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रसातल में मर्यादा PDF Print E-mail
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Saturday, 15 February 2014 11:06

जनसत्ता 15 फरवरी, 2014 : संसद में हंगामे और शोर-शराबे के दृश्य अब किसी को चौंकाते नहीं हैं। सदस्यों के बीच कहा-सुनी की घटनाएं भी होती रही हैं। लेकिन गुरुवार को लोकसभा में जो हुआ उसे हमारे संसदीय इतिहास के सबसे शर्मनाक प्रसंग के रूप में याद किया जाएगा। तेलंगाना विधेयक का विरोध कर रहे आंध्र प्रदेश के सांसद पहले तो लोकसभा अध्यक्ष के आसन के पास आकर शोर मचाने लगे और फिर विजयवाड़ा के सांसद एल राजगोपाल ने सदन में मिर्च का पाउडर स्प्रे कर दिया। इससे अफरातफरी फैल गई। खांसी और आंखों में जलन महसूस होने पर सदस्य इधर-उधर भागने लगे। कई सदस्यों को अस्पताल ले जाना पड़ा। खुद लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार को कार्यवाही स्थगन की घोषणा किए बगैर फौरन सदन से बाहर जाना पड़ा। आंध्र के एक सांसद पर आरोप है कि उन्होंने चाकू निकाल लिया था, अलबत्ता उनका कहना है कि उनके हाथ में चाकू नहीं, माइक था। रायलसीमा और तटीय आंध्र के लोकसभा सदस्य तेलंगाना विधेयक को रोकने के लिए हर तरह की बाधा डाल सकते हैं, यह अनुमान सभी को था। एक सांसद ने तो विधेयक के विरोध में आत्मदाह की धमकी दे रखी थी। पर किसी को कल्पना भी नहीं रही होगी कि कोई इस हद तक चला जाएगा कि सदन में मौजूद लोगों को अपनी हिफाजत के लिए इधर-उधर भागना पड़ेगा।

विडंबना यह है कि राजगोपाल को अपने किए का कोई पछतावा नहीं है; अपनी कारगुजारी को उन्होंने आत्मरक्षा में उठाया गया कदम बताया है। यह सीनाजोरी वे शायद इस उम्मीद में दिखा रहे हैं कि तेलंगाना के विरोध में इस हद  तक चले जाने से उन्हें राजनीतिक फायदा होगा। मिर्च का पाउडर छिड़कने वाले राजगोपाल उन छह सांसदों में हैं जिन्हें अपनी ही पार्टी की सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस देने के कारण कांग्रेस ने निकाल दिया था। पर यह प्रकरण कांग्रेस की एक बड़ी कमी की ओर भी इशारा करता है। कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व ने 2004 में


ही तेलंगाना को अलग राज्य बनाने का आश्वासन दे दिया था। फिर आंध्र प्रदेश में पार्टी के भीतर इस पर रजामंदी बनाने की कोशिश उसने क्यों नहीं की? वाइएस राजशेखर रेड््डी के मुख्यमंत्री रहते यह ज्यादा मुश्किल नहीं होता। पर कांग्रेस बरसों एक कदम आगे दो कदम पीछे की नीति पर चलती रही। फिर, 2009 के चुनाव में आंध्र में लोकसभा और विधानसभा के टिकट देते समय तेलंगाना पर राय को एक कसौटी क्यों नहीं बनाया गया? बहरहाल, स्तब्ध कर देने वाले इस अपूर्व नजारे ने संसदीय कामकाज को लेकर कई सवाल उठाए हैं। संसद की कार्यवाही बाधित होने का सिलसिला बढ़ता गया है। पंद्रहवीं यानी मौजूदा लोकसभा का अड़तीस फीसद वक्त व्यवधान के चलते जाया हुआ है, जबकि लोकसभा के पिछले कार्यकाल में यह आंकड़ा तेरह फीसद था।

मौजूदा लोकसभा के प्रश्नकाल का चालीस फीसद समय बेकार चला गया। दूसरी तरफ, बहुत-से महत्त्वपूर्ण विधेयक और प्रस्ताव बिना बहस के पारित हो जाते हैं। इससे इस अवधारणा का कोई अर्थ नहीं रह जाता कि संसद की भूमिका जनता के प्रति सरकार की जवाबदेही सुनिश्चित करने की है। कई बार संसदीय कामकाज को ठप करना किसी अहम मुद््दे पर देश का ध्यान आकर्षित करने के लिए जरूरी हो सकता है। यह अंतिम विकल्प होना चाहिए, पर इसे बार-बार आजमाया जाने लगा है। तमाम विधानसभाओं में भी यह होता है। इसलिए बड़ा सवाल यह है कि संसदीय कामकाज को सुचारु रूप से चलाने के लिए क्या किया जाए। यों संसद के कामकाज की बाबत हर हफ्ते कार्यमंत्रणा समिति की बैठक होती है। सर्वदलीय विचार-विमर्श भी होता है। पर यह सब कारगर साबित नहीं हो पा रहा है। इसलिए सभी संसदीय दलों को सदन की कार्यवाही और मर्यादा को लेकर कुछ और भी कदम सोचने होंगे।

 

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