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आलोचना का विवेक PDF Print E-mail
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Saturday, 15 February 2014 10:59

मिथलेश शरण चौबे

जनसत्ता 15 फरवरी, 2014 : इतिहास यह नहीं सिखाता कि उसके खाते में जो विफलताएं दर्ज हैं, हम वर्तमान के घटित पर उसे आरोपित करें। इतिहास को जानने का एक उद्देश्य यह है कि उसमें हुए श्रेष्ठ को हम वर्तमान की कसौटियों पर तोलने की कोशिश करें और उसकी अराजकता, अन्याय, विफलता, मूर्खता के अनेक भयावह और विद्रूप किस्सों से सबक लेते हुए अपने वर्तमान को उससे बचा ले जाएं। लेकिन ऐसा आमतौर पर नहीं होता। अपने पूर्वग्रहों और जड़ विचारों की व्याख्या के लिए इतिहास से हम मुफीद प्रसंगों को चुन कर कुछ तर्क हासिल कर लेते हैं, जो वर्तमान में मौजूद संभावना को झुठलाने की कोशिश करने लगते हैं। भारतीय लोकतंत्र कुछ विफल प्रयोगों के बीच लगभग इकहरेपन से चलती हुई एक दर्शनीय अव्यवस्था की तरह है, जिसमें अब तक सामान्य मनुष्य का कोई महत्त्व नहीं रहा है। पारंपरिक तरीकों से व्यवस्था पर काबिज होना और उसे अपनी मर्जी से चलाते रहने का हुनर जो जानते हैं, उनके हम इतने ज्यादा अभ्यस्त हो गए हैं कि ‘कुछ बेहतर भी संभव हो सकता है’ जैसी बात हमें बिल्कुल नहीं सुहातीं। अपने स्वार्थों को साधने में लगे जनविमुख बड़े राजनीतिक दल सिर्फ शासन नहीं चलाते, वे अदृश्य रूप से हमारे विवेक में दीमक लगाने का काम भी करते हैं। फिर हम उनके द्वारा प्रस्तुत चेहरों और नीतियों के आगे के संसार की कल्पना भी नहीं कर सकते।

स्वाभाविक आलोचकों के लिए हर क्षण की गतिविधियां और उनकी अनर्गल व्याख्या ही पर्याप्त रहती है। जनता पार्टी और संयुक्त मोर्चे के विफल प्रयोगों ने इतिहास के सहारे आलोचना करने वालों को बड़े ठोस तर्क उपलब्ध करा दिए हैं। कुछ हर समय निंदा के लिए ललकते लोगों को देश-दुनिया के अन्यान्य विषयों से जैसे इन दिनों विरक्ति-सी हो गई है। किसी को संदिग्ध मानना और अपनी तरह उसके दोषों की व्याख्या करना सहज बात है और इसके लिए सभी स्वतंत्र भी हैं। लेकिन आलोचना का इकहरापन आलोचकों को ही कठघरे में खड़ा


करता है। वर्षों से जन-विरोधी और राजनीति को पतित करने में लगे नेताओं की लंबी सूची ऐसी है, जो अक्सर तीखी आलोचना से बच निकलती है। घोटाले में संसद सदस्यता से बर्खास्त किए गए नेता हों या फिर धर्म के ध्रुवीकरण से देश की बागडोर संभालने का सपना पाले नेताजी, आलोचकों की उदारता से अपने मंसूबों में निर्विघ्न लगे रहते हैं। व्यावसायिक परीक्षा मंडल मध्यप्रदेश में पार्टी और सरकार की सिफारिश पर हुई हजारों फर्जी नियुक्तियां जहां निंदनीय नहीं रह जातीं, वहीं एक बड़े दल के अनेक बड़े नेताओं की हास्यास्पद सार्वजनिक चाटुकारिता भी अलक्षित रह जाती है। मुखर आलोचना कभी पारिवारिक हैसियत को योग्यता मान लिए जाने पर आंख नहीं दिखाती तो कभी राज्यों के प्रतिपक्ष की अवसरवादी राष्ट्रीय जुगलबंदी पर खामोश रह जाती है।

राजनीति के बाहर सार्वजनिक जीवन के बहुविध क्षेत्रों में अन्याय, अराजकता, शोषण, अमानवीयता, फूहड़ता, वैमनस्य आदि के अनेक ऐसे वृत्तांत रोज घटित दिखाई देते हैं, जिन्हें जी भर कोसे बिना रहा नहीं जाता। शायद वे मुखर आलोचकों के लिए ज्यादा मायने नहीं रखते। वर्षों से चली आ रही साधारण मनुष्य से दूरी रखने वाली व्यवस्था के विकल्प के बतौर अगर कोई अधबनी ही सही, सकारात्मक बदलाव की कोशिश घटित होती दिख रही है तो उसे सांस लेने का मौका तो देना ही चाहिए। उनके गलत की भी आलोचना जरूरी है। हमारे पास यह अवसर है कि हम चंद लोगों को परिवर्तन के प्रतीक की माला न पहना कर अपने स्तर पर बेहतर के लिए प्रयास करें और अपने समय की जघन्यताओं-क्रूरताओं की कठोर निंदा भी करें। लेकिन एक की निंदा का उतावलापन अगर अन्य के प्रति उदारता का सबब बन जाए तो इसे आलोचना का विवेक नहीं कहेंगे!

 

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