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इस विकास की कीमत PDF Print E-mail
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Monday, 03 March 2014 11:08

विनोद कुमार

जनसत्ता 03 मार्च, 2014 : हमारे देश का अभिजात तबका और शहरी मध्यम वर्ग उदारीकरण और नई औद्योगिक नीति का कमोबेश समर्थक है।

और उसके पक्ष में दलीलें देता है। इसी तरह दक्षिणपंथी और मध्यवर्ती राजनीतिक दल- चाहे वह कांग्रेस हो, भाजपा हो या बसपा, राजद आदि- नई औद्योगिक नीति के बारे में लगभग मिलते-जुलते विचार रखते हैं। वामपंथी दल उदारीकरण और नई औद्योगिक नीति के बारे में हाल तक थोड़ी भिन्न भाषा का इस्तेमाल करते थे, लेकिन सत्ता की राजनीति ने उन्हें भी काफी हद तक बदल दिया है और आज वे भी नई औद्योगिक नीति और उदारीकरण के पैरोकार हो गए हैं। चाहे वे रूस के गोर्बाच्येव हों या फिर बंगाल के बुद्धदेव भट्टाचार्य। लेकिन बुद्धिजीवियों को लेकर कभी-कभी असमंजस की स्थिति बन सकती है। वह भी तब, जब वह अमर्त्य सेन जैसा सुप्रसिद्ध अर्थशास्त्री और नोबेल पुरस्कार विजेता हो।

 

अमर्त्य सेन वैसे तो देश में व्याप्त विपन्नता और विषमता को वर्तमान सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था की ही उपज मानते हैं, लेकिन कुल मिला कर वे भी उदारीकरण और औद्योगीकरण के पैरोकार हैं। उनकी भी स्पष्ट समझ यह है कि खेती अब अर्थव्यवस्था को मजबूती प्रदान नहीं कर सकती; औद्योगीकरण ही एकमात्र रास्ता है। वे तो यहां तक कहते हैं कि खेती-योग्य जमीन पर उद्योग-धंधा स्थापित होने में कोई हर्ज नहीं। समय-समय पर आने वाले उनके वक्तव्यों-साक्षात्कारों, खासकर सिंगूर और नंदीग्राम के घटनाक्रम के दौरान आए उनके वक्तव्यों में वे स्पष्ट रूप से यह नजरिया रखते नजर आते हैं।

बहुतों को याद होगा कि बांग्ला की सुप्रसिद्ध लेखिका महाश्वेता देवी ने सिंगूर और नंदीग्राम की घटना के आलोक में पश्चिम बंगाल की वाममोर्चा सरकार की कटु आलोचना करते हुए कहा था कि हमें उस रास्ते से परहेज करना चाहिए जिससे कलिंगनगर, सिंगूर और नंदीग्राम जैसी परिघटनाएं होती हैं। जबकि अमर्त्य सेन ने न सिर्फ वाममोर्चा सरकार की नीतियों का समर्थन किया, बल्कि उनका तो स्पष्ट कहना था कि औद्योगिक केंद्रों का विकास खेतिहर जमीन पर होता रहा है। उस दौरान ‘टेलीग्राफ’ में दिए एक साक्षात्कार में वे कहते हैं- ‘द लोकेशंस ऑफ ग्रेट इंडस्ट्री, बी इट मैनचेस्टर आॅर लंकाशायर, दीज वेयर ऑल ऑन हैवीली फर्टाइल लैंड।ह्ण यानी परोक्ष रूप से वे कहते हैं कि टाटा की कार-कंपनी के लिए सिंगूर की तीन-फसली जमीन का चयन कर वाममोर्चा सरकार ने कोई गलती नहीं की।

