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भूमंडलीकरण के दौर में चुनाव PDF Print E-mail
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Tuesday, 18 February 2014 11:58

अनिल चमड़िया

जनसत्ता 18 फरवरी, 2014 : अमेरिकी राजदूत का नरेंद्र मोदी से मिलने का फैसला आखिर सुर्खियों का हिस्सा क्यों बनता है?

अमेरिकी राजदूत ने नरेंद्र मोदी से यह मुलाकात अगले लोकसभा चुनाव में उनके भाजपा के प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार होने के नाते की। लोकसभा चुनाव के पूर्व इस तरह की मुलाकात का क्या मतदाताओं के लिए कोई संदेश है? गुजरात के पिछले विधानसभा चुनाव के दौरान नरेंद्र मोदी से ब्रिटेन के प्रतिनिधि की मुलाकात और अमेरिका द्वारा उन्हें वीजा दिए जाने के संकेत ने भूमंडलीकरण के दौर में देश में होने वाले चुनाव के तौर-तरीकों को समझने का एक नया आधार दिया।

 

भारतीय राजनीति में एक लंबे अरसे तक विदेशी पैसे की भूमिका की चर्चा होती रही हैं। पूर्व रक्षामंत्री जॉर्ज फर्नांडीज ने तो यहां तक आरोप लगाया था कि 1967 के चुनाव में कोई भी ऐसी पार्टी नहीं थी जो कि बिना विदेशी मदद के चुनाव मैदान में उतरी हो। उस विदेशी मदद की जांच के लिए एक संसदीय समिति भी बनी थी। लेकिन उसकी रिपोर्ट अब तक सामने नहीं आई है। पार्टियों और उनके नेताओं के अमीर देशों के प्रभावशाली लोगों से रिश्ते की भी चर्चाएं होती रही हैं। लेकिन भूमंडलीकरण के बाद भारतीय राजनीति खासतौर से उसके चुनावों को प्रभावित करने के तरीकों में फर्क महसूस किया जा रहा है। अब किसी तरह की जांच की जरूरत नहीं रह गई है।

दुनिया की नई व्यवस्था की खासियत यह है कि किसी भी हिस्से के किसी भी फैसले के प्रभाव से बाकी के हिस्से बच नहीं सकते हैं। जब किसी देश में महंगाई बढ़ती है तो उसके विश्वव्यापी कारणों की गिनती कराई जाती है। कोई देश जो दुनिया को किसी भी स्तर पर प्रभावित कर सकता है वह अपने यहां के किसी फैसले से किसी देश की चुनावी राजनीति को भी प्रभावित करने की क्षमता रखता है। अमेरिका में राष्ट्रपति चुनाव के दौरान जब भारत में खुदरा व्यापार में प्रत्यक्ष विदेशी पूंजी निवेश का फैसला हुआ तो उस फैसले के विश्लेषण का एक पहलू था कि भारत का वह फैसला अमेरिका के सत्तारूढ़ दल को मजबूती का संदेश देना था। भूमंडलीकरण के दौर में दुनिया भर में विभिन्न देशों के कई फैसले सामने आए हैं जो भारतीय राजनीति के साथ उनके आर्थिक संबंधों को मजबूत करने में सहायक हों।

अगस्त 1997 में ब्रिटेन की महारानी ने अमृतसर में जलियांवाला बाग जाकर 1919 में अंग्रेज फौज के द्वारा मारे गए लोगों के स्मारक पर फूल चढ़ाए और उस सामूहिक हत्याकांड के लिए माफी मांगी। उसके बाद से ब्रिटेन के प्रतिनिधि कई बार माफी का नवीनीकरण करते रहते हैं। एक ब्रिटिश जांच आयोग के मुताबिक जलियांवाला बाग कांड में मारे गए लोगों की संख्या तीन सौ उन्यासी थी और ग्यारह सौ लोग घायल हुए थे।

यह सवाल पूछा गया कि इतने वर्षों बाद ब्रिटेन को इस हत्याकांड के लिए माफी मांगने की जरूरत क्यों पड़ी? किसी भी देश की सरकार जब इस तरह के फैसले करती है तो उसके पीछे कोई मूल्य-बोध और लोकतांत्रिक विचारों को मजबूत करने का नेक इरादा नहीं होता है। यह विशुद्ध रूप से कूटनीतिक संबंधों का हिस्सा होता है।

