मुखपृष्ठ
Bookmark and Share
इस रिहाई के मायने PDF Print E-mail
User Rating: / 1
PoorBest 
Friday, 28 February 2014 11:44

केपी सिंह

जनसत्ता 28 फरवरी, 2014 : राजीव गांधी के हत्यारों की फांसी की सजा को उच्चतम न्यायालय द्वारा

आजीवन कारावास में बदल देने के बाद तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जयललिता ने आजीवन कारावास की सजा को पूरा हुआ मान कर उनकी रिहाई का रास्ता खोलने में तनिक भी देर नहीं लगाई। आनन-फानन में बुलाई गई मंत्रिमंडल की बैठक में इससे संबंधित प्रस्ताव पास करके तमिलनाडु सरकार ने केंद्र सरकार को तीन दिन में अपनी सहमति या असहमति से अवगत कराने का अनुरोध किया। तमिलनाडु सरकार ने अपनी मंशा स्पष्ट कर दी कि उसे राजीव गांधी के हत्यारों को फांसी तो क्या, आजीवन जेल में रखना भी गवारा नहीं। जयललिता का यह प्रस्ताव भले राजनीतिक लगता हो, पर कानून-सम्मत है। इसीलिए केंद्र सरकार के पास फिर से अदालत का दरवाजा खटखटाने के अलावा कोई और विकल्प नहीं बचा था। अब केंद्र की याचिका पर सर्वोच्च न्यायालय ने तमिलनाडु सरकार के राजीव गांधी के हत्यारों को छोड़ने के फैसले पर रोक लगा दी है।

 

जेल और सजायाफ्ता कैदियों से संबंधित विषय संविधान की सातवीं अनुसूची की ‘राज्य सूची’ में शामिल राज्य सरकारों के अधीन विषयों में उल्लिखित है। यानी केंद्र सरकार का इन विषयों में कोई प्रत्यक्ष हस्तक्षेप नहीं है। सजा निर्धारित कर देने की अदालती और दया माफी की संवैधानिक प्रक्रिया पूरी हो जाने के बाद सजायाफ्ता कैदी राज्य सरकार के अधिकार क्षेत्र में आ जाते हैं, जिन्हें राज्य के जेल नियमों के अनुसार सजा काटनी होती है। कैदियों की सजा कम करने या उसका स्वरूप बदलने का  अधिकार राज्य सरकार के पास है।

दंड प्रक्रिया संहिता की धाराएं 432, 433, 433 ए और भारतीय दंड संहिता की धाराएं 54 और 55 राज्य सरकार को राज्य की सीमा के अंदर हुए अपराधों में सजायाफ्ता कैदियों की सजा कम करने, स्थगित करने और सजा का स्वरूप बदल देने के अधिकार प्रदान करती हैं। तमिलनाडु सरकार ने इन्हीं प्रावधानों का प्रयोग करते हुए राजीव गांधी हत्याकांड से जुड़े अपराधियों की सजा का प्रकार बदल कर उन्हें रिहा करने का निर्णय किया।

दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 435 अलबत्ता यह प्रावधान करती है कि केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो द्वारा अनुसंधान किए गए मुकदमों और केंद्र की विषय सूची में शामिल विषयों से संबंधित आपराधिक मुकदमों के कैदियों के बारे में ऐसा कोई भी निर्णय करने से पहले राज्य सरकार केंद्र सरकार से विचार-विमर्श अवश्य करेगी। इसी प्रावधान के तहत राजीव के हत्यारों की रिहाई का मामला तमिलनाडु सरकार ने केंद्र सरकार के पास विमर्श के लिए भेजा, क्योंकि इस मुकदमे का अनुसंधान केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो ने किया था।

केंद्र सरकार ने उच्चतम न्यायालय में दायर पुनरावलोकन याचिका में गुहार लगाई थी कि राजीव गांधी के हत्यारों की फांसी की सजा को इस आधार पर उम्रकैद में बदल देना उचित नहीं है कि उन्होंने मृत्युदंड के साए में दशकों तक इंतजार किया है। दूसरी याचिका में प्रक्रियागत खामियों को मुद्दा बना कर तमिलनाडु सरकार के इन कैदियों की समयपूर्व रिहाई के निर्णय को चुनौती दी गई।

