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स्त्री सशक्तीकरण का पैमाना PDF Print E-mail
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Saturday, 08 March 2014 11:12

सुषमा वर्मा

जनसत्ता 08 मार्च, 2014 : यूपीए सरकार के शासन-काल में घटती विकास दर और बढ़ी महंगाई की मार का असर

यों तो पूरे देश पर दिखाई देता है, लेकिन इसकी सबसे गहरी चोट महिलाओं पर पड़ी है। सरकार ने अपनी मध्यावधि आर्थिक समीक्षा में मुद्रास्फीति को विकास के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा माना है। इस समीक्षा में सरकार ने जितना बताया है उससे ज्यादा छिपाया है। पूरा सच जानने के लिए राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण संगठन की ताजा रिपोर्ट पर एक नजर डालना जरूरी है। यह रिपोर्ट बताती है कि सन 2009-10 और 2011-12 यानी दो वर्ष के अंदर गांवों में महिला श्रमिकों की संख्या में नब्बे लाख की कमी आई। निश्चय ही इसका असर दलित और गरीब परिवारों पर सर्वाधिक पड़ा है।

 

गृहस्थी की गाड़ी खींचने के लिए इस वर्ग की महिलाओं के लिए मजदूरी करना जरूरी होता है, लेकिन बाजार की मेहरबानी पर टिकी अर्थव्यवस्था ने उन्हें रोजगार-बाजार से बाहर धकेल दिया है। नतीजा सामने है। महिलाओं पर अत्याचार, हिंसा और बलात्कार की घटनाओं में इजाफा हुआ है। आर्थिक तंगी से सामाजिक तनाव बढ़ा है और तनाव बढ़ने पर सबसे पहले सबसे कमजोर कड़ी टूटती है। यह कहने की जरूरत नहीं कि महिलाएं हमारे समाज की सबसे कमजोर कड़ी हैं।

वैश्वीकरण और बाजार आधारित आर्थिक मॉडल अपनाने के लगभग बीस बरस पहले सन 1972-73 में श्रमशक्ति में महिलाओं का योगदान बत्तीस फीसद था। उदारीकरण की राह पकड़ने के बीस बरस बाद 2010-11 में यह संख्या घट कर अठारह प्रतिशत रह गई। हमारे नब्बे फीसद मजदूर असंगठित क्षेत्र में काम करते हैं। असंगठित क्षेत्र में काम करने वाली महिलाओं की संख्या तो और अधिक है। उनके लिए सामाजिक और आर्थिक सुरक्षा का कोई इंजताम नहीं है। कार्यस्थल पर न तो बच्चों के रख-रखाव का प्रबंध होता है और न ही आने-जाने की व्यवस्था।

संयुक्त परिवार व्यवस्था चरमरा जाने से मजदूर औरतों को अपने बच्चों की देखभाल का काम खुद करना पड़ता है और इसकी वैकल्पिक व्यवस्था न होने पर उन्हें अक्सर काम छोड़ना पड़ता है। काम छोड़ने का दुष्परिणाम भी सबसे पहले उन्हें और उनके बच्चों को भोगना पड़ता है। कुपोषण की समस्या को इस कड़वे सच के साथ जोड़ कर समझा जाना चाहिए।

एनएसएसओ की रिपोर्ट के अनुसार गांवों में एक की कमाई पर निर्भर परिवारों की संख्या लगातार बढ़ रही है। इसका अर्थ यही हुआ कि पारिवारिक आय में कमी आ रही है। दुर्भाग्यवश अगर किसी घर में कमाने वाले सदस्य की नौकरी छूट जाए, वह दुर्घटनाग्रस्त हो जाए या उसकी मृत्यु हो जाए तो पूरे परिवार के बिखर जाने की आशंका प्रबल हो जाती है। वर्ष 1993-94 में जहां एक से ज्यादा सदस्यों की कमाई पर निर्भर ग्रामीण परिवार छियासठ प्रतिशत थे, वहीं 2011-12 में उनकी तादाद घट कर चौवन प्रतिशत रह गई। इस अवधि में बिना किसी कमाई वाले परिवारों की संख्या में भी दो फीसद का इजाफा हुआ। संकेत चिंताजनक हैं।

