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लालबत्ती बनाम लोकतंत्र PDF Print E-mail
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Wednesday, 12 March 2014 11:59

केपी सिंह

जनसत्ता 12 मार्च, 2014 : जम्मू एवं कश्मीर विधानसभा में पिछले दिनों लालबत्ती की पात्रता को लेकर हंगामा हो गया।

सत्तापक्ष और विपक्ष के विधायकों ने एक साथ मिल कर सरकार के उन दिशा-निर्देशों का विरोध किया, जिनमें विधायकों से लालबत्ती छीन ली गई थी, पर मुख्य सचिव, पुलिस महानिदेशक और महाधिवक्ता को लालबत्ती का हकदार माना गया था। विधायकों की दलील थी कि वरिष्ठता के क्रम में उनका स्थान मुख्य सचिव और अन्य अधिकारियों से ऊपर है। ऐसे में यह उन्हें मंजूर नहीं था कि उनकी लालबत्ती वापस ले ली जाए और सरकारी अधिकारी लालबत्ती के हकदार बने रहें। विधानसभा अध्यक्ष का यह कथन भी विधायकों को संतुष्ट नहीं कर पाया कि लालबत्ती की पात्रता सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के अनुसार पुन: निर्धारित की गई है।

 

इसके तुरंत बाद मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने ट्विटर पर लिखा कि विधायकों की लालबत्ती की मांग हास्यास्पद है। विपक्षी सदस्यों ने मुख्यमंत्री के इस बयान पर तीखी प्रतिक्रिया की थी कि पूरे सदन में सदस्यों द्वारा उठाई गई मांग को हास्यास्पद कैसे कहा जा सकता है? सरकार के इस स्पष्टीकरण पर कि सर्वोच्च न्यायालय ने केवल संवैधानिक पदों पर आसीन व्यक्तियों को लालबत्ती का हकदार माना है, सदस्य और उत्तेजित हो गए थे। उनका कहना था कि सर्वोच्च न्यायालय के आदेश को सही मायने में लागू किया जाए। उन्होंने पूछा कि मुख्य सचिव, पुलिस महानिदेशक और महाधिवक्ता संवैधानिक पद नहीं हैं, फिर उन्हें लालबत्ती का हकदार क्यों माना गया है? तर्क में दम था।

जम्मू-कश्मीर सरकार ने अंतत: मुख्य सचिव, पुलिस महानिदेशक और महाधिवक्ता को भी उस सूची से हटा दिया, जो लालबत्ती के हकदार माने गए हैं। इस सूची में अब राज्यपाल, मुख्यमंत्री, कैबिनेट मंत्री और उच्च न्यायालय के न्यायाधीश ही शामिल हैं। दूसरी ओर, पंजाब सरकार ने संवैधानिक पदों पर आसीन व्यक्तियों के अतिरिक्त लालबत्ती के पात्र अधिकारियों की एक छोटी सूची जारी कर दी है जिसमें केवल मुख्य सचिव और पुलिस महानिदेशक को लालबत्ती का हकदार माना गया है। हिमाचल प्रदेश, पंजाब और हरियाणा की सरकारें सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों का अभी अध्ययन कर रही हैं। सर्वोच्च न्यायालय द्वारा लालबत्ती के हकदारों की सूची को पुन: निर्धारित करने की समय-सीमा दस मार्च को समाप्त हो गई।

कार के ऊपर गोल-गोल घूमती लालबत्ती हर किसी को आकर्षित करती है। सड़क पर लालबत्ती की गाड़ी देखते ही ट्रक ड्राइवर अनुशासित होकर आसानी से रास्ता दे देता है। साइकिल और रिक्शे वाले बार्इं ओर कतारबद्ध हो जाते हैं। स्कूल जाने वाले बच्चे कौतूहल से कार के अंदर झांकने की कोशिश करते हैं। कार के अंदर बैठा व्यक्ति यह सब देखता रहता है और अपनी किस्मत पर इठलाने को बाध्य हो जाता है। कुछ ऐसी ही होती है लालबत्ती की महिमा और उसके हकदार का सार्वजनिक रुतबा।

लालबत्ती महज लाल रंग की एक बत्ती नहीं है। लालबत्ती राजशाही के प्रतीकों जैसा ही एक प्रतीक है। यह प्रतीकवाद को पोषित करती हुई एक परंपरा है, जो खास को आम से अलग होने का अहसास कराती है। राजशाही और सामंतवादी ताकतें इसी प्रकार के प्रतीकों के सहारे अपनी हैसियत ढूंढ़ा करती थीं। अंग्रेजों ने इसी प्रकार के प्रतीकों के बलबूते इस देश पर शताब्दी से अधिक समय तक राज किया था। अंग्रेजी परंपराएं और प्रतीक अब भी देश से पूर्ण रूप से विदा नहीं हुए हैं। लेकिन यह सिर्फ औपनिवेशिक अवशेष का मामला नहीं है। वरना आज की तुलना में आजादी के शुरुआती वर्षों में इसका चलन अधिक दिखता। सच तो यह है कि सत्ता के दुरुपयोग के दूसरे मामलों की ही तरह लालबत्ती का इस्तेमाल और वीआइपी सुरक्षा का तामझाम भी बढ़ता गया है।

