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आधे सच की राजनीति PDF Print E-mail
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Friday, 14 February 2014 11:58

कुमार प्रशांत

जनसत्ता 14 फरवरी, 2014 : जनार्दन द्विवेदी कांग्रेस के महासचिवों में एक हैं। लेकिन सभी जानते हैं कि

दूसरे सारे महासचिव एक तरफ, जनार्दन द्विवेदी एक तरफ! उन जैसा आदमी जब अचानक यह बोल पड़े कि आरक्षण का आधार जाति नहीं, गरीबी होना चाहिए और यह अब तक इसलिए नहीं हो सका है कि निहित स्वार्थों ने इस पूरी प्रक्रिया पर कब्जा कर लिया है, तब सोचना ही पड़ता है कि इस आधे-अधूरे सच के पीछे की पूरी राजनीति क्या है? वे कहते हैं कि हमें इस सच्चाई को स्वीकार करना चाहिए कि इतने वर्षों बाद भी सारे पिछड़ों-दलितों को आरक्षण का लाभ नहीं मिल पा रहा है। ऊपर वाले ही सारी मलाई खा जाते हैं। यह सब ऐसा नहीं है जो पहली बार कहा जा रहा है, लेकिन जनार्दन द्विवेदी जैसे स्तर के किसी कांग्रेसी ने अब तक यह सब कहा नहीं था!

 

कांग्रेस में किसी को भी वही और वहीं तक अपनी कोई राय रखने का अधिकार होता है जो और जितना दस-जनपथ से बताया जाता है। वहां तो कोई भी राय रखना ही अपराध माना जाता है, जाहिर करना तो दरकिनार! तो क्या जनार्दन द्विवेदी ने आरक्षण के बारे में अपना जो गहन चिंतन जाहिर किया वह भी दस-जनपथ में बनी किसी रणनीति का हिस्सा था? द्विवेदी के इस आरक्षण-बम परीक्षण के बमुश्किल कुछ घंटों बाद दस-जनपथ स्वयं ही बोल उठा और जनार्दन द्विवेदी की मिट्टी पलीद हो गई। सोनिया गांधी ने कहा कि जातीय आधार पर आरक्षण की परिकल्पना कांग्रेस की ही देन है और कांग्रेस उससे कभी भी मुंह नहीं मोड़ेगी।

इधर सोनिया गांधी के मुंह से यह निकला और उधर जनार्दन द्विवेदी का मुंह बंद हो गया। यह तो है कांग्रेस का आंतरिक लोकतंत्र! सोनिया गांधी की बात आ गई तब कहीं जाकर दलितों और पिछड़ों की राजनीति करने वाले कांग्रेसियों की जान में जान आई। मायावती और दूसरे जातिवादियों का- जिनकी राजनीतिक गाड़ी जातिवाद के र्इंधन से ही चलती है- हौसला बहुत बढ़ गया था कि अब कांग्रेस को घेरना आसान हो जाएगा। वे भी सोनिया गांधी के बयान के बाद हाथ मलते रह गए।

अब बच गए हैं तीन- जनार्दन द्विवेदी, उनका बयान और उसकी प्रतिध्वनि! द्विवेदी का यह बयान कदापि उनकी मासूम राय भर नहीं था और न इतिहास में गहरे पैठ कर लाया गया कोई नायाब मोती ही था। यह भारतीय जनता पार्टी की उस रणनीति का कांग्रेसी जवाब था जिसके तहत सारे देश को यह बताया जा रहा है कि नरेंद्र मोदी पिछड़ी जाति से आते हैं। सत्ता की भूख आपको कहां से कहां गिराती और कहां-कहां पहुंचाती है, यह देखना हो तो आप भारतीय जनता पार्टी को देखिए!

जिन-जिन बातों को अपनी पहचान बना कर भारतीय राजनीति में यह पार्टी अलग और असली होने का दावा करती थी, आज उन सबको गंदे कपड़ों की तरह उतार कर, यह सत्ता की घुड़दौड़ में पड़ी हुई है। अब नरेंद्र मोदी हिंदुत्व की कम और हिंदुस्तान की बातें ज्यादा करने लगे हैं; वे अब वल्लभभाई पटेल की विश्व-कीर्तिमान वाली प्रतिमा बनाने लगे हैं, दीनदयाल उपाध्याय या अटल बिहारी वाजपेयी की प्रतिमा अब उनकी रणनीति का हिस्सा नहीं है। वे गुरुजी की किताबों से अब इतिहास या अर्थशास्त्र नहीं पढ़ते, हारवर्ड विश्वविद्यालय की चर्चा करते हैं और चाय वालों और घर-काम करने वालियों की बात करते हैं।