रोजगार के मोर्चे पर शहरों में रहने वाली महिलाओं की स्थिति भी कोई बेहतर नहीं है। शहरों में भी एक से ज्यादा सदस्यों की कमाई पर आश्रित परिवारों की संख्या घटी है। वर्ष 2010-11 में ऐसे परिवार छत्तीस प्रतिशत थे, जबकि 1993-94 में उनकी संख्या उनतालीस फीसद थी। और ताजा आंकड़ों से भी स्थिति में सुधार का संकेत नहीं मिलता। कुल मिला कर हालात बिगड़ रहे हैं। 2009-10 में पंद्रह वर्ष से ज्यादा आयु की गैर-कामकाजी लड़कियों और महिलाओं की संख्या पैंसठ फीसद थी।

मतलब यह कि काम करने की सबसे बेहतर उम्र में भी ये बेकार बैठी थीं। लड़कियों की शिक्षा में सुधार के बावजूद उन्हें नौकरी पाने में कठिनाई आ रही है। कड़वा सच यह है कि महंगाई के दौर में साधारण और गरीब परिवारों के लिए एक कमाई पर परिवार का खर्च चलाना लगभग असंभव हो गया है। सिकुड़ते रोजगार अवसरों के कारण चाहते हुए भी महिलाएं अपने घर की माली हालत सुधारने में कोई योगदान नहीं दे पाती हैं।

एनएसएसओ की रिपोर्ट से यह खुलासा भी हुआ है कि शिक्षा के प्रसार के बरक्स शिक्षित युवाओं को उनकी योग्यता के अनुरूप रोजगार नहीं मिल पाता है। आज देश की लगभग आधी आबादी तीस वर्ष से कम आयु वर्ग में है। नौजवान पीढ़ी देश का भाग्य बदलने की ताकत रखती है, लेकिन अगर युवा वर्ग को काम न मिले तो वह विध्वंस में जुट जाता है। रोजगार देने में लड़कियों और महिलाओं से भेदभाव तो बरसों से बरता जाता रहा है। छंटनी की कैंची भी सबसे पहले उन्हीं पर चलती है।

अनिश्चित रोजगार के दौर में महिलाओं के यौन शोषण की आशंका बढ़ जाती है। पेट पालने या घर चलाने की मजबूरी के कारण अन्याय सह कर भी वे अक्सर चुप्पी साधे रहती हैं। रोजगार के मोर्चे की भयावह स्थिति स्पष्ट करने के लिए एक और आंकड़ा देना जरूरी है। वर्ष 2007 में 28.5 प्रतिशत श्रमशक्ति को साल में छह माह से ज्यादा समय तक कोई काम नहीं मिल पाया था, जबकि अब यह संख्या बढ़ कर पैंतीस फीसद हो गई है। मतलब यह कि देश की एक तिहाई से ज्यादा श्रमशक्ति काम न मिलने के कारण आधे साल से


ज्यादा समय निठल्ली बैठी रहती है। जबरन घर बैठाए जाने वालों की कतार में महिलाओं का स्थान अव्वल है।

महंगाई और बेराजगारी के कारण उपभोक्ता सामग्री बाजार भी लगातार बेरौनक होता जा रहा है। टीवी, कार, मोबाइल, मोटरसाइकिल, फ्रिज, एसी और प्रसाधन सामग्री की बिक्री घट रही है। यह सारा सामान मध्य और उच्च मध्यवर्ग का शगल है। गरीब तबकों में ऐसी चीजें अय्याशी मानी जाती हैं। बेरोजगारी की चोट से जब मध्यवर्ग भी छटपटा रहा हो तब गरीबों की दुर्दशा की कल्पना की जा सकती है। इसी वजह से घरेलू बचत में चिंताजनक गिरावट दर्ज की गई है। वर्ष 2009-10 में घरेलू बचत को सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का 25.3 फीसद आंका गया, जबकि वर्ष 2012-13 आते-आते यह गिर कर 21.9 प्रतिशत रह गई। बचत कम होने का असर विकास पर जो पड़ता है सो पड़ता ही है, आपात स्थिति में आम परिवार के लिए यह कहर साबित होता है। हारी-बीमारी, शादी-ब्याह या अन्य बड़ी जरूरत के वक्त बचत न होने पर गरीब और निम्न मध्यवर्ग को कर्ज लेना पड़ता है और कर्ज न चुकाने पर परिवार की महिलाओं और बच्चों को दर-दर की ठोकरें खानी पड़ती हैं।

