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राहुल की राजनीति PDF Print E-mail
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Friday, 14 March 2014 12:05

विजय विद्रोही

जनसत्ता 14 मार्च, 2014 : चुनावों की घोषणा हो चुकी है। नरेंद्र मोदी चाय पर चर्चा कर रहे हैं।

केजरीवाल मोदी को सवालों के जरिए घेरने में जुटे हैं। उधर राहुल गांधी कभी रिक्शेवालों से मिल रहे हैं तो कभी मछुआरों से। पर मोदी और केजरीवाल के हमलों का कांग्रेस की ओर से आक्रामक होकर जवाब नहीं दिया जा रहा है। मोदी ने पासवान को कांग्रेस से छीन लिया, बिहार में उपेंद्र कुशवाहा और पासवान के साथ मिलकर गठबंधन बनाया तो उत्तर प्रदेश में अपना दल जैसे छोटे दल के साथ हाथ मिलाया। संगमा से बातचीत हो रही है। आंध्र में एनटी रामाराव की बेटी और कांग्रेस सांसद पुरुंदेश्वरी अपने विधायक पति के साथ भाजपा के पाले में जा चुकी हैं। लेकिन राहुल गांधी गठबंधन के नाम पर भी पीछे ही दिखाई दे रहे हैं। जैसे-तैसे लालू के साथ तो गठबंधन हुआ है, लेकिन तेलंगाना में टीआरएस ने अंगूठा दिखा दिया है। ऐसा लगता है कि राहुल तय ही नहीं कर पा रहे हैं कि करना क्या है। अकेले लड़ना है या नए साथी तलाशने हैं।

 

कांग्रेस नेताओं का भी कहना है कि राहुल गांधी चुनावी रणनीति को साफ नहीं कर रहे हैं। जो काम एक साल पहले शुरूकिया जाना था उसे ऐन चुनाव के वक्त किया जा रहा है जबकि इस वक्त उम्मीदवारों के चयन और गठबंधन के विस्तार की जरूरत प्राथमिकता होनी चाहिए। चुनावी सर्वेक्षण बता रहे हैं कि कांग्रेस सौ के आसपास ठहर सकती है। जाहिर है कि ऐसे माहौल में कार्यकर्ता निराश हैं। उत्तर के राज्यों से खबरें आ रही हैं कि बहुत-से कांग्रेस दिग्गज चुनाव लड़ना ही नहीं चाहते या फिर सीट बदलने की मांग कर रहे हैं। ऐसे में राहुल की तरफ से कार्यकर्ताओं में उत्साह जगाने वाला एक भी बयान सामने नहीं आया है, जिसमें आक्रामक अंदाज में तमाम सर्वेक्षणों को भ्रम फैलाने वाला बताया गया हो।

अलबत्ता हुआ यह है कि सर्वे पर होने वाली समाचार चैनलों की बहस में कांग्रेस नेताओं ने जाना बंद कर दिया है। चैनलों को कांग्रेस के हितैषियों से काम चलाना पड़ रहा है। हिंदी समाचार चैनलों की आम शिकायत है कि बहस के लिए कांग्रेस उनके यहां बड़े चेहरे नहीं भेजती, जो पुरजोर तरीके से अपनी बात रख सकें। जबकि अंगरेजी चैनलों में बड़े नेता बहस करते नजर आते हैं। हैरत की बात है कि हिंदी चैनलों की इस तरह की उपेक्षा पर अभी तक उनका ध्यान क्यों नहीं गया है। चैनल की बहस और खबरें छवि बनाने में सहायक होती हैं। इस महत्त्वपूर्ण तथ्य को अगर राहुल गांधी नजरअंदाज कर रहे हैं तो फिर उनकी चुनावी रणनीति पर गंभीर सवाल उठते हैं। इसी तरह इंटरनेट के इस्तेमाल में भी कांग्रेस मोदी और केजरीवाल से काफी पीछे नजर आती है।

पिछले साल जनवरी में जयपुर के चिंतन शिविर में राहुल गांधी की उपाध्यक्ष के तौर पर ताजपोशी के बाद कांग्रेस में उम्मीद जगी थी कि अब युवा चेहरा कांग्रेस की धूमिल होती छवि को चमकाने का काम करेगा, लेकिन राहुल ने नौ की जगह बारह सिलेंडर का फैसला लेने में ही एक साल लगा दिया।

मनमोहन सिंह सरकार की तरफ से दागियों को बचाने के लिए हड़बड़ी में लाए गए अध्यादेश को कूड़ेदान का रास्ता दिखा कर राहुल ने वाकई काबिले-तारीफ काम किया था, लेकिन प्रधानमंत्री के अपमान के भाजपा के बयानों के तूफान के पीछे राहुल की नेकनीयत दब गई थी।

