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सत्ता की प्रयोगशाला में PDF Print E-mail
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Monday, 10 March 2014 11:32

विकास नारायण राय

जनसत्ता 10 मार्च, 2014 : कांग्रेस के देश पर लंबे अरसे के शासन ने राजनीतिक खेल के तमाम अन्य खिलाड़ियों को

राज हथियाने का एक ‘अनुकरणीय’ मॉडल भी दिया है। सत्ता के दावेदारों के लिए सीधा समीकरण बनता है कि अगर राज चाहिए तो कांग्रेस बनो यानी कांग्रेसांतरण! 2014 के चुनावी समर में उतरने तक प्रमुख दावेदार भाजपा इस मॉडल को पूरी तरह आत्मसात कर चुकी है। जब-तब तीसरे मोर्चे के नाम पर भी यही मॉडल झाड़-पोंछ कर बाहर निकला जाता रहा है। वही खेल इस बार भी चल निकला है।

 

यह सफल कांग्रेसी मॉडल दो प्रमुख आयामों पर आधारित है। सभी का गीत गाना, पर पूंजी से असल याराना और ‘परखनली लोकतंत्र’ में सिद्धहस्तता। आज के चुनावी परिदृश्य की शब्दावली में इन आयामों को क्रमश:परिभाषित करने वाली अभिव्यक्तियां हैं: ‘क्रोनी कैपिटलिज्म’ और ‘प्राइमरी’। पहली नजर में यह विस्मयकारी लगेगा कि दोनों अभिव्यक्तियां चुनावतंत्र में नए खिलाड़ी ‘आप’ की कवायदों से रेखांकित हुई हैं। एक तरह से यह ‘आप’ द्वारा कांग्रेस की पोलपट्टी का खुलासा ही है, और साथ ही भाजपा और दीगर सत्ताभिलाषी पार्टियों के कांग्रेसांतरण का भी। इन अभिव्यक्तियों में स्वयं आप के लिए भी चुनौती निहित है कि सत्ता की दौड़ में ताजातरीन शामिल पार्टी इस कांग्रेसी मॉडल से कहां तक परहेज कर पाएगी।

सामान्यतया बहुपार्टी प्रणाली में राजनीतिक दलों को इस या उस वर्ग के हितों के प्रतिनिधि के रूप में देखा जाना चाहिए। पर कांग्रेस हर वर्ग के हितों की प्रमुख प्रतिनिधि होने का दावा करती आई है। स्वतंत्रता संघर्ष की राष्ट्रव्यापी अगुआई करने वाली पार्टी के लिए शुरुआत में यह छूट लेना स्वाभाविक भी रहा होगा। महिला से लेकर मीडिया तक, श्रमिक से सरमायेदार, किसान से कमेरा, उपभोक्ता से व्यापारी, विद्यार्थी से बुद्धिजीवी, पेशेवर से अकुशल, संगठित से असंगठित, युवा, बेरोजगार, दलित, आदिवासी, पिछड़ा, अगड़ा, अल्पसंख्यक, अध्यापक, वकील, डॉक्टर, सैनिक, कर्मचारी, अफसर, पेंशनयाफ्ता, शहरी, ग्रामीण, वनवासी, हर नाम पर पार्टी के प्रकोष्ठ हैं। हर एक के सामने फेंकने के लिए छोटे-बड़े टुकड़े होते हैं कांग्रेसी सरकारों के बजट में।

आज की भाजपा इस लिहाज से कांग्रेस का हूबहू प्रतिबिंब नजर आती है। पिछले दो दशक से देश में आक्रामक रूप से पैठे बाजारवाद के पिछलग्गू बने दोनों राजनीतिक दलों की नीतियों, योजनाओं और प्रशासनिक कारगुजारियों में खालिस पूंजीपरस्ती और छद्म जनवाद सहज ही रमता गया है। भाजपा के नायक मोदी का ‘सुशासन’ का फार्मूला ले-देकर यही तो है कि उनके राज में फाइलें तेज निकलेंगी, जबकि कांग्रेसी प्रशासन का पहिया लालफीताशाही में फंसा रहता है।

