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संकीर्णताओं की विषबेल PDF Print E-mail
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Wednesday, 12 February 2014 11:48

रमणिका गुप्ता

जनसत्ता 12 फरवरी, 2014 : हाल में वीरभूम की एक आदिवासी पंचायत ने दूसरे धर्मावलंबी युवक से

प्रेम करने के अपराधस्वरूप एक बीस वर्षीय युवती को सामूहिक बलात्कार का दंड दिया। पूरा देश दहल उठा। पंच परमेश्वर के आदेश पर लड़की के आस-पड़ोस के युवा से लेकर पिता की उम्र तक के तेरह लोगों ने उसके साथ सार्वजनिक स्थल पर निर्ममतापूर्वक बलात्कार किया। युवती के परिजन बेबसी के साथ यह सब होता देखते रहे। पंचायत स्थल पर मौजूद किसी की भी संवेदना जागृत नहीं हुई। किसी ने इसे रोकने का प्रयास नहीं किया।

 

यह एक शर्मनाक, अप्रत्याशित और हैरान कर देने वाली घटना है। वीरभूम की घटना आदिवासी संस्कृति में कुछ आयातित विकृतियों का संकेत दे रही है। घटना के संदर्भ में जो तथ्य सामने आ रहे हैं उनसे पंचायत का फैसला सांप्रदायिक वैमनस्य की भावना और पैसा ऐंठने की कुत्सित प्रवृत्ति से भी प्रेरित दिखता है। युवक दूसरे धार्मिक समुदाय से संबंधित था। पंचों की नाराजगी का यही सबब था। इस सांप्रदायिक घृणा का स्रोत आदिवासी बहुल इलाकों में कट््टर हिंदूवादी संगठनों की बढ़ती सक्रियता ही हो सकता है।

पारंपरिक आदिवासी समाज में सांप्रदायिकता के लिए कभी कोई जगह नहीं रही। बलात्कार की घटनाएं भी इस खुले और मुक्त समाज में कभी नहीं होती थीं। इस भोले-भाले समाज में निहित स्वार्थ के तहत सांप्रदायिकता का जहर बोया जा रहा है, लेकिन उसे बेअसर करने की जिम्मेवारी न सरकारी तंत्र उठा रहा है, न ही विचारधारा की बात करने वाले राजनीतिक दल या संगठन। समाज या कहें जनता तो हर मामले में असंपृक्त, असहिष्णु, तमाशबीन बन कर खड़ी रहती है। निर्भया के मामले में भी जनता ने उसके नंगे शरीर को ढंकने की जहमत नहीं उठाई और हाल में दो मणिपुरी युवतियों की सरेआम पिटाई को भी रोकने की जरूरत नहीं समझी।

आदिवासी समाज में किसी भी पंचायत द्वारा बलात्कार की सजा देने की संभवत: यह पहली घटना है। ऐसा प्रावधान आदिवासी समाज की दंड संहिता में शामिल नहीं रहा। यह हरियाणा की कुख्यात खाप पंचायतों से आयातित प्रतीत हो रहा है। खाप पंचायतों के क्रूरतापूर्ण फैसलों की आलोचना तो की जाती है, लेकिन उन्हें प्रतिबंधित करने या भारतीय दंड संहिता के दायरे में लाने का कभी गंभीरता से प्रयास नहीं किया गया। इसीलिए वह देश भर की जातीय पंचायतों के अंदर वैमनस्य और कट््टर तौर-तरीकों के संचार का माध्यम बनने लगा है। जातीय पंचायतों का काम मुख्यत: सुधारात्मक होना चाहिए, जो प्राय: होता भी था। उन्हें रोजमर्रा के छोटे-मोटे विवादों को हल करने का अधिकार तो मान्य हो सकता है,  लेकिन अमानवीय और कानून-विरोधी दंड देने का अधिकार न कभी था और न ही दिया जा सकता है।

देश की किसी जातीय पंचायत ने दहेज प्रथा, बाल विवाह, विधवा विवाह, भूत-प्रेत या अन्य सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ कोई अभियान चलाया हो, इसकी कोई मिसाल नहीं मिलती। इनके गठन की प्रणाली में भी एकरूपता नहीं है। इनके अधिकारों और कर्तव्यों का कोई सीमांकन भी आज तक नहीं किया गया है। इनके पदाधिकारियों को भारतीय संविधान और दंड संहिता की जानकारी देने की भी कोई व्यवस्था नहीं है। आमतौर पर जाति विशेष के दबंग लोग इन पर काबिज हो जाते हैं, जो अपना चमड़े का सिक्का चलाने लगते हैं।

इन लोगों या अंधविश्वासी और जड़ किस्म की पुरानी पीढ़ी के बुजुर्गों का आदेश ही उनका कानून होता है। अपने समुदाय के गरीबों, खासकर स्त्रियों और सामाजिक दृष्टि से कमजोर मानी जाने वाली जमातों पर अपना रौब गालिब करने के लिए गांव के ये दबंग ऐसी पंचायतों का इस्तेमाल करते हैं। ये लोग संस्कृति के नाम पर पुरानी दकियानूसी और बर्बर परंपराओं और गैर-कानूनी सामाजिक वर्जनाओं को कायम रखने के लिए ऐसे युवक-युवतियों को प्रताड़ित और दंडित करने का कोई भी अवसर हाथ से जाने नहीं देते, जो जातीय व्यवस्था को तोड़ कर अपना रास्ता खुद तय करते हैं।

