मुखपृष्ठ
Bookmark and Share
निमित्त की राजनीति से आगे PDF Print E-mail
User Rating: / 1
PoorBest 
Monday, 24 February 2014 11:55

शिवदयाल

जनसत्ता 24 फरवरी, 2014 : यह अनुमान लगाना कठिन है कि अरविंद केजरीवाल को देश में ‘नया कुछ’ घटने संबंधी ‘अदृश्य संकेत’ अब भी मिल रहा है या नहीं।

सामने अब दिल्ली की विधानसभा नहीं, लोकसभा है। देश में जिस परिवर्तन का निमित्त बनने का उन्हें भान हुआ था, वह वास्तव में संभव यहीं से हो सकता है।

 

पार्टी-निर्माण के पीछे केजरीवाल के अपने तर्क थे। उनका मानना था कि कांग्रेस-भाजपा जैसी पार्टियां कभी भी मजबूत लोकपाल (जनलोकपाल) कानून नहीं ला सकतीं, इसलिए नई पार्टी बना कर सत्ता स्वयं अपने हाथों में लेनी होगी। उन्होंने ‘नई राजनीति’ का एजेंडा हाथ में लिया और दिल्ली विधानसभा चुनाव की तैयारियों में लग गए। ठीक इसी बिंदु पर उन्होंने नया इतिहास लिखना शुरू किया- चंदे के लेन-देन में पारदर्शिता, मतदाता से सीधा संपर्क, बिना तामझाम का चुनाव-प्रचार, जनता के बीच से बेदाग उम्मीदवार का उसकी जाति-धर्म का विचार किए बिना चयन, मतदाताओं से ही निर्वाचन क्षेत्र की समस्याओं की जानकारी प्राप्त कर मुद््दे जुटाना-बनाना...। इसी क्रम में बिजली और पानी के साथ भ्रष्टाचार को जोड़ कर अपनी चुनावी रणनीति बनाई और विशेषकर कांग्रेस को लगातार निशाने पर लेते रहे। बिजली की लाइन जोड़ने-काटने का कार्यक्रय हाथ में लेकर भी उन्होंने जनमत अपने पक्ष में बनाने का प्रयास किया। आम आदमी पार्टी के चुनाव चिह्न ‘झाडू’ ने इसके चुनाव अभियान को और भी नाटकीय बनाया- कार्यकर्ताओं ने सिर पर टोपी पहनी और हाथ में झाडू उठाया और मतदाताओं के दर पर दस्तक देने लगे। बड़े-बड़े राजनीतिक और पत्रकार इस पार्टी को चार-पांच से अधिक सीटें देने को तैयार नहीं थे। लेकिन साल भर की पार्टी ने अपने पहले ही चुनाव में सत्तर में से अट््ठाईस सीटें जीत कर सबको विस्मित कर दिया।

नई पार्टियां चुनाव जीतती आई हैं, लेकिन चुनाव लड़ने के तरीके ने फर्क पैदा कर दिया। अब तक चुनाव सुधार की मांग सरकार, चुनाव आयोग और राजनीतिक दलों से की जाती रही है। आम आदमी पार्टी ने चुनाव ऐसे लड़ा जैसे चुनाव सुधारों पर अमल हो चुका हो- सामाजिक पृष्ठभूमि, धनबल, बाहुबल का इस्तेमाल किए बिना उम्मीदवारों ने सीटें जीतीं। प्रमाणित हुआ कि देश का आम आदमी भी चुनाव लड़ और जीत सकता है। यह भी कि चुनाव सुधार का दारोमदार वास्तव में राजनीतिक दलों पर है। अगर वे इसके लिए दृढ़ संकल्पित हों तो साफ-सुथरे तरीके से भी चुनाव लड़ा जा सकता है।