उसी साक्षात्कार में अमर्त्य सेन आगे कहते हैं- ‘‘विश्व के मानचित्र पर पश्चिम बंगाल की पहचान एक औद्योगिक केंद्र के रूप में रही है। न सिर्फ अंग्रेज, बल्कि पुर्तगाली, डैनिश और फ्लेमिश लोग यहां से माल खरीद कर ले जाते थे और अपने देशों में बेचा करते थे। अंग्रेजों ने भारत में आधिपत्य कायम करने के बाद यहां के ‘क्लासिक’ उद्योगों को नष्ट किया, लेकिन उसी दौर में जूट उद्योग जैसे नए उद्योग अस्तित्व में आए। बाद में उनका खात्मा हो गया और आजादी के बाद भी बंगाल के गैर-उद्योगीकरण (डी-इंडस्ट्रियलाइजेशन) की यह प्रक्रिया जारी रही। कम्युनिस्टों की नीतियां भी इसके लिए एक हद तक जिम्मेदार थीं। ट्रेड यूनियन आंदोलनों की वजह से मजदूरों के अधिकारों में तो कुछ वृद्धि हुई, लेकिन उद्योग धंधे-ही खत्म हो गए। पूर्व मुख्यमंत्री ज्योति बसु इस संकट को समझ रहे थे। वर्तमान (तत्कालीन) मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य इस संकट से राज्य को उबारना चाहते हैं। वे यहां एक औद्योगिक आधार बनाना चाहते हैं और सही दिशा में चल रहे हैं, क्योंकि औद्योगीकरण से ही विकास तेज गति से हो सकता है।’’

यहां प्रासंगिक होगा यह बताना कि जवाहरलाल नेहरूने भी अपनी पुस्तक ‘डिस्कवरी आॅफ इंडिया’ और ‘विश्व इतिहास की झलक’ में अंग्रेजों के भारत प्रवेश के वक्त भारत की अर्थव्यवस्था पर चर्चा करते हुए उल्लेख किया है कि भारत में उस वक्त कृषि और उद्योग क्षेत्र में संतुलन था। यानी पचास फीसद लोग कृषि व्यवस्था पर निर्भर थे, तो पचास फीसद लोग उद्योग-धंधों पर। सिर्फ बंगाल नहीं, देश के विभिन्न हिस्सों में तरह-तरह के उद्योग-धंधे थे। कपड़ा बनता था, मिट््टी, कांसे और पीतल के बर्तन बनते थे, लोहे के औजार बनते थे, चमड़ा उद्योग था, वास्तुकला अपने चरम पर थी। अपनी जरूरत की वस्तुओं का उत्पादन हम खुद करते थे। लेकिन सवाल यह है कि तब उद्योग और कृषि क्षेत्र में टकराव क्यों नहीं था?

दरअसल, उस जमाने के उद्योग और आज के उद्योग में कुछ बुनियादी फर्क है। पहली बात यह कि उन उद्योगों के विस्तार के लिए हजारों कृषकों को विस्थापित करने की जरूरत नहीं पड़ती थी। आज जैसा टकराव नहीं था। संभवत: इसलिए कि तब उद्योग समाज की जरूरतों को पूरा करने के लिए लगते थे। आज उद्योग बाजार को ध्यान में रख कर मुनाफे के लिए लगाए जाते हैं। निर्यात की संभावना को देखते हुए उनकी महत्ता तय होती है। देश को जरूरत है अधिकतम साढ़े तीन करोड़ से चार करोड़ टन इस्पात की और एमओयू होता है उससे दस गुना अधिक इस्पात उत्पादन के लिए। और इतना इस्पात बनेगा कैसे? देश में उपलब्ध लौह अयस्क भंडार के अंधाधुंध दोहन और यहां के सस्ते मानवीय श्रम से। और इसकी शुरुआत होगी उन कल-कारखानों के निर्माण से, जिनके बनने के लिए हजारों लोगों को अपने घरबार से उजड़ना होगा। क्या अमर्त्य सेन औद्योगीकरण के इसी रास्ते के हिमायती हैं? सिंगूर में टाटा की कंपनी का समर्थन वे जिस तरह से करते नजर आए, उससे तो ऐसा ही लगता है।

