झिझक नहीं हुई?

रामकृपाल यादव का ही ताजातरीन मामला ले लीजिए। राज्यसभा में हैं, लेकिन पाटलीपुत्र से लोकसभा का चुनाव लड़ने की इच्छा रखते हैं। माना कि लालू ने अपनी बेटी को टिकट देकर गुनाह किया, लेकिन इसके लिए पिछले दो दशक की आस्था और विश्वास को दांव पर लगाने के लिए तैयार हो गए? एक मजेदार दृश्य है माकपा महासचिव प्रकाश करात का बारी-बारी से मायावती और जयललिता के दरवाजे पर जाना।

कभी वे मायावती को प्रधानमंत्री बनाते हैं, कभी जयललिता को। और दोनों हैं कि भाव ही नहीं देतीं। मायावती उस जमात में नहीं रहेंगी जहां मुलायम रहेंगे और जयललिता तो एक साम्राज्ञी की तरह अपनी पार्टी को चलाती हैं। वामदलों की नीतियों से उनका जरा भी वास्ता नहीं। फिर भी यह शीर्षासन किसलिए? केवल इसलिए कि राष्ट्रीय राजनीति में थोड़ी-सी और जगह मिल जाए।

झारखंड में आदिवासियत को लेकर सड़कों पर उतरने वाले दो मझोले नेता हैं बंधु तिर्की और चमड़ा लिंडा। डोमेसाइल आंदोलन के बलबूते विधायक बन गए। झामुमो-कांग्रेस सरकार का समर्थन कर रहे हैं। लोकसभा चुनाव के ठीक पहले तृणमूल कांग्रेस में शामिल हो गए। क्या वे यह नहीं जानते कि बृहद झारखंड अलग राज्य के एक बड़े विरोधी नवीन पटनायक हैं तो दूसरी ममता बनर्जी? झारखंड से सटे ओड़िशा और बंगाल के कुछ आदिवासी बहुल जिले हमेशा से बृहद झारखंड अलग राज्य के आंदोलन में शामिल रहे और इन्हें उन दो राज्यों की सरकारों ने बलपूर्वक दबाया। लेकिन इससे क्या फर्क पड़ता है? इस समय उन्हें यह लग रहा है कि तृणमूल कांग्रेस, उनके साथ घूमने वाले अण्णा हजारे और फिल्मी सितारे मिथुन की बदौलत शायद उनकी लॉटरी निकल आए। विधायक से सांसद बन जाएं।

दरअसल, झारखंड बनने के बाद यहां की गरीब जनता का तो बहुत भला नहीं हुआ, लेकिन नेताओं की जबर्दस्त कमाई हुई है। सांसद और विधायक कोष के ही रूप में करोड़ों मिलते हैं। बीस फीसद कमीशन तो एकदम ‘ईमानदार’ कमाई है। थोड़ी-सी हेराफेरी कर दी तो पचास-साठ फीसद तक कमाई हो जाती है। पैसा जेब में कसमसाता रहता है। जिसे देखो, वही चुनाव लड़ने के लिए बेताब है। तो, ऐसे वातावरण में नीतियों और सिद्धांतों के फेरे में कौन पड़े?

 

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