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नवउदारवाद से उपजी चुनौतियां PDF Print E-mail
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Saturday, 22 February 2014 11:37

प्रभात पटनायक

जनसत्ता 22 फरवरी, 2014 : यूपीए सरकार और राजग सरकार और यहां तक कि ‘तीसरे मोर्चे’ की

अल्पायु सरकार भी आर्थिक नीतियों के मामले में एक जैसी ही रहीं। आज भी, जब चुनावी विकल्प के रूप में राहुल गांधी और नरेंद्र मोदी का शोरशराबा हो रहा है, आर्थिक नीतियों के स्तर पर शायद ही कोई बुनियादी फर्क हो। सच्चाई तो यह है कि मोदी खुद इस बात पर जोर देते हैं कि उनमें ‘शासन करने’ की यूपीए के मुकाबले बेहतर क्षमता है, आर्थिक नीतियों के मामले में कोई बुनियादी अंतर नहीं, जिनसे अवाम की बदहाली दूर हो सके। इससे यही साबित होता है कि भूमंडलीकरण के इस दौर में अवाम के सामने आर्थिक नीतियों के स्तर पर वास्तविक विकल्प मौजूद नहीं है।

 

इस बुनियादी तथ्य के अलावा इस युग में देश के वर्गीय ढांचे में कुछ ऐसे बदलाव आए हैं जिनकी वजह से भी विकल्प की ओर बढ़ पाने में दुश्वारी आ रही है। इन तब्दीलियों में एक बुनियादी तब्दीली यह है कि मजदूरों और किसानों की शक्ति में कमी आई है। चूंकि राज्यसत्ता की रीति-नीति तो वित्तीय पूंजी को खुश करने की है, इससे उसकी भूमिका बड़ी पूंजी के हमले से छोटे कारोबार और उत्पादन की रक्षा करने या मदद करने की नहीं रह जाती।

इस असुरक्षा के माहौल में छोटे उत्पादक, मसलन किसान, दस्तकार, मछुआरे, शिल्पी आदि और छोटे व्यापारी भी शोषण की मार झेलने के लिए छोड़ दिए जाते हैं। यह शोषण दोहरे तरीके  से होता है। एक तो प्रत्यक्ष तौर पर बड़ी पूंजी उनकी संपदा जैसे उनकी जमीन वगैरह को कौड़ियों के मोल खरीद कर। दूसरे, उनकी आमदनी में गिरावट पैदा करके। इससे लघु उत्पादन के माध्यम से उनकी जिंदा बने रहने की क्षमता कम रह जाती है। अपनी आजीविका के साधनों से वंचित ये लोग काम की तलाश में शहरों की ओर पलायन करते हैं, इससे बेरोजगारों की पांत और बढ़ती जाती है।

इसके साथ ही नवउदारवादी अर्थव्यवस्था में नए रोजगार भी सीमित ही रहते हैं, भले आर्थिक विकास में तेजी दिखाई दे रही हो। उदाहरण के तौर पर, भारत में ऊंची विकास दर के दौर में भी रोजगार की वृद्धि दर, 2004-5 और 2009-10 में, राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण संगठन की रिपोर्ट के मुताबिक 0.8 प्रतिशत ही रही। जनसंख्या की वृद्धि दर 1.5 प्रतिशत प्रतिवर्ष रही और इसे ही काम के लायक जनसंख्या की वास्तविक वृद्धि दर माना जा सकता है। इसमें उन लघु उत्पादकों को भी जोड़ लें जो अपनी आजीविका से वंचित हो जाते हैं और रोजगार की तलाश में शहर आ जाते हैं तो बेरोजगारी की विकास दर 1.5 प्रतिशत से ज्यादा ही ठहरेगी। उसमें केवल 0.8 प्रतिशत को रोजगार मिलता है, तो इसका मतलब यह है कि बेरोजगारों की रिजर्व फौज की तादाद में भारी मात्रा में इजाफा हो रहा है। इसका असर मजदूर वर्ग की सौदेबाजी की ताकत पर पड़ता है। वह ताकत कम हो जाती है।

इस तथ्य में एक सच्चाई और जुड़ जाती है, यानी बेरोजगारों की सक्रिय फौज और रिजर्व फौज के बीच की अंतररेखा का मिट जाना। हम अक्सर सक्रिय फौज को पूरी तरह रोजगारशुदा मान कर चलते हैं, रिजर्व फौज को पूरी तरह बेरोजगार। मगर कल्पना कीजिए, सौ में नब्बे को रोजगारशुदा और दस को बेरोजगार मानने के बजाय, यह मानिए कि ये अपने समय के 9/10 वक्त तक ही रोजगार में हैं, इससे वह धुंधली अंतररेखा स्पष्ट हो जाएगी जिसे हम रोजगार में ‘राशन प्रणाली’ या सीमित रोजगार अवसर की प्रणाली के रूप में देख पाएंगे।

