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गुजरात मॉडल की असलियत PDF Print E-mail
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Wednesday, 19 February 2014 11:48

कृष्ण स्वरूप आनंदी

जनसत्ता 19 फरवरी, 2014 : गुजरात का विकास चर्चा का विषय बना दिया गया है। ऐसा दावा किया जा रहा है कि

अन्य राज्यों के लिए ही नहीं, बल्कि समूचे देश के लिए भी एक बेहतरीन अनुकरणीय मॉडल गुजरात ने प्रस्तुत किया है। उस मॉडल को देशव्यापी बनाने का सपना जोर-शोर से लोगों को दिखाया जा रहा है। विकास, सुशासन, समृद्धि, रोजगार सृजन जैसे शब्द तेजी से हवा में उछाले गए हैं।

 

गुजरात के विकास-मॉडल का चाहे जितना प्रायोजित गौरव-गान हो, वहां एक बड़ा तबका खुल कर उस मॉडल को चुनौती दे रहा है। यह तबका है वहां के ग्रामीण जनों का। इसका कारण यह है कि तथाकथित विकास की मार सबसे ज्यादा किसान, आदिवासी, स्थानीयसमुदाय और आम जन झेल रहे हैं। मुख्यधारा का मीडिया भले ही उन्हें नजरअंदाज कर रहा हो लेकिन देश के तमाम परिवर्तनकांक्षी जन आंदोलनों, जनसंगठनों, समाजकर्मियों और बुद्धिजीवियों के बीच उनकी आवाज बुलंद बनी हुई है।

विडंबना यह है कि गुजरात मॉडल का विरोध करने वाले सिविल सोसाइटी समूह, गैर-सरकारी संगठन, राजनीतिक दल और बुद्धिजीवी वर्ग उसकी विफलताओं को उजागर करते समय सिर्फ यही चर्चा करते हैं कि वहां मानव विकास अपेक्षया कम हुआ है। कहने का मतलब यह है कि मानव विकास के तमाम सूचकांकों में अन्य राज्यों के मुकाबले गुजरात बेहतर बिल्कुल नहीं है। कई दृष्टियों से अन्य राज्यों की तुलना में वह काफी पीछे भी है। ऐसे तथ्य और आंकड़े लोगों के सामने बहुतायत में पेश किए जा रहे हैं, जो बेशक गलत नहीं हैं।

गुजरात मॉडल की नाकामियां गिनाने वाले अधिकतर लोगों के साथ दिक्कत यह है कि नरेंद्र मोदी की ही भांति वे भी भारी औद्योगीकरण, बृहदाकार बुनियादी ढांचा (इन्फ्रास्ट्रक्चर) निर्माण, अंधाधुंध आधुनिकीकरण, हाइ-टेक टाउनशिप विकास और प्राकृतिक संसाधनों के कॉरपोरेटीकरण के प्रबल पक्षधर हैं। इसीलिए मोदी को इन बिंदुओं पर वे घेरने को बिल्कुल तैयार नहीं हैं। लेकिन गुजरात के आम लोगों को कॉरपोरेट-केंद्रित विकास-मॉडल मंजूर नहीं है। यही कारण है कि वे जगह-जगह एकजुट होकर बड़ी-बड़ी परियोजनाओं का विरोध कर रहे हैं।

नरेंद्र मोदी की महत्त्वाकांक्षी परियोजना ‘एकता की मूर्ति’ को आसपास के सत्तर गांवों के किसान और आदिवासी चुनौती दे रहे हैं। नर्मदा (सरदार सरोवर) बांध से नीचे की ओर 3.2 किलोमीटर की दूरी पर स्थित साधु टेकरी पर सरदार पटेल की प्रतिमा का निर्माण प्रस्तावित है। पिछले साल दो अक्तूबर को आदिवासी बहुल नर्मदा जिले के अंतर्गत नांदेड़ तालुका के इंद्रवर्ण गांव के निकट लगभग दो हजार आदिवासी एकत्र हुए और उन्होंने पर्यटन को बढ़ावा देने के उद््देश्य से राज्य सरकार द्वारा किए जाने वाले भूमि अधिग्रहण का विरोध किया। गौरतलब है कि उन सोलह गांवों के किसानों को मुआवजा राज्य सरकार अब तक नहीं दे पाई है, जिनकी जमीन नर्मदा बांध की वजह से डूब में आ गई थी। सरकार उस इलाके में अब और अधिक जमीन चाहती है।