आम भारतीय की तो कोई फाइल होती नहीं, लिहाजा उसके लिए दोनों दलों के पास एक जैसे प्रकोष्ठ और एक जैसे टुकड़े होते हैं। सत्ता प्रतिष्ठानों पर, जिनमें मीडिया का बड़ा वर्ग भी शामिल है, पूंजी की जकड़बंदी की बानगी है कि आम आदमी की राजनीति करने वाली पार्टी के नायक केजरीवाल को भी दिल्ली की कुर्सी छोड़ने के तुरंत बाद पूंजीपतियों की सभा को आश्वस्त करना जरूरी लगा। बेशक उन्होंने उसी सभा में पूंजी और प्रशासन के भ्रष्ट याराने (क्रोनी कैपिटलिज्म) को खारिज करने की हिम्मत भी दिखाई।

2014 के चुनावी दौर में, आज दस वर्ष के अंतराल पर, अगर भाजपा एक बार फिर स्वयं को केंद्रीय सत्ता की मंजिलों के नजदीक पा रही है तो यह इस पार्टी के, अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व से गति पाए, पिछले दो दशक के कांग्रेसांतरण की ही महिमा है। भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह के, 2002 के गुजरात जनसंहार को लेकर, आज मुसलिम समुदाय से सरेआम माफी मांगने में पार्टी के सांस्कृतिक कांग्रेसांतरण की भूमिका देख पाना क्या मुश्किल है? वाजपेयी ने बतौर प्रधानमंत्री मोदी को इसी ‘राजधर्म’ की सीख दी थी? कांग्रेसियों ने भी 1984 के सिख जनसंहार से रिकार्ड चुनावी फसल काटने के बाद कालांतर में इसी अंदाज में तो सिख समुदाय से माफी मांगी थी।

राष्ट्रीय सुरक्षा और आंतरिक सुरक्षा, चीन से सीमा विवाद या अनुच्छेद 370 जैसे मुद््दों पर भाजपा खुद को कांग्रेस से बड़ी राष्ट्रवादी दिखाना चाहती है। पर नक्सल मोर्चे पर क्या भाजपाई और कांग्रेसी राष्ट्रवाद एक दूसरे के प्रतिबिंब ही नहीं? छत्तीसगढ़ में सरकार भाजपा की है और नक्सली हमलों में जान शीर्ष कांग्रेसियों को गंवानी पड़ी! क्यों स्वयं मोदी को मौजूदा चुनाव प्रचार में चीन की विश्व-व्यापार में व्यापक पैठ की तारीफ करनी पड़ रही है?

भाजपा के आर्थिक कांग्रेसांतरण की वस्तुस्थिति को, केजरीवाल की ‘क्रोनी कैपिटलिज्म’ वाली टिप्पणी के संदर्भ में, दो ताजा उदाहरणों से आंका जा सकता है। देश की राजनीतिक सत्ता हथियाने निकले ‘चाय वाले’ मोदी का असली याराना किनसे है, यह जगजाहिर है। मुकेश अंबानी की गैस-कीमतों में धांधली और डीएलएफ के रॉबर्ट वडरा प्रकरण, दोनों में कांग्रेसी सरकारी तंत्र की आपराधिक संलिप्तता पर मोदी के नेतृत्व में चल रहे भाजपा के राष्ट्रव्यापी चुनावी अभियान में पूर्ण चुप्पी चल रही है।

सुब्रत राय (सहारा) और विजय माल्या (किंगफिशर) जैसी दर्जनों कॉरपोरेट धोखेबाजियां भी, जो इस दौर में सार्वजनिक हुई हैं, चुनावी चर्चा से बाहर हैं। क्योंकि मुकेश अंबानी और डीएलएफ ही नहीं, तमाम क्रोनी कॉरपोरेटों की भाजपाइयों, और तीसरे मोर्चे से भी, वैसी ही परस्पर लाभप्रद घनिष्ठता बन चुकी है जैसी कांग्रेस से रही है।