सरकारी अध्ययनों से एक और चौंकाने वाला सच सामने आया है। महंगाई की मार महानगरों के मुकाबले छोटे शहरों, कस्बों और गांवों में ज्यादा पड़ती है। दिल्ली (नौ फीसद) के मुकाबले गाजियाबाद (ग्यारह फीसद), कोलकाता (ग्यारह फीसद) के मुकाबले दुर्गापुर (बाईस फीसद), बंगलुरु (तेरह फीसद) के मुकाबले मैसूर (चौदह फीसद) और हैदराबाद (नौ फीसद) के मुकाबले विजयवाड़ा (चौदह फीसद) ज्यादा महंगे शहर हैं। छोटे कस्बों और गांवों की स्थिति तो और विकट है। वहां महानगरों के मुकाबले खाने-पीने और दैनिक उपयोग का सामान तो महंगा है ही, साथ ही मकानों का किराया भी ज्यादा है। यह तो सर्वमान्य सच है कि महानगरों की अपेक्षा छोटे कस्बों और गांवों में रोजगार के अवसर कम होते हैं। वहां महिलाओं को नौकरी मिलने की संभावना तो और भी कम होती है।

इसका अर्थ यही हुआ कि छोटे नगरों या कस्बों में रहने वाले परिवारों पर दोहरी मार पड़ती है। एक तो आसानी से काम नहीं मिलता, दूसरे, ऊंची महंगाई का दंश भी झेलना पड़ता है। यह दोहराना जरूरी है कि इस खराब स्थिति का सबसे ज्यादा खमियाजा महिलाओं को भुगतना पड़ता है।

अर्थशास्त्र का सिद्धांत है कि जब किसी देश में आर्थिक विकास का पहिया तेजी से घूमता है तब लोग खेती छोड़ कर उद्योगों की ओर पलायन करते हैं, लेकिन दुनिया की आर्थिक महाशक्ति बनने का सपना देख रहे हमारे देश में आज भी लगभग आधी आबादी खेती पर निर्भर है। लागत बढ़ने और जोत का आकार लगातार कम हो जाने से अब खेती घाटे का धंधा बनती जा रही है। इसी कारण लाखों किसान खेती छोड़ शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं। देश में खेतिहर महिला श्रमिकों की संख्या करोड़ों में है। इस कारण वे भी इस पलायन का बड़ा हिस्सा हैं।

खेत में काम करने वाली अधिकतर श्रमशक्ति अशिक्षित और अकुशल होती है, इसलिए उसे शहरों में मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र में ही काम मिलने की गुंजाइश रहती है। दुर्भाग्यवश मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र में रोजगार बढ़ने के बजाय कम हुए हैं। गांवों में बेकारी का दंश झेल रहे मजदूरों और किसानों को शहर में आकर भी काम नहीं मिल पाता। जब से सरकार ने रोजगार गारंटी योजना लागू की है, गांवों से श्रमशक्ति का पलायन घट गया है। लाखों किसान-मजदूर शहरों से वापस गांव लौटे हैं। अर्थशास्त्र की कसौटी पर कसें तो गंगा उलटी बह रही है। शहरों से गांव लौटने वाली आबादी में बड़ी तादाद महिलाओं की है। उन्हें लगता है कि शहर में बेकार बैठे रहने से अच्छा तो गांव में छह महीने मनरेगा में मजदूरी करना है।

इन सारी कहानियों से यही सबक मिलता है कि आर्थिक विकास के मौजूदा मॉडल में महिलाओं की हिस्सेदारी बढ़ने के बजाय घट रही है। सरकार का महिला सशक्तीकरण का नारा खोखला है। आम चुनाव सिर पर हैं, लेकिन किसी बड़े राजनीतिक दल ने देश की आधी आबादी के उद्धार का कोई ठोस वचन नहीं दिया है। कन्या भू्रण हत्या, महिला कुपोषण, बच्चियों की शिक्षा और महिलाओं के प्रति बढ़ती हिंसक घटनाओं का मूल कारण उनकी कमजोर आर्थिक स्थिति है।

जब तक औरतें अपने पैरों पर खड़ी नहीं हो जातीं, तब तक उनके प्रति दकियानूसी सामाजिक दृष्टिकोण बदलना भी असंभव है। आर्थिक अत्मनिर्भरता से ही समाज में बराबरी का दर्जा पाया जा सकता है। बेरोजगार और घर की चारदीवारी में कैद औरत दया की पात्र हो सकती है, सम्मान की नहीं। महिलाओं की बढ़ती बेराजगारी कहीं उनके सम्मान और सुरक्षा को जान-बूझ कर चोट पहुंचाने की साजिश तो नहीं है।

 

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