फांसी की सजा प्राप्त कैदियों की दया याचिका महामहिम राष्ट्रपति के पास दशकों तक लंबित पड़े रहना कोई नई बात नहीं है। राष्ट्रपति केआर नारायणन ने वर्ष 1997 से 2002 के बीच उनके पास लंबित पंद्रह दया-याचिकाओं पर कोई भी निर्णय नहीं किया था। उसके बाद राष्ट्रपति डॉ कलाम ने अपने पांच वर्ष के कार्यकाल में केवल एक दया याचिका पर फैसला किया था और बाकी की चौबीस याचिकाएं लंबित रह गई थीं। राष्ट्रपति प्रतिभा पाटील ने वर्ष 2007 से 2012 के बीच चौबीस दया याचिकाओं पर फैसला किया और एक को छोड़ कर बाकी तेईस फांसी की सजाओं को उम्रकैद में बदल दिया था।

राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी का कार्यकाल इस मामले में सबसे अलग नजर आता है। उन्होंने अभी तक इक्कीस दया याचिकाओं पर फैसला किया है। एक मामले को छोड़ कर बाकी बीस मामलों में उन्होंने फांसी की सजा बरकरार रखी है। इस प्रकार एकदम बीस कैदियों को फांसी देने की हकीकत ने देश के हुक्मरानों और न्यायविदों को दूर तक विचलित-सा कर दिया लगता है। याचिकाओं के निपटारे में हुई देरी को आधार बना कर इनमें से अधिकतर मामलों में मानवाधिकारों की दुहाई देते हुए उच्चतम न्यायालय में याचिकाएं दायर की गई है। उच्चतम न्यायालय ने इन फांसी की सजाओं को उम्रकैद में बदल दिया है।

उच्चतम न्यायालय ने अपने फैसलों में दलील दी है कि दशकों तक फांसी के फंदे के साए में जीना अपने आप में एक क्रूरतम मानवीय त्रासदी है, जो किसी भी कैदी का मानसिक संतुलन बिगाड़ सकती है। इतनी लंबी त्रासदी झेल चुके कैदी को मृत्युदंड देना न्याय-संगत नहीं है। इसके बावजूद उच्चतम न्यायालय ने दया याचिकाओं के निपटारे के लिए न तो समयबद्ध प्रक्रिया निर्धारित करना उचित समझा और न ही फांसी की सजा को कानून की किताबों से हटा देने की बात स्वीकार की है।

दुनिया के अधिकतर विकसित देशों ने फांसी की सजा समाप्त कर दी है। भारत में हत्या, देशद्रोह और आतंकवाद से संबंधित चंद अपराधों में ही मृत्युदंड देने का प्रावधान है। देश में प्रतिवर्ष लगभग पचास हजार ऐसे अपराध घटित होते हैं, जिनमें अपराधी को फांसी की सजा दी जा सकती है। पर प्रतिवर्ष अंतत: औसतन बीस अपराधियों को ही फांसी की सजा हो पाती है, जिनकी दया


याचिकाएं राष्ट्रपति केपास पहुंचती हैं।

दया याचिकाओं के निपटारे में होने वाली देरी और कानूनी दांव-पेचों के चलते फांसी की सजा पाए कैदियों में से प्रतिवर्ष औसतन एक को भी फांसी नहीं दी जा रही है। यानी फांसी की सजा का कानून किताबों में होना या न होना कोई मायने नहीं रखता। इन परिस्थितियों में यह बहस निरर्थक हो जाती है कि फांसी की सजा समाप्त कर देनी चाहिए।

दूसरा विचारणीय मुद्दा आजीवन कारावास की अवधि से संबंधित है। विशुद्ध कानूनी दृष्टि में आजीवन कारावास का मतलब होता है मृत्यु होने तक का कारावास। पर भारत में आजीवन कारावास की सजा अमूमन चौदह वर्ष के कारावास के बाद पूरी हो जाती है। इसके लिए पर्याप्त कानूनी आधार उपलब्ध है। तमिलनाडु सरकार ने इन्हीं कानूनी प्रावधानों का प्रयोग किया। ऐसे में यह प्रश्न महत्त्वपूर्ण हो जाता है कि क्या उन आजीवन कारावास की सजा प्राप्त कैदियों को भी चौदह वर्ष में रिहा हो जाने का अधिकार मिलना चाहिए, जिनका अपराध जघन्य हो और जिनकी फांसी की सजा को अदालत या महामहिम ने आजीवन कारावास में बदल दिया हो? आम आदमी की नजर में ऐसा नहीं होना चाहिए।

पर समानता का संवैधानिक अधिकार और सजा कम करने के कानूनी प्रावधान कैदियों को मिलने वाली आजीवन कारावास की सजा में किसी प्रकार के भेद करने की इजाजत नहीं देते। सब कुछ राज्य सरकारों के विवेकाधीन है। ऐसे में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिए गए फैसलों में एक बीच का रास्ता ढूंढ़ लिया गया है, हालांकि न्यायविदों में इन फैसलों पर मतभेद हैं। सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालय फांसी की सजा को आजीवन कारावास में बदलते समय कई बार अपराध की कू्ररता और जघन्यता को ध्यान में रखते हुए सजा की न्यूनतम अवधि निर्धारित करने लगे हैं, जो चौदह वर्ष से ज्यादा होती है। यहां यह उल्लेखनीय है कि भारतीय दंड संहिता में आजीवन कारावास की सजा को इस प्रकार परिभाषित करने का कोई प्रावधान नहीं है।