भ्रष्ट याराने का दूसरा उदाहरण कहीं अधिक गंभीर है और सत्ता के तमाम दावेदारों के कांग्रेसांतरण के लिहाज से कहीं अधिक सटीक भी। भारतीय रुपये को कृत्रिम रूप से ‘मजबूत’ रखने के मोर्चे पर मनमोहन सरकार ने शायद ही कभी राजनीतिक अकेलापन महसूस किया हो।


ऐसी राष्ट्रीय सहमति बेमिसाल है। यहां तक कि भाजपा ने अब गल-गली में बेलगाम विदेशी निवेश के मुद््दे पर भी दिखावटी परहेज तक करना छोड़ दिया है। सवाल है सस्ता डॉलर किसे चाहिए? उन यार पूंजीपतियों को ही तो, जो विदेशों में भारी डॉलर निवेश कर रहे हैं, जिसकी मात्रा भारत में हो रहे नकद विदेशी निवेश से कहीं ज्यादा है। ये आंकड़े मोदी और चिदंबरम की अर्थ-दृष्टि की एक जैसी कहानी कहते हैं। दोनों को दिखाई नहीं देता कि देशी उपभोक्ता बाजार चीन के सामानों से पटे पड़े हैं, बैंकों को कॉरपोरेट लूट की प्रणाली बना दिया गया है और रीयल एस्टेट के कारोबार में रोजाना इतना काला धन पैदा होने दिया जा रहा है कि स्विस बैंकों को भी शर्म आ जाय।

सत्ता की प्रयोगशाला में कांग्रेसी मॉडल का दूसरा महत्त्वपूर्ण आयाम है ‘परखनली लोकतंत्र’ की प्रणाली, जिसे कांग्रेस ने कुछ इस विशिष्टता से विकसित किया है कि राज के हर दावेदार के लिए इसका अनुसरण सुविधाजनक होने लगा। इस प्रणाली में लोकलुभावन प्रयोगों और आंकड़ों के सब्जबाग तो भरपूर होते हैं, पर लोकतांत्रिक जवाबदेही के लिए जगह नहीं छोड़नी होती। अगर नौकरशाही भ्रष्ट है तो उससे राहत के लिए ‘परखनली लोकतंत्र’ ने एक और नौकरशाही ‘लोकपाल’ की सौगात दे दी। अगर संसद और विधानसभाओं में केंद्रित होकर लोकतंत्र आम आदमी की पहुंच से बाहर हो गया है तो स्थानीय निकायों और ग्राम सभाओं के नाम पर एक विकेंद्र्रीकृत प्रशासनिक ढांचा हाजिर है। बेशक यहां भी निर्णय में आम जन की भागीदारी नहीं रहेगी।

अगर व्यवस्था में ही निहित है कि सभी को रोजगार नहीं मिल सकता तो मनरेगा है, बैंक-कर्ज की घोषणाएं हैं, आरक्षण हैं। अगर सभी को शिक्षा मयस्सर नहीं तो सर्व शिक्षा-प्रौढ़ शिक्षा अभियान हैं, मिड डे मील है, स्कूली दाखिले का आर्थिक कोटा है। अगर सभी के लिए चिकित्सा सुलभ नहीं तो कागजों पर सामूहिक बीमा योजनाएं हैं, अगर सभी की पहुंच में आवास नहीं तो आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों का दिखावटी कोटा है।

अगर समय पर न्याय सुलभ नहीं तो आंकड़ों का पेट भरने को लोक अदालतें हैं, अगर लड़कियों को कानूनन सामाजिक-आर्थिक रूप से सशक्त नहीं किया जा सकता तो कन्यादान की योजनाएं हैं, महिला पुलिस थाने हैं, मुफ्त स्कूली शिक्षा है, किसानों की फसलों के लिए न्यूनतम मूल्य हैं और मजदूरों के लिए न्यूनतम मजदूरी। बिजली-पानी नहीं तो न सही, पर सबसिडी है, और जिनके लिए यह सब भी नहीं, ऐसे लोगों की संख्या भी करोड़ों में होगी। उनके लिए बुढ़ापा पेंशन है, रैन बसेरे हैं, अनधिकृत कॉलोनियां हैं, गरीबी रेखाएं हैं, आधार कार्ड हैं, हेल्प लाइन हैं। समाज में लोकतंत्र न सही, पर ‘परखनली लोकतंत्र’ में सब कुछ मयस्सर होता है!

