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अपराध के साथ सहजीवन PDF Print E-mail
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Tuesday, 04 March 2014 11:43

अपूर्वानंद

जनसत्ता 04 मार्च, 2014 : यह सौभाग्य बहुत कम किताबों को मिलता है कि वे अपने समाज की अंतरात्मा की

आवाज की तरह उभरें जब ऐसा लगे कि वह पूरी तरह सो चुकी है। वे हमें खुद अपने सामने खड़ा कर देती हैं और मजबूर करती हैं कि हम अपने आपको पहचानें, खुद को दिए जाने वाले धोखे से निकल सकें और खुद को इम्तहान की खराद पर चढ़ा सकें। ऐसी किताब लिखने के लिए निर्मम तटस्थता चाहिए और सत्य के लिए अविचलित प्रतिबद्धता। इसमें तात्कालिक आग्रहों से स्वयं को मुक्त रखना एक चुनौती है।

 

सत्य की खोज के मायने क्या हैं? क्या यह सिर्फ इरादे से जुड़ा मसला है? अभी हम आध्यात्मिक स्तर पर सत्य की खोज की बात नहीं कर रहे। वहां भी यह मात्र नेक इरादे से हासिल नहीं किया जा सकता। दुनियावी मसलों में, खासकर राज्य के संदर्भ में इसका क्या अर्थ है? ऐसे अवसर आते हैं जब उसकी भूमिका और निर्णयों पर प्रश्नचिह्न लगता है और सच जानने की मांग होती है। उस वक्त अपेक्षा की जाती है कि वह ऐसे उपाय करेगा कि उसके सीधे प्रभाव से मुक्त प्रक्रियाओं के माध्यम से सत्य का पता किया जा सके। आधुनिक राजकीय संरचना में न्यायालय को अपेक्षया स्वायत्त संस्था माना जाता है, ऐसी व्यवस्था जो कार्यपालिका के सीधे नियंत्रण में नहीं है और इसलिए जो उसके बारे में भी सच बोल सकती है। लेकिन क्या भारत में यह हो पाया है? क्या सबसे संकटपूर्ण क्षणों में न्यायपालिका से जुड़े लोग इस भूमिका का निर्वाह कर पाए हैं?

सत्य की खोज के लिए इरादे के साथ साहस जरूरी है। लेकिन उससे भी ज्यादा जरूरी है सही सवालों की पहचान। बिना सही सवाल पूछे सही जवाब की उम्मीद करना फिजूल है। मनोज मित्ता अपनी दूसरी किताब ‘द फिक्शन आॅव फैक्ट फाइंडिंग: मोदी एंड गोधरा’ में यही कहते हैं। नाम से ही जाहिर है कि किताब 2002 के गुजरात के जनसंहार के सच की खोज के राजकीय दावों की छानबीन करती है। यह महज इत्तफाक नहीं है कि यह 2014 के लोकसभा चुनाव के ठीक पहले आई है। यह भारतीय लोकतंत्र के लिए चेतावनी की घंटी है: वह बताती है कि इस लोकतंत्र को स्वस्थ रखने के लिए बनाई गई सभी संस्थाएं और प्रक्रियाएं जर्जर और दूषित हो चुकी हैं। वह भारत की संसद, सर्वोच्च न्यायालय, पुलिस और सत्य या तथ्य की खोज के लिए बनी संस्थाओं और खुद भारतीय जनता के विवेक की कड़ाई से छानबीन करती है। नतीजे सुखकर और आश्वस्तिकर नहीं हैं।

मनोज मित्ता इस किताब में इस मिथ की जांच करते हैं कि 2002 के गुजरात के मुसलमानों के जनसंहार के लिए जिम्मेवार लोगों की पहचान कर ली गई है और वह किसी राजनीतिक साजिश का नतीजा नहीं था, कि उसके लिए वह व्यक्ति जिम्मेवार नहीं था जिसे हमारे भावी प्रधानमंत्री के रूप में एक अनिवार्यता और निर्विकल्पता की तरह पेश किया जा रहा है। दस साल तक उसके आलोचक रहे राजनेता अब उसके साथ के लिए दलील दे रहे हैं कि आखिर उच्चतम न्यायालय द्वारा गठित विशेष जांच दल (एसआइटी) ने उसे 2002 के कत्लेआम में किसी भी जिम्मेवारी से मुक्त कर दिया है, फिर 2002 अब कैसे प्रासंगिक रह जाता है!

