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आरक्षण का आवरण PDF Print E-mail
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Friday, 07 March 2014 11:58

योगेश अटल

जनसत्ता 07 मार्च, 2014 : पांच वर्ष तक कृपणता दिखाने के बाद चुनावों के समीप आते-आते केंद्र सरकार

यकायक उदारता का पर्याय बन गई है। सत्ताधारी पार्टी का उपाध्यक्ष सरकार से बाहर रह कर भी प्रधानमंत्री से ज्यादा ताकतवर दीख पड़ता है, जो तुरंत अपनी पसंद के विधेयक पास करवा लेता है, सरकार के सोचे-समझे निर्णय बदलवा लेता है। और इस सबमें अभिप्रेत होता है आगामी चुनावों में येन केन प्रकारेण जीत हासिल करना। उसके लिए नियमों का जाल बिछा कर गति को मंद नहीं किया जाता। केंद्रीय कर्मचारी का महंगाई भत्ता बढ़ा तो कर्मचारी खुश, तेलंगाना बना तो उस क्षेत्र के नेता संतुष्ट और अब बरसों से ओबीसी का दर्जा मांगने वाले जाटों में भी जश्न। इन सब प्रयासों से वोट कितना कांग्रेस के पल्ले पड़ेगा यह आज तो राजनीतिक ज्योतिषी ही बता सकते हैं, पर सच तो तब उजागर होगा, जब चुनाव के नतीजे आएंगे।

 

इस बार के चुनावों की गतिविधियां कुछ भिन्न होंगी। राहुल के विरोध के स्वर में भी आप की गंध आने लगी है। पर उनमें विरोधाभास भी साफ  झलकता है। आप की ही भांति कुछ क्षेत्रों में प्राइमरी करवाने की बात एक ओर नई लगती है, तो दूसरी ओर इस बात का स्वीकरण भी कि उनकी पार्टी ने अभी तक तानाशाही की है। उनका यह कहना कि वे आने वाले चुनावों में परिवारवाद को बढ़ावा नहीं देंगे, इसका मतलब यह मान लेना है कि अभी तक इस दल में ऐसा ही होता रहा है। यही नहीं, इसका यह भी अर्थ निकाला जा सकता है कि शायद राहुल इस बार चुनाव नहीं लड़ेंगे- क्योंकि वह भी परिवारवाद का उदाहरण ही होगा।

इस देश में प्रधानमंत्री को भी न्याय न मिलने की बात इसकी स्वीकृति है कि हमारी न्याय-व्यवस्था कितनी कमजोर है और इसका श्रेय किसे जाना चाहिए। अगर ऐसा है तो यह समझ में नहीं आता कि किसी मंत्री या संभ्रांत व्यक्ति को पुलिस द्वारा उचित सम्मान न देना कैसे उचित ठहराया जाता है। अगर महिलाओं के प्रतिनिधित्व की कमी, युवकों की राजनीति में समुचित भागीदारी का न होना, और सरकारी पैसों का दुरुपयोग चिंता का कारण है, तो कैसे बिना सत्ता परिवर्तन के इन कमियों को दूर किया जा सकता है?

सचमुच ये सब बातें विरोधाभास न होकर सही मायनों में परस्पर विरोधी हैं। गलतियों को स्वीकार करना एक बात है, पर स्वीकरण के उपरांत भी सत्ता में आने के सपने बुनना यथार्थ को नकारने जैसा है।

पिछले दिनों तेजी से किए गए वर्तमान सरकार के फैसलों पर आने वाली सभी प्रतिक्रियाएं अनुकूल नहीं हैं, और होनी भी नहीं चाहिए। इक्कीसवीं सदी के दूसरे दशक का भारत 1952 के भारत से कहीं भिन्न है। तब का अधिकतर मतदाता निरक्षर था, ग्रामीण था, राजनीति में कांग्रेस का कोई विकल्प नहीं था, न कोई खोजा जा रहा था। सरकार नई थी, आदर्शों में पगी थी और नेताओं को भ्रष्टाचार का विकार नहीं लगा था।

आज का भारत अधिक साक्षर है। अधिकतर मतदाता वे लोग हैं, जिन्होंने स्वतंत्र भारत में जन्म लिया, सरकार की अकर्मण्यता को देखा और बढ़ते भ्रष्टाचार को झेला-भुगता है। सत्ताधारी आलोचनाओं के अस्त्रों से आहत हैं। फिर भी सत्ता-सुख की निरंतरता के लिए मतदाता को फिर से माई-बाप के संबोधन से लुभाया जा रहा है। जल्दी-जल्दी में किए जाने वाले निर्णय और अध्यादेशों से यही ज्ञापित होता है कि नाव खतरे के भंवर में फंसती जा रही है।