सामूहिक बलात्कार का आदेश जिस जातीय पंचायत ने दिया उसके पंचों को निश्चित रूप से भुक्तभोगी परिवार की माली हालत की जानकारी थी। उन्हें पता था कि कौन परिवार पैसा देने की स्थिति में है और कौन नहीं, इसलिए उन्होंने पैसा ऐंठने और मनमानी करने के लिए इतना भारी दंड लगाया। युवक के परिवार से पच्चीस हजार रुपए वसूल कर उसे छोड़ दिया और युवती को अपनी मनमानी का शिकार बनाया। आज ऐसी जातीय पंचायतों का संचालन समांतर सरकार की तरह होने लगा है। इस घटना के बाद पश्चिम बंगाल के राज्यपाल ने सभी राज्य सरकारों से ऐसी गैर-कानूनी जातीय अदालतों को प्रतिबंधित करने की अपील की। वास्तव में यह सिर्फ एक आदिवासी पंचायत के क्रूरतापूर्ण आचरण का मामला नहीं है। यह सांस्कृतिक विकृति का एक खतरनाक संकेत है, जिसे पश्चिम बंगाल सहित तमाम आदिवासी बहुल या गैर-आदिवासी राज्यों की सरकारों को भी गंभीरता से लेना चाहिए। वैचारिक दलों या वाम दलों के लिए भी यह चिंता का विषय है।

सांप्रदायिकता के साथ-साथ हाल के वर्षों में क्षेत्रीय वैमनस्य की भावना भी तेजी से पनपी है। देश की राजधानी दिल्ली के कोटला मुबारकपुर इलाके के भीड़भाड़ वाले बाजार में मणिपुर की दो युवतियों के साथ पच्चीस जनवरी की रात एक छोटी-सी घटना को लेकर मारपीट और छेड़खानी की गई और इसकी प्राथमिकी दर्ज करने में पुलिस ने टालमटोल का ऐसा रवैया अपनाया कि आरोपियों की गिरफ्तारी में एक हफ्ता लग गया। यह पुलिस-प्रशासन की कार्यशैली पर सवालिया निशान खड़े करता है। इससे भी चिंताजनक यह है कि उन दो युवतियों के साथ सरेआम पिटाई हुई, उनके साथ दुर्व्यवहार होता रहा और घटनास्थल पर मौजूद लोग तमाशबीन बन सारा कुछ देखते रहे। किसी ने हमलावरों को रोकने-टोकने


की जरूरत नहीं समझी।

इस कांड के चार दिन बाद अरुणाचल के एक विधायक के पुत्र नीडो तानिया की पीट-पीट कर हत्या कर दी गई। सिर्फ इसलिए कि उस युवक ने अपने बाल रंग रखे थे, जिस पर लाजपत नगर के दुकानदारों ने कटाक्ष किया। जब तानिया ने उनकी व्यंग्य-वाणी का विरोध किया तो दुकानदारों ने उसे पीट-पीट कर अधमरा कर दिया। बाद में उसकी मौत हो गई। इस मामले में तो खुद पुलिस ने उस लड़के से दस हजार रुपए जबरन ऐंठ लिए और उसे धमका कर उस दुकानदार को, जिसने उसे पीटा और पिटवाया था, समझौते के रूप में सात हजार रुपए दिलवा दिए। वारदात के बाद छात्र संगठनों के विरोध और आक्रोश को देखते हुए पुलिस सक्रिय हुई और तब तानिया के हत्यारों के अलावा मणिपुरी युवतियों के साथ दुर्व्यवहार करने वालों की भी गिरफ्तारी संभव हो सकी।

देश के अन्य हिस्सों में भी पूर्वोत्तर के लोगों की नागरिकता को ही खारिज किए जाने के कई उदाहरण हैं। पूर्वोत्तर के निवासी दूसरे राज्यों में सामाजिक स्तर पर ही नहीं, प्रशासन की निगाह में भी पराए ही होते जा रहे हैं। दिल्ली हो या देश के अन्य महानगर और शहर, पूर्वोत्तर के लोगों में असुरक्षा की भावना घर करती जा रही है। कर्नाटक में पूर्वोत्तर के छात्रों में असुरक्षा की भावना के कारण भगदड़ मचना, उनका वापस अपने गृह राज्यों में लौटना, यह सवाल उठाता है कि क्या भारत एक देश बन पाया है?

