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Thursday, 13 March 2014 12:17

गणपत तेली

जनसत्ता 13 मार्च, 2014 : दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की गुजरात यात्रा और दिल्ली में

भारतीय जनता पार्टी कार्यालय पर आम आदमी पार्टी और भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ताओं के टकराव की तमाम घटनाओं के बीच यह स्पष्ट हो गया है कि आम आदमी पार्टी अपने आप को राष्ट्रीय चुनावों में भाजपा के समक्ष खड़ी करने में सफल हो रही है। इससे पहले भी आम आदमी पार्टी ने भाजपा और नरेंद्र मोदी को कई मौकों पर ललकारा लेकिन मोदी ने कभी उसका जवाब नहीं दिया और चतुराई से भाजपा भी इन सभी मुद्दों को टालती रही। कई बार सीधे-सीधे खुद पर स्पष्ट सवाल उठाए जाने के बावजूद मोदी आप और इसके नेताओं को नजरअंदाज करते रहे।

 

दिल्ली के विधानसभा चुनावों के दौरान कांग्रेस और भाजपा दोनों ही पार्टियां आम आदमी पार्टी (आप) को खारिज करती रहीं, लेकिन आप को सफलता मिली। इस सफलता के बाद आप ने लोकसभा चुनाव लड़ने का फैसला किया। नवंबर-दिसंबर में हुए विधानसभा चुनावों के बाद यह स्पष्ट लग रहा था कि कांग्रेस मुकाबले में पिछड़ी हुई है, और भाजपा की बढ़त है। इस हालात में आप का मुख्य मुकाबला भाजपा से होगा। योगेंद्र यादव, अरविंद केजरीवाल और अन्य नेताओं ने कई बार इस बात को रेखांकित भी किया कि उनका मुकाबला भाजपा से है।

जाहिर-सी बात है कि आम आदमी पार्टी के लिए यह कहना एक बड़ी चुनौती थी, क्योंकि इस मुकाबले को भौतिक रूप देना कोई आसान बात नहीं थी। आम आदमी पार्टी लगभग एक साल ही पुरानी थी और दिल्ली के अलावा कहीं बड़ा जनाधार भी स्पष्ट नहीं हुआ था। यह स्थिति भारतीय जनता पार्टी से तुलना करने लायक तो कहीं से नहीं ही थी। दूसरी ओर, दिल्ली में भी कई लोग ऐसे थे जो विधानसभा में आप को वोट दे रहे थे लेकिन मोदी को प्रधानमंत्री बनाने की इच्छा रखते थे, मतलब पार्टी का राष्ट्रीय स्तर पर महत्त्व नहीं देख रहे थे।

आम चुनावों में भाजपा से मुकाबले के लिए यह आवश्यक था कि जिस तरह के आरोप-प्रत्यारोप राजनीतिक दलों, जैसे कि भाजपा और कांग्रेस के बीच चलते हैं, उनमें आम आदमी पार्टी भी शामिल हो पाए। यह शामिल होना उन्हें मुख्य बहस में ले आने वाला था। दिल्ली राज्य के स्तर की बहसों में तो यह हो चुका था, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर यह संभव करना आम आदमी पार्टी के लिए बड़ी चुनौती थी। अरविंद केजरीवाल की रोहतक, कानपुर की रैलियों में और अन्य मंचों, साक्षात्कारों में मोदी से अडानी, अंबानी से जुड़े सवाल, मोदी की रैलियों के खर्चे, गैस मूल्य निर्धारण आदि पर पूछे गए सवालों को भाजपा के तमाम नेता स्पष्ट रूप से टालते रहे, जिससे भाजपा बनाम आप या मोदी बनाम केजरीवाल की स्थिति न बन पाए, क्योंकि कांग्रेस बनाम भाजपा या राहुल बनाम मोदी से ही भाजपा लाभजनक स्थिति में थी।

वैसे दिल्ली सरकार के विवादों के दौर में यह उम्मीद भी जल्दबाजी ही थी कि कुल जमा दो महीनों में आम आदमी पार्टी कई महीनों से प्रधानमंत्री पद की तैयारी कर रहे व्यक्तिसे अपने आप को बहस में शामिल करवा लें, और बहस भी ऐसी जिसमें बहुत से असुविधाजनक मसले हैं, क्योंकि आप कुछ ऐसे सवाल भी पूछ रही है जिन्हें आमतौर पर राजनीतिक पार्टियां नहीं पूछती हैं। प्राय: वे सवाल सामाजिक-राजनीतिक सरोकारों से जुड़े कुछ लोग उठाते रहते हैं, जिनका राजनेताओं के लिए कोई महत्त्व नहीं था और प्रचार के अभाव में राजनेताओं का इनसे कोई नुकसान भी नहीं हो पाता था।  ऐसे में अरविंद केजरीवाल का गुजरात दौरा एक महत्त्वपूर्ण कदम साबित हो रहा है।