सबसे ताजा लोकलुभावन का उदाहरण जाट आरक्षण है। अपने को पिछड़ा बताने की कवायद में कुछ प्रदेशों के जाटों ने अपने को अन्य पिछड़ा वर्ग में शामिल कराने की मांग रखी। चुनावों के आसपास ही भाजपा के अटल बिहारी वाजपेयी ने राजस्थान के जाटों को यह दर्जा दे दिया, मगर वे खुद सत्ता से हाथ धो बैठे। उससे प्रभावित होकर राजस्थान के गूजरों ने यह तय किया कि वे भी अगर उसी श्रेणी में बने रहें तो उन्हें मिलने वालों का लाभ इन दो बड़े जाति समूहों में बंट जाएगा। इसलिए उन्होंने अपना पैंतरा बदला और यह मांग की कि उन्हें भी मीणा की तरह ही आदिवासी का दर्जा दिया जाए और अनुसूचित जनजाति की श्रेणी में रखा जाए।

जाटों ने इसका समर्थन इसलिए किया कि उससे उन पर पड़ने वाला कुप्रभाव रुक जाएगा और अनुसूचित जनजाति की श्रेणी में रखे गए लोगों ने इस भरती का डट कर विरोध किया, क्योंकि उनको मिलने वाली सुविधाओं का अधिकतर इस बड़े समूह को मिल जाएगा और उन्हें वंचना का शिकार होना पड़ेगा। वहां आज भी स्थिति यही है: वास्तव में आदिवासी कहे जाने वाले भील अब भी अत्यंत पिछड़े हैं और सारा सुख अधिसंख्य मीणा लोगों को मिल रहा है, जिनमें चौकीदार और जागीरदार दोनों समूह सम्मिलित हैं, जबकि वास्तविक हकदार केवल चौकीदार मीणा हैं, जो अधिकतर दक्षिण राजस्थान में बसते हैं और भीलों के पड़ोसी हैं।

राजस्थान का उदाहरण देकर हरियाणा के जाटों ने भी ओबीसी में सम्मिलित होने की मांग को तेजी से रखा और यह तर्क दिया कि वे भी गूजरों जैसे ही हैं, इसलिए उन्हें भी ‘न्याय’ मिलना चाहिए और ओबीसी की श्रेणी में रखा जाना चाहिए। लंबे अरसे से यह संघर्ष चलता रहा, इसने हिंसात्मक रूप भी धारण कर लिया और अब जबकि यह आंदोलन थोड़ा शिथिल पड़ रहा था, केंद्र की सरकार ने यह तोहफा उन्हें दे दिया।

अपेक्षा के विपरीत इस पर दोनों ही तरह की प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं। इस आंदोलन के नेता अपनी विजय का जश्न मनाने लगे हैं, तो अन्य जातियां भी नीचे के स्तर पर जाने के लिए सहमति जताने लगी हैं। आधुनिकता के साथ अवनति को अपनाने की यह विचित्र प्रक्रिया है।

अंग्रेजों के जमाने में जनगणना का आधार लेकर कई नीची गिनी जाने वाली जातियां अपने नाम बदल कर और अपने


व्यवहारों में धार्मिक शुचिता लाकर ऊंचा उठने का प्रयास कर रही थीं, जिसे समाजशास्त्री श्रीनिवास ने अन्य कोई उचित संज्ञा के अभाव में ‘संस्कृतिकरण’ कहा था। वही ऊंची गिनी जाने वाली जातियां आज फिर से नीचे के स्तर पर जाने को लालायित दीख रही हैं।

आरक्षण की नीति का यह अनपेक्षित परिणाम सचमुच कष्टदायी है। जनजातियों के संबंध में तैयार की जाने वाली नीति के प्रारूप में इस बात का संकेत है कि राज्य को ऐसे तरीके खोजने पड़ेंगे, जिनसे इन श्रेणियों में रखी जातियों को सूची से बाहर किया जा सके और ऐसे समूहों की संख्या उत्तरोत्तर कम होती जाए। तभी इस नीति की सफलता है।

दुर्भाग्य से हो इसका उलटा रहा है। पहले केवल अनुसूचित जनजाति और अनुसूचित जाति के दो समूह थे, फिर बढ़ती मांगों को देख कर अन्य पिछड़ा वर्ग (ध्यान योग्य है कि इसमें जाति के स्थान पर वर्ग शब्द का प्रयोग किया गया) की एक श्रेणी और जोड़ दी गई।

बाद में तो बिहार जैसे राज्यों में इन श्रेणियों की उपश्रेणियां भी बनाई जाने लगीं। आज इतने वर्षों के विकास के बाद इन श्रेणियों में सम्मिलित समूहों की संख्या घटने के बजाय बढ़ती जा रही है, और खुद को ओछा और दलित कहने में गर्व महसूस किया जाने लगा है। ऐसे लोग भी हैं, जो प्रतिष्ठित हैं, ज्ञानी हैं, धनी हैं, और जिनकी उपलब्धियों पर देश को गर्व होता है, लेकिन वे भी निजी स्वार्थ-साधन के लिए सीमितकालीन प्रावधानों को निरंतरता देना चाहते हैं।