जहां तक उपजाऊ जमीन पर उद्योग स्थापित करने में हर्ज न होने का उनका तर्क है, यह कितना खतरनाक है इसे हम झारखंड के संदर्भ में देख सकते हैं। झारखंड के पास 79 लाख हेक्टेयर जमीन उपलब्ध है, जिसमें खेती होती है सिर्फ 23 लाख हेक्टेयर पर। और इस कुल उपलब्ध खेती-योग्य जमीन के 66 फीसद पर धान की खेती होती है। अब अगर यहां की खनिज संपदा को ध्यान में रखते हुए


जो सैकड़ों एमओयू हुए हैं, वे जमीन पर उतर जाएं तो पूरी आदिवासी आबादी ही उजड़ जाएगी। यह स्थिति सिर्फ झारखंड की नहीं, ओड़िशा और छत्तीसगढ़ की भी है। पश्चिम बंगाल के भी कूचबाकुड़ा, पुरुलिया आदि जिले भयानक रूप से विपन्न हैं जहां खेती-योग्य सिंचित जमीन का घोर अभाव है।

यह भी गौरतलब है कि जो क्षेत्र आज खेती की दृष्टि से विकसित नजर आते हैं, वे भी हमेशा से वैसे नहीं थे। वहां रहने वाले लोगों ने उस क्षेत्र को विकसित किया, परती या जंगल-झाड़ से पटी जमीन को साफ कर खेती लायक बनाया। कलिंगनगर जहां टाटा कंपनी एक बड़ा उद्योग लगाने जा रही है और जहां हुए एक विरोध-प्रदर्शन के दौरान दर्जनों लोग मारे जा चुके हैं, वहां के आदिवासी किसी जमाने में झारखंड से ही उस क्षेत्र में ले जाए गए थे और उन लोगों ने कड़ी मेहनत से उस इलाके का विकास किया और खेती लायक जमीन तैयार की। अब एक दिन आप लाव-लश्कर लेकर पहुंच जाएं कि हम वहां कारखाना लगाएंगे और इसके लिए तुम जमीन छोड़ दो, तो यह कहां तक न्याय-संगत है?

यह सब्जबाग दिखाया जाता है कि उद्योग-धंधों से ही विकास होगा? मगर कैसे? आजादी के बाद सार्वजनिक क्षेत्र में दर्जनों कल-कारखाने लगे। भिलाई, दुर्गापुर, राउरकेला और बोकारो जैसे औद्योगिक शहर अस्तित्व में आए। ये सभी हाहाकार करती गरीबी के बीच अपने-अपने राज्यों में समृद्धि के द्वीप हैं। लेकिन इन शहरों में आदिवासी-मूलवासी कितने रह गए हैं? और अब जो उद्योग लगने वाले हैं वे सार्वजनिक क्षेत्र में नहीं, बल्कि निजी क्षेत्र में, जिनका चेहरा और भी भयावह है। और क्या वास्तव में वे उतना रोजगार पैदा करने वाले हैं, जितने का सब्जबाग दिखाया जाता है? सार्वजनिक क्षेत्र के चालीस लाख टन उत्पादन क्षमता वाले बोकारो इस्पात संयंत्र में बावन हजार लोगों को नियमित रोजगार मिला था। अब इतनी ही क्षमता का निजी इस्पात कारखाना चार हजार लोगों को भी नौकरी देने की कुव्वत नहीं रखता।

सही है कि वर्तमान में कुल आबादी में करीबन पचपन करोड़ लोग युवा हैं और कृषि पर दबाब घटना चाहिए। लेकिन नई तकनीक लेकर आने वाले उद्योग या कुल संगठित क्षेत्र कितने लोगों को रोजगार मुहैया कराएंगे? दस लाख, बीस लाख, पच्चीस लाख, एक करोड़। लेकिन हमें तो पचास-पचास फीसद वाले अनुपात के लिए पच्चीस करोड़ लोगों के लिए रोजगार चाहिए। तभी कृषि और उद्योग के बीच आदर्श संतुलन कायम हो सकता है।