विभिन्न आकड़ों की बात छोड़ दीजिए, यह छिपी बात नहीं है कि गुजरात में रेल लाइन के किनारे वैसी ही बदहाल कच्ची बस्तियां दिखाई देती हैं जैसी अन्य राज्यों में, नदियां उतनी ही प्रदूषित हैं, स्कूल-कॉलेज बदहाल हैं, अस्थायी कर्मचारियों के शोषण की सीमा नहीं है। हो सकता है, यह अमदाबाद जैसे बड़े शहरों में न दिखाई दे, लेकिन हम दिल्ली-मुंबई जैसे शहरों को देख कर पूरे देश की स्थिति तो नहीं पता कर सकते हैं। यही बात गुजरात में भी है।

अभी तक गुजरात केंद्रीय विश्वविद्यालय और भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आइआइटी) गांधीनगर को परिसर के लिए जगह नहीं उपलब्ध करवाई गई है, ये अभी तक किराए की इमारतों में चल रहे हैं। किसानों की हालत खराब है, उनकी जमीन कौड़ियों के दाम पर अधिग्रहीत कर उद्योगपतियों को दे दी गई। यह भी साफ है कि कई विकासमूलक सूचकांकों में गुजरात की स्थिति अच्छी नहीं है।

कुपोषण के बारे में तो खुद मुख्यमंत्री ही कह चुके हैं कि शाकाहारी खानपान और ‘स्लिम’ होने की आकांक्षा है इसका कारण। साथ ही, वहां सामाजिक सुरक्षा और मानवाधिकारों की स्थिति भी ठीक नहीं है। ये वे मुद्दे हैं, जो सूबे के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के उस बहुप्रचारित विकास के मॉडल को प्रश्नांकित करते हैं जिसे वे तुरुप के इक्के की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं। पिछले कई महीनों से अपने भाषणों में वे स्वयं और भाजपा के नेता इसी को मुद्दा बना रहे हैं। यहां तक कि अभी टीवी पर गुजरात के विकास के विज्ञापन इस तरह चल रहे हैं कि मानो चुनाव लोकसभा के न होकर गुजरात विधानसभा के हो रहे हैं। और अब इसी पर सवाल!

यह भी गौरतलब है कि कुछ मानवाधिकारवादी कार्यकर्ताओं के अलावा किसी राजनीतिक


पार्टी ने सक्रियता के साथ इस मॉडल पर सवाल नहीं उठाए। कांग्रेस ने इस चुनाव को सांप्रदायिक बनाम सेक्युलर बनाने की कोशिश की, लेकिन बढ़ती महंगाई और भ्रष्टाचार के कारण कांग्रेस का यह दांव चला नहीं। यह   कांग्रेस की विफलता ही कही जाएगी कि वह सांप्रदायिकता के मुद्दे पर मोदी को घेर नहीं पाई। जबकि ऐसा नहीं है कि यह मुद्दा खत्म हो गया है, दंगाइयों को सजा मिल गई है, पीड़ितों का ठीक से पुनर्वास हो गया है और एक समावेशी समाज साकार हो गया है। स्पष्ट रूप से 2002 के घाव आज भी वहां दिखाई देते हैं।

तो भाजपा को जो विस्तृत मैदान मार लिए जाने के लिए खाली दिखाई दे रहा था, उसमें आम आदमी पार्टी भी प्रतिस्पर्धी बन कर उतर गई। आप भ्रष्टाचार केंद्रित जो सवाल कांग्रेस से पूछ रही थी, वही भारतीय जनता पार्टी से भी पूछने शुरू कर दिए और अब उसके द्वारा प्रचारित विकास के मॉडल को भी प्रश्नांकित करना शुरू कर दिया। हालांकि एक पक्ष यह भी सामने आ रहा है कि आप की स्थानीय इकाई मोदी के खिलाफ मुखर नहीं है, केंद्रीय नेतृत्व ही इसे पुरजोर तरीके से उठा रहा है। फिर भी अपनी गुजरात यात्रा में आप के नेताओं ने दूरदराज के हिस्सों में जाकर वहां की स्थिति बयान की और इसे वे प्रभावशाली तरीके से रखने में सफल रहे।

