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राजनीति का बदलता मुहावरा PDF Print E-mail
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Wednesday, 26 February 2014 11:32

योगेश अटल

जनसत्ता 26 फरवरी, 2014 : देश की राजनीति आज एक नए मोड़ पर खड़ी है। सबसे पुरानी गिनी जाने वाली पार्टी के प्रति व्यामोह टूट रहा है।

पिछले दशकों में शीर्ष पर रहीं और अपने-अपने गठबंधनों से जुड़ी हुर्इं दो प्रमुख पार्टियां आज ऐसे समूहों का सामना करने को विवश हो गई हैं जो सत्ता परिवर्तन के स्थान पर व्यवस्था परिवर्तन पर बल दे रहे हैं। बढ़ते हुए भ्रष्टाचार को वे व्यवस्था में खोट के रूप में देखते हैं। और इसीलिए जब स्थापित पद्धतियों के स्थान पर वे जनता जनार्दन की सलाह का सहारा लेते हैं तो उन पर असंवैधानिक होने का आरोप लगाया जाता है। पुरानी पार्टियों की कठिनाई यह है कि वे इन नए उभरते विकल्पों के विगत में नहीं जा सकतीं, क्योंकि वे वर्तमान की उपज हैं और जो इनका नेतृत्व कर रहे हैं उन पर भ्रष्टाचार का आरोप नहीं लगाया जा सकता। ले-दे कर यह कहा जाता रहा है कि उनमें राजनीतिक अनुभव की कमी है, और उन्हें सत्ता चलाना नहीं आता।

 

लेकिन ऐसी आलोचनाएं गले नहीं उतरतीं। पार्टियां पुरानी हो सकती हैं और उनकी संस्कृति में नवागतों को ढलने में समय लग सकता है। पर जो चुन कर सत्ता में आते हैं और राज्य का कार्यभार सम्हालते हैं वे हमेशा पुराने घाघ तो नहीं होते। रोज के कामकाज तो अफसरशाही सम्हालती है जो वरीयता के आधार पर शीर्ष पर पहुंचती है। राजीव गांधी जब प्रधानमंत्री बने तब उन्हें वायुयान चलाने का अनुभव तो था, पर वे  राजनीति में आने से हिचक रहे थे। उनकी पत्नी, जो आज कांग्रेस के शीर्ष पर हैं, राजीव को राजनीति में जाने से तब मना कर रही थीं। पर वे आए, एक नए सोच के साथ, और अपना पहला चरण ही उन्होंने शिक्षा में व्यापक सुधार लाने की दिशा में उठाया। सैम पित्रोदा को लाकर कंप्यूटरीकरण का साहसिक कार्य किया।

अनुभव की आड़ लेकर घिसी-पिटी पद्धतियों को चलाए रखने की मानसिकता रूढ़िवादी और परंपरा-पोषक होती है। देश चलाने के लिए परंपरा के ढर्रे के स्थान पर नए मार्गों की खोज और नए गंतव्यों की आवश्यकता होती है। आधुनिकीकरण की प्रक्रिया की यही मांग रहती है। स्वाभाविक है कि ऐसा करने से कई तंत्र टूटते हैं, और नए तंत्रों की आवश्यकता पड़ती है।

वर्तमान की राजनीति का यह दौर अब तक की उपलब्धियों का मूल्यांकन करने का, असंगतियों को प्रकाशित करने का, और नई सूझ से तंत्र चलाने की जरूरत पर बल देने का है।

इस दृष्टि से जब मीडिया पर होने वाली बहस को देखता हूं तो लगता है कि ये बहसें स्थापित दलों को अपना-अपना राग अलापने का अवसर प्रदान करती हैं और एक दूसरे पर छींटाकशी करने का मौका प्रदान करती हैं। ये बहसें सहमति पैदा करने में सहायक नहीं होतीं। सत्तर के दशक में जब इन बहसों में हमें भाग लेने के लिए बुलाया जाता था तो वैचारिक विवाद होते थे, दुंदुभि वादन नहीं। बहसें चुनाव प्रचार का मंच न होकर विचार विनिमय का माध्यम होती थीं।

आज की बहसों में सारे दल अपनी ढपली अपना राग अलाप रहे हैं। वही बात, वही तर्क, वही अंदाज, और वही आरोप-प्रत्यारोप। तर्क की असंगति का एक ताजा उदाहरण। इस पर विवाद उठ खड़ा हुआ कि न्यायालय का राजीव गांधी के हत्यारों की सजा कम करने का निर्णय सही है या कि गलत। तमिलनाडु की मुख्यमंत्री ने निर्णय को आधार मान कर यह तय किया कि उन तीनों हत्यारों को वे जेल से रिहा कर देंगी। इस पर राहुल गांधी की प्रतिक्रिया उल्लेखनीय है। उन्होंने कहा कि अगर इस देश में प्रधानमंत्री को भी न्याय नहीं मिल सकता तो आम आदमी का क्या होगा। यह बात अलग है कि तब राजीव गांधी प्रधानमंत्री नहीं थे। सरकार की बागडोर चंद्रशेखर के हाथों में थी।