2004 के लोकसभा चुनावों में राहुल गांधी ने उस सियासत में उतरने का फैसला किया, जिससे वे अब तक किनारा करते रहे थे। पिता राजीव गांधी की सीट अमेठी से वे चुनाव लड़े और जीते। लेकिन राहुल ने न कोई पद लिया, न संसद में ही मुखर रहे, अलबत्ता इस दौरान विदेश यात्राएं बहुत कीं। सिंगापुर के प्रधानमंत्री की सलाह को मानते हुए देश को समझने निकल गए। दलित के यहां रात काटी, कहीं रोड शो किया, कहीं कॉलेज छात्रों के साथ बातचीत की, कहीं मनरेगा में मिट्टी ढोई तो कहीं सड़क किनारे चाय पी। विपक्ष ने इसे राहुल का राजनीतिक पर्यटन कह कर मजाक उड़ाया, लेकिन उनके दौरे जारी रहे।

उन्होंने गरीब भारत और अमीर इंडिया की बात की, मनरेगा मजदूरों की मजदूरी समय पर और पूरी मिलने का मुद्दा उठाया, दलितों-आदिवासियों के अधिकारों की बात की, राजनीति में आगे आने के मौके मिलने की वकालत की और व्यवस्था को बदल डालने पर जोर दिया। सियासी मोर्चे पर राहुल ने एक बहुत बड़ा फैसला किया। अकेले चुनाव लड़ने का, उत्तर प्रदेश और बिहार में आइसीयू में पड़ी कांग्रेस में फिर से जान फूंकने का।

उनकी पहली बड़ी अग्निपरीक्षा 2007 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में हुई। वहां की सवा चार सौ सीटों में से कांग्रेस ने 1989 में 94 सीटें जीती थीं और उसे करीब अट्ठाईस फीसद वोट मिले थे। 2002 में कांग्रेस को सिर्फ पच्चीस सीटें मिलीं और वोट प्रतिशत गिर कर नौ फीसद पर आ गया। अब राहुल के सामने संगठन खड़ा करने की चुनौती थी, लगातार हार से हताश कार्यकर्ताओं में जोश भरना था। लेकिन वे विवादास्पद बयानों में उलझ गए। एक बार कहा कि अगर गांधी-नेहरूपरिवार का कोई सदस्य 1992 में सक्रिय राजनीति में होता तो बाबरी मस्जिद नहीं गिरती। बांग्लादेश पर कहा कि पाकिस्तान का विभाजन उनके परिवार की ही भारत को देन है। इन पर काफी विवाद हुआ था।

बारह मई 2007 को नतीजे आए तो कांग्रेस की सीटें पच्चीस से घट कर बाईस रह गर्इं। उसका वोट प्रतिशत भी गिर कर 8.61 फीसद रह गया। राहुल ने तब कहा था कि दरअसल, उत्तर प्रदेश में हमारा   संगठन नहीं है। हमें संगठन फिर से खड़ा करना है और हम यह करके रहेंगे। पांच साल बाद 2012 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में कांग्रेस


फिर पिटी, उसके हिस्से सिर्फ अट्ठाईस सीटें आर्इं, तो राहुल ने पुरानी बात ही दोहरा दी। हार की सारी जिम्मेदारी अपने ऊपर ले ली। यह एक अच्छा संकेत था कि राहुल हार को भी चुनौती की तरह लेते हैं। लेकिन सवाल है कि आखिर उत्तर प्रदेश में कांग्रेस पिट क्यों गई?

हार के कारणों की अभी विवेचना ही हो रही थी कि राहुल को सितंबर 2007 में कांग्रेस महासचिव बनाया गया। साथ ही छात्र संगठन एनएसयूआइ और युवक कांग्रेस की जिम्मेदारी दी गई। नई जिम्मेदारी लेते समय उन्होंने कहा था कि उन्हें एक बेजान संगठन मिला है, जिसमें जान फूंकनी है। राहुल ने टैलेंट हंट यानी प्रतिभा की तलाश का अभियान शुरू किया। नेता बनो, नेता चुनो का नारा लगा। राहुल ने कहा कि हर दूसरे साल युवक कांग्रेस के नेताओं की सूची कांग्रेस को दी जाएगी। इन्हें फिर कांग्रेस आगे बढ़ाएगी।

राहुल ने केजी राव, जेएम लिंग्दोह, एन गोपालस्वामी और टीएस कृष्णमूर्ति जैसे पूर्व चुनाव आयुक्तों से सुझाव लिए। युवक कांग्रेस में चुनाव की प्रक्रिया शुरू हुई। सदस्यता चार गुना बढ़ कर एक करोड़ पार कर गई। राहुल ने इन सदस्यों को आम आदमी के सिपाही का दर्जा दिया। कहा कि उनका काम मनरेगा, जननी सुरक्षा, राशन की दुकानों जैसी योजनाओं पर नजर रखने का होगा।

इसके लिए उन्हें सूचना के अधिकार के इस्तेमाल के बारे में खासतौर पर प्रशिक्षण दिया गया। उत्तर प्रदेश में राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन के तहत चल रही जननी सुरक्षा योजना में नौ हजार करोड़ से ज्यादा के फर्जीवाड़े का पता ‘आम आदमी के सिपाही’ ने ही लगाया था।