दिहाड़ी मजदूर की तादाद में लगातार बढ़ोतरी हो रही है, स्थायी और अस्थायी नौकरियों में लगे लोग, या खुद कभी-कभी नए काम करने वाले लोग जो किसानों के पारंपरिक कामों से हट कर हैं, यही दर्शाते हैं कि रोजगारों में सीमित अवसर ही उपलब्ध हैं। बेरोजगारों की तादाद में बढ़ोतरी जहां मजदूरों की स्थिति को कमजोर बनाती है, वहीं रोजगार के सीमित अवसर इन हालात को और अधिक जटिल बना रहे हैं।

‘रोजगारों के सीमित होने के नियम’ में तब्दीली के अलावा रोजगार पाने के नियम भी बदले हैं जिनके तहत स्थायी नौकरियों के बजाय ठेके पर काम कराने की प्रथा चल पड़ी है। हर जगह ‘आउटसोर्सिंग’ के माध्यम से बड़े ठेकदारों से काम लिया जाता है जो भाड़े पर वही काम कराते हैं जो पहले उस विभाग में स्थायी कर्मचारी करते थे (रेल विभाग इसका उल्लेखनीय उदाहरण है)। इससे भी मजदूरों की सौदेबाजी की, यानी हड़ताल करने की क्षमता में कमी आई है।

दो अन्य तथ्य इसी दिशा का संकेत देते हैं। एक उद्योगों का निजीकरण, जो कि भूमंडलीकरण के दौर में तीव्र गति हासिल कर रहा है। यूनियन सदस्यों के रूप में मजदूरों का प्रतिशत पूरी पूंजीवादी दुनिया में प्राइवेट सेक्टर के मुकाबले पब्लिक सेक्टर में ज्यादा है। अमेरिका में जहां प्राइवेट सेक्टर में केवल आठ प्रतिशत मजदूर यूनियन सदस्य हैं, वहीं सरकारी क्षेत्र में, कुल संख्या का एक तिहाई यूनियन सदस्य हैं जिनमें अध्यापक भी शामिल हैं।

सरकारी क्षेत्र का निजीकरण इस तरह यूनियन सदस्यता में कमी लाता है और इस तरह मजदूरों की हड़ताल करने की क्षमता कम होती जाती है। फ्रांस में पिछले दिनों कई बड़ी हड़तालें हुई हैं तो इसकी एक वजह यह भी है कि सारे विकसित पूंजीवादी देशों के पब्लिक सेक्टरों के यूनियनबद्ध मजदूरों की संख्या के मुकाबले फ्रांस में उनकी तादाद अब भी सबसे ज्यादा है।

एक और कारक भी है, जिसे ‘रोजगार बाजार में लचीलापनह्ण कहते हैं, जिसके द्वारा मजदूरों के एक सीमित हिस्से को (फैक्टरी में एक खास संख्या के मजदूरों से ज्यादा रोजगारशुदा होने


पर) श्रम कानूनों के तहत जो सुरक्षा मिली हुई है (जैसे मजदूरों को निकालने के लिए तयशुदा समय का नोटिस देना), उसे भी खत्म करने की कोशिश चल रही है।

यह अभी भारत में नहीं हो पाया है, हालांकि इसे लागू करवाने का दबाव बहुत ज्यादा है। ‘रोजगार बाजार में लचीलापन’ का यह दबाव कम अहम लग सकता है क्योंकि इसका असर सीमित मजदूरों की तादाद पर ही दिखाई दे सकता है, मगर इसका मकसद उन मजदूरों से हड़ताल करने की क्षमता छीन लेना है जो अहम सेक्टरों की बड़ी-बड़ी इकाइयों में काम कर रहे हैं और जिनकी हड़ताल-क्षमता सबसे ज्यादा है।

ये तमाम तब्दीलियां यानी मजदूरों की संरचना में, सौदेबाजी की उनकी क्षमता में, कानून के तहत मिले उनके अधिकारों में आई तब्दीलियां मजदूर वर्ग की राजनीति की ताकत को कमजोर बनाने में अपनी भूमिका निभा रही हैं। ट्रेड यूनियनों के कमजोर पड़ने का असर स्वत: ही मजदूर वर्ग के राजनीतिक दबाव के कमजोर होने में घटित होता है, एक वैकल्पिक सामाजिक-आर्थिक समाधान आगे बढ़ाने की उसकी क्षमता भी कमजोर होती है, और उसके इर्दगिर्द अवाम को लामबंद करने में दुश्वारियां आती हैं। इस तरह कॉरपोरेट-वित्तीय पूंजी भूमंडलीकृत पूंजी से गठजोड़ करके जितनी ताकतवर होती जाती है, उतनी ही मजदूर वर्ग, किसान जनता और लघु उत्पादकों की राजनीतिक ताकत में कमजोरी आती है, वे गरीबी और जहालत की ओर धकेल दिए जाते हैं। भूमंडलीकरण का युग इस तरीके से वर्ग-शक्तियों के संतुलन में एक निर्णायक मोड़ ले आया है।