अपने तरीके के ‘जनलोकपाल कानून’ लाने की जिद में केजरीवाल दिल्ली के मुख्यमंत्री बन गए, लेकिन इस प्रक्रिया में एक महत्त्वपूर्ण प्रश्न का जाने-अनजाने समाधान हुआ। वह यह कि राजसत्ता को नियंत्रित और मर्यादित रखने के लिए अगर प्रतिबद्ध और ईमानदार लोगों-जमातों की जरूरत है तो राजव्यवस्था और व्यापक अर्थ में लोकतांत्रिक राजनीति चलाने के लिए भी ऐसे लोगों की उतनी ही जरूरत है। बदलाव दोतरफा हो तभी प्रभावी और फलदायी हो सकेगा। व्यवस्था को बाहर से नियंत्रित करना ही पर्याप्त नहीं, उसे अंदर से बदलना भी अपेक्षित है और इसके लिए चुनावी दलदल से बचने से काम नहीं चलेगा, उसमें उतर कर पार उतरने की हिम्मत भी दिखानी होगी।

आम आदमी पार्टी की यह मूक, लेकिन मारक अपील थी, जो देश भर में आंदोलनकारी जमातों के लोग ही नहीं, एकदम सामान्य नागरिक भी उसके सदस्य बनने लग गए। ‘आप’ परिवर्तन का प्रतीक बन गई, देश भर में ‘केजरीवाल प्रभाव’ दृष्टिगोचर होने लगा। स्थापित दल और दिग्गज नेता भी ‘आप’ की कसौटी पर अपने को जनता की नजरों में ‘आम’ और ‘उदार’ दिखाने का उपक्रम करने लगे। ऐसा लगने लगा जैसे केजरीवाल अपनी शर्तों पर राजनीति चला रहे हों। लेकिन मुख्यमंत्री के रूप में उनकी भूमिका शुरू होते ही उन पर आक्षेपों और आलोचनाओं की बरसात होने लगी। कुछ तो आधार उनके कुछ अति उत्साही मंत्रियों ने भी दिया। इसमें कोई संदेह नहीं कि अपने चुनावी वादों को पूरा करने की दिशा में केजरीवाल ने आगे बढ़ कर पहल की, यानी ‘प्रो-ऐक्टिव’ रवैया अपनाया।

पानी की उपलब्धता और उसकी दरों के नियमन का मामला हो, बिजली कंपनियों के आॅडिट का मामला हो, भ्रष्टाचार नियंत्रण के उपायों का मामला हो, खुदरा में एफडीआइ की रोक का मामला हो, या फिर नर्सरी में नामांकन का- केजरीवाल सरकार ने तत्परतापूर्वक काम किया। इससे निहित स्वार्थों को चोट पहुंचनी थी सो पहुंची। आखिर ‘आप’ सरकार को कौन सहन कर सकता था- न दिल्ली का स्थापित राजनीतिक वर्ग, न नौकरशाही, न तेज कमाई करने वाला व्यापारी वर्ग! उसके कार्यकलाप तो लुभा रहे थे रेहड़ी-पटरी वालों को, दैनिक मजूरी करने वालों को, अनधिकृत बस्तियों में रहने वालों को, विद्यार्थियों और श्रम करके परिवार चलाने वाले साधारण, यानी आम लोगों को।

केजरीवाल सरकार से कड़ा इम्तहान लिया जा रहा था। यहां तक कि मुख्यमंत्री आवास का क्षेत्रफल गज-इंच में नापा जा रहा था। उनसे मुख्यमंत्री के रूप में एक-एक दिन का हिसाब मांगा जा रहा था। न केवल भाजपा और कांग्रेस, बल्कि मीडिया का एक बड़ा वर्ग उनके प्रति आक्रामक हो रहा था। उन्हें झूठा और वादाखिलाफ और नाटकबाज घोषित किया जा रहा था।

मगर अभी तो यह शुरुआत ही थी। केजरीवाल ने दिल्ली पुलिस के तीन कर्मियों के खिलाफ कार्रवाई को लेकर एक अप्रत्याशित निर्णय ले लिया। वे मंत्रिमंडलीय सहयोगियों समेत रेल भवन पर धरने पर बैठ गए। दिल्ली पुलिस दिल्ली सरकार के मातहत नहीं, केंद्रीय गृह मंत्रालय के मातहत होती है। उन्होंने दिल्ली के लिए पूर्ण राज्य की मांग कर डाली, साथ ही गंणतंत्र दिवस समारोह की भी परवाह न करने की चेतावनी दे दी। उन्हें धरने के लिए जंतर-मंतर जाने को दिल्ली प्रशासन कह रहा था लेकिन केजरीवाल को प्रतीकात्मक विरोध अभीष्ट नहीं था। वे मुख्यमंत्री रहते केंद्र सरकार के प्रति खुले प्रतिकार पर आमादा थे और इसके लिए नागरिक व्यवस्था को भंग या ठप कर देने का ‘अराजक’ निश्चय दोहरा रहे थे। लोगों को मुख्यमंत्री का यह ‘ओवरडोज’ हजम


