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भारत में तिब्बती मतदाता PDF Print E-mail
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Friday, 21 February 2014 11:50

पुष्परंजन

जनसत्ता 21 फरवरी, 2014 : पचपन साल में पहली बार तिब्बती, भारतीय मतदाता सूची में शामिल किए जा रहे हैं।

भारतीय चुनाव आयोग के इस फैसले पर चीन ने चुप्पी साध ली है। साठ से सत्तर हजार तिब्बतियों को मतदाता बनाने पर चीन अगर चूं-चपड़ नहीं कर रहा है, तो इसके कई मायने निकलेंगे। चुनाव आयोग ने सभी राज्यों को निर्देश भेजा है कि 26 जनवरी, 1950 से 1 जुलाई 1987 के बीच भारत में जन्मे तिब्बतियों को मतदाता सूची में शामिल करने में देर न करें। आयोग ने यह आदेश अगस्त 2013 में कर्नाटक उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति एएस बोपन्ना के एक फैसले के आलोक में भेजा है, जिसमें बंगलुरुके क्षेत्रीय पासपोर्ट कार्यालय को मैक्लोडगंज में जन्मे और कर्नाटक में बालिग हुए एक तिब्बती युवक को भारतीय पासपोर्ट जारी करने को कहा गया था।

 

आयोग के इस आदेश के कई ‘साइड इफेक्ट’ आने वाले दिनों में दिखेंगे। मतदाता सूची में शामिल किए जाने की ऐसी ही मांग 1971 के बाद भारत में जन्मे बांग्लादेशी, 1979 में सोवियत संघ के हमले के बाद अफगानिस्तान से आए साठ हजार शरणार्थी, श्रीलंकाई तमिल और म्यांमा से आए रोहिंग्या शरणार्थियों के बच्चे, जो अब वयस्क हो चुके हैं, कर सकते हैं।

पिछले पचपन वर्षों में दलाई लामा के डेढ़ लाख से अधिक अनुयायी तिब्बत से भारत आ चुके हैं। केंद्रीय तिब्बतन प्रशासन (सीटीआर) के अनुसार, ‘भारत में उनतालीस जगहों पर तिब्बती आबादी बसी हुई है, जो कृषि, हस्तशिल्प, छोटे-मोटे उद्योग और व्यापार करके अपना जीवन यापन कर रही है।’ 2009 में केंद्रीय तिब्बती प्रशासन ने अपने अधीन वाले योजना आयोग के जरिए जनसांख्यिकीय सर्वे कराया था, और उस आधार पर जानकारी दी है कि पांच वर्ष पहले 94 हजार 203 तिब्बती भारत में रह रहे थे। सीटीआर के इस सर्वे को मानें तो 2009 में नेपाल में 13 हजार 514, भूटान में एक हजार 298, और दुनिया के बाकी हिस्सों में कुल मिलाकर 18 हजार 999 तिब्बती शरणार्थी के रूप में रह रहे हैं।

मतलब यह कि भारत से बाहर अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, कोस्टारिका, फ्रांस, मैक्सिको, नार्वे, ताइवान, स्विट्जरलैंड और ब्रिटेन जैसे मुल्कों में 33 हजार 811 तिब्बती रह रहे हैं। इस आधार पर मान लेना चाहिए कि तिब्बती शरणार्थियों की लगभग सत्तर फीसद आबादी अकेले भारत में रह रही है।

भारत से बाहर शायद ही किसी मुल्क ने तिब्बतियों को मतदाता सूची में शामिल किया है। अमेरिका का उदाहरण इसलिए आवश्यक है, क्योंकि चीन के विरुद्ध सीआइए ने बाकायदा तिब्बती गुरिल्ले तैयार कर उन्हें नेपाल-तिब्बत सीमा के खाम और आम्दो में जमीनी युद्ध के लिए उतारा था। 1959 से 1965 तक चले ‘खंफा युद्ध’ में सीआइए की समरनीति कैसे विफल हो गई, उसकी अलग कहानी है। लेकिन सीआइए अब भी तिब्बतियों को चीन के खिलाफ एक ताकतवर हथियार मानता है, इस सच से कोई इनकार नहीं कर सकता।

भारत में अमेरिकी राजदूत नैंसी पावेल, जब तक नेपाल में इस ओहदे पर रहीं, तिब्बती शरणार्थियों की खोज-खबर लेती रहीं। नेपाल में तिब्बतियों के समारोहों में नैंसी पावेल की उपस्थिति इसका प्रमाण है। अमेरिका के सिएटल, पोटलैंड, ओरेगॉन, बर्कले, शिकागो, ओहियो, कैलीफोर्निया, कैंपहाले और कोलोराडो (जहां सीआइए ने तिब्बती गुरिल्लों को प्रशिक्षण दिया था), इदाहो, मोन्टाना, न्यू मैक्सिको, वाशिंगटन, न्यूयार्क ऐसे इलाके हैं, जहां तिब्बतियों की बसावट है। 2008 में केंद्रीय तिब्बतन प्रशासन (सीटीआर) की न्यूयार्क शाखा ने जानकारी दी कि अमेरिका में नौ हजार तिब्बती रह रहे हैं। अमेरिका ने इन्हें ‘आव्रजन कानून-1990’ के आधार पर ‘इमीग्रांट वीजा’ दे रखा है। सबसे गौर करने वाली बात है कि सब तिब्बतियों को अमेरिका ने चीनी नागरिक घोषित कर रखा है।