भूमंडलीकरण के दौर को अपने आर्थिक लाभ के विस्तार के अवसर के रूप में पेश किया जाता है। जाहिर-सी बात है कि किसी भी देश द्वारा जो फैसले किए जाते हैं उनके केंद्र में आर्थिक हित की योजनाएं होती हैं। ब्रिटेन ने भारत पर ढाई सौ वर्षों तक राज किया है और उस राज के दौरान हुए उत्पीड़न और शोषण की वजह से यहां के लोगों में ब्रिटेन के खिलाफ क्षोभ रहा है।

जलियांवाला बाग कांड तो ऐसा था जिसे याद कर आज भारत के लोग सिहर जाते हैं। किसी भी देश के बारे में आम लोगों और खासतौर से प्रभावशाली हिस्से का रुख और रवैया कैसा है यह उस देश के साथ उसके संबंध बनाने में मददगार होता है। पाकिस्तान के साथ रिश्तों के बारे में राजनीतिक व्यवस्था को अगर बहुत सोच-समझ कर कोई फैसला करने का साहस होता है तो उसकी वजह पाकिस्तान को लेकर लोगों के बीच बनी और बनाई गई राय की बड़ी भूमिका होती है।

भूमंडलीकरण का दौर शुरू होने के बाद अमेरिका से लेकर ब्रिटेन तक ने अपने बारे में भारतीय जनमानस का रुख बदलने की कई स्तरों पर कवायद की है। जब यह कहा जाता है कि भारत दुनिया का सबसे बड़ा उभरता हुआ बाजार है तो जाहिर है कि यहां कमाई के लिए लोगों के बीच अच्छी राय कायम करके अपनी ज्यादा से ज्यादा जगह बनाने की कोशिश अमेरिका और ब्रिटेन या अन्य देशों के द्वारा की जाएगी।

नरेंद्र मोदी के लिए जर्मनी की पहल पर यूरोपीय संघ की सक्रियता भी देखने को मिल चुकी है। इस पृष्ठभूमि में ब्रिटेन सरकार की 2012 के गुजरात विधानसभा चुनाव में मौजूदगी का विश्लेषण भी किया जाना चाहिए और 2014 के चुनाव से पहले प्रधानमंत्री पद के दावेदार नरेंद्र मोदी से अमेरिकी राजदूत की मुलाकात पर भी गौर करना चाहिए। 2002 में गुजरात में मुसलमानों के खिलाफ हमलों में सरकारी तंत्र की भूमिका की पड़ताल कई स्तरों पर की जा चुकी है। पूरी दुनिया में उस सांप्रदायिक हमले की न केवल निंदा हुई बल्कि उसे दुनिया के वीभत्स नरसंहारों में एक करार


दिया है।

उस दौरान मुख्यमंत्री होने के नाते नरेंद्र मोदी की भूमिका पर भी लगातार सवाल खड़े हुए हैं। दुनिया में बने इस माहौल के कारण ही ब्रिटेन सहित कई देशों की सरकारों ने मोदी को वीजा देने से इनकार किया।  इस इनकार के जरिए ब्रिटेन ने यह संदेश दिया कि वह मोदी सरकार के कार्यकाल में हुए जनसंहार की भर्त्सना करता है। इससे दुनिया भर में मानवाधिकारों और मानवीय मूल्यों के प्रति ब्रिटेन सरकार की आस्था का संदेश गया।

कोई भी सरकार मानवाधिकार के उन पक्षों का राजनीतिक और रणनीतिक इस्तेमाल करती है जो उसे किसी तरह के फैसले लेने में मदद कर सकते हैं। जैसे भ्रष्टाचार का भी एक हथियार की तरह इस्तेमाल होता है। 2002 के बाद नरेंद्र मोदी और सांप्रदायिक राजनीति के खिलाफ जो वातावरण बना था उसमें ब्रिटेन के लिए मोदी के पक्ष में दिखना घाटे का सौदा साबित हो सकता था। लेकिन अब स्थितियां बदली हैं, गुजरात के विधानसभा चुनाव के दौरान इसका आकलन ब्रिटेन ने अपने तरीके से किया और अब अमेरिका भी कर रहा है।

अमेरिका भारत के चुनावों की नब्ज को पहचानने का दावेदार माना जाता है। संभवत: यह उनका एक विश्लेषण है कि यूपीए सरकार के जाने की स्थिति में सबसे बड़े दल के नाते भाजपा को सरकार बनाने का मौका मिल सकता है। ब्रिटेन का पहले संभवत: यह आकलन था कि नरेंद्र मोदी की गुजरात चुनाव में जीत के बाद प्रधानमंत्री पद के लिए उनकी दावेदारी बन सकती है। लेकिन भारतीय मतदाताओं के लिए, आखिर ब्रिटेन को क्यों जरूरत पड़ी कि चुनाव के मौके पर ही वह एक प्रदेश के मुख्यमंत्री के समर्थन में दिखने की कवायद करे? और 2014 में अमेरिका को भी यह जरूरत क्यों लग रही है? क्या भारत के संसदीय चुनावों में इस तरह की मुलाकातों के संदेश का कोई कारगर असर होता दिखने लगा है?