आमतौर पर भारत की जनता असम के बाद वाले पूर्वोत्तर भारत को न जानती है न ही पहचानती है। ये तथ्य भारतीय समाज के संकीर्ण सोच और अज्ञान को भी दर्शाते हैं। यह संकीर्णता राष्ट्रीय भावना के क्षरण की द्योतक है। कितनी शर्म की बात है कि हमारे देश के अधिकतर लोग पूर्वोत्तर के लोगों को भारतीय नागरिक के रूप में भी नहीं पहचानते। हम उन पर राज तो करते हैं, पर उन्हें अपना नहीं मानते। इस प्रकार उन्हें अपने ही देश में बेगाना बना दिया गया है। यही कारण है कि अब वे अपनी जड़ों की तलाश भारत के बाहर करने लगे हैं। यह भारत सरकार और भारतीय जनता के लिए चिंता ही नहीं, शर्म की बात भी है। सांप्रदायिकता, जातीयता, क्षेत्रीयता आदि की संकीर्ण भावनाएं जनमानस को प्रदूषित करती जा रही हैं। इनके निवारण का कोई प्रयास किसी भी मंच से नहीं किया जा रहा। वोटों की राजनीति के तहत इन्हें और उकसाने का ही काम हो रहा है।

यह एक बहुत ही खतरनाक प्रवृत्ति है, जो इस देश में पनप रही है। इसकी रोकथाम के लिए न सिर्फ राजनीतिक, बल्कि तमाम संवेदनशील सामाजिक और सांस्कृतिक शक्तियों और शैक्षणिक संस्थाओं को भी आगे आना होगा। यह जरूरी है कि स्कूली स्तर पर पूर्वोत्तर के राज्यों और आदिवासी इलाकों के इतिहास, शौर्य और योगदान को पाठ्यक्रम में शामिल किया जाए। हमारे देश के भी और ब्रिटिश इतिहासकारों ने भी जान-बूझ कर इन इलाकों को नजरअंदाज कर उनकी गाथाओं को हाशिये पर डाल दिया, जबकि मध्यकाल के संघर्षों या स्वतंत्रता संग्राम में इन इलाकों का योगदान किसी मायने में कमतर नहीं रहा।

भारत के छात्रों ने भगतसिंह, चंद्रशेखर आजाद, बटुकेश्वर दत्त और स्वतंत्रता संग्राम के अन्य नेताओं के नाम सुने हैं। उनके बारे में पढ़ा है। लेकिन मेघालय के सशस्त्र विद्रोही नंगवाह के बारे में वे नहीं जानते, जिन्हें अंग्रेजों ने फांसी पर चढ़ा दिया था।

मेघालय के ही तिरोत सिं का उन्होंने नाम भी नहीं सुना, जो चार साल तक अंग्रेजों की र्इंट से र्इंट बजाते रहे। वे मिजोरम की रानी रूपलियानी के बारे में नहीं जानते, जिन्होंने घोषणा की थी कि अंग्रेजों को देश के बाहर निकाल कर रहेंगी। उनकी मौत जेल में हुई। झारखंड के रमना अल्हाड़ी 1766 में अंग्रेजों के खिलाफ जंग छेड़ने वाले पहले स्वतंत्रता सेनानी थे, लेकिन इतिहास में उन्हें जगह नहीं मिली। तिलका मांझी से भारतीय जनता अनजान है। बिरसा के बारे में तो लोग अब थोड़ा-बहुत जानने लगे हैं, लेकिन कर्नाटक की रानी चेन्नम्मा, आंध्र प्रदेश के सीताराम राजू, केरल की नीला और चंदू के बारे में अनजान हैं।

भारतीय इतिहास में जिन आदिवासी बहुल क्षेत्रों के इतिहास का जिक्र नहीं है, उन्हीं क्षेत्रों में अंग्रेजों को अपना आधिपत्य कायम करने में लोहे के चने चबाने पड़े थे। दरअसल, इन राज्यों या क्षेत्रों से शेष भारत के बेगानेपन का एक बड़ा कारण है सूचनाओं का अभाव और पाठ्यक्रम में शामिल इतिहास में उनका जिक्र न होना।

सरकार ने भी इन क्षेत्रों को भारतीय जनता से जोड़ने की नीतियां नहीं बनार्इं। विकास के लिए बनाई गई सरकारी नीतियों ने इन क्षेत्रों में विनाश किया है। अगर राष्ट्र-निर्माण में उन राज्यों के लोगों और वहां के महापुरुषों के योगदान के बारे में जानेंगे, तो उनके प्रति श्रद्धा और अपनेपन का भाव जगेगा। दिल्ली सरकार के शिक्षामंत्री ने इस दिशा में महत्त्वपूर्ण पहल करते हुए घोषणा की है कि वे पूर्वोत्तर को पाठ्यक्रम में शामिल करेंगे। अन्य राज्यों की सरकारों को भी इस दिशा में कदम उठाना चाहिए। इसी प्रकार आदिवासियों और उनकी संस्कृति, जीवनशैली और मूल्यों के बारे में देश की बाकी जनता को अवगत कराने के लिए पाठ्यक्रम के स्तर पर पहल करने की जरूरत है। इतिहासकारों को भी ब्रिटिशकालीन इतिहास लेखन की कमियों को दूर करने का बीड़ा उठाना चाहिए।

 

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