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तंगनजरी पर नजर PDF Print E-mail
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Saturday, 15 February 2014 11:05

जनसत्ता 15 फरवरी, 2014 : पूर्वोत्तर के लोगों के प्रति दिल्ली में बढ़ती तंगनजरी और हिंसक घटनाओं को लेकर लंबे समय से चिंता जताई जा रही है। नीडो तानिया की बेरहमी से पिटाई और फिर मौत से स्वाभाविक ही यह चिंता गहरी हुई है। ऐसे में पूर्वोत्तर के लोगों की शिकायतें सुनने के लिए फोन पर नई सहायता सेवा की शुरुआत कर दिल्ली पुलिस ने अच्छी पहल की है। पूर्वोत्तर में उच्च शिक्षा के अच्छे संस्थानों और रोजगार की कमी होने की वजह से हर साल सैकड़ों लड़के-लड़कियां दिल्ली का रुख करते हैं। मगर यहां के विश्वविद्यालयों और दूसरे शैक्षणिक संस्थानों में पर्याप्त छात्रावास न होने की वजह से आमतौर पर उन्हें सामूहिक रूप से किराए के मकानों में रहना पड़ता है। फिर, पूर्वोत्तर के बहुत सारे लोग यहां रेस्तरां वगैरह चलाते या उनमें नौकरी करते हैं। उन्हें भी इसी तरह रहना पड़ता है। दिल्ली में इनकी तादाद अच्छी-खासी होने के बावजूद यहां के लोगों से उनका तालमेल वैसा नहीं बन पाता जैसा दूसरे प्रांतों से आए लोगों के साथ देखा जाता है। इसकी बड़ी वजह यहां के लोगों का पूर्वोत्तर के लोगों के प्रति तंग नजरिया है। इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि कुछ साल पहले जब पूर्वोत्तर की एक लड़की के साथ देर रात को चलती कार में दुराचार की घटना हुई तो दिल्ली पुलिस ने भी हिदायत दी थी कि पूर्वोत्तर की लड़कियां अपने पहनावे में सादगी बरतें। नीडो तानिया को भी इसी संकीर्ण मानसिकता का शिकार होना पड़ा, जब कुछ लोगों ने उसके रंगे बालों पर फब्ती कसी और इसका प्रतिवाद करने पर उसे मारना-पीटना शुरू कर दिया।

दिल्ली पुलिस की फोन पर विशेष सहायता सेवा शुरू होने से पूर्वोत्तर के लोगों को अपनी शिकायतें दर्ज कराने में काफी सहूलियत होगी। हालांकि आपराधिक मामलों की शिकायत के लिए


पहले ही टेलीफोन सेवा मौजूद है, पर पूर्वोत्तर के लोगों के साथ भाषा संबंधी समस्या होने की वजह से इस सेवा पर शिकायतें दर्ज कराने में उन्हें कई बार दिक्कत पेश आती हैं। फिर यहां की पुलिस का रवैया भी स्थानीय लोगों जैसा ही होता है, इसलिए उन्हें माकूल मदद नहीं मिल पाती। इसके मद्देनजर नई सहायता सेवा में पूर्वोत्तर के पुलिस अधिकारियों को तैनात किया गया है। इससे न सिर्फ पुलिस को भाषा संबंधी समस्या से पार पाने में मदद मिलेगी, बल्कि पूर्वोत्तर के लोगों में भी अपनी शिकायतें दर्ज कराने का साहस बढ़ेगा। मगर इसके साथ ही उनके साथ होने वाले भेदभाव को रोकने के दूसरे उपायों पर भी विचार करने की जरूरत है। शैक्षणिक संस्थानों में पूर्वोत्तर के लिए विशेष छात्रावास बनाने से वहां से आने वाले विद्यार्थियों में असुरक्षा-बोध काफी हद तक कम किया जा सकता है। फिर लोगों में जागरूकता पैदा करने की कोशिश भी होनी चाहिए। इसकी शुरुआत स्कूली पाठ्यक्रमों से की जा सकती है। हम अपने देश की विविधता का राग अलापते रहते हैं, पर हाल यह है कि पूर्वोत्तर की संस्कृति के बारे में कुछ जानना तो दूर, औसत पढ़े-लिखे लोगों को वहां के बारे में सामान्य भौगोलिक जानकारी भी नहीं होती। हमारी राजनीति में भी पूर्वोत्तर के प्रति संवेदनशीलता नहीं दिखती, शायद इसलिए कि वहां के राज्य इतने बड़े नहीं हैं कि राष्ट्रीय राजनीति को प्रभावित कर पाएं। पूर्वोत्तर के प्रति उपेक्षा और भेदभाव का लंबा सिलसिला है। दिल्ली पुलिस की हेल्पलाइन एक सकारात्मक मगर छोटा-सा कदम है।

 

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