नहीं हुआ। मीडिया तो उनके प्रति हमलावार ही हो गया। उपराज्यपाल की पहल पर धरना टूटा तो केजरीवाल की साख भी जरूर टूटी। राष्ट्रपति ने गणतंत्र दिवस की पूर्व-संध्या के अभिभाषण में लोगों को ‘लोकप्रिय अराजकता’ के प्रति चेताया।

इस घटना और केजरीवाल सरकार की विदाई के बीच दिल्ली की राजनीति में कम से कम दो बार और उबाल आया। पहली बार तब, जब आम आदमी पार्टी ने बेईमानों की सूची जारी की। और दूसरी बार, जब देश के सबसे बडेÞ पूंजीपति सहित केंद्र सरकार के मंत्रियों के खिलाफ गैस उत्पादन और कीमत में भ्रष्टाचार को लेकर प्राथमिकी दर्ज की गई। और तब जाकर दिल्ली विधानसभा में जनलोकपाल विधेयक प्रस्तुत करने का मामला आया। उपराज्यपाल के निर्देश को कारण बता कांग्रेस और भाजपा, दोनों जनलोकपाल विधेयक पेश होने देने के मसले पर मत विभाजन में सरकार के खिलाफ हो गए। सदन में शोरगुल खूब हुआ, आरोप-प्रत्यारोप भी खूब लगे। जहां भाजपा ने केजरीवाल को झूठा कहा वहीं कांग्रेस ने उन्हें संविधान की मर्यादा तोड़ने वाला मुख्यमंत्री करार दिया। केजरीवाल ने विधेयक रोके जाने का कारण अंबानी के खिलाफ प्राथमिकी को बताया और सीधा आरोप जड़ा कि दोनों दल अंबानी-समूह से उपकृत हैं।

मुख्यमंत्री केजरीवाल ने आप कार्यालय की खिड़की से समर्थकों को संबोधित करते हुए सरकार के इस्तीफे की घोषणा कर दी। हमारे शास्त्रों में उनचास प्रकार के पवन बताए गए हैं, दिल्ली में लोगों ने केजरीवाल सरकार के उनचास रंग देखे इन उनचास दिनों में। अपने हिसाब से आप की सरकार ने देश में जनपक्षीय राजनीति की एक मिसाल पेश की, लोकसभा चुनावों में वह इसी आधार पर आम आदमी से वोट मांगेगी। इसमें कोई संदेह नहीं कि कांग्रेस और भाजपा के बाद आम आदमी पार्टी में ही एक अखिल भारतीय दल बनने की संभावना है। उसे कुछ विरोधियों ने मीडिया की पैदाइश बताया तो कुछ ने कॉरपोरेट घराने की उपज। कुछ ने तो उसके उभार को नवउदारवाद का राजनीतिक हथकंडा करार दिया। मीडिया ने कभी भले ही आम आदमी पार्टी को हाथों-हाथ लिया हो, आज साठ प्रतिशत मीडिया इसका घोर विरोधी नजर आता है। खुदरा में एफडीआइ से इनकार के बाद आम आदमी पार्टी को कॉरपोरेट की उपज मानना मुश्किल है।

फिर ‘आप’ है क्या? यह पार्टी आज वह भारत की साधारण जनता की राजनीतिक जरूरत बन चुकी है, जो राजनीति के अपराधीकरण, जात-पांत, भ्रष्टाचार, बदइंतजामी और लूट-खसोट से तंग आ चुकी है। अगर आम लोगों के लिए आप सचमुच एक संभावना है तो इसके कर्णधारों को यह देखना होगा कि अब आप की राजनीति को किसी ‘जोम’ या ‘सनक’ के सहारे नहीं छोड़ा जा सकता। अगर जनलोकपाल विधेयक पारित करवाना ही सर्वप्रमुख उद्देश्य था तो इसके लिए सरकार की कुरबानी अभी की अभी क्यों जरूरी हो गई? उपराज्यपाल के सुझाव या निर्देश पर अमल कर लेने में ही आखिर कौन-सी हेठी होती! कांग्रेस और भाजपा सहित आम सहमति के प्रयास क्यों नहीं किए गए? यह सब करने के बाद भी अगर विधेयक पास नहीं होता तो कुरबानी का एक ठोस औचित्य और आधार बनता।