पिछले साल अठारह जून को कोई चौवालीस गांवों के दस हजार से ज्यादा किसान विट्ठलनगर से कूच करके सात सौ से ज्यादा ट्रैक्टरों के जरिए गांधीनगर पहुंचे थे। उन्होंने गुजरात सरकार को ज्ञापन सौंपा कि साणंद-वीरमगाम के अंतर्गत मंडल-बेचराजी विशेष निवेश क्षेत्र उन्हें मंजूर नहीं है इसलिए उसे फौरन रद््द कर दिया जाए। ध्यान रहे कि 30 मई, 2013 को मंडल-बेचराजी पट्टी में आने वाली चौवालीस में से छत्तीस ग्रामसभाओं ने उस इलाके में बनने वाले विशेष निवेश क्षेत्र (एसआइआर) के खिलाफ प्रस्ताव पारित किए थे। गुजरात सरकार ने वर्ष 2009 में विशेष निवेश क्षेत्र अधिनियम (एसआइआर एक्ट) बनाया था। सच कहा जाए तो भारत सरकार द्वारा परिकल्पित और अधिनियमित विशेष आर्थिक क्षेत्र (एसइजेड- सेज) का बृहत्तर संशोधित संस्करण है गुजरात का विशेष निवेश क्षेत्र।

इसमें निर्यातोन्मुखी इकाइयां तो होंगी ही, इन सबके साथ-साथ वहां तमाम औद्योगिक और व्यावसायिक गतिविधियों का संकुल होगा यानी उनका जाल बिछा होगा, आवासीय परिसर होंगे, शिक्षा-स्वास्थ्य की सुविधाएं होंगी, आमोद-प्रमोद के सारे अधुनातन साधन उपलब्ध होंगे और होगा प्रभावी साज-सरंजाम। वर्ष 2012 में मंडल-बेचराजी विशेष निवेश क्षेत्र की अधिसूचना जारी हुई थी। गुजरात में ऐसी तेरह परियोजनाएं खड़ी होंगी।

मंडल-बेचराजी पट््टी के अंतर्गत आने वाली जमीन का अस्सी प्रतिशत हिस्सा बेहद उपजाऊ बहु-फसली है, पंद्रह प्रतिशत पर चरागाह हैं और बाकी पांच प्रतिशत तरह-तरह के उपयोग में आने वाली परती या बंजर जमीन है। इस इलाके में पांच सौ तीस वर्ग किलोमीटर यानी तिरपन हजार हेक्टेयर (लगभग एक लाख छब्बीस हजार एकड़) से ज्यादा जमीन पर विशेष निवेश क्षेत्र विकसित किया जा रहा है। अमदाबाद, मेहसाणा और सुरेंद्रनगर जिलों के चौवालीस गांव इसकी जद में आ रहे हैं। प्रभावित परिवारों की संख्या छिहत्तर हजार के आसपास है।

यहीं बेचराजी-वीरमगाम राजमार्ग पर हंसलपुर गांव में मारुति-सुजुकी का संयंत्र लगभग सात सौ एकड़ जमीन पर लग रहा है। ढाई हजार एकड़ जमीन पर विट्ठल नवोन्मेष नगर विकसित किया जाना है। भावनगर जिले के महुआ नामक ग्रामीण अंचल में निरमा का सीमेंट कारखाना लग रहा है। इसी जिले की मीठी विर्दी में 777 हेक्टेयर जमीन पर अमेरिकी कंपनी जीई हिताची/वेस्टिंगहाउस नाभिकीय ऊर्जा संयंत्र लगाना चाहती है। विट्ठलपुर में ही मारुति-सुजुकी ने एक दूसरी जमीन खरीद रखी है जिसका रकबा है सात सौ से आठ सौ एकड़ के बीच। ध्यान देने की बात है कि दिल्ली-मुंबई औद्योगिक गलियारे के गुजरात से गुजरने वाले हिस्से से जुड़ा हुआ है मंडल-बेचराजी विशेष निवेश क्षेत्र।

