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बिहार जीतेगा या गुजरात PDF Print E-mail
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Wednesday, 05 March 2014 12:01

अरुण कुमार त्रिपाठी

जनसत्ता 05 मार्च, 2014 : कुछ दिनों पहले बिहार में राष्ट्रीय जनता दल के विद्रोह को शांत कर जल्दी-जल्दी में

गठबंधन बनाने के लिए राजधानी लौटे लालू प्रसाद ने एक टीवी कार्यक्रम में कहा कि कहां हैं नरेंद्र मोदी, वे तो आप के टीवी में ही दिखाई पड़ते हैं। आने दीजिए चुनाव, हम दिखा देंगे कि वे कहीं नहीं हैं। लेकिन जब उनसे बार-बार पूछा गया कि जिन सामाजिक शक्तियों को जोड़ कर आप धर्मनिरपेक्षता का गठजोड़ बनाते थे और जिसके बूते पर आप ने बिहार में आडवाणी का रथ रोक कर उनको गिरफ्तार किया था वे तो बिखर गई हैं, यहां तक कि लोक जनशक्ति पार्टी भाजपा की तरफ चली गई और कांग्रेस से भी आपका गठजोड़ नहीं हो पा रहा है। इस सवाल पर लालू प्रसाद थोड़ा दुखी होकर और इतिहास के गर्त में उतरते हुए बोले- हम बिहार आरा के वीर कुंअर सिंह की विरासत को आगे बढ़ाने वाले हैं। लालू कमजोर और बूढ़ा जरूर दिख रहा है, पर उसने हिम्मत नहीं हारी है। वह उसी तरह सांप्रदायिकता और देश तोड़ने वाली ताकतों से लड़ेगा जिस तरह वीर कुंअर सिंह ने लड़ा था।

 

निश्चित तौर पर भ्रष्टाचार के आरोप से घिरे और सजा पाकर चुनाव लड़ने से वंचित हो चुके लालू प्रसाद को कम से एक मोर्चे पर बेदाग जरूर कहा जा सकता है और वह है धर्मनिरपेक्षता का। लालू ने सामाजिक न्याय के साथ धर्मनिपरपेक्षता का ऐसा गठबंधन तैयार किया था जिसने नब्बे के दशक में सांप्रदायिक ताकतों की चूलें हिला दी थीं। लेकिन कांग्रेस के साथ मिलकर बना लालू और पासवान का धर्मनिरपेक्ष मोर्चा आज बिखर चुका है। पासवान भाजपा के साथ जा चुके हैं और नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री बनाने में लग गए हैं। दूसरी तरफ राजद और जनता दल (एकी) दोनों के बीच झूल रही कांग्रेस को लालू प्रसाद यादव ने बारह सीटें देने का प्रस्ताव दे दिया है और नीतीश कुमार गठबंधन की खातिर बिहार के लिए विशेष राज्य का दर्जा मांगने पर अड़े हुए हैं।

ऐसे में जब लालू को लेकर सोनिया और राहुल गांधी के बीच अलग-अलग राय होने की खबरें आ रही हैं तब धर्मनिरपेक्षता की कोई संयुक्त ताकत बनती नजर नहीं आ रही है। ये स्थितियां सचमुच लालू प्रसाद के उस भावुक ऐतिहासिक प्रसंग की ओर संकेत करती हैं जिसमें 1857 में वीर कुंअर सिंह अंग्रेजों के खिलाफ लड़ते हुए शाहजहांपुर तक चले आए थे और बाद में घायल होकर लौटे और उन्होंने स्वयं तलवार से अपना ही जख्मी हाथ काट कर अलग कर दिया था। धर्मनिरपेक्षता और अपनी राजनीतिक जमीन बचाने के लिए लालू प्रसाद यादव लगभग वैसी ही लड़ाई लड़ते नजर आ रहे हैं। ऐसे में एक सवाल यह भी है कि पिछले दिनों डूब से बाहर निकली लालू प्रसाद की धर्मनिरपेक्ष और सामाजिक न्याय की जमीन का क्या होगा?

इस समय बिहार में दो तरह की लड़ाइयां चल रही हैं। एक लड़ाई धर्मनिरपेक्षता बनाम सांप्रदायिकता की है तो दूसरी गुजरात बनाम बिहार की। भारतीय जनता पार्टी मोदी के नेतृत्व में गुजरात बनाम बिहार मॉडल की लड़ाई लड़ रही है और उस लड़ाई में सामाजिक न्याय की तमाम ताकतों को एकजुट कर रही है। रामविलास पासवान, उपेंद्र कुशवाहा, जयनारायण निषाद, नंदकिशोर यादव को साथ लाकर भाजपा यह दिखाना चाहती है कि वह सवर्णों की पार्टी नहीं है। वह सामाजिक न्याय की उन्हीं ताकतों की पार्टी है जिनके माध्यम से कभी लालू प्रसाद ने आडवाणी का रथ रोक कर उन्हें गिरफ्तार किया था।