प्रश्न है कि अमेरिका ने इन तिब्बतियों को अपने यहां की मतदाता सूची में शामिल क्यों नहीं किया, और इन्हें चीनी नागरिक घोषित करने का मतलब क्या है? इससे यही अर्थ निकलता है कि अमेरिका भी ‘वन चाइना पालिसी’ के आगे घुटने टेक चुका है, और फालतू में तिब्बत मुक्ति के नाम पर उनके पचपन वर्ष बर्बाद किए। मगर अकेले अमेरिका को क्या कोसें, दूसरे पश्चिमी देश, जो मानवाधिकार रक्षा के नाम पर मचमच करते रहते हैं, उन्होंने भी तिब्बतियों को मतदाता सूची में नहीं डाला है।

इक्के-दुक्के तिब्बती अगर विवाह, या अन्य दूसरे कारणों से कनाडा, अमेरिका और अन्य पश्चिमी देशों के नागरिक बने हैं, तो इससे उन देशों में बसे तिब्बतियों की बड़ी आबादी का कोई भला नहीं हुआ है। न्यूयार्क से लेकर वाशिंगटन, कोलोराडो के होटलों, सड़कों पर ऐसे सैकड़ों तिब्बती मिल जाएंगे, जो दस से पंद्रह लाख रुपए एजेंटों को देकर छह महीने के पर्यटक वीजा पर अमेरिका गए, और वहीं टिक गए। अमेरिका में अवैध वीजा और बिना वर्क परमिट के आए तिब्बतियों का जम कर शोषण होता है।

नेपाल में तिब्बतियों की हालत और बदतर है। 2008 के बाद से नेपाली नेताओं ने चीन के आगे जिस तरह साष्टांग दंडवत कर रखा है, उसका सबसे बड़ा नुकसान तिब्बतियों को उठाना पड़ रहा है। तिब्बती, नेपाल में किसी तरह का प्रदर्शन नहीं कर सकते। चीन के किसी वीआइपी का नेपाल आने का कार्यक्रम होता है, तो सबसे पहले तिब्बतियों पर कहर बरपा होता है।

नेपाल में बीस हजार तिब्बती हैं, लेकिन उनमें से बहुत सारे लोग अवैध रूप से रह रहे हैं। 1998 से नेपाल सरकार ने तिब्बतियों को शरणार्थी प्रमाणपत्र (रिफ्यूजी आइडेंटीटी सर्टिफिकेट) देना बंद कर रखा है। इसके बगैर नेपाल के


तिब्बती शरणार्थी न तो ठीक से व्यापार कर सकते हैं, न ही किसी अच्छी नौकरी के लिए आवेदन कर सकते हैं।

चीनी दबाव का ही परिणाम था कि 2005 में नेपाल ने तिब्बतन रिफ्यूजी वेलफेयर आॅफिस (टीआरडब्ल्यूओ) पर ताला लगा दिया। तेरह जनवरी 2012 को चीन के तत्कालीन प्रधानमंत्री वेन जियाबाओ को खाड़ी देश जाते समय चार घंटे के लिए काठमांडो रुकना था, उनकी चौकसी के लिए सात हजार सुरक्षाकर्मियों को तिब्बतियों के पीछे लगाना पड़ा। उस समय 579 तिब्बती नेपाल में गिरफ्तार किए गए थे, लेकिन बाहरी दुनिया इससे बेखबर थी। इस दमन का नतीजा था कि नेपाल में तिब्बतियों ने आत्मदाह करना शुरू किया। पिछले साल तेरह फरवरी को सौवें तिब्बती ने नेपाल में आत्मदाह किया था। ऐसे विपरीत माहौल में किसी तिब्बती को नेपाल की मतदाता सूची में शामिल करने की कल्पना ही नहीं की जा सकती।

वर्ष 1959 में दलाई लामा ने जब तिब्बत से महाभिनिष्क्रमण किया था, तब उनके साथ करीब अस्सी हजार अनुयायी थे। 1960 में कर्नाटक सरकार ने मैसूर जिले के बाइलाकुपे में तीन हजार एकड़ जमीन तिब्बतियों के बसने के लिए दी। कर्नाटक के करीब आधे दर्जन स्थानों के अलावा हिमाचल, सिक्किम, पश्चिम बंगाल, लद््दाख, बोधगया में तिब्बती अधिक संख्या में बसे हैं। भारत सरकार की ओर से तिब्बती बच्चों के लिए विशेष स्कूल बनाए गए हैं। तिब्बतियों को मेडिकल और इंजीनियरिंग शिक्षा के लिए कुछ सीटें आरक्षित की गई हैं।