कुछ रोज पहले विनय सीतापति ने भी तार्किक ढंग से कहा था कि 2002 के हत्याकांड में नरेंद्र मोदी की भूमिका पर अनावश्यक रूप से ध्यान केंद्रित रखने के चलते असली हत्यारों या अपराधियों को सजा दिलाने में कोताही हो रही है। आखिर वह कोई एक हत्याकांड नहीं था। अनेक छोटे-छोटे हत्याकांड थे जिसके सूत्रधार स्थानीय ही थे। सीतापति के मुताबिक 2002 के इन सूत्रधारों और असली हत्यारों की ओर से हमारा ध्यान हट जाता है अगर हम उसे एक बड़े षड्यंत्र का परिणाम मान कर उसके राजफाश की कवायद में लग जाते हैं। लेकिन मनोज ने अपनी किताब के जरिए इसका प्रतिवाद करते हुए कहा है कि 2002 में गुजरात के तत्कालीन प्रमुख नरेंद्र मोदी की भूमिका पर अभी फैसलाकुन बात नहीं हुई है।

इसके लिए वे गुजरात की पुलिस, उसकी निचली अदालतों, तत्कालीन केंद्र सरकार, उच्चतम न्यायालय और स्वतंत्र जांच आयोगों की भूमिका और उनके द्वारा सच खोजने के लिए अपनाई गई प्रक्रियाओं की सख्ती से पड़ताल करते हैं। सबसे महत्त्वपूर्ण प्रश्न वे पूछते हैं कि आखिर उच्चतम न्यायालय ने इतने बड़े कत्लेआम की जांच का जिम्मा एक ऐसे व्यक्ति को कैसे दे दिया जिसने खुद 1991 में राजीव गांधी की हिफाजत में अक्षम्य लापरवाही बरती थी जिसका परिणाम उनकी ह्त्या में हुआ। वे राजीव गांधी हत्याकांड की जांच की रिपोर्ट की पड़ताल कर प्रश्न करते हैं कि आरके राघवन को, जिन पर राजीव की सुरक्षा का दायित्व था, न्यायमूर्ति जेएस वर्मा आयोग ने यह मानने के बाद भी कि उन्होंने अपने दायित्व-निर्वाह में लापरवाही बरती, बरी क्यों कर दिया!

वर्मा आयोग ने साफ  कहा था कि राघवन और उनके पुलिस सहयोगियों ने इस हत्याकांड में पुलिस की किसी भी लापरवाही के आरोप से बचने के लिए एक साझा मोर्चा बना लिया था। इस निष्कर्ष के बाद भी क्यों वर्मा आयोग राघवन को जिम्मेवार ठहराने से हिचक गया? उन्होंने इस मामले में व्यक्तिगत जिम्मेवारी तय करने का काम राज्य सरकार पर और संबंधित विभागों पर कैसे छोड़ दिया?