दूसरों से अलग होने के अहसास की चाहत कोई बहुत बड़ी बात नहीं है। हम सभी एक-दूसरे से अलग हैं। मुश्किल यह है कि लालबत्ती अलग होने के अहसास के साथ-साथ दूसरों से श्रेष्ठ होने का छद्म अहसास भी कराती है। योग्यता के मापदंड पर हम सभी एक समान नहीं हैं। एक श्रेष्ठ है तो दूसरा उससे भी श्रेष्ठ या कम श्रेष्ठ हो सकता है। श्रेष्ठता का आत्म-बोध अपने आप में कोई गलत बात नहीं है। पर जब यह आत्म-बोध भी सार्वजनिक प्रदर्शन का विषय बन कर दूसरों को कमतर होने का अहसास कराने लगे तब अनर्थ हो जाता है। लालबत्ती के विरोध को इसी परिप्रेक्ष्य में समझने की जरूरत है।

राजनीतिकों और नौकरशाहों में लालबत्ती का आकर्षण इसीलिए है क्योंकि यह उन्हें उनकी ऊंची हैसियत और ताकतवर होने का अहसास कराती है। लेकिन रुतबे की उनकी इस भूख ने एक बड़ी खाई भी निर्मित की है जिसमें सत्तासीन और ऊंचे ओहदेदार साधारण भारतीय से बहुत दूर खड़े नजर आते हैं।

लालबत्ती की तरह सुरक्षा-व्यवस्था भी अधिकांशत: यही काम करती है। कुछ लोगों को विशिष्ट श्रेणी की सुरक्षा मुहैया कराना राज्य का कर्तव्य माना जा सकता है, पर इसका दायरा जिस तरह फैलता गया है उसमें बहुत-से स्थानीय राजनीतिक और संदिग्ध पृष्ठभूमि के लोग भी शामिल हो गए हैं। दूसरी ओर, सामान्य कानून-व्यवस्था के लिए पुलिसकर्मियों का हमेशा टोटा बना रहता है।

सच्ची लोकतांत्रिक व्यवस्था व्यक्ति के श्रेष्ठता-बोध के सार्वजनिक प्रदर्शन की इजाजत नहीं देती। लोकतंत्र की आत्मा समानता के पवित्र अधिकार में बसती है। समानता का अधिकार गणतंत्र का महापर्व है। प्रत्येक व्यक्ति अपने आप में श्रेष्ठ है और किसी को भी कमतर होने का अहसास


कराने वाली प्रणाली निंदनीय ही होनी चाहिए। लालबत्ती इस आधार पर अपने आप में कोई प्रशंसनीय अवधारणा नहीं है। फिर संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों के लिए इसकी वकालत क्यों हो रही है?

पुलिस अधिकारी लालबत्ती के महत्त्व को जरूरत के आधार पर परिभाषित करते हैं। उनके अनुसार लालबत्ती आपातकालीन स्थिति में कुछ विशेष प्रकार के वाहनों के लिए रास्ता छोड़ देने की हिदायत का प्रतीक है। इस तर्क के आधार पर मरीज को ले जा रही एंबुलेंस, दुर्घटनास्थल पर राहत के लिए जाते हुए पुलिस और अन्य वाहन और अपराधियों का पीछा कर रहे पुलिस के वाहनों पर लालबत्ती की सार्थकता नजर आती है। राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री जैसे विशिष्ट ओहदेदारों के वाहनों को रास्ता दिखाने के लिए लगाई गई पायलट गाड़ी पर भी लालबत्ती की जरूरत हो सकती है। पर इन महानुभावों द्वारा स्वयं के लिए प्रयोग की जा रही गाड़ी पर लालबत्ती का क्या औचित्य है?