यह महज संयोग नहीं है कि नरेंद्र मोदी मुजफ्फरपुर में पासवान के साथ मंच साझा करते हुए कहते हैं कि ‘जो सोचते हैं कि भाजपा ब्राह्मणों और बनियों की पार्टी है वे यह देख कर चौंक गए हैं कि भाजपा ने पिछड़ी जाति के एक व्यक्ति को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बना दिया है। आने वाला दशक दलितों और पिछड़ों का होने वाला है।’

नरेंद्र मोदी की यह भाषा खास तरह का सामाजिक न्याय का विमर्श पैदा करती है। इससे भाजपा और संघ परिवार पर लगी वह तोहमत मिट सकती है कि वह ब्राह्मणवादी सोच की पार्टी है और कभी पिछड़ों और दलितों को सत्ता के शीर्ष पर नहीं आने देगी। कल्याण सिंह को दरकिनार किए जाना, उमा भारती को पार्टी से निकालना और हाल में दिवंगत हुए पार्टी के पहले दलित अध्यक्ष बंगारू लक्ष्मण का मंच पर वाजपेयी का चरण छूना और फिर भ्रष्टाचार के आरोप में बाहर किया जाना, ये सब ऐसे उदाहरण रहे हैं जिनसे लगता रहा है कि संघ परिवार दलितों और पिछड़ों को महज इस्तेमाल करता है। उन्हें अपने शीर्ष पदों पर कभी नहीं आने देता। लेकिन मोदी के हाथ में नेतृत्व आने के बाद भाजपा अब अपना सीना (अगर वह छप्पन इंच का है तो) ठोंक कर कह रही है कि वह सामाजिक न्याय की सबसे बड़ी मसीहा है। एक तरह से कमंडल के बहाने नब्बे के दशक में दिल्ली की सत्ता पर काबिज हुई भाजपा ने अब मंडल को भी अपने पाले में करने की तैयारी कर ली है।

सामाजिक न्याय की इन ताकतों को अपने साथ जोड़ कर उन्हें सांप्रदायिक बनाने का काम संघ परिवार आज से नहीं कर रहा है। लेकिन जब से देश के अन्य धर्मनिरपेक्ष दलों ने इन ताकतों में सद्भाव और भाईचारे वाला सोच पैदा करने में ढिलाई की, तब सेउनका सांप्रदायीकरण तीव्र हुआ है। यही कारण है


कि मोदी ने मुजफ्फरपुर की रैली में सबसे ज्यादा मजाक धर्मनिरपेक्षता का ही उड़ाया। उन्होंने कहा कि जब मैं विकास की बात करता हूं तो वे कहते हैं कि सेक्युलरिज्म खतरे में है; जब मैं आतंकवाद के खिलाफ बोलता हूं तो वे कहते हैं सेक्युलरिज्म खतरे में है।

बिहार की दूसरी बड़ी लड़ाई गुजरात बनाम बिहार की है। अगर धर्मनिरपेक्षता और सांप्रदायिकता की असली लड़ाई लालू प्रसाद लड़ेंगे तो गुजरात बनाम बिहार की असली लड़ाई नीतीश कुमार लड़ेंगे। निश्चित तौर पर लालू प्रसाद बिहार की तुलना में गुजरात की तारीफ करके कोई लड़ाई नहीं लड़ने जा रहे हैं।

वे नीतीश कुमार को धर्मनिरपेक्षता के मोर्चे पर पाखंडी बता कर अपना अभियान चलाएंगे तो मोदी और पासवान बिहार के खोखले विकास को मुद््दा बनाएंगे। मोदी एक तरफ पासवान को साथ लेकर उनकी धर्मनिरपेक्ष छवि का इस्तेमाल करेंगे तो दूसरी तरफ वे अपनी हिंदुत्ववादी छवि से सवर्णों को रिझाएंगे। लेकिन मोदी सबसे ज्यादा बिहार के पढ़े-लिखे लोगों को इस बिना पर आकर्षित करना चाहेंगे कि बिहार के विकास का नीतीश कुमार का दावा खोखला है।

यही कारण है कि मोदी बिहार के विकास के कमजोर आंकड़ों को जोरशोर से उछाल रहे हैं। बिहार में महज तेईस प्रतिशत घरों में शौचालय हैं, बिजली सिर्फ सोलह फीसद घरों में आती है, यहां साढ़े आठ लाख पंजीकृत बेरोजगारों में केवल दो हजार को रोजगार मिलता है।