जैसा कि ऐसे निर्णयों के बारे में पहले से ही कहा जा सकता था वैसा ही अब हो रहा है। अगर गूजर आरक्षण पर राजस्थान के जाटों ने अपनी मांग को आगे बढ़ाया, वैसा ही राजस्थान में सफलता पाने पर हरियाणा के जाटों ने भी किया। जब राजस्थान के गूजरों ने अपने को आदिवासी की श्रेणी में रखने की मांग उठाई और अपने दावों को जांचने के लिए एक स्वतंत्र समिति की मांग की तब भी यही निकला कि भारत सरकार की दी हुई कसौटी पर न केवल उनमें पात्रता का अभाव है, बल्कि अन्य कई ऐसे समूह हैं, जो अभी तक इन श्रेणियों में सम्मिलित हैं, पर वे इन कसौटियों के अनुरूप नहीं हैं और इसलिए उनकी पात्रता पर प्रश्नचिह्न लग गए हैं। उन्हें ‘मलाई की परत’ भी कहा जाने लगा है।

गूजरों की पात्रता निर्धारित करने के लिए नियुक्त चोपड़ा समिति, जिसका मैं भी सदस्य था, इस निष्कर्ष पर पहुंची कि गूजर कोई एक जाति नहीं, बल्कि कई जातियों का एक वर्ण जैसा समूह है। यही बात जाटों के संबंध में भी कही जा सकती है।

पात्रता जांचने के लिए जातिगत सर्वेक्षण की आवश्यकता होती है, पर ऐसी सूचना एकत्र करना असंवैधानिक माना जाता है। इसलिए बड़ी मुश्किल से हमारी समिति ने आवश्यक सूचनाएं एकत्र कीं। मुझे ताज्जुब नहीं है कि जाटों के बारे में यह निर्णय आने पर अन्य कई समूह भी मांग करने लगे हैं, जिनमें ब्राह्मण और राजपूत तक शामिल हैं। गौर करने की बात तो यह है कि हिंदू व्यवस्था के अनुसार ये जाति नहीं कहे जा सकते, क्योंकि ये वर्ण हैं, और प्रत्येक वर्ण में अनेक जातियां होती हैं।

यह मान्यता रही है कि एक नाम और एक ही वर्ण के होते हुए भी एक जीवंत जाति प्रादेशिक ही होती है। प्रत्येक जाति में अमीर और गरीब दोनों होते हैं। आश्चर्य तो तब हुआ जब समृद्ध गिने जाने वाले जैन धर्म के लोग (जो अलग-अलग संप्रदायों में बंटे हैं- जैसे श्वेतांबर और दिगंबर- और जिनमें से प्रत्येक में कई जातियां हैं, और जिनका पुरोहित हिंदू ब्राह्मण होता है, उसे भी सरकारी फरमान से आरक्षण का अधिकारी मान लिया गया। ऐसा लगता है कि अंग्रेजों ने अपनी सत्ता बनाए रखने के लिए जो फूट के बीज बोए उसी परंपरा को स्वतंत्र भारत की सरकारें पोषित कर रही हैं।

देश में नौ ऐसे राज्य हैं, जहां जाटों का बाहुल्य है और जहां से लोकसभा के लिए दो सौ छब्बीस प्रतिनिधि चुन कर आते हैं। जाहिर है कि पिछड़ा वर्ग के राष्ट्रीय आयोग के मना करने पर भी यह गलत कदम उठाया गया है। आश्चर्य है कि अपने को सेक्युलर कहने वाली पार्टियां जातिवाद को पुनर्जीवित करने में जुटी हैं। आज दैनंदिन व्यवहार और बाजार में ‘जाति पांति पूछे नहीं कोई’ की उक्ति चरितार्थ हो रही है, वहीं राजनीति के दंगल में उस मरणासन्न को जीवनदान देने की कोशिशें चल रही हैं। अगर धीरे-धीरे अन्य जातियां भी जुड़ती गर्इं तो फिर कौन-से समूह होंगे, जो पिछड़े की श्रेणी में नहीं होंगे?

यह बात भ्रामक है कि कोई भी दल किसी जाति विशेष या समुदाय विशेष के सभी वोटों को प्रलोभन देकर खरीद सकता है। यह एक समाजशास्त्रीय सत्य है कि जो समूह जितना बड़ा होगा उसमें एकता बनाए रखने की चुनौती उतनी ही कठिन होगी। लोगों की राय सिर्फ कृतज्ञता ज्ञापन के लिए नहीं होती। चुनाव में मुफ्त मिलने वाली दारू या पैसे का प्रलोभन ही जनमत का निर्धारण नहीं करता। इसके दांव-पेच बड़े जटिल होते हैं। पैसा या शक्ति का विनियोग कभी विजय का फल देता था, पर अब उससे भी भारी शक्ति मानस की हो गई है।

टॉफ्लर जिसे पावर शिफ्ट कहते हैं, उसका आगमन हो गया है।

 

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