भारत में रहने वाले तिब्बतियों को ‘आरसी’ (रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट) दिया जाता है, जिसका नवीनीकरण हर वर्ष किया जाता है। सोलह साल के हर तिब्बती युवा के पास ‘आरसी’ होना अनिवार्य है, लेकिन इन दिनों देश में नए आने वाले तिब्बतियों को आरसी नहीं दिया जा रहा है। पासपोर्ट की तरह भारत सरकार तिब्बतियों को ‘येलो बुक’ जारी करती है, जिसके आधार पर भारत में शरण लिए हुए तिब्बती विदेश यात्रा करते रहे हैं।

शरणार्थियों के लिए 1951 में संयुक्त राष्ट्र द्वारा पारित समझौते पर भारत ने हस्ताक्षर नहीं किया है, न ही 1967 में शरणार्थियों के अधिकारों की रक्षा के लिए बने प्रोटोकॉल को भारत ने स्वीकार किया। चुनांचे, ‘आरसी’ धारक तिब्बती, भारत में शरणार्थी नहीं हैं। विदेशी कानून, 1946 और ‘रजिस्ट्रेशन आॅफ फॉरेनर्स एक्ट-1939’ के आधार पर तिब्बतियों को विदेशी माना गया है। लेकिन इन दोनों कानूनों में इतने झोल हैं कि उसका फायदा यहां रहने वाले विदेशी उठा ले जाते हैं। इस पर व्यापक बहस होनी चाहिए कि भारत में बसी विदेशी आबादी को मतदाता सूची में शामिल करना उचित है, या नहीं?

22 दिसंबर, 2010 को दिल्ली हाइकोर्ट ने नामग्याल डोलकर बनाम विदेश मंत्रालय के मामले में ऐतिहासिक फैसला दिया कि अप्रैल 1986 में कांगड़ा में जन्मी और देहरादून में पली-बढ़ी इस महिला को भारत का जन्मजात नागरिक माना जाए, उसे भारतीय पासपोर्ट जारी किया जाए, और मुआवजे के रूप में पांच हजार रुपए भी दिए जाएं। अदालत ने 26 जनवरी 1950 से 1 जुलाई 1987 के बीच भारत में जन्मे तिब्बतियों को मतदाता सूची में शामिल किए जाने के सरकार के निर्णय को अपने फैसले का आधार बनाया।

इस फैसले के बाद चुनाव आयोग को तिब्बतियों को मतदाता सूची में शामिल करने में चार साल और क्यों लग गए, इस बारे में नौकरशाही के बंद गलियारे को ही पता होगा। लेकिन यह जानना दिलचस्प है कि भारत सरकार पर अमेरिका में बसी तिब्बती लॉबी ने लगातार दबाव बनाए रखा। प्रमाण के रूप में पिछले साल पंद्रह अगस्त को कैलिफोर्निया स्थित ‘तिब्बत जस्टिस सेंटर’ द्वारा जारी पत्र है, जिसमें भारत सरकार से पूछा गया कि दिल्ली हाइकोर्ट के फैसले के बावजूद चुनाव आयोग यह क्यों नहीं मान रहा है कि 26 जनवरी 1950 से 1 जुलाई 1987 के बीच भारत में जन्मे तिब्बती, इस देश के नागरिक हैं।

हैरत की बात है कि देश का ध्यान दिसंबर 2010 में दिल्ली हाइकोर्ट के फैसले से तीन माह पहले सिक्किम चुनाव आयोग की एक विज्ञप्ति पर नहीं गया, जिसमें जानकारी दी गई कि पांच हजार 899 में से, 55 तिब्बती शरणार्थियों के नाम मतदाता सूची से हटाए गए हैं। इसका अर्थ यही निकलता था कि दिल्ली उच्च न्यायालय के आदेश से बहुत पहले सिक्किम सरकार, शरणार्थी तिब्बतियों को मतदाता सूची में शामिल कर चुकी थी। कब, और कैसे? सिक्किम सरकार से यह जानकारी हासिल करनी चाहिए कि क्या तिब्बतियों को मतदाता बनाने के लिए चुनाव आयोग, या गृह मंत्रालय ने कोई आदेश दिया था।

क्या इसे महज संयोग मानें कि नैंसी पावेल के राजदूत रहते साठ से सत्तर हजार तिब्बती भारतीय नागरिक बन जाएंगे? या इसके लिए अमेरिकी दबाव भी काम कर रहा है? चीन इसलिए चुप है कि तिब्बतियों की नई पीढ़ी को अगर भारतीय नागरिकता मिल जाती है तो उनकी आजादी का अभियान अपने-आप कमजोर हो जाएगा। क्या यह सब कुछ एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है?

 

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