गुजरात के किसान, आदिवासी और आम जन कह रहे हैं कि विकास


का यह मॉडल उन्हें मंजूर नहीं है जो खेती-किसानी, आबादी-बस्ती, आजीविका और प्रकृति को उजाड़ कर उनके स्थान पर कॉरपोरेट संचालित भीमकाय संयंत्र, हाइटेक टाउनशिप और एसआईआर, सेज, निम्ज खड़े करता है। ध्यान देने की बात है कि दिल्ली-मुंबई औद्योगिक गलियारे से गुजरात में कई ‘निम्ज’ परियोजनाएं जोड़ी जाएंगी। उनके खिलाफ किसानों, आदिवासियों और स्थानीय समुदायों में काफी रोष व्याप्त है और वे जगह-जगह संघर्षरत हैं।

गुजरात के आम लोग ऐसी औद्योगिक या कारोबारी गतिविधियों और इकाइयों का स्वागत करने के इच्छुक हैं जो उनकी खेती-बाड़ी, आजीविका, जीवन शैली, लोक संस्कृति, स्थानिकता और सामुदायिकता, उद्यमशीलता, प्रकृति और पारिस्थितिकी की सहचरी हो। चुनीभाई वैद्य जैसे तपे-तपाए सर्वोदय कार्यकर्ता, गांधीजन और अन्य समाजकर्मी गांव-गांव जाकर लोगों को यह अहसास करा रहे हैं कि प्राकृतिक संसाधन मूलत: समाज यानी स्थानीय समुदायों के हैं। चुनीभाई वैद्य लिखते हैं, ‘‘सरकारों को यह भ्रम हो गया है कि देश में जो जल, जंगल, जमीन, खनिज, सागर, नदी आदि प्राकृतिक संसाधन हैं वे उनकी मालिक हैं, पर अब यह प्रश्न करने का समय आ गया है कि प्राकृतिक संसाधनों का मालिक कौन है?

सरकार या समाज?... समाज स्वयंभू है अर्थात स्वरचित है। इसे कोई बनाता नहीं है। सरकार को समाज बनाता है, निर्मित करता है, बदलता है। सरकार को वेतन समाज देता है। राष्ट्रपति से लेकर चपरासी तक सभी समाज के वेतनभोगी सेवक हैं। संक्षेप में, समाज जो मालिक है उसने जल, जंगल, जमीन, खनिज, सागर, नदी आदि प्राकृतिक संसाधन अपने वेतनभोगी सेवक सरकार को प्रबंधन के लिए सौंपे हैं। इनको बेचने का अधिकार नहीं दिया। पर जैसा कि शुरू में कहा, सरकारों को यह भ्रम हुआ है कि वे मालिक हैं। वे इस जमीन को बेचने, नदियों को बेचने और जंगलों और सागरों का ठेका देने में जुटी हैं।’’ यह लोकशाही की अवधारणा के खिलाफ है कि सरकारें जनगण के प्राकृतिक संसाधनों को जबरन अधिगृहीत करके उन्हें कॉरपोरेट समूहों के हवाले करती जाएं जिन पर उनके बड़े-बड़े संयंत्र खड़े हो सकें। गुजरात में ऐसे कई संयंत्रों के खिलाफ आंदोलन चल रहे हैं।

गुजरात में जो किसान खेती लायक जमीन चाहते हैं, उन्हें देने के लिए सरकार के पास जमीन नहीं है। लेकिन देशी-विदेशी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए सरकार के पास जमीन ही जमीन है। चुनी काका लिखते हैं, ‘‘हम सरकार से कहते हैं कि गरीबों को खेती कर सकें इतनी पांच या दस एकड़ जमीन देकर खेती कराओ। देते हैं तो एक अथवा दो एकड़, और औद्योगिक घरानों को दो-पांच हजार से लेकर बीस हजार और चालीस हजार एकड़ जमीन दी जा रही है।’’