इस परिवर्तन के दो अहम नतीजे गौर करने लायक  हैं। पहला, वर्गीय राजनीति में गिरावट के साथ ‘पहचान की राजनीति’ वजूद में आती है। दरअसल, पहचान की राजनीति एक भ्रामक अवधारणा है क्योंकि इसमें अनेक असमान, यहां तक एक दूसरे के एकदम विपरीत तरह के आंदोलन समाहित हैं। यहां तीन तरह के अलग-अलग संघटकों की पहचान की जा सकती है।

एक, ‘पहचान से जुड़े प्रतिरोध आंदोलन’ जैसे दलित आंदोलन या महिला आंदोलन, जिनकी अपनी-अपनी विशेषताएं भी हैं। दूसरे, ‘सौदेबाजी वाले पहचान आंदोलन’ जैसे जाटों की आरक्षण की मांग, जिसकी आड़ में वे अपनी स्थिति मजबूत बना सकें। तीसरे, ‘पहचान की फासीवादी राजनीति’ (जिसकी स्पष्ट मिसाल सांप्रदायिक फासीवाद है) जो हालांकि एक खास पहचान-समूह से जुड़ी हुई है और दूसरे पहचान-समूहों के खिलाफ  जहरीला प्रचार करके उन पर हमला बोलती है।

इस राजनीति को कॉरपोरेट वित्तीय पूंजी पालती-पोसती है और इसका वास्तविक मकसद उसी कॉरपोरेट जगत को मजबूती प्रदान करना होता है, न कि उस पहचान-समूह के हितों के लिए कुछ करना, जिनके नाम पर वह राजनीति संगठित होती है। जहां ये तीनों तरह की ‘पहचान राजनीतियां’ एक दूसरे से काफी जुदा हैं, वर्गीय राजनीति में आई कमजोरी का अहम असर उन सब पर है। इस तरह की राजनीति ऐसे किसी खास पहचान-समूह को ‘पहचान के नाम पर सौदेबाजी की राजनीति’ के माध्यम से एक उछाल प्रदान करती है जो अपने वर्गीय संगठनों के तहत कोई असरदार काम नहीं कर सकते। इस राजनीति से ‘पहचान की फासीवादी राजनीति’ को भी बल मिलता है क्योंकि कॉरपोरेट-वित्तीय अभिजात का वर्चस्व इस तरह की राजनीति को बढ़ावा देता है। जहां तक ‘प्रतिरोध के पहचान आंदोलनों’ का सवाल है, वर्गीय राजनीति के चौतरफा कमजोर पड़ने से उनमें भी प्रगतिशीलता का तत्त्व कमजोर हुआ है और इससे वे भी अधिक से अधिक ‘सौदेबाजी की पहचान राजनीति’ की ओर धकेल दिए गए हैं।

कुल मिला कर, वर्गीय राजनीति में गिरावट से ‘पहचान की राजनीति’ के ऐसे रूपों को मजबूती हासिल हुई है जो व्यवस्था के लिए कोई खतरा पैदा नहीं करते बल्कि उलटे, अवाम के एक हिस्से को दूसरे के खिलाफ  खड़ा करके इस व्यवस्था के लिए किसी आसन्न चुनौती की संभावना को कमजोर ही करते हैं। इससे उस नई संरचना के विचार को आघात पहुंच रहा है जिसमें, देश के भीतर जाति आधारित सामंती व्यवस्था के तहत ‘पुरानी व्यवस्था’ को ढहा कर, उसकी जगह ‘नई सामुदायिक व्यवस्था’ की स्थापना पर बल था, जो कि हमारे जनतंत्र की मांग है।

स्वाभाविक रूप से यह प्रश्न उठता है कि इन हालात में प्रगतिशील ताकतें क्या कर सकती हैं? हेगेलीय दर्शन से उलट और इतिहास का अंत वाले अंग्रेजी राजनीतिक अर्थशास्त्र से उलट, मार्क्स ने सर्वहारा को बदलाव के एजेंट के रूप में देखा था जो सिर्फ इतिहास को आगे नहीं ले जाता बल्कि खुद ‘इतिहास के फंदे’ से मानवजाति के निकलने की सूरत भी बनाता है।

बावजूद इसके कि नवउदारवाद ने वर्गीय राजनीति को कमजोर किया है, जरूरत इस बात की है कि न सिर्फ मजदूरों को संगठित करने के लिए नए क्षेत्रों की ओर बढ़ा जाए, मसलन अब तक असंगठित रहे मजदूरों और घरेलू कामगारों को संगठित करना, बल्कि वर्गीय राजनीति के लिए नए किस्म के हस्तक्षेप भी किए जाएं।

सबसे अधिक जिस चीज की जरूरत है, वह है नवउदारवाद के वैचारिक वर्चस्व को स्वीकार न करना। लोकतंत्र पर नवउदारवाद के हमले को रोकने और लोकतंत्र की हिफाजत से आगे समाजवाद के संघर्ष तक जाने के लिए नवउदारवादी वर्चस्व को नकारना और नवउदारवादी विचारों के खिलाफ  प्रति-वर्चस्व गढ़ने का प्रयास करना एक शर्त है। विचारों के इस संघर्ष में लेखकों की केंद्रीय भूमिका है।

 

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