मगर क्या मौजूदा विकास नीति से यह संभव है कि औद्योगिक क्षेत्र इतनी बड़ी संख्या में रोजगार पैदा करें? क्या यह कठोर वास्तविकता नहीं कि आज भी सत्तर-अस्सी फीसद जनता कृषि क्षेत्र पर ही मूलत: निर्भर हैं। रोजगार मुहैया कराने वाला सबसे बड़ा क्षेत्र कृषि ही है जिसकी अब तक घोर उपेक्षा हुई है। हमने इस बात का कभी आकलन किया है कि औद्योगिक प्रदूषण से अब तक कितनी कृषि-योग्य भूमि को हमने बंजर बना दिया है, किन-किन नदियों को औद्योगिक कचरे से पाट दिया है? रही-सही कृषि-योग्य जमीन पर भी हम कारखाना लगा दें तो खेती पर निर्भर गरीब जनता का क्या होगा?

यह भी क्रूर मजाक है कि अब उद्योग लगाने के लिए किसी को दस-बीस एकड़ जमीन नहीं चाहिए- किसी को पांच सौ एकड़, किसी को हजार एकड़ तो किसी को पांच हजार एकड़ चाहिए, कुछ को इससे भी अधिक। क्योंकि उन्हें वहां सिर्फ कारखाना नहीं लगाना है- रिहायशी भवन, शानदार वातानुकूलित बाजार, हवाई पट्टी, स्वीमिंग पूल, पांच सितारा होटल आदि भी बनाने हैं। अपना औद्योगिक साम्राज्य कायम करना है। इस नए साम्राज्यवाद या इस नई जमींदारी के लिए वे तथाकथित विकास की आड़ में गरीबों का गला घोंटने पर तुले हैं जो किसी भी तरह से उचित नहीं है। अगर उद्योग के लिए जमीन चाहिए ही तो उद्योगपति उन क्षेत्रों में जाएं जहां काफी बंजर परती जमीन पड़ी है। उसे विकसित करें और वहां उद्योग लगाएं।

गांधी की अहिंसा की दुहाई तो अमर्त्य सेन देते हैं, लेकिन कृषि और कुटीर उद्योग आधारित ग्राम स्वराज्य की जगह औद्योगीकरण को ही विकास का आधार मानते हैं। नंदीग्राम के संदर्भ में उन्होंने कहा कि यह कुछ ज्यादा ही जटिल मामला है। कुछ विपक्षी दलों ने वहां ‘मुक्त क्षेत्र’ बना लिया है और वहां वे किसी को प्रवेश करने की अनुमति नहीं दे रहे हैं। यह भी एक हिंसक गतिविधि है जो भारत की अहिंसा की परंपरागत नीति के विरुद्ध है।

कोई भी किसी क्षेत्र में जा सकता है। लेकिन किसी को यह छूट तो नहीं दी जा सकती कि वह सत्ता की मदद से, पूंजी के बल पर किसी क्षेत्र में प्रवेश करे, वहां के मूलवासियों को दर-बदर कर वहां अपना साम्राज्य बना ले। और विरोध के शांतिमय तरीकों को कुंद किसने किया है? विरोध करने के कुछ अहिंसक रास्ते गांधी ने बताए थे। व्यक्तिगत सत्याग्रह, असहयोग, शांतिपूर्ण धरना-प्रदर्शन, आमरण अनशन आदि। लेकिन हालात ऐसे बनते जा रहे हैं कि आप धरना, प्रदर्शन, घेराव, व्यक्तिगत सत्याग्रह करके थक जाएं, अनशन करके मर जाएं, व्यवस्था के कानों पर जूं तक रेंगती। पोस्को इसका ज्वलंत उदाहरण है। याद रखना चाहिए कि गांधी ने सिर्फ अहिंसा और सत्याग्रह की बात नहीं कही थी। उन्होंने आत्मनिर्भरता, सादगी, सदाचार, कुटीर उद्योग और ग्राम स्वराज्य की बातें भी की थीं, जिनके बगैर अहिंसा की बात करना बेमानी है।

 

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