गुजरात सरकार किसानों की जमीन कौड़ियों के भाव देशी-विदेशी बहुराष्ट्रीय कंपनियों को लुटाती जा रही है। कच्छ जिले के लखपत तालुका में दीपक सीमेंट्स को चौरासी हेक्टेयर जमीन पांच रुपए प्रति मीटर की दर पर सरकार द्वारा उपलब्ध कराई गई। वर्ष 2007 और 2009 के दौरान ‘जीवंत गुजरात वैश्विक निवेशक शिखर सम्मेलनों’ (वॉइब्रेंट गुजरात ग्लोबल इनवेस्टर्स समिट्स) में सरकार ने देशी-विदेशी बहुराष्ट्रीय कंपनियों को राज्य में औद्योगिक संयंत्रों और व्यावसायिक अड््डों की स्थापना के लिए अति महत्त्वपूर्ण या संवेदनशील (स्ट्रेटेजिक) ठौर-ठिकानों पर लगभग नगण्य कीमतों पर बेशकीमती जमीन देने का आश्वासन देकर लुभाया।

लॉर्सन ऐंड टुब्रो को 109 हेक्टेयर जमीन दक्षिण गुजरात स्थित सुवाली में सौ रुपए प्रति वर्ग मीटर की दर पर सरकार द्वारा मुहैया कराई गई। इसी प्रकार, एस्सार समूह को दस हेक्टेयर से ज्यादा गांधीनगर में पांच हजार रुपए प्रति वर्ग मीटर के हिसाब से मिली। एबीजी सीमेंट ने तीन सौ हेक्टेयर जमीन ग्यारह रुपए प्रति वर्ग मीटर की दर पर खरीदी। रिलायंस जामनगर इंफ्रास्ट्रक्चर को चौदह सौ हेक्टेयर जमीन अस्सी रुपए से लेकर तीन सौ नब्बे रुपए प्रति वर्गमीटर के भाव से दी गई। भरुच स्थित जंबुसार में स्टर्लिंग इंफ्रास्ट्रक्चर ने 577 हेक्टेयर जमीन सत्तावन रुपए प्रति वर्ग मीटर के हिसाब से हथियाई। कोस्टल गुजरात पॉवर कंपनी के खाते में कच्छ क्षेत्र की 218 हेक्टेयर जमीन बारह रुपए प्रति वर्ग मीटर के हिसाब से गई। सुर्खाब बर्ड रिजॉर्ट को बीस हेक्टेयर जमीन ग्यारह रुपए प्रति मीटर के भाव से कच्छ जिले के मांडवी में दी गई। तुलसी बायोसाइंस ने बलसाड के पर्डी इलाके में तीन हेक्टेयर जमीन साढ़े पांच सौ रुपए प्रति वर्ग मीटर के हिसाब से अपने नाम दर्ज कराई।

‘व़ाइब्रेंट गुजरात इनवेस्टर्स समिट’ के अलावा समय-समय पर गुजरात सरकार कॉरपोरेट घरानों को इफरात में जमीन लगभग नगण्य कीमत पर यानी खैरात में बांटती गई। उपर्युक्त विवरण पूर्ण नहीं है, लेकिन इस बात का खुलासा जरूर करता है कि गुजरात में कैसे सरकार को मोहरा बना कर देशी-विदेशी बहुराष्ट्रीय कंपनियां किसानों की जमीन की खुली लूट कर रही हैं। यह सिलसिला रुक नहीं रहा है और कॉरपोरेट ताकतों द्वारा स्थानीय लोगों की जमीन हथियाना जारी है। जबकि स्थानीय किसान किसी भी कीमत पर अपनी इंच-भर जमीन कॉरपोरेट महाबलियों को नहीं देना चाहते।

 

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