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अखिलेश सरकार के दो साल पूरे : बड़ी उपलब्धियों के साथ रहा विवादों का भी साया PDF Print E-mail
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Friday, 14 March 2014 15:29

लखनऊ। चुनावी वर्ष में अपने कार्यकाल के दो साल पूरे कर रही उत्तर प्रदेश की समाजवादी पार्टी (सपा) सरकार के लिए यह अवधि लखनऊ मेट्रो, आईटी सिटी जैसे अवस्थापना तथा अन्य क्षेत्रों में कई महत्वपूर्ण उपलब्धियों की गवाह रही, वहीं मुजफ्फरनगर में हुए दंगे तथा उनकी विभीषिका और दुर्गाशक्ति नागपाल निलम्बन प्रकरण उसके लिए परेशानी का कारण बने।

 

विधानसभा चुनाव में भारी बहुमत के साथ 15 मार्च 2012 को सत्तारूढ़ हुई सपा की नजर में इन दो वर्षों में मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने भविष्य में खुद को ‘विकास पुरुष’ के रूप में याद किये जाने की पुख्ता जमीन तैयार कर ली है, वहीं विपक्ष अखिलेश सरकार को हर मोर्चे पर विफल मानता है ।

सपा के प्रान्तीय प्रवक्ता राजेन्द्र चौधरी ने कहा कि महज दो साल के कार्यकाल में उत्तर प्रदेश में मेट्रो, आईटी सिटी और नये बिजली कारखानों के निर्माण की शुरुआत के अलावा छात्र-छात्राओं को मुफ्त लैपटाप, बेरोजगारी भत्ता योजना, कौशल विकास कार्यक्रम, लड़कियों को पढ़ाई जारी रखने में मदद के लिये ‘हमारी बेटी, उसका कल’ योजना जैसे क्रांतिकारी कदम उठाकर मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने भविष्य में खुद को ‘विकास पुरुष’ के रूप में याद किए जाने का आधार तैयार कर लिया है।

उन्होंने कहा कि दो साल में हुए बुनियादी कार्यों का असर आने वाले एक-दो साल में नजर आएगा और तब लोग सपा सरकार की दूरदर्शितापूर्ण योजनाओं और कार्यों का मूल्यांकन करेंगे।

चौधरी ने कहा कि सरकार ने अद्वितीय इच्छाशक्ति का परिचय देते हुए लखनऊ मेट्रो परियोजना की शुरुआत कर दी है जो दो-तीन साल में मुकम्मल हो जाएगी। इसके अलावा लखनऊ में आईटी सिटी का शिलान्यास भी हो चुका है। इससे आने वाले वर्षों में प्रौद्योगिकी कौशल से लैस हजारों लोगों को नौकरी के लिए नोएडा और गुड़गांव नहीं जाना पड़ेगा। उन्हें लखनऊ में ही रोजगार मिलेगा।

चौधरी ने कहा कि सरकार के दो साल सफल रहे हैं। इस दौरान विकास हुआ है और घोषणापत्र के ज्यादातर वादे पूरे किए जा चुके हैं। पूरे देश के राज्यों में सरकारें उत्तर प्रदेश के विकास के मॉडल को अपना रही हैं। सरकार में जनता का भरोसा पुख्ता हुआ है। सरकार ने लोकतंत्र बहाल किया है और भ्रष्टाचार पर रोक लगाई है।

हालांकि, सरकार अपने घोषणापत्र में किसान आयोग के गठन, अल्पसंख्यकों को उनकी आबादी के हिसाब से अलग से आरक्षण देने, गरीब बुनकरों को मुफ्त बिजली, राजकीय सुरक्षा बलों में मुसलमानों की भर्ती के विशेष प्रावधान तथा कक्षा 10 पास करके अगले दर्जे में दाखिला लेने वाले छात्र-छात्राओं को टैबलेट देने के वादे पूरे नहीं कर सकी।

इस पर सपा प्रवक्ता कहते हैं कि सरकार का चुनाव घोषणापत्र पांच साल के लिये है, लिहाजा आने वाले समय में ये वादे पूरे कर दिए जाएंगे।

दूसरी ओर, विपक्ष की नजर में सरकार के दो साल के कार्यकाल में विकास रुक गया और स्थितियां पहले से ज्यादा खराब हुई हैं।

भाजपा प्रवक्ता विजय बहादुर पाठक के मुताबिक अपने गठन के पहले दिन से ही कानून-व्यवस्था के मोर्चे पर नाकाम हुई सरकार जब दूसरा साल पूरा कर रही है तो उसमें निरंतर गिरावट है। योजनाओं से लेकर निर्णयों तक में भ्रम और असमंजस की स्थिति रही जिसके कारण छोटी-छोटी घटनाएं राज्य में बड़े तनाव की वारदात का कारण बनीं।

उन्होंने कहा कि प्रशासनिक निर्णयों के मामले में, चाहे वह राज्य कर्मचारियों की 15 साल बाद हुई हड़ताल रही हो, या फिर अभी हाल में हुई जूनियर डाक्टरों की हड़ताल रही हो, हर बार न्यायालय को हस्तक्षेप करना पड़ा। इसका मतलब यह है कि समस्याओं की जड़ पर सरकार की नजर नहीं रही, अन्यथा उन्हें अनदेखा किया गया।

कांग्रेस विधानमंडल दल के नेता प्रदीप माथुर ने सपा सरकार के दो साल के कार्यकाल के बारे में कहा कि इस सरकार को जिस तरह जनता ने विश्वास के साथ चुना था, उसके अनुरूप वह काम नहीं कर पायी।