तमिलनाडु सरकार ने इतने गंभीर मामले में वर्मा आयोग के स्पष्ट सुझाव के बाद भी अपने पुलिस अधिकारियों के खिलाफ कोई जांच नहीं की, क्या यह ताज्जुब की बात नहीं? विभागीय जांच में राघवन को सिर्फ उनकी सफाई के आधार पर आरोप-मुक्त कर दिया गया। नतीजा हुआ राघवन की असाधारण पदोन्नति में। वे उसी केंद्रीय सतर्कता आयोग के प्रमुख हो गए जिसने कभी राजीव गांधी हत्याकांड की जांच की थी।

क्या यह आश्चर्यजनक है कि उन्हीं आरके राघवन ने गोधरा, गुलबर्ग सोसाइटी, नरोदा पाटिया, बेस्ट बेकरी या अन्य हत्याकांडों के पीछे


की साजिश की जांच के लिए सबसे जरूरी सवाल नहीं किए! मसलन, गोधरा में साबरमती एक्सप्रेस में आग से जलकर मारे गए लोगों के शवों को प्रशासन ने नियम के विरुद्ध जाकर विश्व हिंदू परिषद के नेता जयदीप पटेल को किसके कहने पर सुपुर्द किया! स्थापित तरीका है दुर्घटनाओं में मारे गए लोगों के परिजनों को या प्रशासन को मृत शरीर सौंपने का। क्या इतना संवेदनशील निर्णय मात्र मामलातदार जैसे निचले स्तर के अधिकारी के बस की बात थी!

मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि उनकी पटेल से उस दिन कोई मुलाकात नहीं हुई जबकि गोधरा की जिलाधीश जयंती रवि ने अपने बयान में साफ  कहा कि उस रोज गोधरा में हुई बैठक में मुख्यमंत्री के साथ पटेल भी शामिल थे। क्या इस अंतर्विरोध को सुलझाने की जरूरत नहीं थी? एसआइटी ने कहा कि गोधरा ट्रेन आगजनी में मारे गए लोगों के शवों को अमदाबाद ले जाने का निर्णय मुख्यमंत्री की उपस्थिति में हुआ। फिर यह कैसे माना जा सकता है कि विहिप नेता को इस प्रक्रिया में शामिल करने की जानकारी मुख्यमंत्री को नहीं थी!

उसी तरह, मुख्यमंत्री के इस दावे को मान लेने की क्या वजह हो सकती है कि उन्हें अट््ठाईस फरवरी को गुलबर्ग सोसाइटी पर तकरीबन दस हजार लोगों के हमले की, जिसमें साठ से ज्यादा मुसलमानों को मार डाला गया था और कांग्रेस नेता और पूर्व सांसद जाफरी साहब को टुकड़े-टुकड़े कर जला दिया गया था, रात आठ बजे के पहले खबर ही नहीं हुई? मुख्यमंत्री के ही पास गृह मंत्रालय था। वे दिन के एक बजे हालात का जायजा लेने के लिए बैठक कर रहे थे। क्या वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों ने उन्हें यह नहीं बताया कि गुलबर्ग सोसाइटी के पास हालात बेकाबू हो गए हैं और अतिरिक्त पुलिस बल की मांग की जा चुकी है? और ऐसा नहीं हुआ तो क्या यह मोदी की प्रशासनिक अक्षमता का सबूत नहीं है?

जब एसआइटी ने मुख्यमंत्री से सवाल किए तो उनके पहले उत्तर से ही वह संतुष्ट कैसे हो गई? मोदी से उसने जिरह क्यों नहीं की? क्या मोदी की पेशी महज औपचारिकता थी? इसका भी क्या उत्तर है कि 2010 की अपनी पहली रिपोर्ट के ही अनेक नतीजों को इसने 2012 में उलट दिया। जहां पहली रिपोर्ट में कई जगह मोदी शक के दायरे में हैं, अंतिम रिपोर्ट में वे पूरी तरह बरी किए जाते हैं। क्या इसका कोई रिश्ता बदलते राजनीतिक परिदृश्य से है, जिसमें मोदी की राष्ट्रीय स्वीकार्यता बढ़ती जान पड़ती थी?