देश का एक भी प्रमुख राजनीतिक दल लोकतांत्रिक तौर-तरीकों से संचालित नहीं है, एक भी नहीं जिसका आंतरिक संचालन पारदर्शी हो। कांग्रेस में नेतृत्व एक परिवार का विशेषाधिकार है और भाजपा में नेतृत्व और नीतियां राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ थोपता आया है। तमाम क्षेत्रीय दलों पर व्यक्तियों-परिवारों की तानाशाही कायम है, जबकि कम्युनिस्ट पार्टियों का संचालन बंद प्रणाली से किया जाता है। कहना न होगा कि यह समूचा ढांचा उत्तरोत्तर कॉरपोरेट-काले धन पर निर्भर होता गया है। इस माहौल में ‘आप’ द्वारा कार्यकर्ता ‘प्राइमरी’ से उम्मीदवारों के चयन का तरीका ‘परखनली लोकतंत्र’ को चुनौती है। पर अभी ‘आप’ की अपनी प्राइमरी कवायदें भी पूरी पारदर्शी नहीं हो सकी हैं जबकि कांग्रेस और भाजपा ने तो सीमित गतिविधियों को परखनली लोकतंत्र के ढांचे में ही उतार लिया है।

कांग्रेसांतरण की गतिकी का धरातल समतल नहीं हो सकता। कांग्रेस को सत्ता से हटाने के ध्रुवीकरण दिखाते हैं कि राजनीति में जिस आसानी से चोला बदला जा सकता है, डीएनए नहीं। मसलन, धरना-प्रदर्शन आम आदमी पार्टी का डीएनए है, और बावजूद दिल्ली में सरकार बना लेने के, वह रातोंरात बदल नहीं गया। कुछ वैसे ही जैसे बेलगाम भ्रष्टाचार कांग्रेस का डीएनए बन चुका है और नंगी सांप्रदायिकता भाजपा का। ये भी रातोंरात नहीं बदले जा सकते। बावजूद कांग्रेस द्वारा संसद में भ्रष्टाचार विरोधी विधेयकों का अंबार लगाने के, और बावजूद भाजपा के गुजरात संहार पर ‘हमसे गलतियां हुर्इं, माफ  करो’ कहने के।

तीसरे मोर्चे को बेशक गैरकांग्रेसी-गैरभाजपाई कलेवर ओढ़ाया जाता हो, पर इसमे शामिल दलों, जिन्हें न भ्रष्टाचार से परहेज है और न सांप्रदायिक दोहन से, का जातिगत से लेकर क्षेत्रवादी अस्मिता का डीएनए बदस्तूर है। बेशक वे सभी एक लोकतांत्रिक-गणतंत्रीय विकल्प के झंडे तले इकट्ठा होते हों। बेशक उनके मोर्चे में कम्युनिस्ट दल भी शरीक हों, जिनका समाजवादी डीएनए जन-निरपेक्ष बौद्धिकता से पिंड नहीं छुड़ा पाता। यहां तक कि विज्ञापनों में अण्णा हजारे को ममता बनर्जी के लिए कुर्सी मांगते देखिए: जो सब सिर्फ कह रहे हैं, वह ममता कर दिखाएंगी- यानी, नया कुछ नहीं।

प्राय: कयास हैं कि 2014 के चुनावों में भ्रष्टाचार और उससे उपजी महंगाई-बेरोजगारी के चलते कांग्रेस को हार मिलेगी। पर भाजपा या तीसरे मोर्चे के सत्ता हथियाने में भारतीय राजनीति के कांग्रेसांतरण की ही जीत होगी।

 

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