राजनीतिक संभावनाओं के मद््देनजर नरेंद्र मोदी के लिए जिस तरह से विधानसभा का चुनाव बहुत अहम रहा, उसी तरह से 2014 का आम चुनाव भी है। नरेंद्र मोदी के खिलाफ जितनी तरह की शिकायतें और आरोप लगते रहे हैं उन सबका चुनाव के लिहाज से महत्त्व होता है।

बहुत सारी शिकायतें और आरोप मिलकर ही एक ठोस राय या फैसले का आकार लेते हैं। मोदी के खिलाफ सांप्रदायिक होने का आरोप और उसकी वजह से आर्थिक विकास में बाधा का संदेश सांप्रदायिक राजनीति के समर्थन को बाधित करता है। लेकिन जब ब्रिटेन यह कहता है कि वह गुजरात के साथ अपने संबंधों की पुनर्बहाली कर रहा है और अमेरिका पुनर्बहाली का संदेश दे रहा है तो एक तरह से वे नरेंद्र मोदी के राजनीतिक समर्थन में खड़े दिखना चाहते हैं। संदेश चुनाव के मौके पर दिए जा रहे हों तो जाहिर तौर पर यह मोदी के समर्थकों और विरोधियों को भी प्रभावित करने का उद्देश्य लिए होते हैं। संसदीय चुनाव के पूर्व अमेरिकी राजदूत का नरेंद्र मोदी से मिलने का फैसला चुनाव के मौके पर उन विरोधियों का मुंह बंद करने की कोशिश है जो अमेरिका द्वारा नरेंद्र मोदी पर लगाई गई बंदिशों का हवाला देते रहे हैं।

अमेरिका ने मोदी के लिए अपनी सीमा के भीतर घुसने पर पाबंदी लगा रखी है और दूसरी तरफ अमेरिका को भूमंडलीकरण की व्यवस्था का अगुआ माना जाता है। जाहिर-सी बात है कि यह इस देश के उन लोगों के लिए एक संदेश रहा है जो अपने आर्थिक हितों को ध्यान में रख कर मोदी जैसों की राजनीति से दूरी बनाए रखते हैं और उनकी मदद से परहेज करते हैं।

भूमंडलीकरण के दौर में आर्थिक स्तर पर परजीवी माने जाने वाले देशों के संसदीय चुनाव और सरकार की सक्रियता के लिए दुनिया के ताकतवर देशों के साथ रिश्ते एक मजबूत संदेश की तरह काम करते हैं। ये संदेश एक खास राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक ढांचे को मजबूती देते हैं। एक संदेश से हितों के साझेपन के रिश्ते बनते और बिगड़ते हैं। जैसे किसी संदेश से सेंसेक्स बिल्कुल नीचे लुढ़क जाता है और किसी संदेश से झटके ऊपर पहुंच जाता है।

भूमंडलीकरण के दौर में आर्थिक स्तर पर आत्मनिर्भर न बन पाने वाले देशों में होने वाले चुनाव वहां के मतदाताओं के लिए कम दुनिया के दूसरे देशों के लिए ज्यादा महत्त्वपूर्ण हो गए हैं। यह साफ दिखता है कि देश के मतदाताओं को रिझाने के लिए जुमलेबाजी और थोथे नारों का सहारा लिया जाता है, मगर दूसरी तरफ नीतिगत फैसलों के लिए दुनिया के ताकतवर देशों के साथ रिश्तों की ज्यादा चिंता रहती है। नरेंद्र मोदी लगातार अमेरिका के साथ अपने रिश्ते ठीक होने का संदेश देने की जद््दोजहद करते रहे हैं। प्रसंगवश यह एक नया विषय हमारे सामने उपस्थित हो सकता है कि भूमंडलीकरण की चुनावी संहिता क्या होनी चाहिए?

 

 

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