राहुल गांधी ने अपनी मां की परेशानी की बात कभी की थी तो नरेंद्र मोदी ने उनकी खिल्ली उड़ाई; और अब यह हाल है कि नरेंद्र मोदी अपनी गरीबी की, अपने पिछड़ी जाति के होने की, अपनी मां की घर-मजदूरी की, चाय बनाने की ही चर्चा करते हैं। वे सही-गलत, सच-झूठ, इतिहास-भूगोल सबकी ऐसी-तैसी करते हुए, जहां जो बात चल जाए, वहां वह कह कर निकल रहे हैं। यह चुनावी सन्निपात है।

भारतीय जनता पार्टी पहले से भी जानती है, और अब, जब उसकी कमान नरेंद्र मोदी के हाथ में है तब वह और ज्यादा अच्छी तरह जान गई है कि मुसलमानों का वोट उसे नहीं मिलने वाला है। गुजरात में मुसलमानों ने बड़ी संख्या में मोदी को वोट दिया, भारतीय जनता पार्टी का यह दावा उतना ही सच्चा है जितना यह कहना कि भारत की साड़ी और बिंदी यूरोप-अमेरिका में फैशन बनती जा रही है। नरेंद्र मोदी को सर्वोच्च अदालत ने नीरो क्यों कहा था, लोग यह जानते हैं। पर मोदी को जब लगा कि अपनी महत्त्वाकांक्षा को साधने के लिए दाग छुड़ाने होंगे तो उन्हें सद्भावना उपवास की सूझी।

अमदाबाद में पिछले दिनों कुछ मुसलिम कारोबारियों को इकट्ठा कर वहां मोदी ने कहा कि मुसलिम समुदाय विकास की गाड़ी का दूसरा पहिया है। प्रधानमंत्री पद की लालसा में यह सब कवायद कर रहे मोदी ने गुजरात के विधानसभा चुनाव में एक भी मुसलिम उम्मीदवार नहीं खड़ा किया था! दरअसल, इस वक्त मुसलमानों के प्रति नरमी या सौहार्द दिखाने के पीछे भाजपा की रणनीति यह है कि मुसलमान उसे हराने की मंशा से वोट न डालें, जैसा कि बहुत बार देखने में आया है। फिर यह भी समझने की बात है कि गुजरात में जिन मुसलमानों का वोट भाजपा को मिला, वे एक खास वर्ग के, मुट्ठी भर मुसलमान हैं जिनका बहुत बड़ा


आर्थिक हित सरकार या सत्ता से अलग जाने पर खतरे में पड़ता है।

यह सच हमसे ज्यादा नरेंद्र मोदी को पता है और इसलिए राष्ट्रीय स्तर पर सत्ता की खोज में निकले मोदी को किसी दूसरे बड़े वोट बैंक की तलाश है। इस तलाश में वे इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि अगर इस वक्त वे दलित या पिछड़ी जाति की अपनी पहचान बना सकें तो कांग्रेस के वोट बैंक को तोड़ा जा सकता है। इधर यह समझ में आया और उधर मोदी दलित और पिछड़े बन गए!

अब कांग्रेस परेशान है कि वह इसका मुकाबला कैसे करे। उसका हाल बुरा है- न कोई राष्ट्रीय आधार बचा है न कोई राष्ट्रीय नेता! एकमात्र राहुल गांधी हैं कि जिन्हें अभी अपना ही कद मालूम नहीं है। फिर मोदी का मुकाबला कैसे हो? कांग्रेस राजनीतिक संभावनाएं टटोल रही है। उसने आरक्षण को निशाने पर लिया। जातियों के लिए नहीं, गरीबों के लिए आरक्षण हो, ऐसा नारा लगा कर क्या वह मोदी के अचानक दलित-पिछड़ा बन जाने के कारण सिकुड़ा अपना वोट बैंक बड़ा कर सकती है?