राजीव गांधी के हत्यारों और इसी प्रकार के अन्य मामलों में फांसी की सजा देने में हुई देरी को क्रूर और अमानवीय करार देते हुए उच्चतम न्यायालय ने उनकी फांसी की सजा को उम्रकैद में बदल दिया है। देवेंद्र पाल सिंह भुल्लर के मामले में आतंकवाद की दुहाई देकर सर्वोच्च अदालत अपनी ही इस दलील को मानने से इनकार कर देती है। स्वामी श्रद्धानंद प्रकरण में सर्वोच्च अदालत द्वारा आजीवन कारावास को, बिना किसी कानूनी प्रावधान के, पच्चीस या तीस वर्ष तक के कारावास के रूप में परिभाषित कर दिया जाता है। इतने लंबे समय तक रिहाई या मौत का जेल में इंतजार करना क्या कैदी के प्रति क्रूर और अमानवीय व्यवहार नहीं है? शायद इसीलिए न्यायविद रिक रोबिन्सन ने कहा है कि भारत में एक नहीं अनेक सर्वोच्च अदालतें हैं। इन सभी मामलों में न्यायविद एकमत नहीं हैं।

राजीव गांधी के हत्यारों के संदर्भ में अब सबसे महत्त्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या उनकी रिहाई संभव है या नहीं? प्रश्न जितना जटिल है उसका उत्तर उतना ही आसान है। वर्तमान घटनाक्रम में यह प्रश्न कानून और राजनीति की दो नावों में एक साथ सवार हो गया है और दोनों नावों के मंजिल तक पहुंचने में कोई अड़चन नजर नहीं आती। राजीव गांधी के हत्यारे जेल से बाहर जरूर आएंगे, पर कानूनी प्रक्रिया के चलते इसमें थोड़ी देर जरूर हो सकती है।

अगर पुनरावलोकन याचिका में सर्वोच्च अदालत अपने पहले के आदेश, जिसके द्वारा फांसी की सजा आजीवन कारावास में बदल दी गई थी, को बरकरार रखती है तो तमिलनाडु सरकार को राजीव के हत्यारों की रिहाई का फैसला लागू करने में कोई अड़चन नहीं आएगी। अगर सर्वोच्च अदालत अपना फैसला बदल देती है और फांसी की सजा बरकरार रखती है तो भी तमिलनाडु सरकार को पर्याप्त कानूनी आधार उपलब्ध है, जिसका प्रयोग करके वह राजीव गांधी के हत्यारों की रिहाई के आदेश पुन: दे सकती है।

दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 433 में प्रावधान है कि अंतिम रूप से निर्धारित हो चुकी फांसी की सजा को राज्य सरकार किसी दूसरी प्रकार की सजा में तब्दील करके हत्यारों की रिहाई सुनिश्चित कर सकती है। ऐसा होना चाहिए या नहीं, यह एक अलग विचारणीय प्रश्न है।

मानवता और इंसाफ का परचम सर्वोच्च रखने की नीयत से चुनी हुई सरकारों और राज्याध्यक्षों को कानून और संविधान में सजा माफी के विस्तृत विवेकाधीन अधिकार दिए गए हैं। जन-प्रतिनिधियों और महामहिम को चाहिए कि इन शक्तियों का प्रयोग सदा न्याय की शुचिता बरकरार रखने की खातिर ही किया जाए। अगर इन शक्तियों का प्रयोग किसी अन्य मंतव्य की साधना के लिए होगा तो इन पर निश्चित ही अंगुलियां उठेंगी। और विशुद्ध और स्वस्थ राजनीति का यही तकाजा होता है कि राजनीतिकों के फैसलों पर अंगुली नहीं उठनी चाहिए।

 

 

फेसबुक पेज को लाइक करने के लिए क्लिक करें- https://www.facebook.com/Jansatta
ट्विटर पेज पर फॉलो करने के लिए क्लिक करें- https://twitter.com/Jansatta

 

 

 

 

 

आपके विचार

 
 

आप की राय

सोनिया गांधी ने आरोप लगाया है कि 'भाजपा के झूठे सपने के जाल में आम जनता फंस गई है' क्या आप उनकी बातों से सहमत हैं?