इसी संदर्भ में सोमनाथ भारती पर लगाए गए इल्जाम को भी देखा जाना चाहिए। जो तर्क राहुल ने राजीव गांधी को लेकर दिया, क्या वही तर्क सोमनाथ भारती के संदर्भ में भी दिया जा सकता था! सोमनाथ भारती का अनादर तो तब किया गया जब वे दिल्ली राज्य के मंत्री थे। एक मामूली पुलिस अधिकारी ऐसे चुनिंदा नागरिक की, और वह भी मंत्री की- अवहेलना करे तो उसे कानून की सर्वोपरिता की आड़ में बचा लिया जाता है। होना तो यह चाहिए कि कोई भी संभ्रांत नागरिक अगर सरकारी अफसर के पास जाए तो उसे उचित सम्मान दिया जाए और उसकी बात को ध्यान से सुना जो, विशेषकर तब जब कि वह व्यक्तिगत लाभ की बात न कर रहा हो।

ये दो घटनाएं इस बात का प्रमाण हैं कि एक में पद की दुहाई देकर हत्यारों की रिहाई रोकी जाती है तो दूसरी में कानून का सहारा लेकर पद के गौरव को खंडित किया जाता है। राजीव गांधी को समय पर न्याय न मिलना उतना ही दुखदहै जितना कि एक पुलिस अधिकारी द्वारा मंत्री की अवज्ञा।

मेरी बात को अन्यथा न लिया जाए, इसलिए यह कहना आवश्यक है कि राजीव गांधी की नृशंस हत्या एक जघन्य अपराध थी और हत्यारों को शीघ्र और कड़ी से कड़ी सजा दी जानी चाहिए थी। पर नियम और कानून के प्रपंच में उलझ कर यह मामला इतने बरसों तक टलता रहा। और इस कारण अब यह दलील जा रही है कि फांसी की सजा को आजीवन कारावास में तब्दील कर दिया जाए। जाहिर है कि यह बात आसानी से गले नहीं उतर सकती। पर यह घटना इस बात की ओर भी संकेत देती है कि हमारी न्याय-व्यवस्था में कितनी खोट है, और हमारी प्रतिक्रिया कितनी दोमुंही है।

इस घटना को आज के संदर्भ में भी देखा जाना चाहिए, जबकि संवैधानिकता और नियमबद्धता के प्रश्न उठाए जा रहे हैं और कहा जा रहा है कि केजरीवाल सरकार के जन लोकपाल विधेयक पर तो सहमति थी मगर आपत्ति नियम-अवहेलना पर


थी। अगर विधेयक पर सहमति थी और उसे जनहित में माना गया तो फिर रास्ते की रुकावट बने नियम की पूजा करने का क्या अभिप्राय था?

यदि गौर से देखा जाए तो विधेयक पेश करने की विधि पर ही प्रश्न उठाया जाना चाहिए। पूर्ण राज्य का दर्जा पाए प्रदेशों में तो केंद्रीय गृह मंत्रालय का ऐसा हस्तक्षेप नहीं होता, फिर यहां क्यों? यह प्रश्न कैसे उठाया जा सकता था? जन लोकपाल विधेयक एक प्रकार से ‘टेस्ट केस’ था। एक बात और। अगर विधानसभा में पारित होने के बाद विधेयक उप-राज्यपाल की स्वीकृति के लिए जाना ही था तो उसे पहले भेजने की आवश्यकता को समर्थन देने का क्या मतलब है? हमें यह स्मरण रखना चाहिए कि नियम लक्ष्य-सिद्धि के माध्यम हैं। नियमपूजक लोग माध्यम को ही लक्ष्य बना लेते हैं, और उनका उपयोग या दुरुपयोग अपनी स्वार्थ-सिद्धि के लिए करते हैं।

व्यवस्था में खोट लाने में नियमों की भूमिका को समझना आवश्यक है। नियम साधक भी होते हैं और बाधक भी। नौकरशाही में वही अफसर अनुभवी गिना जाता है जो परिस्थिति के अनुकूल नियम की व्याख्या करे और अपने बॉस को खुश रखे। नियम-पूजा के माध्यम से ही अफसर और अधिकारी भ्रष्ट होते हैं। वे माध्यम को ही लक्ष्य मान लेते हैं।