ऐसे नारे से वोट बैंक फैलेगा कि सिकुड़ेगा? जवाब किसी के पास नहीं है। इसलिए तय हुआ कि यह पासा फेंका जाए और किसी ऐसे आदमी द्वारा इसे फिंकवाया जाए जिसकी पहुंच के बारे में कहीं, किसी को कोई शंका न हो, ताकि बात में वजन भी रहे और विश्वसनीयता भी; और फिर प्रतिक्रिया नापी जाए। सकारात्मक प्रतिक्रिया रही तो बात आगे बढ़े; नकारात्मक प्रतिक्रिया हो तो उसे प्रभु-परिवार के किसी सदस्य द्वारा वापस ले लिया जाए ताकि उनकी विश्वसनीयता की कमाई कर ली जाए। यह एक तीर से कई शिकार वाला मामला था।

जातीय पहचान की राजनीति और आरक्षण का राजनीतिक हथियार- कांग्रेस ने इन दोनों को इस कदर मजबूत बनाया, फैलाया और स्पर्धा में उतार रखा है कि उसे बदलना उसके बस की बात भी नहीं रह गई है। यह शेर की सवारी जैसा मामला बन गया है। इसलिए रणनीति का दूसरा तीर तुरंत ही इस्तेमाल किया गया और सोनिया गांधी का बयान सामने आ गया। लेकिन वह कहते हैं न कि तरकश से निकला तीर वापस नहीं होता है, वैसा ही कुछ हो रहा है कि जनार्दन द्विवेदी आधा सच क्यों बोल रहे हैं?

आरक्षण जिस लक्ष्य को हासिल करने के लिए लाया गया था, वह एक किनारे रह गया और कांग्रेस, कांशीराम, मायावती, मुलायम सिंह यादव मानो इसे तलवार बना कर  भांजने लगे। जब दूसरे दलों ने भी देखा-समझा कि यह तलवार सत्ता को करीब ला सकती है, तो सभी इसे भांजने में लग गए। अचानक बाबा साहब आंबेडकर सबके आराध्य बन गए और संविधान के निर्माता करार दिए गए, लेकिन इतिहास बड़ी टेढ़ी शै है। उसका आप चाहे जितना बेजा इस्तेमाल करें, किसी मोड़ पर वह अपना सच इस तरह जाहिर कर देता है कि आप ठगे-से, फिसल कर औंधे मुंह गिरते हैं।

अब बताना जनार्दन द्विवेदी को है कि अगर उनका यह तर्क सही है कि आरक्षण का फायदा सारे दलितों तक इसलिए नहीं पहुंचा कि कुछ निहित स्वार्थों ने उस पर कब्जा कर लिया है, तो क्या यही भारतीय राजनीति का भी सच नहीं है कि लोकतंत्र का फायदा जन-जन तक इसलिए नहीं पहुंचा है कि उस पर निहित स्वार्थों ने कब्जा कर लिया है?

यह भी कि भारतीय राजनीति पर सबसे बड़ा और कड़ा कब्जा कांग्रेस का ही रहा है! उसने तो सारा लोकतंत्र एक परिवार के ही हवाले कर, लोकतंत्र से किनारा कर लिया है! तब अगर जनार्दन द्विवेदी आरक्षण का आधार इस आधार पर बदलने की बात करते हैं कि उस पर मुट्ठी भर लोगों का कब्जा हो गया है तो क्यों न राजनीति का भी और लोकतंत्र का भी आधार बदला जाए, क्योंकि उस पर भी मुट्ठी भर निहित स्वार्थियों का कब्जा हो गया है?

लोकतंत्र का यह पूरा खेल लोकसभा और देश की तमाम विधानसभाओं की कुल संख्या को जोड़ लें तो कुछ हजार लोगों के बीच कैद हो गया है। करीब सवा अरब लोगों के देश की किस्मत से खेलते कुछ हजार अनपढ़, साक्षर जाहिल, आर्थिक अपराधी, सांप्रदायिक क्रूरता के धनी, परिवारवादी लोग लोकतंत्र का दावा भी कैसे कर सकते हैं?

आरक्षण के संदर्भ में हमारी न्यायपालिका ने जिस क्रीमी लेयर की बात की है, क्या वही क्रीमी लेयर नहीं है जिसमें राहुल गांधी, नरेंद्र मोदी, मायावती, मुलायम सिंह, वामपंथी, दक्षिणपंथी, मंदिरपंथी और मस्जिदपंथी, गुरद्वारापंथी, चर्चपंथी सभी आते हैं? इन सबने लोकतंत्र पर इस तरह कब्जा कर रखा है कि इसकी सांस घुट गई है! अब जो बचा है वह ढांचा भर है जिसे निहित स्वार्थ का बेताल कांधे पर उठाए घूमता है। अगर आरक्षण के संदर्भ में जनार्दन द्विवेदी का सच सच है तो लोकतंत्र के संदर्भ में यह सच झूठ कैसे हो सकता है?

 

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