आप के नेताओं का यह कदम मोदी के तथाकथित विकास के मॉडल की पोल तो खोलता ही है, साथ ही, अरविंद केजरीवाल के काफिले को रोक कर उन्हें पुलिस थाने ले जाने और अगले दिन मोदी से मिलने न दिए जाने की कार्रवाई ने मोदी और केजरीवाल को आमने-सामने कर दिया। पहले दिन की घटना के विरोध प्रदर्शन के फलस्वरूप दिल्ली सहित अनेक शहरों में भाजपा कार्यालयों पर आम आदमी पार्टी के प्रदर्शन और इसके बाद हुई झड़पों ने दोनों दलों को भी आमने-सामने ला खड़ा किया। अब आप और भाजपा के बीच भी आरोप-प्रत्यारोप शुरू हो गए।

अब तक भाजपा और मोदी द्वारा आप के सवालों का जवाब नहीं दिया जाना, उन्हें टालने और महत्त्वहीन मानने का संकेत करता था, लेकिन गुजरात जाने के बाद ये सब सवाल पूछना केजरीवाल सहित आप के नेताओं के पक्ष को मजबूत करता है। अब मोदी अगर अरविंद केजरीवाल के सवालों का जवाब देते हैं, तो यह सीधा-सीधा केजरीवाल को अपने समकक्ष स्थान देना होगा। और जवाब नहीं दिया जाना, जवाब न होने और अहंकार आदि की श्रेणी में आएगा। मोदी से मुखातिब होने के लिए जा रहे आप के नेताओं को रास्ते में रोक लिया जाना और उन्हें मिलने का वक्त नहीं दिया जाना भी मोटे तौर पर यही संदेश देता है कि मोदी के पास जवाब नहीं है, वे ऐसे व्यक्तिहैं जो सवालों से कतराते हैं। दो टीवी साक्षात्कारों को बीच में छोड़ने के बाद उनकी यह छवि बनी थी, वैसे भी पत्रकारों से बात नहीं करते हैं, हाल ही में उन्होंने मधु त्रेहन के साथ साक्षात्कार को भी एकाध दिन पहले रद्द कर दिया। चाहे भाजपा आप नेताओं के गुजरात दौरे को प्रचार-लोलुपता कह कर खारिज करे, इसके प्रभाव को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

इस प्रकार, लोकसभा चुनावों के नतीजों पर इसका कितना प्रभाव पड़ेगा, यह तो आने वाले दिनों में ही स्पष्ट हो पाएगा, लेकिन आम आदमी पार्टी खुद को भाजपा के साथ मुखामुखम की स्थिति में ले आई है। विवादों, संगठन की कमी, मत वैभिन्यता आदि के बावजूद वह इन लोकसभा चुनावों में एक पक्ष बन कर उभर रही है। चाहे यह पार्टी स्वयं सफलता दर्ज न कर पाए, लेकिन नतीजों को प्रभावित करने की क्षमता रखती है।

दूसरी तरफ, दिल्ली में भाजपा कार्यकर्ताओं ने जिस तरह से हिंसक झड़प में भागीदारी की, उसने यह भी स्पष्ट कर दिया कि भाजपा में आम आदमी पार्टी को लेकर किस तरह का माहौल है। यह भाजपा के उस डर को प्रकट करता है कि आप उसका खेल बिगाड़ सकती है। साथ ही, हाल का राजनीतिक घटनाक्रम भी भाजपा की इस स्थिति को बयान करता है। एक तो उन्होंने बेकरार होकर उस लोक जनशक्तिपार्टी से गठबंधन किया, जो बारह साल पहले गुजरात के दंगों पर राजग छोड़ कर चली गई और जिसने मोदी और भाजपा की सांप्रदायिकता को कोसने का कोई मौका नहीं छोड़ा था।

उधर नितिन गडकरी महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना से अपील कर रहे हैं कि चुनाव मत लड़ो, वोट बंट जाएंगे। इधर हरियाणा जनहित कांग्रेस और बीएसआर कांग्रेस के साथ जुड़े लोगों के कारण सुषमा स्वराज नाराज हैं। और तो और, वाराणसी सीट पर दावे को लेकर मोदी समर्थक और जोशी समर्थक भिड़ चुके हैं। इस सबसे यह संकेत मिलता है कि भाजपा के नेता और प्रवक्ता कुछ भी कहें, भाजपा भी अभी तक चुनाव के नतीजों को लेकर सशंकित है। मतलब, चुनाव अभी खुला है।

 

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