राहुल ने 2012 के विधानसभा चुनावों के दौरान इसे बड़ा मुद््दा भी बनाया। लेकिन अफसोस कि इस योजना को उनके दल के वरिष्ठ नेताओं ने ही पलीता लगा दिया। कांग्रेस शासित असम में सात से आठ हजार आम आदमी के सिपाही वहां राशन की दुकानों में हो रही गड़बड़ियों की जांच के लिए भेजे गए। उनके और राज्य सरकार के नेताओं के बीच टकराव शुरू हो गया। आरोप लगा कि एक राजनीतिक दल को एक एनजीओ की तर्ज पर नहीं चलाया जा सकता। राहुल गांधी को आखिरकर इस प्रयोग को रोकना पड़ा।

किसी की समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर राहुल चाहते क्या हैं। उन्होंने साफ कर दिया था कि उनकी प्रधानमंत्री बनने में कोई रुचि नहीं है। वे शादी करने के भी इच्छुक नहीं हैं। दिल्ली में जनलोकपाल को लेकर इतना बड़ा आंदोलन हुआ, लेकिन राहुल खामोश रहे। लोकपाल विधेयक पर बहस के दौरान जरूर लोकपाल को संवैधानिक संस्था का दर्जा देने का प्रस्ताव दिया, जो मतदान के दौरान गिर गया। निर्भया बलात्कार कांड पर युवा वर्ग जब इंडिया गेट और विजय चौक पर पुलिस के डंडे खा रहा था तब भी राहुल चुप रहे। बाद में वे और सोनिया गांधी देर रात अपने घर के बाहर धरना दे रहे नौजवानों से जरूर मिले, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी।

राहुल को पिछले साल जनवरी में जयपुर के चिंतन शिविर में पार्टी का उपाध्यक्ष बनाया गया। उसके बाद कर्नाटक में कांग्रेस जीती। पार्टी ने सारा श्रेय राहुल को दिया। लेकिन साल के अंत में दिल्ली, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में कांग्रेस को पूरी तरह शिकस्त खानी पड़ी। राहुल को लगा कि मनरेगा की तरह भोजन का अधिकार कांग्रेस की झोली में वोट गिराएगा, लेकिन ऐसा हो नहीं सका। अब उनकी नजर गांवों के गरीबों और शहरी निम्न मध्यवर्ग पर है। इनकी कुल आबादी सत्तर करोड़ के करीब है। वे इनको अधिकार दिए जाने को मुख्य चुनावी मुद््दा बना रहे हैं। मनरेगा के जरिए रोजगार का अधिकार, शिक्षा का अधिकार, सूचना का अधिकार और भोजन का अधिकार।

चार राज्यों में बुरी तरह पिटने के बाद लगता है कि राहुल समझ गए कि महंगाई और भ्रष्टाचार मनमोहन सिंह सरकार के अच्छे कामों पर भी भारी पड़ रहे हैं। यही वजह है कि उन्होंने जोर लगाया और लोकपाल विधेयक पास करवा दिया। महंगाई की मार कम करने के लिए बारह सिलेंडर की मांग पूरी करवाई। दिल्ली में आम आदमी पार्टी से भी राहुल सीख रहे हैं। वे रेहड़ी वालों से, आदिवासी महिलाओं से, रिक्शे वालों से, मजदूरों-कुलियों से पूछ रहे हैं कि कांग्रेस का घोषणापत्र किस तरह का होना चाहिए। राहुल ने रणनीति बदली है। महंगाई और भ्रष्टाचार पर जनता का गुस्सा कम करने में लगे हैं।

कांग्रेस शासित राज्यों से एपीएमसी एक्ट (कृषि उत्पाद विपणन समिति अधिनियम) में संशोधन करने को कहा गया है, ताकि किसान सब्जियां और फल सीधे बेच सकें। इससे किसानों और उपभोक्ताओं दोनों को लाभ होगा। लोकपाल के बाद उन्होंने भ्रष्टाचार-निरोधक अन्य छह विधेयकों को भी पारित कराने पर जोर दिया। लेकिन घोटालों की पोल खोलने वालों को संरक्षण देने वाला विसलब्लोअर विधेयक ही पारित हो सका।

राहुल गांधी इस बार कांग्रेस का चेहरा होंगे, लेकिन चुनावों में मनमोहन सिंह सरकार के कामकाज की परख होगी। राहुल अक्सर कहते हैं कि यूपीए सरकार ने काम तो अच्छा किया है, लेकिन उसका प्रचार-प्रसार नहीं हुआ है। राहुल इसके अलावा ‘सिस्टम’ बदलने की बात करते हैं। जाहिर है कि उन्हें सरकार के कामों का प्रचार करना है, छवि चमकानी है और व्यवस्था को बदलने का खाका पेश करना है। समय बहुत कम है, काम बहुत ज्यादा। सबसे बड़ी बात है कि मोदी के अलावा अब अरविंद   केजरीवाल से भी मुकाबला है।

 

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