पुलिस ड्यूटी कर रहे वाहनों, कर की चोरी कर रहे वाहनों की चेकिंग कर रहे सरकारी वाहनों और एंबुलेंस को छोड़ किसी भी वाहन पर लालबत्ती या किसी अन्य प्रतीक चिह्न की आवश्यकता नहीं है। इस सत्य को स्वीकार करने में कठिनाई हो सकती है, पर सत्य को सत्य कहने से ही स्वस्थ्य परंपराएं जन्म लेती हैं।

सर्वोच्च न्यायालय ने संवैधानिक पदों पर आसीन व्यक्तियों के वाहनों पर लालबत्ती के प्रयोग को उचित माना है। सुरक्षा के मद््देनजर सर्वोच्च न्यायालय की इस राय पर फिर से गौर करने की गुंजाइश है। इन पदों पर नियुक्त व्यक्तियों को कई बार न्याय की खातिर या जनहित में कुछ ऐसे फैसले लेने पड़ते हैं जिनके कारण कोई भी प्रभावित व्यक्ति उन्हें नुकसान पहुंचाने की सोच सकता है। महात्मा गांधी, इंदिरा गांधी और राजीव गांधी की हत्या इस दलील की पुष्टि करते हैं।

इसीलिए संवैधानिक पदों को सुशोभित करने वाले व्यक्तियों की सुरक्षा करना पुलिस की अहम जिम्मेदारी होती है। पुलिस के अधिकारियों का मानना है कि ऐसे व्यक्तियों की सुरक्षा का पहला सिद्धांत काफिले में उनकी कार की पहचान को गुप्त बनाए रखना होता है।

इसलिए उनके काफिले में एक जैसी कई कारें शामिल की जाती हैं जिन पर कोई भी प्रतीक चिह्न लगाना वर्जित होता है। फिर उनके वाहनों पर लालबत्ती के प्रयोग की इजाजत देने के पीछे क्या प्रयोजन हो सकता है? समय आ गया है कि प्रतीकों पर आधारित प्रणाली को अलविदा कह दिया जाए। दिल्ली में आम आदमी के राजनीतिक अभ्युदय की कहानी ने बता दिया है कि जनता शासन-प्रणाली से क्या उम्मीद रखती है? विशिष्ट बने रह कर जन-आकांक्षाओं को पूरा करने का दम भरने के दिन लद चुके हैं। लोकतंत्र की सही परिभाषा- जनता का शासन, जनता के द्वारा, जनता के लिए- को सही मायने में समझने की जरूरत है। एक गणतांत्रिक व्यवस्था में प्रतीकवाद, अहंकार और अधिनायकवाद के लिए कोई स्थान नहीं होना चहिए।

इस मुद्दे से जुड़े हुए एक और विषय पर भी चर्चा की जरूरत है। उच्च पदों पर आसीन जन-प्रतिनिधियों और अफसरों का रुतबा उनके दफ्तरों की चारदीवारियों तक तो समझ में आता है। दफ्तर के बाहर सड़कों पर उनकी और आम आदमी की हैसियत में कोई अंतर नहीं होता है।

समाज को व्यक्ति की सामाजिक हैसियत उसके व्यक्तिगत गुणों और अधिमान के आधार पर स्वयं निर्धारित करने की छूट होनी चाहिए। इस प्रक्रिया में उसका ओहदा बीच में नहीं आना चाहिए। पद के साथ जुड़ी हैसियत के सार्वजनिक मंचन की वर्जना संविधान में भी उल्लिखित है। संविधान में उल्लेख है कि सैन्य सेवा और शिक्षा के आधार पर अर्जित की गई उपाधियों को छोड़ बाकी किसी प्रतीकात्मक सम्मान का सार्वजनिक प्रदर्शन नहीं होगा।

भारत में अंग्रेजों ने राज-व्यवस्था को चलाने के लिए ओहदेदारों के महिमामंडन की शुरुआत की थी। किसी को राय बहादुर तो किसी को सरदार बहादुर की उपाधि दी थी। उनकी सत्ता इसी प्रकार के प्रतीकों की मोहताज थी, जिन्हें पाकर भारतीय धन्य हो जाया करते थे। यह धारक की सार्वजनिक हैसियत की घोषणा भी होती थी। विदेशी शासकों के लिए इस प्रकार की व्यवस्था जरूरी थी ताकि देशी जनता में से कुछ को अधिनायक बना कर बहुसंख्यकों पर राज किया जा सके। गणतंत्र में इस प्रकार के सत्ता-प्रतीकों को अधिमान देना गुलामी को सलामी देने के समान है।

लालबत्ती के प्रयोग पर सवाल उठा कर सर्वोच्च न्यायालय ने एक अच्छी शुरुआत की है। इस शुरुआत को अभी और आगे ले जाने की जरूरत है। लालबत्ती के अलावा और भी कई प्रकार के प्रतीक सरकारी और गैर-सरकारी वाहनों पर देखे जा सकते हैं, जो वाहन में बैठे व्यक्ति की पहचान की सार्वजनिक घोषणा करते हैं। इनमें तरह-तरह के झंडे, चिह्न और पदनाम की तख्तियां शामिल हैं। इनमें से कुछ प्रतीकों को अंग्रेजों द्वारा बनाए गए कायदे-कानूनों में मान्यता प्राप्त है और कुछ का कोई आधार नहीं है। इस प्रकार के चिह्नों पर भी प्रतिबंध लगाने की आवश्यकता है।

 

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