एसआइटी ने तो तकल्लुफ के लिए ही सही, नरेंद्र मोदी से सवाल किए। लेकिन गोधरा और उसके बाद की हिंसा की जांच के लिए खुद गुजरात सरकार द्वारा गठित न्यायमूर्ति नानावती आयोग ने तो उन्हें बुलाना भी जरूरी नहीं समझा, जबकि उसके दायरे में इस पूरे घटनाक्रम में मुख्यमंत्री की भूमिका की जांच का काम भी शामिल था। आयोग की कार्यशैली की पड़ताल के लिए मनोज ने ठीक ही ध्यान दिलाया है कि इन्हीं नानावती साहब ने 1984 के सिख हत्याकांड की जांच के दौरान नियमानुसार कांग्रेस के बड़े नेताओं को- पीवी नरसिंह राव, कमलनाथ, एचकेएल भगत, जगदीश टाइटलर और सज्जन कुमार समेत- सम्मन जारी किए थे। फिर इसकी क्या व्याख्या की जाए कि उन्होंने बार-बार जकिया जाफरी और अन्य पीड़ितों के कहने पर भी मोदी को पूछताछ के लिए नहीं बुलाया!

इतना ही नहीं, गोधरा ट्रेन आगजनी की साजिश के लिए इसने जिन मौलवी उमरजी और मोहम्मद कलोता को अपराधी ठहराया, उन्हें अपना पक्ष रखने की इजाजत भी नहीं दी। नानावती आयोग के इस निष्कर्ष के दो साल बाद ही अदालत ने दोनों को ही इस आरोप से बरी कर दिया। क्या इससे आयोग के पक्षपातपूर्ण रवैये का पर्दाफाश नहीं हो जाता?

आजाद भारत का इतिहास सामूहिक हत्याकांडों का इतिहास भी कहा जा सकता है। ये प्राय: सांप्रदायिक होते हैं। ये अपराध कैसे संगठित किए जाते हैं? क्या सारे सामूहिक हत्याकांड स्वत:स्फूर्त होते हैं? क्या इनके पीछे कोई विचारधारात्मक सांगठनिक तंत्र सक्रिय रहता है? इनमें एक में राज्य के समर्थन और संरक्षण में हत्याएं संगठित की जाती हैं और दूसरे में राज्य शामिल नहीं रहता है। लेकिन राज्य के घटकों के, जिनमें पुलिस, प्रशासन आदि शामिल हैं, खामोश समर्थन के बिना क्या कोई सामूहिक हत्याकांड मुमकिन है?

पिछले तीस बरसों के ऐसे हत्याकांडों के अपराधियों का हम ठीक-ठीक पता नहीं कर पाए हैं। इस मामले में एकमात्र अपवाद श्रीकृष्ण आयोग है। सामूहिक हत्याकांड की ओर ले जाने वाले बाबरी मस्जिद विध्वंस की भी लंबी जांच के बावजूद लिब्रहान आयोग ने अस्पष्ट रिपोर्ट ही दी। 1984 के सिख-कत्लेआम की जांच करने वाले रंगनाथ मिश्र आयोग की संदिग्ध भूमिका की बखिया मनोज मित्ता अपनी पहली किताब में उधेड़ चुके हैं।

सामूहिक हत्याकांडों के सच की खोज की जगह उसके गल्प से काम चला लेने वाले समाज का जीवन हमेशा एक अगले हत्याकांड के लिए तैयारी में गुजरता है। सच जानने की उसकी अनिच्छा भी यह बताती है कि उसकी सामूहिक चेतना का अपराधीकरण हो चुका है। ऐसे क्षण में साहित्य का काम है निर्ममता से उसे सत्य से उसके पलायन के बारे में बताना। इस लिहाज से मनोज मित्ता की किताब पत्रकारिता से अधिक साहित्यिक धर्म का निर्वाह करती है। 2014 का सबसे प्रासंगिक प्रश्न पूछ कर: क्या हम अपराध के साथ जीने को तैयार हैं?

 

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