उन्होंने कहा कि प्रदेश की कानून-व्यवस्था छिन्न-भिन्न है, ऐसे में प्रदेश में निवेशक कैसे आयेंगे। मुख्यमंत्री ने बड़ी मेहनत करके आगरा में निवेशकों की शिखर बैठक की लेकिन उसके बावजूद कहीं निवेश


नहीं हुआ।

माथुर ने कहा कि राज्य सरकार ने केन्द्र की महत्वाकांक्षी योजनाओं पर अपनी मुहर लगाकर अपना प्रचार किया। लब्बोलुआब यह है कि जनता की निगाह में यह सरकार नाकाम है।

लोकसभा चुनाव की उठापटक के बीच मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने अपने कृषि मंत्री आनन्द सिंह और स्टाम्प तथा न्यायालय शुल्क राज्यमंत्री मनोज पारस को गत नौ मार्च को बर्खास्त कर दिया। सिंह को उनके बेटे कीर्तिवर्द्धन सिंह के भाजपा में शामिल होने और सपा प्रमुख पर भ्रष्टाचार के गम्भीर आरोप लगाने जबकि पारस को अराजकता के कुछ मामलों में संलिप्तता के इल्जाम में हटाया गया।

सरकार ने अपने कार्यकाल के दूसरे वर्ष में मुसलमानों के लिये कई योजनाएं चलायीं और अपने चुनाव घोषणापत्र में किए गये वादे के मुताबिक आतंकवाद से जुड़े मामलों में जेल में बंद ‘बेकसूर’ मुसलमानों से मुकदमे वापस लेने की कोशिश की। इसके लिए उसे विपक्ष के तीखे हमलों का सामना करना पड़ा।

मुकदमे वापस लेने के लगभग हर मामले में सरकार को अलग-अलग कारणों से अदालतों से हरी झंडी नहीं मिल सकी। इसके अलावा मुस्लिम लड़कियों के लिए शुरू की गई ‘हमारी बेटी उसका कल’ योजना को सिर्फ मुसलमानों के लिए ही शुरू करने को लेकर विपक्ष ने सरकार पर जमकर हमला बोला ।

सपा प्रवक्ता चौधरी ने बताया कि सरकार ने अपने कार्यकाल के दूसरे साल में प्रदेश के 30 महत्वपूर्ण विभागों में संचालित 85 योजनाओं को शामिल करते हुए उनमें से 20 प्रतिशत लाभ का मात्राकरण अल्पसंख्यक समुदाय को दिए जाने का निर्णय लिया। इस दौरान सरकार ने 6248 मदरसों को मान्यता प्रदान की और 459 मदरसों को अनुदान सूची पर लिया।

चौधरी ने बताया कि सरकार ने इस अवधि में एक लाख 70 हजार शिक्षामित्रों को परिषदीय स्कूलों में समायोजित करने तथा 108 समाजवादी स्वास्थ्य सेवा की तर्ज पर गर्भवती महिलाओं के लिए 102 सेवा शुरू करने का महत्वपूर्ण निर्णय भी लिया।

लोकसभा चुनाव की आहट के बीच सपा ने 17 पिछड़ी जातियों- राजभर, निषाद, प्रजापति, मल्लाह, कहार, कश्यप, कुम्हार, धीमर, बिन्द, भर, केवट, धीवर, बाथम, मछुआ, मांझी, तुरहा और गौड़ को अनुसूचित जाति वर्ग में शामिल करने की कोशिश दोबारा शुरू की। इसके लिये पार्टी ने कई दौर की यात्राएं भी निकालीं।

हालांकि कानून-व्यवस्था के मोर्चे पर सरकार को तमाम तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ा। इस दौरान बरेली, अम्बेडकरनगर तथा लखनऊ समेत कई जिलों में साम्प्रदायिक घटनाएं हुर्इं लेकिन सबसे भीषण घटना मुजफ्फरनगर दंगों के रूप में सामने आई।

पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर में पिछले साल सात सितम्बर को शुरू हुए साम्प्रदायिक दंगों की आग गांवों तक पहुंचने की वजह से उस पर नियंत्रण के लिये सेना तक बुलानी पड़ी। इन दंगों में 40 से ज्यादा लोग मारे गए और हजारों बेघर हो गए।

फसाद के मामले में भारतीय जनता पार्टी के दो विधायकों संगीत सोम और सुरेश राणा को गिरफ्तार कर लिया गया लेकिन कुछ मुस्लिम आरोपियों की गिरफ्तारी नहीं होने से सरकार को तमाम तरह के सवालों और आलोचनाओं का सामना करना पड़ा।

लोकसभा चुनाव की आहट के बीच सरकार ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश का प्रतिनिधित्व करने वाले तीन राज्यमंत्रियों महबूब अली, शाहिद मंजूर और इकबाल महमूद को प्रोन्नत करके काबीना मंत्री बना दिया। हालांकि इसे मुजफ्फरनगर दंगों के कारण हुए नुकसान की भरपाई की कोशिश ही माना गया।

इसके पूर्व, 28 जुलाई को गौतमबुद्धनगर की उपजिलाधिकारी दुर्गाशक्ति नागपाल को कादलपुर गांव में एक निर्माणाधीन मस्जिद को अदूरदर्शितापूर्ण तरीके से ढहाने के आरोप में निलम्बित किए जाने के प्रकरण को लेकर सरकार को कठघरे में खड़ा किया गया।

आईएएस एसोसिएशन ने दुर्गाशक्ति को खनन माफिया के दबाव में निलम्बित किए जाने का आरोप लगाते हुए इस पर खासी नाराजगी जतायी। हालांकि बाद में दुर्गाशक्ति को बहाल करके कानपुर में तैनाती दे दिए जाने पर मामले का पटाक्षेप हो गया।

(भाषा)

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