बिहार के विकास के विडंबनापूर्ण आंकड़े ‘सिंगल मैन’ में संकर्षण ठाकुर ने भी विस्तार से बताए हैं। बिहार के तैंतालीस प्रतिशत ग्रामीण इलाकों में कंकरीट की सड़क नहीं है। वहां के सिर्फ दस प्रतिशत लोग आधुनिक बैंकिंग का इस्तेमाल करते हैं। छह प्रतिशत लोग ही पक्के मकानों में रहते हैं। जबकि मोबाइल साठ प्रतिशत लोग रखते हैं। ये सब स्थितियां तब हैं जबकि नीतीश कुमार ने बिहार की विकास दर में पांच गुना इजाफा किया है। उन्होंने जब 2005 में राज्य की कमान संभाली थी तब उसकी विकास दर 2.6 प्रतिशत थी और वह 2011-12 में 11.3 प्रतिशत पर पहुंच गई। जिस बिहार के नेतृत्व की ‘इकोनॉमिस्ट’ जैसी पूंजीवादी पत्रिका जम कर आलोचना किया करती थी वह भी अब तारीफ करने लगी है। ऐसे में यह सवाल अहम है कि 2005 से बिहार के विकास पुरुष बनकर उभरे नीतीश कुमार का मॉडल क्या गुजरात से मात खा जाएगा और मोदी के सामने उनका क्या भविष्य होगा?

निश्चित तौर पर आज बिहार में सामाजिक न्याय कोई मुद्दा नहीं है। क्योंकि सामाजिक न्याय का जातिगत आयाम लगभग सभी पार्टियों में अपनी जगह बना चुका है और चारों तरफ सामाजिक न्याय की ताकतें ही बोल रही हैं। इसलिए गोलबंदी के लिए सामाजिक न्याय कोई आधार नहीं बनने वाला है। हां यह सवाल जरूर है कि लालू प्रसाद के साथ रह कर पासवान जो काम नहीं कर पाए थे क्या वे मोदी के साथ रह कर नीतीश के महादलित वोटों में सेंध लगा पाएंगे? राष्ट्रीय जनता दल के साथ वे 2009 में बारह सीटों पर लड़े थे और सभी हार गए। 2010 में विधानसभा की पचहत्तर सीटों पर राजद के साथ मिल कर लड़े, महज तीन सीट ही जीत पाए। फिर भी लोजपा के सात प्रतिशत वोट और भाजपा के चौदह प्रतिशत वोट मिलकर क्या जद (एकी) के चौबीस प्रतिशत वोटों में सेंध लगा पाएंगे?

दरअसल, जद (एकी) के चलते भाजपा को मुसलिम बहुल मिथिला इलाकों में भी सीटें हासिल हुई थी, जिसकी उम्मीद वह पासवान की अल्पसंख्यक समर्थक छवि से कर रही है। पासवान को साथ लेने का यही प्रतीकात्मक महत्त्व उसके लिए ज्यादा है। पर राज्य के सोलह प्रतिशत मुसलिम मतदाता अब नीतीश की तरफ एकजुट होंगे या नए सिरे से उभर रहे लालू के साथ जाएंगे या कांग्रेस का दामन थामेंगे यह लाख टके का सवाल है। उम्मीद तो यही जताई जा रही है कि कांग्रेस और राजद में तालमेल न होने का फायदा जद (एकी) को मिलेगा। संभव है नीतीश, मोदी, लालू और कांग्रेस के चौकोने मुकाबले मुसलमान उसी तरह रणनीतिक मतदान करें जैसे उन्होंने 2009 में उत्तर प्रदेश के चुनावों में किया था।

फिलहाल कभी राष्ट्रीय स्तर पर धर्मनिरपेक्षता के मसीहा के तौर पर उभरे लालू प्रसाद अपनी दागदार छवि के कारण एक क्षेत्रीय अस्मिता की लड़ाई लड़ रहे हैं और उनके बाद बिहार के विकास पुरुष के तौर पर उभरे नीतीश कुमार धर्मनिरपेक्षता के सवाल पर भाजपा का दामन छोड़ कर भले ग्यारह दलों के गैर-भाजपा और गैर-कांग्रेस के मोर्चे में शामिल हों लेकिन वे भी भाजपा के तूफानी प्रचार के सामने अपना किला ही बचा रहे हैं।

उन्होंने बिहार में कभी लालू-विरोधी वोटों को एकजुट किया था लेकिन आज वे धर्मनिरपेक्ष वोटों को एकजुट करने में नई कामयाबी पाते हुए नहीं दिख रहे हैं। बिहार गठबंधन की चालाक बिसात पर अगले चुनाव में उतर रहा है जहां चुनाव पूर्व गठबंधन से बचते हुए, बड़े खिलाड़ी अपनी जमीन बचाते हुए अपने विकल्प खुले रखना चाहते हैं। देखना है इस लड़ाई में बिहार जीतता है या गुजरात।

 

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