एक ओर स्थापित दल नियमों की आड़ लेकर अपने को बचाने की कोशिश कर रहे हैं, तो दूसरी ओर, आप जैसी पार्टियां स्थापित दलों की कमजोरियों को विज्ञापित करने में जुटी हैं। उन पर तो भ्रष्ट होने का आरोप लगने से रहा, क्योंकि वे सत्ता में रहे नहीं, और दिल्ली में भी वे सत्ता में बने रहने की भावना से आए नहीं। उनका लक्ष्य था सत्ता के दुर्ग में होने वाले भ्रष्टाचार का पर्दाफाश करना। वे सत्ता से शीघ्र बाहर आ गए, उसका पश्चात्ताप करना शायद ठीक नहीं है; उन्हें जो आम आदमी की अपार सहानुभूति मिली वह अवश्य उल्लेखनीय है। स्थापित दल वे वादे गिना रहे हैं जिनकी पूर्ति इतने कम समय में कतई संभव नहीं थी। और जो थोड़े-से कदम उठाए गए, जिन्होंने व्यवस्था को हिला कर रख दिया, उसका श्रेय देने में भी विरोधी पक्ष- अर्थात अब तक चली आ रही प्रणाली के नायक दल- अपनी कृपणता दर्शा रहा है।

सत्ता छोड़ने से जो व्यापक सहानुभूति आप को मिल रही है वह देशव्यापी है। आश्चर्य नहीं होगा कि लोकसभा चुनावों के परिणाम भी दिल्ली विधानसभा चुनाव के परिणामों की तर्ज पर हों। भाजपा की संख्या द्वार पर आकर अटक जार, बीच में रहें आप जैसी कई पार्टियां, और कांग्रेस हो नीचे के पायदान पर! भारतीय मतदाता ऐसा करिश्मा करने में समर्थ है। वर्ष 1967 के चुनावों में उसने यह कर दिखाया था। हमें ऐसी स्थिति से निबटने के लिए तैयार रहना चाहिए। आज के समय में कोई दल ऐसा नहीं दिखता जो बिना अन्य दलों के सहकार के सरकार बना सके। मिली-जुली सरकार का नया स्वरूप गठबंधन के दौर का कोई अगला चरण हो सकता है।

जब सत्ता की लालसा न हो और चरमराई व्यवस्था की वास्तविकता को उजागर करने की चेष्टा की जाए तो उस समय यही अपेक्षा की जानी चाहिए कि स्थापित स्तंभों की आत्म-संतोषी भावना खंडित होगी। मुझे लगता है कि आप जैसे संगठन को ‘एक और दल’ मान कर उसकी अवहेलना करना वास्तविकता से दूर भागने जैसा है। सच तो यह है कि इस नए समूह की रणनीति के कई पक्ष राहुल भी अपना रहे हैं। भाजपा भी मूल मुद््दों को नकार नहीं रही है। सभी यह स्वीकार करने लगे हैं कि पहले की भांति खरीदे जा सकने वाले मतदाताओं की संख्या घट रही है। अरविंद की सरकार जाने के बाद दिल्ली के सरकारी अस्पतालों के जो खुलासे सामने आ रहे हैं उससे फिर आम आदमी की सहानुभूति आप की ओर लौट रही है। लोग कहने लगे हैं कि अगर यह सरकार अपना पूरा कार्यकाल पूरा कर लेती तो दिल्ली एक आदर्श राज्य के रूप में उभर कर आता।

देश की बदलती राजनीति को पुराने मुहावरों से नहीं समझा जा सकता। दलगत राजनीति ने पिछले दशकों में गठबंधन की राजनीति को जन्म दिया, जिसमें कई क्षत्रप उभर कर आए, जिनकी प्रतिष्ठा अपने क्षेत्र तक सीमित रही, हालांकि उनकी पहचान देशव्यापी हो गई, पर उनमें से कोई भी राष्ट्रीय स्तर पर अपनी वैसी छवि नहीं बना पाया है जैसी कि जवाहरलाल नेहरूकी थी। स्वतंत्रता प्राप्ति के नेता भी ‘जेल स्नातक’ कहे जाते थे, पर वे मुक्ति आंदोलन के कारण जेल गए थे। बाद के नेता अब भ्रष्टाचार के कारण जेल जाते हैं। गरीबी की दुहाई देकर उठे ये नेता काले धन के माध्यम से करोड़पति हो गए हैं। इनकी शब्दावली में गरीबी महज एक मुहावरा बन कर रह गई है।

मध्यम वर्ग और शिक्षित श्रेणी के नए नेता दलगत राजनीति से बाहर एक नया मुहावरा लेकर आए हैं। वे विकल्प की बात करते हैं। विकल्प दल का नहीं, व्यवस्था का। व्यवस्था के दोष दर्शाने के लिए वर्तमान के नियमों के उभयभावों को प्रकट करना सहज नहीं है। स्थापित दल अपनी वस्तुस्थिति बचाए रखने के लिए ही नियमों का प्रश्रय ले रहे हैं। राजनीति की नई शब्दावली और भिन्न व्याकरण अभी उनके पल्ले नहीं पड़ रहे हैं। रूढ़ियों में कैद ये दल बाहर की हवा और रोशनी से मुखातिब होने से डर रहे हैं।

 

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