लेकिन सवाल यह भी है कि जनलोकपाल, वह भी अपनी तर्ज के जनलोकपाल के प्रति ऐसी जिद की वजह? कहीं यह वैचारिक उथलेपन का परिणाम तो नहीं? वे कहते हैं कि हम व्यवस्था परिवर्तन वाले लोग हैं। तो क्या एक कानून, एक संस्था भारत में व्यवस्था परिवर्तन का कारण बन सकती है- जनलोकपाल क्या भारत की सामाजिक, आार्थिक, राजनीतिक व्यवस्था को बदल देगा? फिर इस बदलाव का स्वरूप क्या होगा, इसका कोई खाका तो स्पष्ट होना चाहिए! नारे पकड़ने से काम नहीं चलेगा।

यह सत्तर के दशक का नारा है- व्यवस्था परिवर्तन! उसी दौर की एक शब्दावली थी- दूसरी आजादी। आपातकाल में जनता के सब अधिकार छीन लिए गए थे, उनकी बहाली के लिए दूसरी आजादी का आह्वान किया गया। दुनिया जानती है, आपातकाल समाप्त हुआ, जनता पार्टी की सरकार बनी तो इसे दूसरी आजादी कहा गया। आपने भ्रष्टाचार से आजादी को दूसरी आजादी बताकर इस मुद्दे को जनता की राजनीतिक स्वतंत्रता के भी ऊपर रख दिया। कहना ही था तो तीसरी आजादी कहते।

यहां हम अण्णा की बात नहीं करेंगे कि उन्होंने अरविंद केजरीवाल को सत्ता का लालची बता दिया। एक पार्टी के रूप में आम आदमी पार्टी केंद्र की सत्ता-प्राप्ति का लक्ष्य अपने लिए रख सकती है, इसका उसे अधिकार है। लेकिन देश के उद्योगपतियों के फोरम सीआइआइ के मंच से केजरीवाल ने कह दिया कि वे पूंजीवाद के खिलाफ नहीं है। देश की आर्थिक समस्याओं का एकमात्र कारण भी भ्रष्टाचार को बता दिया। लालच भ्रष्ट करता है, आपने कहा, लेकिन वह परिवेश कैसे निर्मित होता है जिसमें ज्यादा से ज्यादा लोग लालची होते हैं? आपके हिसाब से कानून से डरा कर लोगों को सदाचारी बनाया जा सकता है! क्रोनी कैपिटलिज्म (याराना पूंजीवाद) बुरा है, आपने कहा, लेकिन वह पैदा कैसे होता है, उसे रोकने की आपकी नीति क्या है?

उत्साह राजनीति में अच्छी बात है, लेकिन विचारों और कार्यक्रमों में परिपक्वता और स्पष्टता ही आम आदमी पार्टी को आगे ले जा सकती है। चुन-चुन कर व्यक्तियों को बेईमान घोषित करने और तुम-तड़ाके की भाषा का इस्तेमाल कुछ लोगों को खुश भले कर दे, इससे पार्टी का आकर्षण घटेगा ही, बढ़ेगा नहीं। फिर यह भी तो ‘भ्रष्ट आचार’ ही है, आखिर भ्रष्टाचार का अर्थ केवल आर्थिक भ्रष्टाचार तो होता नहीं।

 

फेसबुक पेज को लाइक करने के लिए क्लिक करें- https://www.facebook.com/Jansatta
ट्विटर पेज पर फॉलो करने के लिए क्लिक करें- https://twitter.com/Jansatta

आपके विचार

 
 

आप की राय

सोनिया गांधी ने आरोप लगाया है कि 'भाजपा के झूठे सपने के जाल में आम जनता फंस गई है' क्या आप उनकी बातों से सहमत हैं?